Wednesday, 15 February 2017

और इस तरह देशभक्त हो गया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                                  हम सभी खुद को कैसा समझते हैं , क्या अपने आप को कभी आईने में तोलते हैं। कल मुझे एक लेखक की भेजी पुस्तक मिली , जिस में खुद उनकी एक भी रचना नहीं थी। मैंने पहली बार इस तरह की किताब पढ़ी जिस में इतनी विविधता थी , दो शहरों की बात , कुछ मंदिरों , इमारतों की बात और बहुत ऐसे लोगों की भी बात थी जिन्होंने जीवन में कुछ हटकर तमाम कार्य किये। सोचा ये सब पढ़ने और याद करने का अर्थ क्या है। मुझे लगा इन सभी से हमें स्पष्ट रूप से परिभाषायें समझ आती हैं। बस उसी को आधार बना कुछ निष्कर्ष निकालने की कोशिश की है।
                          आप नेता हैं राजनीति करते हैं , अगर देश जनता की भलाई नहीं केवल सत्ता हासिल करना ही आपकी चाहत है आदर्श है तो इस में देशभक्ति कहां है। आपने देश और समाज के नैतिक मूल्यों का पालन किये बिना किसी भी तरह चुनाव जीत लिया तो आप कानून और संविधान की अवहेलना करने वाले अराजक तत्व हैं जो शासक बन अन्याय और लूट ही कर सकते हैं। बड़े  से बड़े पद मिलने पर भी आपने अगर सच्ची निष्ठा और ईमानदारी से देश और राज्य में निष्पक्ष शासन नहीं दिया , लोकहित की नहीं दलहित परिवारहित की ही चिंता की तब आप देशभक्त कैसे हैं। अगर देश या राज्य के कोष का एक भी पैसा आपने व्यर्थ बर्बाद किया जिस से जनता का कुछ भी कल्याण नहीं हो सकता तब आप अच्छे शासक नहीं हैं। और अगर जनता का धन अपनी सुख सुविधा पे खर्च करते हैं जब लोग गरीब हैं भूखे हैं तब आप अमानत में खयानत के दोषी हैं।  जिस शासन में जनता को न्याय बुनियादी हक सुरक्षा और निडर होकर जीने का बराबरी का अवसर नहीं मिलता उसकी पुलिस प्रशासन न्यायपालिका सभी अपना कर्तव्य निभाने में असफल ही नहीं देश और समाज के अपराधी भी हैं। किसी आम आदमी को मरने तक न्याय नहीं मिलना , बिना अपराध जेलों में ज़ुल्म सहना और धनवान और ख़ास लोगों के अपराधों की सज़ा उनके जीवन काल में नहीं मिलना और उनकी मौत के बाद फैसला सुनाना सज़ा का ये न्याय नहीं न्याय व्यवस्था का उपहास है।
               बात केवल नेताओं और प्रशासकों की नहीं है , आप अगर डॉक्टर हैं लेकिन आपका मकसद रोगियों की सेवा या उपचार से अधिक पैसा बनाना है और उस के लिये आप तमाम गलत तरीके अपनाते हैं। तब आप अपने देश समाज और पेशे के प्रति ईमानदार नहीं बल्कि गुनाहगार हैं। देशभक्त तो कदापि नहीं। शिक्षक बनकर शिक्षा का व्योपार करने वाले तो अज्ञानी हैं जो खुद भटके हुए किसी दूसरे को सही दिशा नहीं दिखला सकते। कारोबार भी कुछ नियमों का पालन कर किया जाता है ईमानदारी से , बहुत अधिक मनमाने दाम वसूलना मुनाफाखोरी करना लूट होता है व्योपार नहीं। साहित्यकार लेखक और पत्रकार भी अगर सच की बात नहीं करते और अपने नाम शोहरत पैसा पुरुस्कार की चाह में दरबारी या फिर व्योपारी बनकर फायदा उठाते सच को गलत ढंग से प्रस्तुत कर तब उनका गुनाह अक्षम्य है। चौकीदार हैं आप रखवाली करनी है आपने , खुद को न्यायधीश या थानेदार न समझें।
                       देश के हर नागरिक को अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। केवल नेताओं की बुराई की बातें करना काफी नहीं है। सोशल मीडिया पर संजीदा बातों को उपहास या मनोरंजन की बात बना देना भी अनुचित है , क्यों  नहीं सोचते आपका देश है आपको उसको बेहतर बनाना है जतन करके।  क्या आप देश के नियमों का पालन करते हैं , सोचते हैं आपने देश को या किसी नागरिक को कोई नुकसान नहीं देना। हो सके तो किसी को कुछ फायदा पहुंचना जनसेवा करके देशसेवा कर तभी देशभक्त हैं।  खाली बातों से देश प्रेम नहीं होता है। आज पर्यावरण की हालत देश की और खराब होती जा रही हर साल चालीस प्रतिशत बढ़ रहा प्रदूषण। देश में बीस लाख लोग इसी से मरते हैं हर सेकिंड बीस लोग। पेड़ काटना , वाहनों का धुवां , उद्योगों का धुवां - अन्य गंदगी से धरती और जल का प्रदूषित होना। सीमेंट की ऊंची बहुमंज़िला इमारतें बनाने में प्रदूषण ही नहीं धरती और धरती के नीचे के जल का गिरता स्तर। कौन कौन दोषी है। हर कोई समझता है चर्चा करता है मगर खुद भी किसी न किसी तरह शामिल है देश की बदहाली बर्बादी में। औरों पर सब आरोप लगा मैं देशभक्त नहीं हो गया।


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