Thursday, 6 July 2017

जाना था कहां जा रहे हैं किधर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    जाना था कहां जा रहे हैं किधर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                        मेक इन इंडिया और स्टार्ट अप इंडिया की बात चलते चलते वहां पहुंच गई है जहां भारत को स्वदेशी की अवधारणा को ही तिलांजलि देनी पड़ी है। तीन साल हो गए गंगा की सफाई करते इस सरकार को भी और पिछली सरकारों की तरह ही गंगा पापियों के पाप धोते धोते और मैली हो गई है। आज राजकपूर जी होते तो उनकी फिल्म का भी रीमेक आ जाता और बाकी नायकों की तरह समाज की बात को अपनी कमाई का जरिया बना सकते थे वो भी। अब हमारी गंगा कोई विदेशी आकर बताएगा कैसे साफ़ होगी , पानी भी उसी से साफ़ करवा लिया जाएगा और देश की सुरक्षा को ड्रोन भी उसी से मिलेंगे। इन सब को छोड़ उस छोटे से देश से ईमानदारी और साहस के साथ निडर होकर किस तरह रहना भी सीख लेते तो बाकी सब खुद ब खुद हो जाता। इधर टीवी और अख़बार वाले खबरों के नाम पर मनोरंजक सामान बेच रहे या झूठे इश्तिहार से कमाई कर के सच के पैरोकार कहला रहे अपने मुंह मियां मिट्ठू बनकर। इनकी खबर में राजनेता अभिनेता खिलाड़ी और शेयर बाज़ारी या अन्य कारोबारी ही नज़र आते हैं। बाकी तीन चौथाई जनता की कोई खबर नहीं है , बस उनकी ख़ुदकुशी खबर है पांच सेकंड की इक दिन। अब महिलाओं से अनाचार की खबर जैसे केवल दोहराई जाती जगह का नाम बदल कर। देश बदल रहा है मोबाइल की कॉलर ट्यून भर बनकर रह गया है , दिखावे की देशभक्ति की तरह।
                                    इधर सत्ताधारी दल को लगता है देश में सरकार संविधान में बताये लोकतान्त्रिक ढंग से चुनाव से नहीं फेसबुक व्हाट्सएप्प पर बहस और शोर से बनेगी। कोई अगले चुनाव में फिर अपने दल को जिताने की कोई और आगे बढ़कर बीस साल किसी नेता की सरकार बनाने की आस लगाए है। सामान सौ बरस का है पल की खबर नहीं। कल क्या होगा किसे मालूम , अभी तलक देश की जनता बहुत अचंभित करती आई है ऐसे आसमानी लोग धरती पर पटकती रही है। ये जो पब्लिक है ये सब जानती है , भीतर क्या है बाहर क्या है ये सब कुछ पहचानती है। आपको इस नए दौर की सुशासन की कुछ वास्तविक घटनाएं बताना ज़रूरी है। शहर की स्वच्छता और आवारा पशु रहित करने का इनाम मिलता है अधिकारी को , मगर जिस जगह राज्य अधिकारी बड़े बड़े भाषण देते वहीं गंदगी उनको दिखती नहीं। किस को छल रहे हो जनता को या खुद अपने आप को। पिछली सरकारें खुला दरबार लगाती थीं आपने नई खिड़की खोल दी अपने नाम से सी एम विंडो मगर हुआ क्या वही ढाक के तीन पात। एक शिकायत वह भी खुद सरकारी प्लॉट्स पर कब्ज़े की नियम कानून को ताक पर रखने और रिश्वतखोरी की , एक महीने में हल किये जाने की बात कहने वाले पहले लिख देते कोई करवाई ज़रूरी नहीं , फिर दोबारा खुल जाती और एक साल छह महीने तक इधर से उधर भेजी जाती जबकि सी एम विंडो को पहले मालूम किस विभाग की बात है। कोई बड़ा अधिकारी साल तक कुछ नहीं करता मगर अचानक सी एम का दौरा होने पर फिर कागज़ी करवाई कर निपटान कर दी जाती है। अभी इतना काफी नहीं है सात महीने बाद बताया जाता है जांच करने पर शिकायत फिर खोल दी गई है। किसी सरकार को खुद अपना उपहास इस तरह करते कभी नहीं देखा था जो इनका देख लिया। 
                   शायद बहुत लोगों को इतना भी मालूम नहीं कि किसी दल की सरकार होना उनके हर नेता को अधिकार नहीं देता सरकारी काम काज में दखल देने को वो भी अपना रोब जमाने को। दल के नेता को खुद की परेशानी होने पर कोई कानूनी अधिकार किसी विभाग पर छापा डालने का है या नहीं , मगर टीवी अख़बार खबर देते हैं नौ बजे दल के नेता ने छापा मारा और कुछ अधिकारी नहीं उपस्थित थे। उनको इतना भी मालूम नहीं बेशक तब वो घर पर रहे हों मगर उनको विभाग के काम पर बाहर भी होना ज़रूरी होता है। और ऐसे में उन पर धौंस जमाना कि हमारा फोन नहीं लिया कितना उचित है जबकि यही सब आम जनता से अधिकारी हर दिन करते रहते हैं। और इस के बाद क्या हुआ वो भी जान लें , विभाग के अधिकारी सत्ताधारी दल के आवास पर छापा डालते हैं और बिजली की चोरी होती पाते हैं तो नेता जी मार पीट और गुंडागर्दी करते हैं ताकि अपने दल की सरकार की सुशासन की परिभाषा समझाई जा सके। जब विभाग के कर्मचारी चेतावनी देते हैं तब उन नेता जी पर मुकदमा दर्ज किया जाता है। मगर दल के लोग अभी भी कहते हैं कि नेता जी की अनुपस्थिति में बिजली काटनी गलत है। अब नेता जी की माता जी जाकर बेटे की गलती की माफ़ी मांगती हैं अधिकारी से मारपीट करने पर। और शायद सदा की तरह मामला पंचायती ढंग से निपटा दिया जाये। नियम कायदा अपराध हर बात आम सहमति से समझौता करवा खत्म। इसको कानून का नहीं कोई और शासन कहते हैं। दिल्ली को जाने कैसा रोग लगा है एक दिल्ली का शासक खुद को दूध का धुला मानता है और जब मर्ज़ी अपने ढंग से जनमत को अपने पक्ष में साबित कर अपने कर्मों को उचित ठहराता है तो दूसरा खुद को समझता है कि बस वही देश की नैया पार लगा सकता है और घोषित करता रहता है उसी का शासन चलने वाला है। ऐसे में क्या बीस साल को चुनाव आयोग को छुट्टी दे दी जाये और टीवी बहस और सोशल मीडिया पर तय हो जाये जनता का अभिमत क्या है। अभी भी आपको लगता है देश और समाज सही दिशा के जा रहे हैं।
       

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