Sunday, 18 September 2016

देखना अपने समाज को दर्पण के सामने ( कड़वा सच ) डॉ लोक सेतिया

आप जब कुछ नहीं कर सकते तब परेशान ही हो सकते हैं देख देख कर वो सब जो गलत है अनुचित है मगर जिसको सही और उचित समझा जा रहा है। अगर आप विवेकशील हैं चिंतन करते हैं खुद अपने बारे ही नहीं समाज और देश के बारे में भी तब आप अन्य लोगों की तरह ऐसा बोल पल्ला नहीं झाड़ सकते कि मुझे क्या।
और लोग आपको सनकी या पागल कहते हैं और मूर्ख समझते हैं जो अपना हित छोड़ जनहित की बात पर परेशान रहता है। मगर आप चाहो भी तो खुद को बदल नहीं सकते , जब देखते हैं आस पास अनुचित और गैर कानूनी काम हो रहे हैं मगर न पुलिस अपना कर्तव्य निभाना चाहती है न प्रशासन न ही सरकार का कोई विभाग शिकायत करने पर कोई करवाई ही करता है अपितु गुण्डे बदमाश आपराधिक तत्व आपको धमकाते हैं और आपका जीना हराम कर देते हैं क्योंकि आपके पास धन बल या बाहु बल नहीं है। तब लगता है इस समाज में सभ्य और शरीफ नागरिक को जीने की आज़ादी नहीं है। हर नेता बड़ी बड़ी बातें करता है कष्ट निवारण समिति जैसे आडंबर रचाता है मगर जनता को मिलता नहीं न्याय कहीं भी। मात्र उलझाया जाता है , सभाओं के नाम पर , क्या पुलिस या प्रशासन को नज़र नहीं आता जो जो गलत होता सभी को दिखाई देता है।
जब अपराधी के विरुद्ध या कानून तोड़ने वाले के खिलाफ कोई कदम उठाना पड़ता है तब उसको जिसने प्रशासन को सूचित किया होता है अनुचित कार्य होने के बारे उसी को परेशानी में डाला जाता है गलत करने वालों के सामने लाकर खड़ा कर के।  तब जताते हैं अगर ये मूर्ख शिकायत नहीं करता तो सरकार या प्रशासन आपको कदापि नहीं रोकती , क्यों अधिकारी और नेता देश और समाज को ऐसा बना रहने देना चाहते हैं , जैसा कभी नहीं होना चाहिये। इस के बावजूद इनको देश भक्त और जनसेवक कहलाने का भी शौक है , क्या देशभक्ति की परिभाषा यही है। लगता है जैसे हर कोई दूसरों को लूट रहा है , व्योपार के नाम पर , शिक्षा के नाम पर , स्वास्थ्य सेवा के नाम पर या जनता की सेवा का दावा कर के। नैतिकता कहीं बची दिखती नहीं , पैसा सभी का भगवान हो गया है। गैर कानूनी काम जितनी आसानी से यहां किये जा सकते हैं उचित कार्य करना उतना ही कठिन होता जा रहा है। मालूम नहीं ये कैसा विकास है जो विनाश अधिक लाता जाता है।
                   नेता और प्रशासन के लोग इतने बेशर्म हो चुके हैं कि उनको देश की जनता की गरीबी भूख और बदहाली नज़र ही नहीं आती है। झूठे विज्ञापनों पर करोड़ों रूपये बर्बाद किये जा रहे सालों से किस लिये , केवल मीडिया को खुश रखने को , क्या इस से बड़ा कोई घोटाला हुआ है आज तक , हिसाब लगाना कभी। यही धन अगर गरीबों को मूलभूत सुविधायें देने पर खर्च किया जाता तो आज कोई बेघर नहीं होता। नानक जी आज होते तो तमाम धनवान लोगों की रोटी को निचोड़ दिखाते लहू की नदियां बहती नज़र आती। कौन कौन कैसे कमाई कर रहा है  किस किस का खून चूस कर। महात्मा गांधी की समाधि पर माथा टेकने से आप गांधीवादी नहीं हो जाते , याद करें गांधी जी ने कहा था इस देश के पास सभी की ज़रूरत पूरी करने को बहुत है , मगर किसी की हवस पूरी करने को काफी नहीं। आज कुछ लोगों की धन की हवस इतनी बढ़ गई है कि कभी खत्म ही नहीं होती , ध्यान से देखो कौन कौन है जो अरबपति होने का बाद और अधिक चाहता है।  हमारे धर्म ग्रंथ बताते हैं जिस के पास बहुत हो फिर भी और अधिक की चाह रखता हो वही सब से दरिद्र होता है।  इस श्रेणी में नेता अभिनेता नायक महानायक स्वामी और नेता सरकार उद्योगपति ही नहीं धार्मिक स्थल तक आते हैं जो आये दिन बताते हैं कितनी दौलत जमा हो गई किस मंदिर मठ या आश्रम के पास , मुझे दिखाओ किस धर्म की कौन सी किताब में लिखा है संचय करना ऐसे में जब लोग भूखे नंगे और बदहाली में जीते हैं। अधर्म को धर्म घोषित किया जा रहा है आजकल।
                     अब ज़रा और बात , कल रात की ही बात , टीवी पर दो कार्यक्रम देखे , एक नृत्य का एक हास्य का।  नृत्य के कार्यक्रम में अभिनेता अमिताभ बच्चन जी मंच पर थे , इक नवयुवती की परफॉर्मंस पर बोलते हुए उन्होंने अपनी फिल्म की इक कविता पढ़ी " ज़िन्दगी तुम्हारी ज़ुल्फ़ों ,,,,,,,,,,,,,,,,,, गुज़रती  तो शादाब हो भी सकती  थी  "  आप इसको हल्के में ले सकते हैं , मगर उसके बाद जो तमाशा दिखाया गया उसको नज़रअंदाज़ करना अपराध होगा। संचालक उस नवयुवती को गिरने से संभालता दिखाई दिया और समझाया गया जैसे हर युवती का सपना यही है कि भले वो सत्तर साल का बूढ़ा भी हो तब भी उसका प्रेम प्रदर्शन उनको खुश कर सकता है। क्या ये महिला जगत की छवि को खराब नहीं करता , क्या अमिताभ जी को उचित लगता है कोई अपनी उम्र से इतनी छोटी महिला से ऐसी बात कहे। मगर हम विचित्र हैं नामी लोगों की बुराई भी हमें अच्छी लगती है।  हास्य के प्रोग्राम में इतनी बेहूदा बातों पर लोग हंसते हैं कि रोना आता है।  हर सुबह हर चैनल अंधविश्वास को बेचता है अपने मुनाफे की खातिर सभी आदर्शों की बातों को भुलाकर पैसे के लिये।  जिधर देखो यही हो रहा है पाप का महिमामंडन , किसी को ग्लानि नहीं क्या कर रहे क्यों कर रहे हैं।  अब फिर भी लोग समझते हैं हम धर्म और ईश्वर को मानते हैं तो वो कौन सा धर्म है कैसा भगवान मुझे समझ नहीं आता है।

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