Sunday, 30 November 2014

खोखले लोगों का धर्म ( आलेख ) डा लोक सेतिया

कभी कभी हैरानी होती है कि क्या लोग सच में नहीं देख पाते कि जहां वो धर्म या समाजसेवा की बात समझ कर जाते हैं वहां न तो धर्म ही होता है न ही कोई सच्ची समाज सेवा ही। जो हो रहा होता है वो इक छल होता है , धोखा होता है , आडंबर होता है , दुनिया को दिखाने को इक तमाशा होता है। कोई संत बन स्वर्ग को बेच रहा है ,कोई आपको सारे पापों की सज़ा से बचाने का प्रलोभन देता है उसको गुरु बनाने पर , कोई अपने इस कारोबार में आपको भी शामिल कर लेता है। अधर्म को धर्म का नाम दिया जा रहा है , ऐसा धर्म किसी का कल्याण नहीं कर सकता। इस से बेहतर है आप किसी धर्म को न मानें , कोई गुरु न बनायें , किसी ईश्वर किसी देवी देवता की उपासना न करें। बल्कि इस से नास्तिक होना लाख दर्जा बेहतर होगा। ये बात कि कोई गुरु होना ही चाहिये या किसी न किसी धर्म का मानना ही चाहिये उन्हीं लोगों ने कही और सब जगह दोहराई जिनको ऐसा करने से कुछ हासिल करना था। कभी निष्पक्ष होकर पढ़ना सभी तथाकथित धर्म ग्रंथों को और समझना वो आपको ज्ञान देना चाहते हैं या ऐसा चाहते हैं कि आप कुछ भी न सोचें न ही समझने का ही प्रयास करें कि सही क्या गल्त क्या है। धर्म वो जो आपके विवेक को जागृत करे ताकि आप अच्छे बुरे , पाप पुण्य , सच झूठ को पहचान सकें। मुझे तलाश है ऐसे धर्म की ऐसे गुरु की , नहीं नज़र आता कोई , मगर मुझे ज़रूरत भी नहीं है। मेरी अंतरात्मा मेरा गुरु है जो बताती है सब से बड़ा धर्म मानवधर्म है। ईश्वर है या नहीं है मुझे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता , न ही इस से कि कोई अगला या पिछला जन्म होता है या नहीं। हां जाता हूं मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे , देखता रहता क्या क्या होता धर्म के नाम पर वहां और सोचता जो सर्वशक्तिमान है क्या उसका बस नहीं चलता इन पर या वो भी अपने गुणगान से खुश होता है और अपने नाम पर ये सब होता देख कर भी अनदेखा करता है। नहीं ऐसा नहीं  है भगवान को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग उसको मानें या न मानें , उसकी अराधना अर्चना पूजा करें या न करें। उसको फर्क पड़ता होगा कि लोग उसके बनाये इंसानों से प्यार करते हैं या नहीं करते। जो जीवन में सभी से प्यार मुहब्बत से नहीं रहते , सद्कर्म नहीं करते , बिना स्वार्थ कुछ भी नहीं करते , अथवा अपने स्वार्थ के लिये सही गल्त सब कुछ करते हैं उनसे ईश्वर प्रसन्न नहीं हो सकता , ये सभी जानते हैं। फिर भी लोग जानकर अनजान क्यों बने हुए हैं , समझना होगा।
                   ये जो लोगों की भीड़ दिखाई देती संतों , साधुओं , धर्मस्थलों पर उनका किसी धर्म से कोई सरोकार नहीं होता है। यहां लोग चाहते हैं किसी भी तरह कुछ पाना , कोई पहचान , कोई नाम , शोहरत , कोई रुतबा या समाज में वो कहलाना जो न तो हैं न ही बन सकते हैं। जब इनको अवसर मिलता है किसी भी तरह अपना नाम पहली कतार में लाने का तब ये उसको उपयोग करते हैं अपने मन की झूठी तसल्ली के लिये कि लोग मुझे ऐसा मानते हैं , वैसा होना कदापि नहीं चाहते। इक छल है खुद से , इसको धर्म नहीं कह सकते , धर्म क्या है ये जानना समझना कौन चाहता है। खुश हैं अमुक गुरु के अमुक कार्य में प्रचार में उनका भी नाम शामिल है , इक आयोजन है समाज सेवा के नाम पर अथवा धर्म प्रचार के नाम पर उसके निमंत्रण पत्र पर उनका भी नाम लिखा हुआ है सैंकड़ों और नामों में , कभी सोचा है क्या है ये। इक खोखलापन है , जो ये शोर हर तरफ होता दिखाई देता है उसका सच यही है। खाली ढोल बज रहा है , ढोल की पोल जब खुलती है तब पता चलता उसके भीतर तो कुछ भी नहीं था। क्या झूठ कहा मैंने , सोचना।

Wednesday, 26 November 2014

लोग बड़े बड़े मकसद वाले ( तरकश ) डा लोक सेतिया

कलयुग की बात है , दिन में अंधेरी रात है। देखो धर्म बिकता है , इक डाल है दूजा हर पात है। देखो बने हैं महल कितने सन्यासियों के वास्ते , होती जाने कैसे उनपर धन दौलत की बरसात है। अब मोह माया छोड़ने के उपदेश देता कौन है , सब तरफ नज़र आती चोरों ही की बारात है। साधू बने अपराधी चेले बचाने को मिले , सब देख कर अंधे हुए नेता हों या अफ्सर बड़े। नतमस्तक सभी अपने अपने मतलब के लिये , किसको है परवाह जनता यहां कैसे जिये। लिखा हुआ किस ग्रंथ में संत बन संचय करो , भगवान को हो बेचते कैसे कहें उससे डरो। है खेल ये कैसा जो इंसानियत से खेलते ,सच की बातें ही काफी झूठ की वंदना करो। गली गली फिरते साधु बनकर भिखारी , और कुछ बनाकर डेरे बने हैं बड़े शिकारी। गीता को भी बेचते सन्यासी कहते ज्ञान है , जिनको बनाया शिष्य पर उनका कुछ और अरमान है। ये खेल बहुत टेड़ा है भाई तू न उलझना यहां , तूने नहीं समझा इसे तू बहुत नादान है। बात इतनी जान ले बड़े लोगों की बड़ी शान है। देश की राजनीति भी बन चुकी दुकान है , जो चीज़ बिकती नहीं उसी का ऊंचा दाम है। सब को बड़े लक्ष्य पाने हैं , बंगले सभी को बनाने हैं। जो जितना बड़ा पद पाता है वो उतना ही और ललचाता है। कभी नगर पार्षद बन कर भी खुश था अब सांसद होकर भी नहीं चैन आता है , दिल का करें क्या जो मंत्री बनने को ललचाता है। इधर नहीं मिला अगर उधर को भाग जाता है। कभी लाख का सपना देखता था अब करोड़पति है गरीब कहलाता है। क्या करे कोई सभी का लक्ष्य बढ़ता जाता है।
           सरकार भी छोटे लक्ष्य नहीं बनाती अब , रोटी कपड़ा मकान , शिक्षा रोज़गार की बात नहीं होती।  गरीबी की रेखा का रोना सरकारें आजकल नहीं रोती। स्वदेशीकरण को भूल कर विदेशी बाजार की बात होती है। सब कुछ विदेशी कंपनियों को सौंप कर सरकार खुद बस सोती है। आतंकवाद हो या साम्प्रदायिकता नेताओं को दोनों चर्चा को याद रहते हैं , जिनको बताया दुश्मन कभी उसी को मसीहा कहते हैं। नेता हों या अफ्सर बड़े विदेश सब को भाता है , सोना बिकता नहीं पीतल खरीद लाता है। काला धन हो या हो भ्र्ष्टाचार दोनों ही सत्ता दिलाते हैं , सरकार जब बन गई तब सच यही समझाते हैं। कालाधन कभी नहीं आयेगा जनता को क्यों भरमाते हैं। सब को मालूम है मिलकर सभी ही खाते हैं।
      जो भी बैठा है पद पर सब यही दोहराते हैं , अपने अपने को रेवड़ियां हरदम खिलाते हैं। लोकतंत्र के नाम पर होता वही तमाशा है , सब को अपने बेटे से दामाद से ही आशा है। देश की बात रहती नहीं याद है , देखलो कर रहे विदेश जा फरियाद है। परमाणु बंब और अंतरिक्ष में मंगल की बात करते हैं , ये नहीं आता नज़र लोग अभी भी भूखे मरते हैं। हर नई सरकार धन प्रचार पर लुटाती है , हम बड़े महान हैं वाले पुराने गीत दोहराती है। लो समाजवाद भी ले आया विदेशी बग्गी है , राजसी शान की लालसा सभी में जग्गी है। साईकिल हो हाथी हो चाहे लालटेन हो , है इरादा सब का कुछ लेन हो कुछ देन हो। देखो किसी के आज भी खोटे सिक्के चल गये , कुछ लोग बहती गंगा में हाथ धोने से ही रह गये। क्या क्या दिखायें आपको देखो जिधर यही बात है , रौशन हैं बड़े नगर और गांवों में अँधेरी रात है। भीख मिलती है उसे जिसकी बड़ी औकात है।

Monday, 24 November 2014

कैद ( कविता ) 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

जाने कब से बंद थे ,
हम खुद अपनी ही कैद में ,
छटपटाते रहे अब तक ,
रिहाई के लिये हर दिन ,
किया ही नहीं हमने कभी ,
मुक्त होने का प्रयास भी ,
समझते रहे अपनी कैद को ,
अपने लिये इक सुरक्षा कवच।
जानते थे ये भी हम कि ,
जीने के लिये निकलना ही होगा ,
इस अनचाही कैद से इक दिन ,
मगर देखते रहे इक सपना कि ,
आयेगा कभी कोई मसीहा ,
मुक्त करवाने हमको ,
खुद अपनी ही कैद से।
तकदीर ने शायद हमको ,
दिखलाया है रास्ता ,
बंधनमुक्त होने का ,
और खुद हमने थामा है ,
इक दूजे का हाथ ,
और तब नहीं है बाकी कोई निशां ,
अपनी निराशा और तनहाई ,
की खुद ही बनाई उस कैद का।
संग संग उड़ रहे हैं हम ,
और खुले गगन में ,
चले हैं छूने प्यार में ,
आकाश की नई ऊंचाई को ,
गा रहे हैं अब गीत ख़ुशी के।

Wednesday, 19 November 2014

वी आई पी अपराधी , आम अपराधी ( तरकश ) डा लोक सेतिया

अपराध वही होता है अपराधी अलग अलग होते हैं। सरकार हो चाहे लोग ये देख कर आचरण करते हैं कि अपराध किसने किया है। अभी हरियाणा में एक अपराधी को अदालत के सख्त आदेश के बाद जैसे पकड़ा गया वो बताता है कि सरकार या सत्ताधारी दल बदलने से भी बदलता कुछ भी नहीं। सरकार पहले इक मेडिकल बोर्ड बनाती है जो अपराधी को गंभीर रूप से बीमार घोषित करता है , जब अदालत फटकार लगाती है कि आपने बिना उसकी अनुमति या जानकारी के कोई बोर्ड कैसे बनाया तब विवश होकर अपराधी को गिरफ्तार किया जाता है और दावा किया जाता है कि सरकार ने कितना महान कार्य किया है। जो लोग सड़क पर किसी जेबकतरे को पकड़ पीट देते हैं वही लोग गंभीर अपराध करने के बावजूद किसी का बचाव इसलिये करते हैं क्योंकि वो उनका गुरु है। अब ऐसे कलयुगी गुरु कैसी शिक्षा देते हैं ये समझ लेना चाहिये , क्या सीखा आपने अपने धर्म से अपने गुरु के प्रवचनों से , यही कि पापी और अपराधी का बचाव करना। मुझे किसी भी धर्मग्रंथ में ये लिखा नहीं मिला कि अन्यायी और पापी अगर कोई अपना है तो उसको सही बताना है। मतलब साफ है ये जो लाखों करोड़ों लोग जाते हैं कहने को धर्म की बात सुनने समझने उनको भी धर्म नहीं अपनाना है , धार्मिक होने का आडंबर करना है , इक तमगा लगाना है। तभी दुकान पर किसी धर्म का नाम लिखने से ये नहीं समझना कि वहां झूठ या लूट का कारोबार नहीं होगा। इक मुखौटा है धर्म भी लोगों को अपने अपकर्म को ढकने को। मगर हम केवल सरकार पर ही दोष नहीं दे सकते , जब कोई नेता जेल जाता है तब भी उसके समर्थक यही करते हैं , जब संजय दत्त को जेल में जाना पड़ता है तब बड़ी बड़ी बातें करने वाले फिल्मों वाले उनके पक्ष में खड़े नज़र आते हैं। सरकार और पुलिस सालों तक खामोश होकर देखती रहती है धर्म के नाम पर गुंडों का गिरोह बनते , खुद सरकारें बनाती हैं रामपाल , भिंडरावाले , आसाराम , रामरहीम जैसे लोगों को। और जब ये लोग खुद सरकार को चुनौती देते हैं तब जाकर समझ आता है हमने खुद जिनको देव के नाम पर दैत्यों जैसे कर्म करने दिये वो कितने भयानक हो गये हैं। क्या लोग समझेंगे इन सब की वास्तविकता को , नहीं कभी नहीं , क्योंकि लोग जो मापदंड दूसरों के लिये निर्धारित करते हैं खुद अपने पर उनको लागू नहीं करते। ये मीडिया वाले भी हमेशा दोहरे मापदंड ही अपनाते हैं , जब किसी और के साथ होता तब तमाशाई बन जाते हैं , जब खुद पर गुज़रती तब बेहाल हो जाते हैं। पुलिस भी जब इनके साथ आम लोगों की तरह बर्ताव करती तब इनको समझ आता सच क्या है। वर्ना ये भी बड़े लोगों के अपराधों पर खबर भी ऐसे देते हैं जैसे उनको नायक साबित करते हों। शायद कोई सबक इनको भी सीखना है , कि अपराध अपराध ही होता है चाहे जो भी अपराधी हो।

Tuesday, 18 November 2014

भारत का आईना ( तरकश ) डा लोक सेतिया

ये कुछ अलग है , मोदी मोदी का शोर विदेशों में खूब मचा हुआ है। एन आर आई भारतीय देश का झंडा लिये या तिरंगे के रंग में रंगे परदेस में अपने देश के प्रधानमंत्री का स्वागत कर रहे हैं जोश के साथ। टिकट खरीद कर बहुत दूर चल कर मोदी जी का भाषण सुनने आ रहे हैं। अच्छा है इक उम्मीद जागी है उन लोगों में देश में कुछ बदलाव की। मगर क्या वो सच भी होगी या जैसा कितनी बार पहले भी होता रहा है ये सब हम भूल ही जायेंगे। सवाल ये है कि क्या हम ये मान बैठे हैं कि सरकार बदलने से सब बदल जायेगा , सिर्फ मोदी नाम का मसीहा सब बदल देगा या हम खुद भी अपने को बदलेंगे। क्या ये सच नहीं है कि देश का बंटाधार होता रहा और हम हमें क्या सोच कर चुपचाप तमाशाई बने रहे। क्या अन्याय का विरोध करने कभी खुद सामने आये ? क्या भ्रष्टाचार करने वालों का विरोध करना तो क्या हम उनके सामने नतमस्तक नहीं होते रहे , और क्या फिर से वो कभी नहीं दोहरायेंगे। कहीं हम आडंबर तो नहीं रच रहे कि हम देशभक्त हैं जबकि हमको अपने अपने स्वार्थ को छोड़ बाकी कुछ भी दिखाई ही नहीं देता। क्या ये लोग जो भीड़ में शामिल हैं वो खुद भी कुछ देना चाहते हैं अपने देश को या मात्र दिखावा ही करते हैं देश प्रेम का। जानता हूं देशभक्ति की परिभाषा बदल चुकी है , देश की समस्याओं पर चिंता नहीं करते अब , उनको हल करने को प्रयास नहीं करते , ये काम सरकार का है , हमें तो क्रिकेट मैच में देशभक्ति का प्रदर्शन करना है , या किसी अन्ना किसी मोदी की जयजयकार ही करनी है। ये आसान है , वो भगत सिंह वो गांधी वाली देशभक्ति आउट ऑफ़ डेट हो चुकी है। अपने जीवन देश को अर्पित करना या लोग नंगे हैं तो खुद एक धोती पहनने की बात सोचना , है कोई ऐसी देशभक्ति वाला। ज़रा सोचना क्या मोदी कभी उन लोगों में भी भाषण देने ऐसे ही बन ठन कर जायेंगे जो देश की इक तिहाई जनता बदहाल है , जिसके पास न काम है न छत है न पैसा है न साधन हैं। पीने को पानी तक को तरसती है जो , दो वक़्त रोटी जिसको सपना लगता है। क्या मोदी जी प्राथमिकता में वो लोग कहीं हैं जो सब से निचले पायदान पर हैं। सवाल फिर वही है कब तक सरकारें जिनके पास है उनको और अधिक देने को महत्व देती रहेंगी , और जिनके पास कुछ नहीं वो हाशिये पर ही रहेंगे। उस आज़ादी उस लोकतंत्र का क्या मतलब जिसमें देश में इतनी असमानता हो। अमीरों को और अमीर बनाने से ये अंतर और बढ़ता ही जाता है , क्या किसी मोदी में है साहस कि जिनके पास अम्बार लगे हैं उनसे लेकर उनको दे सके जिनके पास कुछ भी नहीं है। ये गरीबी की रेखा क्या कभी खत्म होगी।
            कभी तो सोचना होगा कितना चाहिये धनवानों को , अंबानी को टाटा को , अमिताभ को , सचिन को , और इन नेताओं को अपने लिये। क्या अपराध नहीं है मानवता के प्रति कि कुछ लोग भूख से , बिना इलाज से मरते रहें और कुछ लोगों के पास इतना धन सड़ता रहे कि उनको खुद नहीं पता हो इसका करना क्या चाहिये। ये क्या हो रहा है धर्म के नाम पर , बड़े बड़े आश्रमों में , क्या जानते भी हैं धर्म को ? संचय करना किस धर्म में सही बताया गया है , और ये जो धन संपत्ति के अंबार जमा किये बैठे हैं ये धर्मगुरु हैं। और इनके अनुयायी क्या करते हैं अपने तथाकथित गुरु का बचाव चाहे वो अपराध ही करता रहे , देश की न्याय व्यवस्था को चुनौती देने वाले धर्म क्या अधर्म के मार्ग पर नहीं चल रहे। रावण को कंस को भगवान बनाने वालो कभी तो समझो ये क्या कर रहे हो। सब से पहले सच और झूठ की पहचान करना सीखो , तब मालूम होगा धर्म क्या है , सत्य ही धर्म है , ये सब धर्मग्रंथ समझाते हैं , प्रवचन से धर्म नहीं आयेगा न ही भाषण देने सुनने से देशभक्ति। विडंबना की बात है रास्ता दिखाने वाले खुद रास्ते से भटक गये हैं।
अंत में मेरी ग़ज़ल के कुछ शेर :::::::::::::::::::::::
रास्ता अंधे सबको दिखा रहे ,
वो नया कीर्तिमान हैं बना रहे।
सुन रहे बहरे बड़े ध्यान से ,
गीत मधुर गूंगे जब गा रहे।
उनपर है सबको ऐतबार भी ,
झूठ को सच जो हैं बता रहे।
हक दिलाने की बात कह कर ,
झोंपड़ी भी उनकी हैं हटा रहे।
दाग़ चेहरे के आते नहीं नज़र ,
आईना झूठा है ये बता रहे।

Thursday, 13 November 2014

इस बदलाव का सच ( ये ज़रूर पढ़ना ) डा लोक सेतिया

टीवी पर हर समाचार चैनेल पर धूम मची है , मोदी जी का डंका विदेश में बजने लगा है। ऑस्ट्रेलिया में हज़ारों लोग टिकट खरीद कर मोदी जी भाषण सुनेंगे। आज बाल दिवस है। मुझे याद है पिछले साल मेरे एक मित्र अपनी बेटी को मिलने गये थे वहां , जब उनकी बेटी ने कहा था कि देखो यहां कूड़े का नामोनिशान तक नहीं है , तब उनके मुंह से अचानक ये शब्द निकल गये थे "अगर भारत में कचरा न हो तो एक तिहाई आबादी तो भूखी ही मर जायेगी , उनको तो रोटी ही कूड़े से मिलती है "। ये व्यंग्य नहीं वास्तविकता है इस देश की जिसको आज तक कोई नेता कोई सरकार न देखना चाहती है न ही समझना। वास्तव में हमारी सरकार , प्रशासन और आधुनिक इंडिया में रहने वाले लोग इनको देखना तक नहीं चाहते , इनको कुछ देने की तो बात ही क्या करें।
बात दिवस पर दो ख़बरें छपी हैं अख़बारों में , एक राजस्थान की है जहां चौदह साल के स्कूल का इक बच्चा ख़ुदकुशी करते हुए पत्र लिख कर छोड़ गया है अपने अध्यापकों को सज़ा देने को , जो उसको बेरहमी से पीटते थे होमवर्क नहीं करने पर। दूसरी हिसार की है हरियाणा में जिसमें अध्यापक का अमानवीय अत्याचार की बात है , क्या यही अध्यापक न्याय की डगर पर चलना सिखा सकते हैं , मगर यहां समस्या कुछ और ही है। ये लोग शिक्षा देने को अध्यापक नहीं बने हैं , इनमें से अधिकतर आईएएस आईपीएस या कुछ और ही बनना चाहते थे जब नहीं सफल हुए तब ये नौकरी कर ली वेतन पाने को। और आजकल जिनको सरकार हो या निजि स्कूल वाले नाम मात्र को वेतन देकर रखते हैं वे तो कुंठा के शिकार रहते ही हैं। उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है। हम बात बाल दिवस की और बच्चों की कर रहे थे , उसी पर आते हैं। इक घटना रेडियो पर सुनी थी मैंने बहुत साल पहले , इक बच्चे को सज़ा देकर बंद कर दिया अध्यापक ने कमरे में , और भूल गया उसको निकालना बाहर , उस दिन गर्मी की छुट्टियां होनी थी दो महीने की। दो महीने बाद उस बच्चे का शव मिला था स्कूल के कमरे में जब छुट्टियां समाप्त हुई। पिछले साल ऐसी इक घटना घटी थी हरियाणा में , कई घंटों बाद जब देखा जाकर अभिभावकों ने तब बच्चा बेहोश था , उसको चंडीगढ़ में पी जी आई में दाखिल किया गया था , मगर उसके दिमाग पर बहुत बुरा असर हो चुका था उम्र भर को। देखते रहते हैं स्कूली बच्चों को बंधक की तरह हर सरकारी कर्यक्रम में शामिल किया जाता है , लिखा था कुछ दिन पहले ये भी जब देखा था एक अधिकारी को फोन पर सरकारी स्कूल के मुख्य अध्यापक को ये कहते कि उपायुक्त जी के आने से पहले इतने बच्चे भेजने हैं। शिक्षा का अधिकार क्या मिल गया सबको , आज चौदह साल से कम उम्र के बच्चे अख़बार बांटते हैं कपास चुनते हैं कम मज़दूरी लेकर। कितने तथाकथित समाजसेवी लोगों के घर नौकर हैं छोटे बच्चे। मेरे शहर में इक बाल भवन है जो वास्तव में अफसरों की संपत्ति है , वो जिसको चाहे उपयोग करने की इजाज़त देते हैं। शायद लोग नहीं जानते कि वास्तव में वो जगह किसी ने कभी स्कूल की लायब्रेरी बना कर दान में दी थी , जो अब सरकारी संपत्ति बन चुकी है। कभी गुरु दत्त की फिल्म का इक गीत चर्चा में था " जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं "। कितने साल हो गये हैं मगर लगता है कुछ भी बदला नहीं है। बदलेगा भी कैसे जब सरकार बदलते ही देश के हालात को बदलने की बात छोड़ सब शामिल हो जाते हैं अपने राज्य अपने शासन को विस्तार देने में। भाजपा को हरियाणा महाराष्ट्र के बाद और राज्य जीतने हैं , अब जो धर्मगुरु कानून के शिकंजे में फंसे हैं भाजपा नेता वोट बैंक की खातिर उनकी शरण में हैं , अब ऐसे में क्या उम्मीद की जा सकती है। किसी शायर का इक शेर कहीं सच न हो जाये। "तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला , मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला "।  

Wednesday, 12 November 2014

कब तक तमाशाओं से बहलाएंगे देश को ( सवाल - तरकश ) डा लोक सेतिया

भाजपा को लगता है सत्ता की सीड़ी मिल गई है , हर रोग की एक ही दवा है मोदी नाम का जाप। सब यही रट रहे हैं , देश का शासन मिला अब राज्यों का भी मिलने लगा है। ऐसे में सत्ता हासिल करना ही कहीं इक मात्र ध्येय न बन जाये , बहुत मुमकिन है। सपनों से देश की जनता को छलते आये हैं हमेशा से ही राजनेता। कहीं फिर वही कहानी इस बार भी न दोहराई जाये , संभलना ज़रूरी है। चलो देखते हैं देश की सतसठ साल में जो बर्बादी हुई है उसके पीछे कारण क्या रहे हैं। इधर देश विदेश में काले धन की और घोटालों की राशि की बहुत बातें सुनाई दी हैं , मोदी जी का अवतार काफी हद तक इसी माहौल के कारण ही संभव हो सका है। मगर क्या मोदी जी सब बदल देंगे या कम से कम बदलना चाहते हैं। कुछ सवाल पहले याद रखने हैं।
क्या देश के गरीबों की गरीबी दूर होगी ?
क्या भूख से अब लोग नहीं मरेंगे ?
क्या शिक्षा सब को एक समान मिलेगी , शिक्षा का बाज़ार बंद हो सकेगा , क्या ये कारोबार और सिर्फ मुनाफे का कारोबार नहीं बना रहेगा ?
क्या सब को स्वास्थ्य सेवा एक समान मिला करेगी , क्या चिकित्साक्षेत्र की लूट थमेगी ताकि सही इलाज संभव हो सके या सारी सुविधायें धनवानों के लिये ही आगे भी सुरक्षित रहेंगी ?
क्या नौकरी काबलियत से मिला करेगी , बिना सिफारिश बिना रिश्वत ?
क्या प्रशासन न्यायकारी बन जायेगा , पुलिस जनता की मित्र बन सकेगी , इस विभाग को सुधारा जायेगा ताकि ये जनता का दमन न करके उसको सुरक्षा देने का कर्तव्य निभा सके ?
कोई ये न कहे कि आपने देश की सब से गंभीर बिमारी भ्र्ष्टाचार की बात ही नहीं की , तो उस पर पूरी चर्चा करते हैं। किसी भी योजना का धन अगर देश की जनता को नहीं मिलकर कुछ अन्य लोगों को मिलता है जिस से देश या जनता का कोई भला नहीं होता , और ही काम पर खर्च या बर्बाद किया जाता है तब उसको घोटाला कहते हैं। शायद बहुत लोग हैरान हों कि आज़ादी के बाद से इक ऐसा घोटाला देश की और राज्यों की सभी सरकारें करती आई हैं , वो है सरकारी प्रचार के अनावश्यक विज्ञापन। उनसे किसी को कुछ नहीं मिलता , मिलता है मुट्ठी भर अखबार टीवी वालों को मुफ्त का धन और नेताओं को झूठा प्रचार भी और मीडिया को अपने प्रभाव में रखने का रास्ता भी। यकीन करें इन विज्ञापनों पर इतना धन बर्बाद किया गया है जितना देश में आज तक हुए सभी घोटालों को देश विदेश में जमा काले धन की राशि में जोड़ कर भी नहीं हुआ है। लेकिन इसको रोकने की बात भला कौन करेगा , सच बोलने वाले ये सच कभी बोलते ही नहीं , पापी पेट का सवाल जो है। अभी बात हुई है किसी ने अपने किसी कार्यक्रम में देश के प्रधानमंत्री जी को क्यों नहीं बुलाया है। मुझे लगता है देश के प्रधानमंत्री को राज्यों के मुख्यमंत्रियों को ही नहीं सांसदों विधायकों और प्रशासन के बड़े अधिकारियों को मुख्य अतिथि बनने से अधिक ज़रूरी और बहुत काम करने चाहियें। मुझे याद है कुछ साल पहले हमें बाल भवन में साहित्य की मासिक सभा करने की मनाही इसलिये की गई थी कि हमने इक कवि सम्मलेन में उपायुक्त महोदय को मुख्य अतिथि नहीं बनाया था। क्या ये लोग जनता की संपत्ति को अपनी निजि जायदाद समझना छोड़ देंगे।
                       गंगा की सफाई की बात हो रही है , थोड़ी सफाई संसद की भी की जानी चाहिये। संविधान में तीन कार्यों के लिये तीन अंग बनाये गये थे , कार्यपालिका अर्थात प्रशासन का काम था देश के विकास और जनता की सुविधाओं पर आबंटित धन को इमानदारी से खर्च करना , विधायिका का काम था उसपर निगाह रखना और योजनायें बनाना बजट पारित करना , न्यायपालिका का काम था न्याय व्यवस्था कायम रखना। जिस दिन नरसिंहराव जी ने सांसदों को हर वर्ष विशेष निधि देने का प्रावधान रखा था उस दिन ही विधायिका ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर अतिक्रमण किया था जिसको तभी न्यायालय में चुनौती दी जानी चाहिये थी। मगर ये रोग ऐसा बढ़ता गया कि अब कोई प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री इसको रोकने को सोच भी नहीं सकता है। कौन नहीं जानता है कि ये राशि कैसे खर्च की जाती है , हर सांसद हर विधायक को जो हिस्सा देता है उसी ठेकेदार को ठेका मिलता है। यहां के पिछले विधायक ने तो खुद टाइलों की फैक्ट्री ही लगा ली थी और पांच साल तक हर विभाग उनकी टाइलें ही चौगुने दाम पर खरीदता रहा। मोदी जी क्या ये असंवैधानिक कार्य जो भ्र्ष्टाचार का बहुत बड़ा माध्यम भी है बंद कर सकते हैं। स्वच्छता की ज़रूरत आपके अपने घर को भी है , याद है संसद में प्रवेश करते समय माथा टेका था , मंदिर की पवित्रता को बखूबी जानते हैं नरेंद्र मोदी जी। कब शुरुआत करते हैं हम भी देखना चाहते हैं।  

Sunday, 9 November 2014

नेहरू से लेकर मोदी तक ( इंडिया का कड़वा सच ) डा लोक सेतिया

देश को आज़ाद हुए सतसठ वर्ष हो गये मगर अभी भी कहने को विकास की बात की जाती है मगर होता क्या है ? देश का धन बर्बाद किया जाता है , क्या अंतर है नेहरू की सरकार करे इंदिरा की वाजपेयी की मनमोहन की या अब मोदी की। भूल तो नहीं गये इमरजेंसी के विज्ञापन , आपात्काल का गुणगान , फिर फील गुड का दावा , भारत निर्माण का प्रचार , हरयाणा या अन्य राज्यों का अपना अपना नंबर वन का डंका बजाना। ये सब क्या है , किसी को लोकप्रिय साबित करने के लिये देश के धन की बर्बादी। कभी किसी ने नहीं सवाल किया इस देश में आज तक का सब से बड़ा घोटाला क्या है , कैसे बतायेंगे अखबार टीवी वाले कि हम शामिल हैं इस लूट में। इनका पेट भरता ही नहीं बिना सरकारी विज्ञापनों के , ये बैसाखियां ज़रूरी हैं इनके लिये। जो खुद अपने पैरों पर चलना नहीं चाहते वो सब से तेज़ सब से आगे होने का दम भरते हैं। हैरानी होती है कोई सरकार कोई नेता ये बदलना नहीं चाहता , क्या जनता को विज्ञापनों से पता चलेगा कि सच सब बदल चुका है। अगर बदलेगा तो लोगों को दिखाई नहीं देगा , दुष्यंत कुमार ने चालीस साल पहले जो लिखा था वो आज भी सच है। " रोज़ अख़बारों में पढ़कर ये ख्याल आया हमें , इस तरफ आती तो हम भी देखते फसले बहार "। कभी हिसाब लगाना सतसठ साल में कितने लाखों हज़ार करोड़ रुपये इस तरह विज्ञापनों पर बर्बाद किये गये , मात्र मिडिया वालों को खुश रखने और अपने या अपने बाप दादा के नाम का डंका बजाने का काम करने के लिये , लोकतंत्र के नाम पर इस से बड़ा धोखा क्या हो सकता है। अभी सफाई अभियान की बात शुरू हुई है और हर तरफ बड़े बड़े विज्ञापन सड़कों पर लग गये हर विभाग के , देखा कल यहां पैमाइश की जा रही थी सड़कों की पार्कों की ये आंकड़े बनाने को कि इतनी जगह की सफाई की गई ताकि उसका बजट दिखाया जा सके , वही कागज़ी काम। इन विभाग वालों को दिखाई नहीं देता सीवर का होल सालों से खुला पड़ा है , पानी की लाईन कब से लीक करती है , फुटपाथ कब से रोक रखा है दुकानदारों ने , विभाग वाले सालों से किराया वसूल करते आ रहे हैं गैरकानूनी ढंग से , अफ्सर के घर सब्ज़ी जाती है और सामान जाता है रोज़ मुफ्त में , कितने तथाकथित नेता हैं जो किसी दुकानदार से सामान ले जाते बिना दाम चुकाये। क्या क्या बताया जाये , फिर दुष्यंत का शेर याद आता है। "इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं , आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार "।
     योजना के नाम पर फिर वही लोग उसी तरह लूट में शामिल हैं , इक तमाशा है जनता को दिखाने को। इक काम हमेशा सरकार ने किया है हर बात का दोष लोगों पर डालने का। विज्ञापन है लोग खुले में शौच करते हैं , उनको शर्मसार किया जाता है , क्या है ये ? कौन चाहता है खुले में शौच को जाना , क्या सुविधा है सब जगह लोग जा सकें जब मज़बूरी हो , पहले आपको वो सुविधा देनी होगी , अगर नहीं जानते हैं तो बता दूं आयुर्वेद में लिखा हैं मल मूत्र आदि के वेग को रोकना जानलेवा साबित हो सकता है। जब तक सरकार खुद अपना कर्तव्य निभाना नहीं चाहती बल्कि उसका दोष जनता पर डालने का काम करती रहेगी , वास्तविकता नहीं बदलेगी। हां इक बात तो बताना भूल ही गया सरकार या अफ्सर जो करना चाहते उसके लिये पैसा बजट सब हो जाता है। जो नहीं करना उसी को लेकर रोना रोते रहते धन नहीं है , धन की बर्बादी जब तक नहीं रूकती , जनता का कोई भला नहीं होने वाला। अगर जो मनमानी कभी कोई और करता था वही आपको भी करनी है तो नतीजा भी वही ही निकलेगा। क्या अफ्सर सेवक बन जायेंगे , नेता शासक नहीं रहेंगे ? यही देखना है।

Monday, 3 November 2014

दो आज़ाद पंछी गगन के ( कहानी ) डा लोक सेतिया

महानगर के बस अड्डे पर अचानक प्रेम व प्रीति की मुलाकात हो गई। सालों बाद इस प्रकार कॉलेज का पुराना सहपाठी कभी कोई ऐसे मिल जाये तो यूं लगता है मानो गुज़रा हुआ ज़माना वापस लौट आया है। इत्तेफाक से दोनों को अपनी अपनी कंपनी के काम से एक ही नगर को जाना था। दो दिन के लंबे सफर में तो अजनबी सहयात्री भी अपने से लगने लगते हैं , ऐसे में पुराना सहपाठी मिल जाये तो मन झूमने लगता है। प्रेम और प्रीति दोनों को भी ऐसा ही प्रतीत हो रहा था। प्रेम ने बुकिंग विंडो पर जाकर दोनों की टिकट बुक करवा ली थी और बस में साथ साथ बैठ कर कॉलेज के दिनों की बातें करने लगे थे। कुछ ही पल में ऐसे घुल मिल कर बातें कर रहे थे जैसे वो कभी बिछुड़े ही नहीं थे। बातों बातों में दोनों ने इक दूजे से विवाह और जीवन साथी के बारे भी पूछा था जिसका जवाब दोनों ने ही इस प्रकार संक्षिप्त सा दिया था मानो उनको इस विषय पर बात करनी ही नहीं हो। मगर शायद दोनों को ही ये बात समझ आ गई थी कि मेरी तरह उसको भी ज़िंदगी की सच्ची खुशी हासिल नहीं हुई है और उसके सपने भी मेरी तरह टूट कर बिखर चुके हैं। दोनों जिधर ज़िंदगी ले जा रही थी जाते जा रहे हैं। कुछ ही घंटो में वे इक दूजे से इतना बेतकल्लुफ हो बात करने लगे थे जितना कॉलेज में चार साल साथ पढ़ते भी नहीं हो पाये थे। प्रीति को तब प्रेम की बातें अजीब लगती थी जब वो बहस में अपनी बात पर अड़ जाता था कि पैसा ही सब कुछ नहीं होता , और हमें सुंदरता को महत्व नहीं देकर व्यक्ति के सवभाव को देखना चाहिये। सुंदरता हमेशा नहीं रहती है , मधुर व्यवहार हमेशा साथ रहता है और सच्चा मित्र सुख दुःख दोनों में साथ देता है , जो वक़्त और ज़रूरत को दोस्त बनाता है वो दोस्ती का अर्थ नहीं जनता। प्रेम मानता था कि दोस्त बहुत मुश्किल से मिलता है हर किसी को दोस्त नहीं समझा जा सकता। जिसके बहुत दोस्त होते हैं वास्तव में उसका कोई दोस्त नहीं होता है। प्रीति का विचार था कि किसी को भी सीधा सरल नहीं होना चाहिये जैसा समय हो खुद को उसी तरह बदल लेना चाहिये। खुश रहने के लिये पैसा और दोस्त जितने भी बन सकें बनाना चाहिये। प्रेम की भावुकतापूर्ण बातें प्रीति को पसंद नहीं आती थी , उसको रमेश की बातें अच्छी लगती थी जो रोज़ नये नये दोस्तों के साथ कर्यक्रम बनाने और मौज मस्ती से जीने में यकीन रखता था। प्यार मुहब्बत को रमेश किस्से कहानियों की बातें समझता था और कहता था कि असली जीवन में ये सब फ़िज़ूल की बातें हैं। इसके बावजूद प्रीति के दिलोदिमाग पर रमेश ही छाया रहता था , उसको मालूम था कि प्रेम क्यों उसको चोरी चोरी अजीब सी नज़रों से देखता रहता है , जैसे कुछ कहना चाहती हों उसकी नज़रें प्रीति से। उसकी सहेली आशा कहती थी प्रेम तुमको बेहद चाहता है उसे अपना दोस्त बना लो मगर प्रीति को प्रेम का ऐसे उसको तिरछी नज़रों से तकना बिल्कुल पसंद नहीं था , वो सोचती रहती थी काश कभी रमेश उसको ऐसी नज़रों से देखे। उसने प्रेम को कभी कोई अहमियत नहीं दी थी , एक बार जब कॉलेज के वार्षिक समारोह में प्रेम ने कोई नाटक प्रस्तुत करना था और उससे पूछा था नायिका का किरदार निभाने के बारे तब प्रीति ने जैसे उसको डांट ही दिया था "तुमने ऐसा सोचा भी कैसे कि मैं तुम्हारी नायिका का अभिनय करने को मान जाउंगी"। मगर प्रेम ने तब इतना ही कहा था तुमको मेरी बात बुरी लगी है तो क्षमा चाहता हूं। प्रेम का चेहरा बुझ सा गया था और उसने नाटक का विचार ही छोड़ दिया था। प्रीति को ये समझना ज़रूरी नहीं लगा था कि किसलिये प्रेम ने उसकी जगह किसी और लड़की को अपने साथ नाटक में शामिल होने को नहीं कहा था। प्रीति के उपेक्षापूर्ण व्यवहार से प्रेम चुप चाप रहता था पर कभी कोई शिकायत नहीं करता था। जब भी परीक्षा नज़दीक होती प्रेम खुद उससे पूछता था किसी तरह की कोई ज़रूरत तो नहीं प्रीति को और तब प्रीति उसके नोट्स लिया करती अपनी कई प्रॉब्लम्स हल करवाती थी प्रेम से। मगर प्रीति रमेश के प्रति आकर्षित थी चाहे वो प्रीति को कभी भी विशेष महत्व नहीं देता था आशा ने कितनी बार समझाया था प्रीति को कि ये इकतरफा प्यार तुमको कुछ नहीं देगा , पर दिल पर किसी का बस नहीं होता है , जो आसानी से मिल रहा हो अक्सर हम उसकी कद्र नहीं करते और जो नहीं हासिल हो सके उसको पाने को तरसते रहते हैं। सभी कभी न कभी ऐसी मृगतृष्णा का शिकार हो जाते हैं। मगर प्रीति को वही प्रेम आज बेहद अच्छा लग रहा था और उसके मन में ये सवाल खुद ही आया था कि किसलिये उसने प्रेम से तब उपेक्षा का व्यवहार किया था जबकि उसने कभी कोई खराब हरकत नहीं की थी कोई गल्त बात न बोली थी , उसने तो अपने मन की बात तक भी प्रीति को नहीं कही थी। शायद आशा सही कहती थी कि ये भी उसके प्यार का ही इक रूप था , प्रीति खुद ही मानना नहीं चाहती थी कि वो प्रेम को भी चाह सकती है , आशा शायद उसको खुद से ज़्यादा समझती थी। बीते समय की बातें करते करते दोनों खो गये थे यादों में , और इक ख़ामोशी सी छा गई थी। जाने कब प्रीति प्रेम के कंधे पर सर रख कर गहरी नींद में सो गई थी। तभी इक हिल स्टेशन पर बस पहुंच कर रुकी थी , सभी यात्रियों से कहा गया था कि अब चार घंटे रुकना है यहां ताकि सब उस खूबसूरत जगह को देख सकें। शाम छह बजे तक सबको वहीं आना था आगे का सफर जारी रखने के लिये।
                             आज प्रेम और प्रीति दोनों को लग रहा था अब कुछ दिन खुश रह सकते हैं घर के तनाव भरे माहौल से दूर किसी दोस्त के साथ हंस कर जी सकेंगे। उनको लगता था जैसे उनकी ज़िंदगी में जहां पतझड़ ही पतझड़ थी , कोई खुशबू नहीं किसी फूल की उसमें अचानक बहार आ गई हो चार दिन को ही सही। प्रीति ने कुछ सोच कर प्रेम से कहा था क्यों न हम इस जगह की सैर करने की जगह कहीं चल कर बैठें ताकि अपना हल चाल बता सकें पूछ सकें। थोड़ा आराम भी मिलेगा और हम शायद इक दूसरे को करीब से समझना भी चाहते हैं। प्रेम ने कहा था प्रीति यही ठीक है घूमना तो कभी भी हो सकता है मगर हम जाने फिर कब यूं मिल सकें। वे अपने अपने बैग लेकर कुछ दूर इक पार्क में चले आये थे , प्रेम पास से कुछ खाने को और दो कप काफी ले आया था और प्रीति ने घास पर इक चादर बिछा दी थी ताकि बैंच पर न बैठ कर उसपर आराम से बैठा जा सके। काफी पीते पीते प्रीति ने कहा था प्रेम तुम कॉलेज में जो बातें किया करते थे मुझे तब उनकी समझ नहीं थी मगर अब उसको समझती हूं , जानती हूं तुम्हें किसी दोस्त की तलाश थी , शायद मुझे तुमने हमेशा अपनी मित्र ही समझा मगर मुझे ही नहीं पता था कि तुम मेरे लिये क्या हो। तुमने तब कभी कुछ नहीं कहा था और आज भी जब हम दोनों विवाहित हैं तब तो शायद बिल्कुल ही नहीं कह सकोगे , मगर मुझे आज अपनी भूल का सुधार करना ही है ,ये अवसर दोबारा मिलेगा ऐसी संभावना नहीं नज़र आती कहीं। इन कुछ ही पलों में हम जितना करीब हो गये हैं कॉलेज में चार साल में कहां हो सके थे। प्रेम मुझे कब से इक ऐसे सच्चे दोस्त की ज़रूरत महसूस होती रहती थी जिसको मैं अपना सब कुछ बिना झिझक बता सकूं पूर्ण विश्वास करके , मगर नहीं मिला एक भी , हम चाहे कॉलेज में अधिक करीब नहीं हुए हों तब भी इक दूजे को बहुत भली भांति समझते तो रहे हैं , इसलिये मुझे लगता है अब तुम और मैं चाहे दूर ही रहते हों दोस्ती का रिश्ता निभा सकते हैं। मैं तुम पर पूरा भरोसा करती हूं इसलिये अपनी हर बात तुम्हें बताना चाहती हूं ताकि जब भी मुझे ज़रूरत हो इक सच्चे दोस्त की सलाह मिल सके और तुम भी मुझे अपनी ऐसी ही दोस्त अभी भी समझ सको तो सच मैं भग्यशाली हूंगी तुम्हारी सच्ची दोस्त बन कर। प्रीति की बात सुन कर प्रेम ने कहा था जो तुमने आज कहा है वो शायद मेरा ही सपना है , ये तुमने जब कहा तब तुम भी जानती थी मैं भी यही चाहता रहा हूं और समझती भी हो कि ये कहने का साहस मैं आज भी नहीं कर पाउंगा। अब शायद नियति ने हमें इसलिये ही इस मोड़ पर फिर से मिलवा दिया है ताकि हम आपस में अपने जीवन की हर बात सांझी कर थोड़ा सुकून हासिल कर सकें। प्रीति अब तुम बता सकती हो तुम्हारे जीवन में जो भी कठिनाई हो , क्या तुम्हारी पति से या घर में किसी से कोई समस्या है जो हमेशा चहकने वाली प्रीति यूं गुमसुम हो गई है। प्रीति ने कहा प्रेम आज मुझे तुमसे सब बताना है अपने बारे जो कभी किसी को नहीं बता सकी। प्रेम ऐसा नहीं है कि मेरे पति कोई बुरे इंसान हैं , मगर अक्सर जो हम सोचते हैं वो वैसा मिलता नहीं ज़िंदगी से , मेरे पति को मेरे काम करने से जॉब करने से कोई ऐतराज़ तो नहीं है लेकिन वो मेरी क़ाबलियत को बिल्कुल महत्व नहीं देते। वही पुरानी सोच , औरत मर्द के पांव की जूती है , उसका अपमान करना मर्दानगी है , उसको प्रताड़ित करना पति का अधिकार। पत्नी को सर पर नहीं बिठाना चाहिये , उसको दबा कर रखना चाहिये , वो बस उपयोग की इक वस्तु मात्र है जब मन चाहा जैसे भी इस्तेमाल किया। इक ऐसा जीवन साथी जो भावनाशून्य हो , आदमी नहीं कोई मूरत हो पत्थर की , जो समझता हो औरत को खाना पीना गहने कपड़े मिल रहे तो और क्या चाहिये उसको। प्यार की दो बात के लिये समय नहीं हो जिसके पास , हर शाम थक कर आना घर और खा पी कर सो जाना , कुछ भी न पूछना न ही कुछ भी बताना। लगता है दो अजनबी इक साथ रहते मज़बूरी में। कभी शराब के नशे में प्यार की बात भी ऐसे करना जैसे पत्नी नहीं बाज़ार से खरीदी कोई वस्तु है जिसको चाहे इस्तेमाल किया चाहे रख छोड़ा कहीं। प्रेम लगता है ज़िंदगी की गाड़ी दो बेमेल पहियों पर घिसट कर चल रही है , जाने अनजाने , किधर जाना नहीं मालूम। कोई कारण नहीं कि अलग होने की बात कहें पर साथ रहने को मन चाहे ऐसा भी कुछ नहीं , इक नीरस सा जीवन जैसे कोई बोझ है जिसको ताउम्र ढोना है। प्रेम यही है मेरी ज़िंदगी की कहानी , खुद ही तुम्हें बतानी चाही है क्योंकि कभी कोई और मुझे तुमसा विश्वसनीय मिल ही नहीं सका। प्रेम तुम भी मुझे अपनी हर बात बताना चाहो ऐसा बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है , फिर भी अगर तुम भी मुझे ऐसे ही अपना सुख दुःख का साथी समझ कर अपने जीवन के बारे अपनी ख़ुशी अपने दर्द के बारे बता सको तो मुझे अच्छा भी लगेगा और ख़ुशी भी होगी। मुझे पता है मेरे पति जैसा व्यवहार तुम किसी भी महिला से नहीं कर सकते , तभी ये सब तुमको बताने से मुझे इक राहत सी मिली है।
                                              प्रीति की बात सुनने के बाद प्रेम ने कहा , प्रीति तुम्हारी ही तरह मैंने भी अपनी बात किसी से नहीं की आज तक , लेकिन तुम जानती हो तुमसे नहीं छिपा सकता। अब इसलिये भी बताना चाहता हूं ताकि तुम समझ सको कि तुम अकेली नहीं हो दुनिया में जिसके सपने टूट कर बिखर गये , मैं भी ऐसे लोगों में शामिल हूं और हम जैसे जाने और कितने लोग हैं जो ऐसे ही जीते हैं घुट घुट कर। सच कहूं तो मुझे कभी किसी से कोई भी शिकायत नहीं होती है , बस इतना नहीं समझ पाता कि सब से मुझे तिरस्कार किसलिये मिलता है हमेशा। अपनी पत्नी को मैं इस दुनिया का सब से नकारा और बेवकूफ व्यक्ति लगता हूं। हर दिन मुझे नाकाबिल होने के ताने देती है , आस पास के बाकी सभी पुरुष उसको काबिल और समझदार लगते हैं , वो अपनी किस्मत को कोसती है जो मुझ जैसा पति उसको मिला। वो कहती है वो कितना भी प्रयास कर ले मैं कभी नहीं सुधर सकता। ये बात सच भी है मैं जैसा भी हूं वैसा ही रहना चाहता हूं , बदलना नहीं चाहता। मुझे हमेशा यही एहसास रहता है कि मैं कभी किसी को भी प्यार के काबिल नहीं लग सकता। क्या मुझे शादी करनी ही नहीं चाहिये थी , और विवाह करके मैंने पत्नी का जीवन बर्बाद कर दिया है। मुझे कभी ये बात नहीं समझ आई कि अगर मैं उसको इतना बुरा लगता हूं तो वो मुझे छोड़ किसलिये नहीं देती , इतनी नफरत भरी है उसके मन में मेरे लिये तब भी कैसे मेरे साथ रहती है। मैं खुद उसको छोड़ कहीं नहीं जा सकता क्योंकि समझ नहीं आता कि जाऊं तो कहां , इक दोस्त तक नहीं मिला जिसको समझा सकता अपना हाल। मैंने हमेशा प्रयास किया उसको हर मुमकिन सुख सुविधा देने का , हर कदम साथ देता रहा हूं मगर उसकी हर अपेक्षा हर चाहत को नहीं कर पाया पूरा। कारोबार में बार बार असफल होने से मेरा आत्मविश्वास बिखर चुका है और मैं ज़िंदा हूं क्योंकि जीना है मरने तक। प्रेम की कहानी सुन प्रीति की आह निकल गई , वो बोली प्रेम लगता है तुम्हारी और खुद मेरी ज़िंदगी की बर्बादी का कारण मैं हूं , काश मैंने तभी तुमसे रिश्ता कायम किया होता और तुमको वो सब देती जो मुझे देना चाहिये था , और मुझे जो भी चाहिये था बिना मांगे ही मिल जाता। जाने क्यों प्रीति की बात सुन प्रेम की आंखें भर आई थी , ये देख प्रीति ने कहा था प्रेम अब मैं तुमको कभी रोने नहीं दूंगी , हम अब चाहे कहीं भी रहें इक दूसरे का साथ हर ख़ुशी हर दुःख में देते रहेंगे। जो बात आज मैं कहने जा रही हूं वो दुनिया को शायद कभी समझ नहीं आये मगर मेरा विश्वास है कि तुम मेरी भावना को समझोगे। हमारा अपराध क्या है ? हम प्यार के सम्मान के अपनेपन के भूखे हैं तो इसमें गलत क्या है , क्या हमें अपनी ज़िंदगी जीने का हक नहीं है।तमाम उम्र हम दोनों किसी और के अनुसार कैसे जी सकते हैं , और ऐसा करने के बाद भी हम दोनों से हमारे विवाहित जीवनसाथी खुश नहीं होने वाले न ही खुद हमको कभी कोई ख़ुशी देने वाले हैं , ये बात मैं भी जानती हूं और तुम भी प्रेम। शायद जीवन भर हमें ऐसे ही घुट घुट कर जीना होगा। अब जब किस्मत ने हमें एक सप्ताह के लिये साथ रहने का अवसर दिया है तो क्यों न हम इसको वैसे बितायें जैसा हम कॉलेज के दिनों में दोस्ती कर के बिता सकते थे। तुम्हारी इक तम्मना मैं पूरी कर सकूं और तुम भी मेरी इक आरज़ू और चाहत को पूरा कर सको। हम अगले सात दिन के लिये भूल जायें कि हमारी किसी से शादी हो चुकी है , मैं केवल प्रीति हूं किसी की पत्नी नहीं और तुम सिर्फ प्रेम हो किसी के पति नहीं। मेरी ये बात सुनकर कोई और मुझे बदचलन समझे मगर तुम मेरी भावना को समझना , हम दोनों तपती गर्मी में झुलसते रहे कुम्लाहे मुरझाये से पौधे हैं जिनको आने वाले सात दिनों की बरसात नया जीवन दे सकती है। मुझे पता है प्रेम तुम ये बात कभी नहीं कह सकते , मैं खुद लाज शर्म को छोड़ कर जाने कैसे ये कह रही हूं ताकि जो सच्चा प्यार मुझे नहीं मिला कभी मेरी ही भूल से उसको पा सकूं और शायद अपनी भूल का प्रायश्चित भी कर पाऊं। तुम तब भी बोले थे जब कोई बंधन नहीं था तो अब तो कभी नहीं बोलते लेकिन मुझे लगता है तुमने जितना प्यार मुझसे किया शायद कोई किसी से नहीं कर सकता। मैंने भी इक सपना देखा है कि काश कभी कोई मुझे भी मुहब्बत से प्यार से सम्मान से , मेरी इच्छाओं का आदर करते हुए अपना बनाये। एक पवत्र प्रेम न कि शारीरिक आकर्षण या केवल वासना , प्रेम क्या ऐसा मुमकिन है अब ये सात दिन हम इक दूजे के होकर जियें। जैसे सदा सदा से हम इक दूसरे के हैं और बाकी दुनिया से अपना कोई नाता नहीं है। प्रेम प्रीति की बातें सुनते सुनते जैसे किसी सपनों की दुनिया में खो गया था , बोला था प्रीति क्या ये सच है या मेरा सपना , कॉलेज के दिनों मैंने हमेशा यही ख्वाब देखा था कि इक दिन तुम खुद मेरे पास आओगी और अपने प्यार का इज़हार करोगी। अब दुनिया क्या सोचती है इस से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है , मेरी ज़िंदगी मेरी है और तुम्हें भी अपनी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से जीने का पूरा अधिकार है। इसलिये तुम्हारा ये प्रस्ताव मुझे स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है। अगले सात दिन हम प्रेमी प्रेमिका बन कर ही जियेंगे ताकि इन दिनों का खुशनुमा एहसास उम्र भर हमें जीने की ऊर्जा प्रदान करता रहे। कहते हैं न ज़िंदगी प्यार की दो चार घड़ी होती है , चाहे थोड़ी भी हो ये उम्र बड़ी होती है। प्रेम ने पूछा था प्रीति मैंने कभी तुमको कोई उपहार देने को सोचा था मगर नहीं दिया ये सोच कर कि तुम स्वीकार न करोगी , क्या आज मैं कुछ देना चाहूं तो तुमको मंज़ूर होगा। "ज़रूर "प्रीति बोली थी आओ बाज़ार चलें हमें बस का समय होने से पहले वापस भी आना है। प्रीति ने प्रेम की पसंद की ड्रेस , चूड़ियां , बिंदी , लिपस्टिक ले ली थी , इक मंगल सूत्र को देख रुक गया तो प्रीति ने कहा था ले लो मुझे पसंद है। वक़्त गुज़रते पता ही नहीं चला था और जब तक बस स्टैंड पर पहुँचते उनकी बस निकल चुकी थी। लेकिन उनको बस छूटने का कोई अफ़सोस नहीं था , दूसरी कोई बस भी नहीं मिल सकती थी और उन्होंने तब वहीं किसी होटल में वो रात इक साथ गुज़ारने का तय कर लिया था। प्रेम ने पूछा था प्रीति क्या दो कमरे लेने हैं , प्रीत ने कहा था नहीं अब जब तक यहां हैं एक ही कमरे में रहेंगे। होटल के कमरे में आकर दोनों ने इक दूजे से उपहार में मिले कपड़े पहने थे , और इक दूजे को प्यार भरी नज़रों से निहारते रहे थे। प्रीति ने आज प्रेम को पति मान अपना श्रृंगार किया था और ये सोच खुद ही शरमा रही थी , फिर प्रेम के करीब जाकर बोली थी मेरा मंगलसूत्र कहां है प्रेम जी। प्रेम को लगा था मानो आज सारी दुनिया उसके कदम चूमने लगी है और उसने मंगलसूत्र प्रीति के गले में पहना दिया था। प्रीति ने झुक कर प्रेम के पांव छू लिये थे और पत्नी की तरह अपने हाथों को अपनी मांग पर फेरा था जैसे पति का आशिर्वाद लिया हो। ये प्यार वालों का अपना बंधन था जिसमें किसी तीसरे की कोई ज़रूरत नहीं थी , उन्होंने खुद को पति पत्नी मान लिया था। प्रेम जब सोफे पर सोने लगा तब प्रीति ने कहा था प्रेम दुनिया की नज़र में मेरा पति कोई भी हो मेरे लिये तुम ही मेरे पति हो सब कुछ हो , मैं आज खुद को तन मन से तुम्हें समर्पित करती हूं , मुझे अपना लो अपनी आगोश में ले लो , आज की रात अपनी सुहागरात है। मुझे अपना प्यार तुम पर बरसाना है और तुम भी मेरी जन्म जन्म की प्यास बुझा दो। ऐसे वो दोनों सुध बुध खो इक दूजे में समा गये थे , प्यार के सच्चे रिश्ते के लिये दुनिया के सब रिश्तों को भुलाकर।
     अगली सुबह उनको उठते ही जाना था बाकी सफर पूरा करने ताकि जिस काम को जाने को निकले थे वो पूरा कर सकें और अगले छह दिन साथ गुज़ार सकें ऐसे ही। टैक्सी मिल गई थी और सफर पूरा करने के बाद उन्होंने उस शहर में भी एक ही कमरा लिया था होटल में। सफर की थकान मिटाने को वो जल्दी ही सो गये थे।
   जब अगली सुबह जागे तो सुबह का अख़बार पढ़कर दंग रह गये थे , खबर छपी थी कि जिस बस में वो यात्रा कर रहे थे वो उसी रात खाई में गिर गई थी और उसमें जितने मुसाफिर थे सब मर गये थे। टूरिस्ट कंपनी ने उनका नाम भी दे रखा था मरने वालों की लिस्ट में। उनको समझ नहीं आ रहा था कि इस खबर का सन्देश क्या है। क्या वे अपने अपने घर सूचित कर दें कि हम ज़िंदा हैं या इस खबर को अपने लिये इक उपहार समझ जिस प्यार के रिश्ते को सात दिन को अपनाया था उसको उम्र भर का नाता मान लें। क्या अपने परिवार वालों को सच सच बता दें कि हम उस बस में नहीं थे और इक साथ पुराने सहपाठी के साथ थे दो दिन दो रात इक साथ। मुमकिन है तब वो कहते इससे तो अच्छा होता तुम मर ही जाते। काफी विचार विमर्श के बाद उन्होंने इसे तकदीर का फैसला समझने का निर्णय लिया है , और तय किया है कहीं और जाकर अपनी प्यार की नई दुनिया बसा लेंगे। अपना जीवन जीने का हक सभी को है , प्रेम प्रीति भी अपने सपने साकार करना चाहते हैं। घुट घुट कर मरने से अच्छा है दुनिया की नज़र में मर कर भी प्यार की दुनिया बसा कर ख़ुशी से जीना। ये सोच कर दोनों को लगा था वे अब किसी बंद पिंजरे के पंछी नहीं हैं , खुले गगन के दो आज़ाद पंछी हैं। "पंछी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में , आज मैं आज़ाद हूं दुनिया के चमन में "। प्रीति गुनगुना रही थी , उन दोनों के मन मयूर नाच रहे थे।
                                   ( इक सत्य घटना पर आधारित है ये कहानी )