Thursday, 30 October 2014

क्या सच में कुछ बदल रहा है ( आलेख ) डा लोक सेतिया

कई दिन के बाद लिखने को आया हूं ब्लॉग पर। सच कहूं तो खुद निजि बातों में खोया रहा कुछ दिन से और हर दिन लिखना छूट सा गया। हर लेखक के जीवन में ऐसा होता है कभी जब उसका ध्यान लिखने में नहीं रहता है। शायद एक महीना मैंने लिखने को लेकर सोचा ही नहीं। सत्ता बदली देश में भी राज्य में भी , समझ रहा था क्या जो बदलता हुआ लग रहा है वो वास्तव में बदल भी रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमेशा की तरह नाम ही बदलें बाकी सब वही चलता रहे। कुछ बातें नज़र आईं हैं जिनसे थोड़ा भरोसा हुआ है जनता को कि शायद अब सच में सब बदलने वाला है। डर लगता है कहीं फिर देश की उम्मीदें टूट न जायें , सत्ता ही बदले व्यवस्था जस की तस बनी रहे। कम से कम कुछ बातें तो हैं जिनको फिर से दोहराया जाने लगा है , आडंबर जो कोई और करता था किसी और रूप में वो कोई दूसरा नये ढंग से करता लग रहा है। कहां से शुरू की जाये बात , चलो आज के दिन से करते हैं।
          सरदार पटेल के नाम पर मैराथन दौड़ क्या है , कुछ सुविधा संम्पन लोगों का मात्र दिखावा नहीं क्या। क्या देश की जनता का इस से कुछ भला होने वाला है , क्या आम लोग शामिल होंगे ऐसे खेल में। कब तक आखिर कब तब यूं ही देश का धन फज़ूल दिखावों पर बर्बाद किया जाता रहेगा। महाराष्ट्र में शपथ ग्रहण समारोह पर ऐसा महंगा आयोजन किसलिये , समझना होगा भाजपा को उसको शासन का अधिकार मिला है या देश जनता की सेवा का। अंतर इतना सा ही है , सब मांगे देश और जनता की सेवा का अवसर हैं , मगर जब कुर्सी मिलती है तब शासक बन जाते हैं। बहुत अचरज हुआ जब जो कांग्रेस किया करती थी अपने सांसदों को बुला छप्पन प्रकार के व्यंजन परोसना वही मोदी जी ने भी किया। अगर सत्ताधारी ऐसे ही राजसी शान से रहते रहेंगे तब गरीब भूखा ही रहेगा , भाषण से पेट नहीं भरता।
            मैं कभी आगरा नहीं गया , ताजमहल मुझे हमेशा लगता किसी शासक ने जनता के खून पसीने की कमाई से अपना खज़ाना भर उसको अपनी ख़ुशी पर बर्बाद किया। शायद उस धन से लोगों को कितनी सुविधायें दी जा सकती थी। ये जो बुत , समाधियां बनाने का चलन है मैं इसको लोकतांत्रिक नहीं मानता , अभी भी सत्ताधारी खुद को देश का मालिक ही समझने लगते हैं। अन्यथा जिस देश की आधी जनता को दो वक़्त रोटी नहीं नसीब होती हो उस देश में मरने के बाद नेताओं की समाधियों पर धन कभी खर्च नहीं किया जाता। सोचो अगर वो नेता वास्तव में देश के और जनता के सेवक थे तो क्या उनको ऐसा किया जाना पसंद होता। काले धन की बात हो रही है , काला धन विदेशी बैंकों में ही नहीं है , नब्बे प्रतिशत देश में ही है ,उसको ढूंढने में उसपर अंकुश लगाने में कोई संधि बाधा नहीं है। क्या चाहती है सरकार रोक लगाना काले धन पर , मुश्किल नहीं है , एक कानून होना चाहिये हर नागरिक को बताना पड़े उसके पास क्या क्या है , घर ज़मीन , नकद , गहने या जो भी , और बिना घोषित कुछ भी हो उस को देश की संम्पति घोषित किया जाये। किसी को भी जितने भी चाहे घर खरीदने का अधिकार नहीं होना चाहिये ताकि जो बेघर हैं वही खरीद सकें। जो व्योपारी हैं उनको खेती की ज़मीन खरीदने का अधिकार किसलिये , काला धन सफ़ेद करने को। जब तक राजनेता खुद सादगी से नहीं रहते उनको गांधी का आलाप लगाने का कोई हक नहीं है। खुद को देश को जनता को धोखा देते रहे हैं नेता हमेशा , लेकिन कब तक। अभी भी भाजपा हो चाहे कोई दल सबका एक मात्र ध्येय सत्ता पाना ही है , और उसके लिये जो भी करना हो करते हैं। कुछ उसी तरह जैसे हम मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे बनाते जा रहे और जो वास्तविक धर्म है उसको समझना ही नहीं चाहते। लिखा बहुत जा सकता है मगर यहीं अंत करता हूं इस लेख का दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल के कुछ शेरों से।
   हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए ,
   इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
  सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं ,
  मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
  मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही ,
  हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।

Friday, 10 October 2014

सच हुए सपने ( कविता ) 107 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

सच हुए सपने ( कविता )
सपने तो सपने होते हैं ,
देखते हैं सभी सपने ,
मैंने भी देखे थे कुछ ,
प्यार वाले सपने ,
कोई अपना हो ,
हमराज़ भी हो ,
हमसफ़र भी हो ,
हमज़ुबां भी हो ,
चाहे पास हो ,
चाहे कहीं दूर हो ,
हो मगर दिल के ,
बहत ही करीब ,
जिसको पाकर ,
संवर जाये मेरा ,
बिगड़ा हुआ नसीब।
सब दुनिया वाले ,
यही कहते थे ,
किस दुनिया में ,
रहता हूं मैं अब तक ,
और किस दुनिया को ,
ढूंढता फिरता हूं ,
ऐसी दुनिया जहां ,
कोई स्वार्थ न हो ,
कोई बंधन न हो ,
और हो सच्चा प्यार ,
अपनापन , भरोसा ,
अटूट विश्वास इक दूजे पर।
मगर मेरा विश्वास ,
मेरा सपना सच किया है ,
तुमने ऐ दोस्त ऐ हमदम ,
जी उठा हूं जैसे फिर से ,
निकल कर जीवन की निराशाओं से ,
तैर रहा आशाओं के समंदर में ,
तुम्हारा हाथ थाम कर ,
मिलेगी अब ज़रूर ,
उस पार मेरी मंज़िल ,
इक सपनों का होगा ,
महल वहीं कहीं ,
जहां होगा अपना हर कोई ,
मुहब्बत वाला इक घर ,
जिसकी खिड़की दरवाज़े ,
दीवारें और छत भी ,
बने होंगे प्यार से ,
स्वर्ग सा सुंदर होगा ,
अपना छोटा सा आशियाना।

Sunday, 5 October 2014

रसीली ( कहानी , इक वेश्या की ) डा लोक सेतिया ( भाग दो )

                        ( अब आगे कहानी का दूसरा और अंतिम भाग )
वो रसीली ही थी , प्यार के रस से लबालब भरी हुई।  अपना नाम सार्थक करती थी , हमेशा हर किसी से मीठी मीठी बातें करना हंसना खिलखिलाना बचपन से सवभाव था उसका। घर का छोटा बड़ा सदस्य हो ,आस पास का कोई चाहे राह से गुज़रता कोई अनजान अजनबी सब से बिना झिझक बात करना हसी मज़ाक करना आदत थी रसीली की। सब का मन मोह लिया करती अपने भोले चेहरे निश्छल व्यवहार और सब के काम में साथ देने से। उसको नहीं पता चला कि कब उसने बचपन से किशोर अवस्था में और फिर जवानी में कदम रखा था। वो अभी भी वैसी ही थी , झूम कर किसी को गले लगा लेना , घुल मिल जाना सभी से बचपन जैसा ही था। घर के लोग चाहते थे उसको समझाना कि वो बच्ची नहीं रही अब और उसको हमउम्र लड़कों से थोड़ा दूरी रखनी चाहिये। रसीली नहीं समझ पाई थी कि अपने बचपन के दोस्तों से प्यार से मिलने , बात करने में बुराई क्या है। कोई उसको बिंदास कहता कोई नासमझ कोई बदचलन , मगर रसीली को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था। वो मानती थी कि जब वो कुछ भी गलत नहीं करती तो कोई क्या सोचता है इससे क्या मतलब। रसीली की सहेलियां भी कहती थी उसको , तुझे लड़कों के साथ अकेले कहीं भी आने जाने में क्या डर नहीं लगता है। वो कहती मेरे अपने दोस्त ही तो हैं भला उनसे किस बात का डर। और तब उस अल्हड़पन की बाली उम्र में ही रसीली कब अपना दिल कमाल को दे बैठी उसको भी पता नहीं चला। एक हरदम खामोश रहने वाला अपने में मस्त खोया रहने वाला कमाल उसके दिल और दिमाग पर छा गया कुछ ही दिन की मुलाकातों में जाने कैसे। कुछ दिन छुट्टियां बिताने आया था पास किसी रिश्तेदार के घर में। जब कमाल को वापस जाना था अपने शहर को तब वो नई दोस्त बनी रसीली को मिलने आया था , बहुत उदास था। रसीली ने कहा था फिर कब आओगे कमाल यहां। वो बेहद निराशा भरे स्वर में बोला था , उसको नहीं मालूम कि अब कभी आ सकेगा भी या नहीं। उसकी इस बात से रसीली को जाने ऐसा क्या हुआ था जो उसने कह दिया था कमाल अगर तुम नहीं आओगे तो मैं जी नहीं सकूंगी तुम्हारे बिना अधिक दिनों तक , मर ही जाऊंगी। और फिर जो कुछ घटा वो कोई सपना ही था , कमाल का रसीली से शादी करने का वादा और रसीली का घर को छोड़ कमाल के साथ जाना उसके शहर में उसके घर।
                                    रसीली को अपने साथ लेकर जब कमाल अपने घर पहुंचा तब वहां हंगामा खड़ा हो गया , जैसे कोई भूचाल आ गया हो। एक चुपचाप हर बात पर जी हां कहने वाले बेटे से ऐसी अपेक्षा नहीं थी परिवार वालों को सपने में भी। कमाल को आदेश दिया गया कि रसीली को लेजाकर उसके घर छोड़ आये। लेकिन कमाल ने अपना घर ही छोड़ दिया था और रसीली का हाथ थाम इक कसम खाई थी कि अब चाहे सारा ज़माना सारी खुदाई भी उन दोनों के खिलाफ हो जाये वो हमेशा इक साथ ही रहेंगे। उन्होंने तय कर लिया था कि अब प्यार ही उनके लिए सब कुछ है , प्यार में जीना प्यार में मरना भी मंज़ूर है। बेशक लोग उनसे नफरत करें वो सब को प्यार का ही सबक सिखायेंगे उम्र भर। शायद किताबों कहानियों की तरह लोग भी बदल जायेंगे और उनसे प्यार करने लगेंगे। मगर किताबों और कहानियों के पात्र बदल जाते हैं वास्तविक जीवन में अक्सर ऐसा नहीं होता है। उन दोनों के लिये और विशेषकर रसीली के लिये अपनों की नफरत उसकी मौत भी कम नहीं कर सकी। रसीली को जब कमाल के घर में जगह नहीं मिली तब उसने प्रयास किया था अपने घर वालों से सहारा मिल जाये। रसीली ने अपनी इक सहेली को फोन किया था ताकि वो उसके परिवार वालों से पूछ सके कि अगर वो कमाल को लेकर आये वहां तो क्या उनको सवीकार करेंगे पति पत्नी के रूप में। शाम को सहेली ने बताया था कि जब वो रसीली के घर गई थी तब वो बातें कर रहे थे उन दोनों को तलाश करने और जान से मरने की। इसलिये उसने उनको ये पूछना ही उचित नहीं समझा और यही बताया कि वह तो रसीली से मिलने को आई थी और उसको रसीली की कोई जानकारी नहीं है। सहेली ने समझाया था तुम दोनों कहीं दूर चले जाओ और अपनी दुनिया वहां बसा लो जहां ये ज़ालिम नफरत करने वाले नहीं हों। रसीली और कमाल जैसे सपनों के आकाश से गिर कर दुनिया की पत्थरीली ज़मीन पर आ गये थे और उनको समझ नहीं आ रहा था प्यार करके ऐसा क्या गुनाह किया है उन लोगों ने। पूरा का पूरा समाज ही उनका दुश्मन क्यों बन गया है , क्या कोई जगह नहीं जहां प्यार करने वालों को शरण मिल सके। भटकते रहे बहुत दिन तक इधर उधर मगर नहीं मिली कोई भी जगह उनको रहने को। प्यार करने वाले दिल ज़िंदगी की जंग लड़ते रहे और दो वक़्त पेट भरना भी कठिन हो गया। न रहने को ठिकाना न पास कुछ भी पैसे , उस पर जहां किसी से सहायता मांगते , काम मांगते और कोई ठिकाना , हर जगह शिकारी वहशी दरिंदे ही मिलते। ये देख बहुत घबरा गये दोनों प्रेमी , मगर इक ज़िद ने ज़िंदा रखा कि अपने लिये नहीं अब साथी के लिये जीना है। ज़िंदगी की कशमकश में वे इक दूजे को प्यार करना तो भूल ही गये थे और बात बात पर आपस में उलझने लगे थे। ऐसे में हवस के भूखे भेड़ियों ने उनकी मज़बूरियों का फायदा उठा कर उनको अपनी राह पर चलने को विवश कर दिया था। बहुत जल्द इक प्रेम कहानी पाप कथा बन गई थी। समाज के एक शरीफ कहलाने वाले धनवान व्यक्ति  ने उनको दया करने का झांसा देकर ऐसा फंसाया कि उनको ऐसी बदनाम गलियों में पहुंचा दिया जहां से निकलने की कोई राह ही नहीं होती है। हर दिन पल पल ज़िंदगी की लड़ाई लड़ते लड़ते दोनों तंग आ गये थे और हार मान ली थी , अपने हालत को नियति स्वीकार कर लिया था। और ऐसे में वो दोनों नशे का शिकार हो गये थे। इक समाजसेवक ने शरण देकर उनका शोषण किया बहुत दिन तक , कमाल को कहीं अन्य जगह भेज काम से रसीली के साथ वो खुद और उसके साथी मिल कई दिन तक अनाचार करते रहे , जब ये सब कमाल ने देखा और विरोध किया तो उसको सज़ा दी गई अपाहिज बनाने की , उसको नपुंसक बना दिया गया। ऐसे इक प्रेमी अपनी ही प्रेमिका का सौदा करने वाला इक दलाल बना दिया गया। उनको इक बदनाम बस्ती में पहुंचा दिया कुछ शरीफ कहलाने वाले लोगों ने।
                          रसीली कभी भी बस्ती की बाकी औरतों जैसी नहीं बन पाई , उसका सवभाव तब भी सनेहपूर्ण ही रहा अपने पास आने वालों से प्रेम और अपनेपन से बातें करते उसके पास अपनी हवस मिटाने आये ग्राहक भी उसको चाहने लगते थे। उनको रसीली का जिस्म ही नहीं मिलता था और भी बहुत कुछ मिलता था जो बस्ती की दूसरी किसी औरत से नहीं मिलता था। एक पूरी तहर खुद को समर्पित करने वाली औरत जो उनसे उनके दुःख और परेशानियां भी जानना चाहती थी मित्र बन कर और उनसे सहानुभूति भी रखती थी। ऐसे में वो लोग भी रसीली के पास आकर रहने लगे जिनके पास उसको देने को पैसे नहीं भी होते थे। जीवन से निराश लोगों को अपनाना रसीली और कमाल की आदत बन गई थी , खाली पेट आते कई लोग तब उनको रसीली खुद खाना बना कर खिलाती थी और उनकी प्यास भी बुझाती थी , जिस बस्ती में सब कुछ पैसा हो वहां रसीली यूं रहती थी जैसे पैसे की कोई अहमियत ही नहीं हो। पैसा न होने से किसी को ठुकराया नहीं कभी रसीली ने , रसीली से सब को प्यार ही नहीं मीठे बोल भी मिलते थे और खाने को रोटी के साथ देसी शराब भी। जाने कितने लोग जिनको अपनों ने ठुकरा दिया था उनको रसीली की हमदर्दी ने फिर से जीना सीखा दिया था। प्यार रसीली के अंग अंग में उसके रोम रोम में बेशुमार भरा हुआ था।  हालात ने उसको वैश्या का नाम भले दे दिया था तब भी जिस्म बेचने वाली औरतों की तरह उसने पैसे को अपना सब कुछ नहीं समझा था। सब के प्यार की प्यास मिटा कर अपने और अपने साथी कमाल की पेट की भूख और बाकी ज़रूरतें पूरी करने का काम रसीली ने ऐसे किया उम्र भर जैसे कोई पूजा करता है , इबादत करता हो। वासना का कारोबार नहीं सीखा कभी भी रसीली ने , कमाल और रसीली ने कभी दुनिया वालों से कोई शिकायत नहीं की थी। मगर जब दोनों अकेले होते अपने घर में तब पूछा करते भगवान से ये सवाल कि उनको प्यार करने की ऐसी सज़ा क्यों मिली है। क्यों खुदा अपनी दुनिया में प्यार करने वालों की भी इक दुनिया बनाना भूल गया था।
      पिछले दो दिन से बस्ती गुमसुम सी है , सन्नाटा सा छाया हुआ है बस्ती में। जो बस्ती की औरतें ईर्ष्या किया करती थी रसीली से उनकी भी आंखे नम हैं चेहरे उदास हैं और घर में ग़म की गहरी छाया है। शायद उनको भी ख्याल आ रहा है कि किसी दिन उनका भी यही अंत होना है। पुलिस वाले चाहते थे किसी तरह कोई रसीली की लाश उनसे ले ले अंतिम संस्कार करने के लिये ताकि उनको रसीली का ये घर सील बंद नहीं करना पड़े और वे इसका कब्ज़ा किसी और जिस्म बेचने वाली औरत को देकर कुछ कमाई कर सकें। लगता है पापियों की बात भगवान भी जल्दी सुन लेता है , तभी तो पुलिस वाले अपनी गाड़ी में रसीली की लाश ले जाते उस से पहले ही इक अनजान व्यक्ति रसीली के घर के दरवाज़े पर आकर रुका था रिक्शा से उतरा था। जब उसको मालूम हुआ कि रसीली की मौत हो चुकी है तब वो फफक फफक कर रोने लगा था , पुलिस वालों को उसने बताया था कि जब भी इस शहर में आता है वो तब रसीली के घर ही मेहमान बन कर रुकता है। पिछली कई बार उसने रसीली को एक भी पैसा नहीं दिया था किसी काम के लिये भी , क्योंकि उसके पास थे ही नहीं तब देने को पैसे। आज ढेर सारे पैसे साथ लाया था ये सोचकर कि उसका सारा क़र्ज़ उतार देगा। जब पुलिस वालों ने बताया कि रसीली की देह को लेने को कोई उसका अपना तैयार नहीं है और अब उसका दाह संस्कार लावारिस घोषित कर उनको ही करना है तब उसने पुलिस वालों से पूछा था कि क्या वो उसका अपना बन उसकी लाश को ले जा सकता है ताकि रसीली का अंतिम संस्कार कर सके। पुलिस वाले कब से यही चाहते ही थे , उस व्यक्ति से कुछ कागज़ों पर लिखवा लिया है कि वो रसीली का मित्र है और उसकी लाश ले जाकर क्रियाकर्म करना चाहता है। शमशान भूमि का वाहन आ गया है और वो अकेला रसीली का शव लेकर जा रहा है , बस्ती वालों के साथ पुलिस वालों की भी आँखे नम हैं ये देख कर कि कोई है जो रसीली के प्यार की कीमत समझता है और उसका क़र्ज़ चुकाने आया है , चाहे रसीली की मौत के बाद ही।
   ( रसीली की ये कहानी यहां समाप्त होती है , मगर शायद मैं रसीली की सही छवि अभी भी नहीं बना पाया हूँ। तभी ये वास्तविक कहानी किसी पत्र पत्रिका ने छापना स्वीकार नहीं किया। यहां मुझे इक इंग्लैंड के मनोचिक्सक की याद आती है , उसने ये प्रचार कर रखा था कि जो भी कोई ख़ुदकुशी करना चाहता हो वो मरने से पहले एक बार उसको ज़रूर आकर मिले। लोग आते हर दिन और वो सब को ये मनाने को सफल हो जाता कि उनके पास अभी जीने की वजह है। मगर इक दिन वो ऐसा नहीं कर पाया और उसने इक व्यक्ति को ये कह दिया कि मैं भी आपको नहीं समझा सकता कि आपको क्यों जीना चाहिये। अब उस को मरना ही था ये सोच कर निकला तो उन मनोचिकित्स्क की सहायक जो केबिन के बाहर बैठी ये सब सुन रही थी , ने उसको रोक कर पूछा आप क्या करने जा रहे हो , जब उसने ख़ुदकुशी करने की बात कही तब उस सहायक ने पूछा था क्या आप मेरे साथ चल कर एक कप कॉफी पी सकते हैं मरने से पहले , वो मान गया था। तब थोड़ी ही देर में उसको अपना मित्र बना उस सहायक ने उसका ख़ुदकुशी का इरादा बदलवा दिया था। आज भी उस सहायक के नाम इक संस्था है जो निराश लोगों में जीवन की आशा जगाती है। दिल्ली में भी उसकी एक शाखा है सफदरजंग हवाई अड्डे के पास , बहुत साल पहले उसके लिये काम किया है मैंने। रसीली ने शायद कुछ ऐसा ही किया था उम्र भर। हो सके तो आप भी उसको समझना। )

Thursday, 2 October 2014

कब होंगे सब लोग समान , मोदी जी ? ( आलेख ) डा लोक सेतिया

आज बहुत दिन बाद कुछ कहने लगा हूं जो शायद कितनी बार दोहरा चुका हूं। ठीक वैसे जैसे कल गांधी जी के जन्म दिवस पर जो हुआ वो जाने कितनी बार पहले भी हुआ है , होता रहेगा। ये इक तमाशा सा लगता है , बहुत सारे साफ सुथरे लोग , शानदार झाड़ू , बैनर , मीडिया का जमावड़ा , लाइव टेलीकास्ट , भाषण। कितना पैसा बर्बाद किया गया आडंबर पर इस गरीब देश का। बहुत पहले किसी विदेशी अर्थशास्त्री ने लिखा था इंडियन एक्सप्रेस में कि भारत देश तब तक गरीबी से मुक्त नहीं हो सकता जब तक दिखावे पर झूठी शानो शौकत पर धन खर्च करना बंद नहीं किया जाता। यकीनन सफाई ऐसे नहीं की जा सकती , कितनी हैरानी की बात है कि मुझे इन सब बातों पर लिखते उम्र बीत गई है और वही लोग कल हाथ में झाड़ू पकड़ फोटो करवा रहे थे जो कहते हैं मुझे कोई दूसरा काम नहीं जो रोज़ आस पास सफाई के बारे पत्र लिखता रहता हूं। अगर मुझ सा आम आदमी कहे तो पागलपन और कोई ओहदे पर बैठा व्यक्ति वही कहे तो बहुत महान बात। मोबाईल पर संदेश मिला सफाई अभियान का भी उसी तरह जैसे मोदी जी की आवाज़ में वोट की अपील का। सत्ताशास्त्र व्यंग्य याद आ गया , इक तरफा संवाद करते हैं शासक। इन राजनैतिक दल वालों को कभी समझ नहीं आया कि मैं किस तरफ हूं। पत्रकार मित्र भी पूछते हैं , मैंने इक बार इक सांध्य दैनिक के ऑफिस के महूर्त पर यही कहा था , आप या तो जनता की तरफ हो सकते हैं या नेता अफसर और शासन की तरफ। ये सच कोई माने या नहीं माने मगर वास्तविकता यही है कि देश में चालीस सालों में पत्रकारिता का पतन हद से अधिक हुआ है , और ये पथ से भटके ही नहीं ये तो विपरीत दिशा को भाग रहे हैं। विज्ञापन प्रसार संख्या की दौड़ में अंधे हो चुके हैं। जनता हूं आज देश विदेश में प्रधान मंत्री मोदी जी की धूम है , और मेरी आदत है मैं किसी की इबादत नहीं करता चाहे कोई आदमी कितना ही बड़ा क्यों नहीं हो। इक बार महेश भट्ट जी का साक्षात्कार देखा था टीवी पर , उन्होंने इक बात कही थी कि हम गुलामी की मानसिकता वाले लोग हैं , हमें चाहिये कोई न कोई परस्तिश को। कभी अमिताभ कभी सचिन कभी कोई और। मगर बार बार ये भरम टूटता है , किसी शायर का इक शेर है "तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला , मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला"।
                          इसलिये कहना चाहता हूँ कि चाहे कोई भी हो अंध भक्ति नहीं करना  , खुद भगवान से भी सवाल पूछना कभी मिल सके कहीं गर। भारतीय जनता पार्टी क्या कहती है , मोदी जी क्या कहते हैं , इतना काफी नहीं है। वो क्या करते हैं ये देखना ज़रूरी है। आज जिनको टिकट देकर खड़ा किया है भाजपा ने कौन हैं वो , कल तक उसी दल में तो नहीं थे जिनको गुंडा राज का दोष दे रहे या जिन पर घोटालों पर घोटालों के आरोप हैं जब सत्ता में था उनका दल। दलबदलू नैया पर नहीं किया करते बीच मझधार डुबोते हैं। गटर का पानी मिलता रहेगा तो गंगा को गटर ही बना लोगे। बहुत वादे किये हैं , मुश्किल काम है देश से भूख गरीबी और छोटे बड़े का अंतर मिटाना जो कैसे होगा शायद मोदी जी भी नहीं जानते। चलो आखिर में अपनी पहली कविता सुनाता हूं , जो कल भी सच थी , आज भी सच है।
पढ़ कर रोज़ खबर कोई ,
मन फिर हो जाता है उदास।
कब अन्याय का होगा अंत ,
न्याय की होगी पूरी आस।
कब ये थामेंगी गर्म हवायें ,
आयेगा जाने कब मधुमास।
कब होंगे सब लोग समान ,
आम हैं कुछ तो कुछ हैं ख़ास।
जिन को चुनकर ऊपर भेजा ,
फिर वो न आये हमारे पास।
सरकारों को बदल देखा ,
हमको न कोई आई रास।
बन गये चोरों और ठगों के ,
सत्ता के गलियारे दास।
कैसी आई ये आज़ादी ,
जनता काट रही बनवास।

Wednesday, 1 October 2014

ग़ज़ल 213 ( अब यही ज़िंदगी अब यही बंदगी ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

अब यही ज़िंदगी , अब यही बंदगी ,
प्यार की जब हमें भा गई बेखुदी।
आपके वास्ते ग़ज़ल कहने लगे ,
थी हमारी मगर हो गई आपकी।
इश्क़ करना नहीं जानते हम अभी ,
खुद सिखा दो तुम्हीं कुछ हमें आशिक़ी।
पास आओ करें बात भी प्यार की ,
छांव कर दो ज़रा खोल दो ज़ुल्फ़ भी।
वक़्त मिलने का तुम भूल जाना नहीं ,
रोज़ मिलते वही याद रखना घड़ी।
किस तरह हम कहें बात दिल की तुम्हें ,
आप सुनते कहां बात पूरी कभी।
जब से "तनहा" दिवाना हुआ आपका ,
भूल जाती उसे बात बाकी सभी।