Tuesday, 21 March 2017

फिर एक और सर्वदलीय बैठक ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 सुप्रीम कोर्ट में इक सरफिरे की याचिका पर चुनाव आयोग ने हलफनामा दायर कर कहा है कि वो निष्पक्ष चुनाव के लिए प्रतिबद्ध है और याचिका दायर करने वाले की बात  से सहमत है। पिछली बार सर्वदलीय बैठक एकमत थी कि विधायकों सांसदों मंत्रियों आला अधिकारियों का वेतन भत्ते सुविधायें और कई गुणा बढ़ाना देश की जनता की गरीबी जैसी समस्याओं को मिटाने को अतिअवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट जाने क्यों बार बार आपराधिक और दागदार नेताओं को राजनीति से बाहर निकलना चाहता है , जब कि सब अपराधी विश्वास करते हैं यही अदालत उनको किसी दिन निर्दोष घोषित करेगी। न्याय की देवी की आंखों पर काली पट्टी बंधी इसी लिये है , समझ नहीं आता सब अपना घर छोड़ दूसरे के घर में तांक झांक क्यों करते हैं। सुप्रीम कोर्ट को पहले अदालतों का हाल देख उसको ठीक करना चाहिए , औरों को नसीहत देने से पहले अपने गिरेबान में झांक लेना चाहिए। जो खुद शीशे के घर में रहते हों उनको दूसरों पर पत्थर नहीं फैंकने चाहियें। मंच संचालक आज की सर्वदलीय बैठक की शुरुआत करते ये उदगार व्यक्त कर रहे थे , और उसके बाद बारी बारी सभी नेता गंभीर समस्या का निदान खोज रहे थे अपना अपना मत प्रकट कर संबोधन  में। इक वरिष्ठ नेता ने सवाल किया जब महिलाओं को उनकी आबादी के समान स्थान नहीं मिलने पर आरक्षण की बात की जाती है तब अपराधी क्या देश के नागरिक नहीं हैं। सभी दलों में तीस प्रतिशत उमीदवार आपराधिक पृष्ठ भूमि से होते हैं , जनता खुद भी अपराधी है ऐसे अपराधियों को पसंद करती अपने सर पर बिठाती और जितवाती है। जब हम इस विचारधारा को मानते हैं कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं , तब अपराधी से नफरत किसलिये। अपराध करना उनका कारोबार है पेशा है , और राजनीति उनकी देशसेवा है।
              याचिका दायर करने वाले का कहना है कि नेताओं के आपराधिक मुकदमों की एक साल में सुनवाई करवा जल्द फैसला किया जाये और दो साल की सज़ा मिलने पर उम्र भर का परिबंध चुनाव लड़ने पर लग जाये। ये तो पक्षपात होगा , जनता को भी बराबरी का हक है न्याय पाने का , जैसे किसी ने बीमा करवाया हुआ और जब ऑपरेशन की ज़रूरत हो बीमा कंपनी भुगतान नहीं करती। उसके बाद सात सात साल कोई इंतज़ार करता रहे खर्च किये पैसे वसूल करने को , जब मिलें तब डेढ़ लाख की कीमत जब खर्च हुए से इतनी कम हो चुकी हो कि मुकदमा करने वाला पछताता हो।  क्या ऐसे मुकदमों की सुनवाई जल्दी नहीं की जानी चाहिए। इक नेता का सवाल था क्या हर वोटर वोट देने से पहले शपथ खा सकता है कि उसने कभी कोई अपराध नहीं किया है। क्या घूस देना सिफारिश करवाना अनुचित नहीं है , पहले जनता को खुद अपनी बेगुनाही साबित करनी चाहिए तब नेताओं पर दोष लगाना चाहिए।
                अपराध भी इक हिस्सा है समाज के बहुत सारे बाकी कामों की तरह , और ये जितना कमाई वाला है उतना ही जोखिम वाला भी। ये भी याद रखना ज़रूरी है कि अपराधी बेशक जनसंख्या का पांच प्रतिशत हों , उनके कारण कितने लोगों की रोज़ी रोटी चलती है। पुलिस वकील न्यायपालिका सब का काम अपराध के सहारे चलता है। अपराधी अपराध छोड़ देंगे तो ये सब क्या करेंगे। फिर भी हम नेता अदालत का सम्मान करते रहे हैं करते रहेंगे। जल्दबाज़ी में कोई फैसला लागू नहीं किया जाना चाहिए , इस युग में ढूध का धुला कोई नहीं है। मगर हम सभी को घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है , चुनाव आयोग किसी के चुनाव लड़ने पर क्या रोक लगायेगा , जब संविधान के अनुसार कभी किसी विधानसभा के विधायक अपना नेता तक चुनने को आज़ाद नहीं हैं। हर नेता खुद इक बंधुआ मज़दूर की तरह है , आलाकमान का हुक्म सर्वोपरि है। क्या किसी अदालत को ये अलोकतंत्र दिखाई नहीं देता , हम छोटे अपराधी हैं किसी जुर्म में आरोपित हैं , जो देश के संविधान को बंधक बनाये हुए हैं , विधायकों सांसदों को अपनी मर्ज़ी से नेता तक नहीं चुनने देते उनका अपराध क्या है। कोई जनहित याचिका ऐसे अनुचित लोकतंत्र विरोधी फैसलों पर क्यों नहीं दायर की जाती। चलो इक नया नया शेर सुनाता हूं :-
                       मतलूब सब हाकिम बने , तालिब नहीं कोई यहां ,
                       कैसे बताएं अब तुम्हें कैसी सियासत बन  गई ।
                     चुनाव आयोग और न्यायपालिका को सब से पहले संविधान और लोकतंत्र की रक्षा पर ध्यान देना चाहिए। हम लोग अपराधी थे , शायद अब अपराध छोड़ चुके हैं , जो खुलेआम खिलवाड़ कर रहे हैं , जनता के निर्वाचित प्रितिनिधियों से इतर किसी को मनोनयन से सत्ता पर बिठाना , उन को रोकना प्राथमिकता होनी चाहिए। कठपुतलियों का शासन लोकतांत्रिक नहीं है।
    लो इक ताज़ा खबर , सर्वोच्च न्यायालय सुझाव देता है , आप सभी पक्ष बाहर मिल बैठ समझौता कर लो , अगर ज़रूरत हो हम मध्यस्थ बनने को राज़ी हैं। वाह ! देश की सुप्रीम कोर्ट अब न्याय नहीं समझौता करवायेगी। इसका अर्थ क्या है , आपको क्यों सब को राज़ी करना है , आप न्याय करें। इतने साल तक सब आपकी तरफ देख रहे थे न्याय की खातिर। अब न्याय होगा या किसी गांव की पंचायत की तरह फैसला। नेताओ डरने की कोई ज़रूरत नहीं हमें भरोसा है कोई अदालत हम में किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकती। ऐसे न्यायधीश होते थे कभी गुज़रे ज़माने में जो तब की प्रधानमंत्री के चुनाव तक को अवैध करार कर देते थे। इंसाफ आजकजल नहीं होता , बस समझौते की राह देखते हैं।  सच कहना अपराध है , अवमानना है।
                     

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