Monday, 9 January 2017

आपका आदेश है , हमारी आज़ादी नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    पिता कहते हैं मैं ऐसा चाहता हूं , बच्चों को मानना पड़ता है , अपनी मर्ज़ी नहीं चलती। मगर पिता की हर बात सही हो ये भी ज़रूरी नहीं , जब अनुचित बात माननी पड़ती है तभी एक हद के बाद विद्रोह होता ही है। पिता की समझदारी इसी में है कि उस हद तक मनमानी नहीं करे। सरकार चाहती है अब लोग अपना पैसा अपनी सहूलियत से नहीं खर्च करें , नकद खरीदारी नहीं कर कार्ड से या चेक से भुगतान करें। सरकार को काले धन को रोकना है मगर रोक काले धंधों पर नहीं लोगों पर लगाना चाहती है। नहीं समझे , कल थानेदार आपको आदेश दे घर में पैसा सोना या कीमती सामान नहीं रखो ताकि चोर चोरी नहीं कर सके। उसका सीधा मतलब यही है कि चोरों पर पुलिस का बस नहीं चलता इसलिए शरीफ लोगों पर ही हुक्म चलाते हैं , आपकी गलती है आप सभी रात को सो जाते हो। अगर कोई न कोई जागता होता तो खुद ही चोर को पकड़ लेते , भाई ये नया चौकीदार यही तो चाहता है "जागते रहो "। सोना मना है इस राज में , चैन से सोना तो गुनाह है। अब आप आज़ाद हैं मगर आपको आज़ादी उतनी ही मिलेगी जितनी सरकार चाहेगी। पैसा आपका है मगर आपको सप्ताह में कितना निकालना है ये आपकी मर्ज़ी क्या ज़रूरत पर भी निर्भर नहीं। आप आज़ाद हैं उसी तरह जैसे खूंटे से बंधा जानवर , उसकी रस्सी जितनी है उतनी दूर तक आजा सकता है। तो ये नया तरीका है जनता को खूंटे से बांध नेता लोग छुट्टे सांड की तरह घूमेंगे , उन पर कोई बंदिश नहीं। प्रशासन और सरकार जब जैसे सुविधा हो नियम बदल सकती है , आम नागरिक ही कुछ नहीं कर सकता अपनी सुविधा से। लोकतंत्र मैं और तानाशाही में अब कोई अंतर नहीं रहा , बस जो भी आदेश है आपकी भलाई में है। स्वीकार करना लाज़मी है।
                  कल ऐसा भी मुमकिन है सरकार का बयान आये वो चाहती है लोग शाम होते ही घर में बंद होकर खिड़की दरवाज़े बंद रखें अपनी सुरक्षा की खातिर। अर्थात वो जनता को सुरक्षा देने में नाकाम है। किसी भी अपराध को रोकने का ऐसा तरीका उचित नहीं है। आप अपनी नाकामी या कर्तव्य नहीं निभाने को इस तरह जनता पर अनुचित प्रतिबंध लगा सही नहीं साबित कर सकते। आपको भ्र्ष्टाचार रोकना है , अंकुश उन पर लगाना था जो घोटाले करते हैं , हर काम में रिश्वत खाते हैं , या जो अवैध धंधे करते हैं। आम नागरिक पर अनावश्यक रोक लगा आप अपनी हार मान रहे हैं कि बदमाशों को पकड़ना मुश्किल है तो शरिफ को ही समझाते हैं खुद बदमाश से बचकर रहो। यही आपका तरीका है पुलिस हवालदार वाला , जो सभ्य नागरिक को ही कहता है आप अपराधी के अपराध की बात किसी प्रशासन को मत बताओ। सच है , जिस देश में प्रधानमंत्री का दफ्तर ही ऐसा हो , जिसे कोई सत्येंद्र दुबे जैसा ईमानदार अफ्सर पत्र लिखे भ्र्ष्टाचार की सूचना देने को , और ये जानकारी भृष्ट लोगों तक पहुंच जाये और उसका कत्ल कर दिया जाये , उस देश में और क्या हो सकता है। चुप रहने में भलाई है , सच बोलना मौत को बुलावा देना है। मैंने भी खुद देखा है झेला है इसी शासन में। अंधेर नगरी चौपट राजा , सुना था अब देख भी लिया है।

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