Thursday, 7 July 2016

कुछ भी ठीक नहीं है सरकार ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

भ्र्ष्टाचार की खबर नहीं होना ही काफी नहीं है , उसका नहीं होना साबित किया जाना भी ज़रूरी है। बिना देखे प्रचारित करना कि मिट गया है भ्र्ष्टाचार जनता को धोखे में रखना है। आम आदमी जब सरकारी दफ्तर जाता है कोई शिकायत लेकर क्या तब उसको न्याय मिलता है ? नहीं। तब हर अधिकारी यही चाहता है शिकायत करने वाले को किसी तरह निपटाया जाये न कि उसकी परेशानी दूर की जाये। उसको टाला जाये या कहा जाये कि यहां नहीं वहां जाओ , और उलझाया जाता रहे। अदालतों में जाकर देखो आम लोग कितने परेशान हैं मगर उनको सालों साल न्याय नहीं मिलता। पुलिस थाने की बात सब जानते हैं , वहां जो नहीं हो वही कम है। इस देश में नेता अफ्सर धनवान और ख़ास लोगों को शायद ही सही गलत की कोई परवाह होती है , क़ानून को ये इक अनावश्यक वस्तु मानते हैं जिसकी कोई कद्र नहीं है। अख़बार हों या टीवी वाले उनको भी रोज़ की छोटी मोटी रिश्व्त की बात बेमानी लगती है क्योंकि उनको ये कभी देनी नहीं पड़ती है। पत्रकारिता का तमगा आपको एक सुरक्षा कवच देता है ताकि कोई आपसे छोटी छोटी बात पर पैसा नहीं मांग सके। प्रेस शब्द लिखा होना आपकी कार को चलान से बचाता है और आपको आम से ख़ास बना देता है। पत्रकारिता के मायने बदल गये हैं , खबर की परिभाषा भी। अब कोई पत्रकार खबर को ढूंढ़ता नहीं है , खबरें उस तक खुद आती हैं , जिनको खबर छपवानी हो खुद दे जाते हैं।
        अब किसी सरकार को गरीब आम आदमी की चिंता नहीं है , जिसको हर दिन रोटी कमानी होती है वो कैसे न्याय पाने को बार बार सरकारी अफसरों की हाज़िरी लगाता रहे बिना कोई समाधान पाये। और कभी अधिकारी आये नहीं , कभी मीटिंग में व्यस्त हैं जैसे बहाने सुन निराश होता रहे। अभी केंद्र सरकार के कर्मचारियों का वेतन बढ़ाया गया है जो औसत आम आदमी की आमदनी से पचास गुणा अधिक है , चाहे उसको और भी बढ़ा दो तब भी उनको ये कभी काफी नहीं लगता। उनको तब भी ऊपर की कमाई चाहिए।
इतना वेतन पाकर भी ये लोग अपना काम ईमानदारी से करना नहीं चाहते , क्या ये देशद्रोह नहीं है ?
आज तक देश की जनता की हालत केवल इसी कारण नहीं सुधरी है क्योंकि पुलिस प्रशासन और नेताओं ने वो सब किया ही नहीं जो किया जाना था। विडंबना है इनको जो करना वो नहीं करने की कोई सज़ा ही नहीं मिलती है। किसी शायर ने भी कहा है :::::::::::::
               वो अगर ज़हर देता तो सबकी नज़र में आ जाता ,
              तो यूं किया कि मुझे वक़्त पर दवाएं नहीं दीं।
देश की जनता की भी बस इतनी ही शिकायत है , सरकार को जो करना था कभी किया ही नहीं। सब ठीक है के विज्ञापन हमेशा देखते रहे हैं लोग , सब ठीक हुआ नहीं कभी भी। कोई चाहता ही नहीं सब ठीक करना , उनकी कुर्सी उनके स्वार्थ कुछ भी ठीक नहीं होने से हैं।

Tuesday, 5 July 2016

मेरा सुंदर सपना टूट गया ( कड़वा सच ) डॉ लोक सेतिया

दो साल हो गये हैं इंतज़ार करते करते , जनता को वो अच्छे दिन कहीं दिखाई नहीं देते। दिखाई देते हैं तो बस नित नये सरकारी विज्ञापन। भ्र्ष्टाचार मिटा दिया है ऐसा नवीन विज्ञापन आया है , तब तो देश ईमानदार समझा जाना चाहिये , फिर क्यों आज भी वहीं का वहीं है सूचि में बहुत नीचे। भ्रष्ट देशों में प्रथम आने की ओर। किसी ने वादा किया था राक्षसों का अंत करने का , राक्षस जैसे थे वैसे ही हैं , शायद सरकार ने उनका नामकरण फिर से कर कोई और नाम दे दिया है। बस एक नारे से समस्या हल हो जाती है , अगर देशवासी कूड़ा नहीं करें तो कोई गंदगी नहीं कर सकता। कूड़े के ढेर लगे हैं और स्वच्छ भारत के विज्ञापन भी। विज्ञापन में टीवी पर जनता को शर्मसार किया जाता है गंदगी करने को , सफाई करना सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है , गंदगी मत करो का सबक पढ़ाना सरकार का काम है। लोग कूड़ा कहां डालें , शौच को कहां जायें ये सरकार का सरोकार नहीं है। रिश्वत बिना कोई काम नहीं होता तो क्या , आप रिश्वत दें ही नहीं रिश्वत का नामोनिशान मिट जायेगा , ऐसा विज्ञापन फिर से आना चाहिए। ये पहले भी हुआ था , दफ्तरों में रिश्वत नहीं देने की तख्तियां लगी थी। अब फिर से बापू के तीन बंदर सबक सिखायेंगे। गंदगी को मत देखो , भ्र्ष्टाचार है मत बोलो , सच कोई बोले कि सभी कुछ पहले सा ही है तो मत सुनो। लो जी अच्छे दिन आ गये हैं। बुरे दिन समाप्त नहीं हुए हैं , उन्हीं को अच्छे दिन घोषित कर दिया गया है। तानाशाही आज भी जारी है प्रशासन की सत्ताधारी नेताओं की , बस उसको लोकतंत्र नाम दे दिया है। बिना कुछ किये सभी कुछ हो गया है। चमत्कार है। कुछ दोहे राजनीति के नाम पर ::::::::::::::::::::::::::
                             नतमस्तक हो मांगता मालिक उससे भीख ,
                             शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख।
                             मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर ,
                             कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर।
                             नेता आज़माते रहे गठबंधन का योग ,
                              देखो मंत्री बन गये कैसे कैसे लोग।
                             झूठ यहां अनमोल है सच का ना व्योपार ,
                             सोना बन बिकता यहां पीतल बीच बाज़ार।
                             चमत्कार का आजकल अद्भुत है आधार ,
                             देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार।