Thursday, 26 January 2017

कोई नन्हा फ़रिश्ता आज भी आ जाता ( बात फिल्मों-संगीत-साहित्य-कविता-कहानियों की ) डॉ लोक सेतिया

                     मैं , मेरी फ़िल्में , मेरे गीत , मेरी शिक्षा ( लोक सेतिया )
मुझ में अगर थोड़ा सा कोई अच्छा इंसान है , इंसानियत की समझ है , दूसरों के दर्द को समझने की संवेदना है , तो वो किसी शिक्षक किसी धर्म प्रवचक या किसी गुरु का दिया ज्ञान नहीं है। ये सब मुझे मिला है इक आदत से जो किसी ज़माने में अच्छी आदत नहीं समझी जाती थी। बचपन से संगीत का चाव और मेरी आवाज़ भले बहुत सुरीली नहीं हो तब भी हर दम गाने-गुनगुनाने का शौक। कॉलेज गया तो फिल्मों से जैसे इश्क़ ही हो गया। सोचता हूं अगर आज के इस युग में मैं पला बढ़ा होता तो कैसा बनता , कठोर हृदय मतलबी , चालबाज़ ,
खलनायक , या कोई ज़ालिम जो बदले की आग में कातिल बन गया। भगवान का शुक्र है मैं उस युग में पला और बढ़ा जिस में माफ करना और नफरत को प्यार से जीतना सिखाया जाता था। आज सुनते हैं किसी फिल्म ने कितने सौ करोड़ का कारोबार किया , मगर किस कीमत पर , इंसान को हैवान या शैतान बनाने की कीमत पर। आज मैं खुद लिखता हूं ग़ज़ल कविता कहानी , मगर मुझे अभी तक लगता नहीं कुछ भी वास्तविक सार्थक लेखन किया है मैंने। इतने साल कलम घिसाई ही की है , काश इक कविता इक ग़ज़ल इक कहानी ऐसी लिखता जो सच में संदेश देती मानवता का। थोड़ा प्रयास किया है , हिलती हुई दिवारें कहानी , औरत कविता , दोस्त बनाने चले हो ग़ज़ल , सत्ताशास्त्र जैसा व्यंग्य जैसी कुछ रचनाएं हैं जिनको मैं समझता हूं कुछ तो सोचने को विवश करती होंगी। मेरी पसंद की फिल्में कई हैं , सफर , ख़ामोशी , बहारें फिर भी आएंगी , नया दौर , नया ज़माना , सैकड़ों हैं। मगर इक फिल्म जिसकी मुझे लगता आज भी फिर से बनाने की या उसी को फिर से दिखाने की बेहद ज़रूरत है वो है " नन्हा फरिश्ता "।
                        हम सब अपने भीतर झांक कर देखें तो अपने अंदर इक डाकू इक ज़ालिम इंसान इक बेरहम लुटेरा मिल सकता है। इक छोटी सी बच्ची तीन डाका डालने आये डाकुओं को घर में अकेली मिलती है जिसे इक डाकू उठा साथ ले जाता है। और पूरी फिल्म झकझोर देती है भावनाओं को जब इक मासूम फरिश्ता उन खूंखार डाकुओं को अच्छे इंसान बना देता है। मुझे भी लगता है मैं आज भी बहुत बुरा हूं और चाहता हूं कोई उस जैसा नन्हा फरिश्ता मुझे बदल दे और मेरे भीतर से सारी बुराई को मिटा मुझे अच्छा आदमी बना दे। काश कोई फिल्म निर्माता दोबारा ऐसी कहानियों पर फिल्म बनाये बेशक उस फिल्म से करोड़ों रूपये नहीं मिलें पर करोड़ों दिलों को बदल दे जो।
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