Saturday, 25 February 2017

कैसा महाभारत है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  ये वो कुरुक्षेत्र है जिस में कोई कृष्ण धर्म की खातिर धनुष उठाने का उपदेश नहीं दे रहा। जहां सभी अंधे हैं धृतराष्ट्र को सब दिखाई देता है , आंखों वाले आंखें मूंद या गंधारी की तरह पट्टी बांध सच को देखने से बच रहे हैं। भीष्मपितामह को अपनी प्रतिज्ञा याद नहीं रही , गुरु द्रोणाचार्य की चिंता है उनको इतिहास छात्रों को अपनी पसंद से पढ़ाना है। अपने आश्रम को शिक्षा का सब से सफल कारोबार बनाकर जगह जगह अपनी दुकानें खोलनी हैं। युधिष्टर को समझ नहीं आ रहा धर्म किस तरफ है , उसकी व्याख्या बदल चुकी है। कौन पांडव है कौन कौरव किसे खबर , सभी दल बदल बदल एक जैसे बन गये हैं। सब को सभा में स्थान चाहिए आसन चाहिए , हर सुख सुविधा चाहिए। उधर महल में बैठा रावण फिर सीता हरण की योजना बना रहा है , इस बार उसने विभीषणों को अपना बना लिया है सत्ता में भागीदार बनाकर , और उसको राम की सेना की जानकारी और भेद लाने को भेज दिया है। अब राम किसी भरत को सिंघासन पर बिठाने की गलती नहीं करता , लक्ष्मण भी अब बनवास में साथ नहीं जाने को तैयार , सीता की दशा अभी भी वही है। रामायण और महाभारत आपस में घुल मिल गये हैं , कवि वीर रस को छोड़ बुद्ध को याद कर युद्ध में शांति की कविता सुना रहे हैं।
        महिला सशक्तिकरण की चर्चा में शामिल सीता और द्रोपती अपना मुल्यांकन करना चाहती हैं। अभी भी उनकी अग्निपरीक्षा ली जाती है आज भी धर्मराज उसको जुए में दांव पर लगा हार जाते हैं। गंधारी अपनी पट्टी खोल आज भी अपनी संतान के दुष्कर्म नहीं देख सकती। राम-कृष्ण चुनाव में अब मुद्दा तक नहीं हैं , उनके आदर्श खोखले साबित हो गये हैं उनकी निति अपनी उपयोगिकता खो चुकी है। आदर्शों की बात बची ही नहीं , युद्ध में भी अब कोई नियम पालन नहीं करता।  वार कमर से नीचे क्या पीठ के पीछे धोखे से भी करने वाला योद्धा खुद को बलवान बताता है। कुंभकर्ण ने नया अवतार लिया है देश का प्रशासन सारा तंत्र पुलिस अदालत न्यायपालिका सब सुख की नींद सोते हैं जब जनता हाहाकार करती है त्राहि त्राहि कहती है। आधुनिक हनुमान अयोध्या को आग के हवाले कर राजधानी में मंत्री बन गये हैं।
             राम बेबस हैं अकेले हैं , कृष्ण खुद ज्ञान भुला सोच रहे गीता का उपदेश किसको देना है। दुर्योधन को यकीन है अब कोई उसको नहीं मार सकता , सभी उसको समझौते का प्रस्ताव भेज रहे हैं। शतरंज की बिसात फिर से बिछी हुई है , शकुनि अपनी चल चल चुके हैं। विदुर समझ गये हैं अब सच और ज्ञान की निष्पक्षता की बात कहना मुसीबत को आमंत्रित करना है। युद्ध जारी है दोनों तरह से हाथ में काठ की तलवार लिये ललकार रहे इक दूजे को वार करने का साहस किसी में नहीं है। बस जनता को दिखाना है कि युद्ध हो रहा है , मगर मन ही मन चिंतन चल रहा चुनाव के बाद की राजनीति को लेकर। जीत दोनों की और हार देश की जनता की होगी ये तो पहले से तय किया जा चुका है। 

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