Thursday, 20 April 2017

अहंकार की लाल बत्ती ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

मुझे माता पिता ने दिया क्या था , ये तो मेरी समझदारी और मेहनत है जो आज मेरे पास सब कुछ है। आप को अजीब लगेगा मगर ऐसा सोचने वाले लोग बहुत हैं। उनको मालूम ही नहीं होता कि किन हालात में माता पिता ने उनकी परवरिश कैसे की। शायद उनकी छिपी मेहनत का फल है जो खुद उनको नहीं मिला आपको मिला है। पेड़ लगाने वाला खुद फल नहीं खाता कभी उसके फल कोई और खाता है। आज जो लोग शोर मचाते हैं केवल हम ही सब अच्छा करते हैं और अभी तक बाकी सब सिर्फ बुरा ही करते आये हैं उनको बताना होगा कि आज आप जिस जगह हैं शायद होते ही नहीं अगर आपसे पहले वालों ने ऐसा अवसर सब को मिल सके वो सब नहीं किया होता। किसी नेता या दल की सरकार अगर ये मानती है कि वही सब को सभी कुछ दे रही है तो इसको उनका अहंकार कहना होगा। क्योंकि कोई दल कोई नेता अपनी जेब से या अपनी जायदाद बेच कर जनता को कुछ नहीं देता है , बल्कि देश की जनता के धन पर शाही ढंग से रहता है। शासन करना देश सेवा नहीं होता , देश और जनता की सेवा तब होती जब आप सफेद हाथी की तरह देश के खज़ाने पर बोझ नहीं होते। इसलिए आप जैसी भी राजनीति करें ये दावा नहीं करें कि आप कोई त्याग जैसा महान कार्य करते हैं। पिछली सरकारों ने जो किया जनता जानती है , आप को उनके किये पापों का ही नहीं अपने कर्मों का भी हिसाब देखना है। अभी निर्णय किया गया लाल बत्ती हटाने का जो सही है मगर ऐसा करना ही काफी नहीं है। वास्तविक काम सत्ता की राजनीति नेताओं और प्रशासन की सोच और तौर तरीके बदलने का है। आप ख़ास क्यों हैं जब देश का संविधान सब को बराबरी का हक देता है। और लोकतंत्र का पहला नियम है कोई आपका विरोध कर सकता है , और सत्ता में होते उनके विरोध करने के अधिकार की रक्षा करना आपका फ़र्ज़ है। ऐसा शायद पहली बार आजकल दिखाई दिया है कि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की सभा में जाने वालों की वेशभूषा पर ऐतराज़ किया जाये और काली कमीज़ काली स्वेटर क्या रुमाल और जुराब तक उतरवा दी जाये। पूरा बहुमत फिर भी इतना डर। केवल सड़क पर ही नहीं आपके वाहन पर लाल बत्ती होती है , आप दफ्तर में या जहां कहीं भी हैं आपको खुद को आम नागरिक से अधिक महत्व अपना नहीं समझना चाहिए। ये बात नेताओं अधिकारीयों पर ही नहीं और सब पर भी लागू होती है।
        मैं सब से बड़ा जानकर ज्ञानी , मैं सब से बड़ा गुरु , मैं सब से धनवान , मैं सब से बड़ा दानवीर , मैं सब से पवित्र आत्मा , मैं सब से अधिक देशभक्त और ईमानदार , बड़ा संत साधु सन्यासी , सब से काबिल डॉक्टर वकील या न्यायधीश आदि आदि। मैं मैं मैं। मैं आम आदमी हूं लिखने वाले तक की मानसिकता खुद को सब से ख़ास बताने की नज़र आती है। पत्रकार होना क्या है , आप का ख़ास दर्जा है , आपको सब ख़ास समझें यही चाहते हैं। प्रैस शब्द अपने वाहन पर लिखवाना किसी लाल बत्ती लगवाने जैसा ही है। इसी तरह लोग अपनी कार पर दल का प्रधान या कोई ओहदा लिखवा या सत्ताधारी दल का चिन्ह या झंडा लगा चाहते हैं उनको पुलिस या अन्य लोग विशेष समझें। वास्तव में ऐसा करने वाले लोग भीतर से खोखले होते हैं , जैसे किसी की खुद की कोई काबलियत या पहचान नहीं होती। हर किसी को बताता है मैं उसका बेटा या क्या क्या हूं। अहंकार बड़े होने की नहीं छोटे होने की निशानी है। असली महान लोगों को किसी तमगे लगाने की ज़रूरत होती ही नहीं है।

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