Sunday, 31 August 2014

प्रेमियों के दिन कब बदलेंगे ( कहानी ) डा लोक सेतिया

कहानी सच्ची है केवल नाम बदले हुए हैं। शायद अभी अधूरी है कहानी। लगता है नई कहानी का भी वही पुराना अंजाम ही होगा। ललित कॉलेज में पढ़ता था कुछ साल पहले जब उसको किसी से इश्क हो गया। मिलते रहे दोनों हर शाम , जन्म जन्म तक साथ देने की बातें की आपस में। शिक्षा पूरी करने के बाद ललित ने बाज़ार में अपना गिफ्ट शॉप का कारोबार शुरू कर लिया और प्रेमिका को एक अच्छी सरकारी नौकरी मिल गई। शहर अलग अलग थे दोनों के कुछ किलोमीटर की दूरी थी। अपना कारोबार जमा लेने के बाद ललित मिला अपनी प्रेमिका से जाकर और शादी की बात की उसके साथ। सोच में पड़ गई प्रेमिका क्या करे। उसको इस बीच साथ  जॉब करने वाले सीनियर अधिकारी ने परपोज़ किया था मगर  उसने माता पिता से बात करने को कह दिया था। तब पंद्रह साल पहले सब के पास फोन नहीं था हर दिन सम्पर्क करने को। ललित की मां को जब ललित ने बताया कि उसको किसी से प्यार है तो इकलौते बेटे की खुशी को सब से अधिक महत्व देने वाली ममता भरी मां कैसे नहीं मानती। वो खुद ही चली गई थी रिश्ते की बात लेकर। सोच कर बताने को कहा गया था। सोचना क्या था , जब दोनों इक दूजे को पसंद कर चुके थे। मगर जब प्यार को दुनियादारी के तराज़ू में तोला जाता तब अंजाम यही होता है। प्रेमिका मान गई थी कि माता पिता ठीक  ही कहते हैं कि उसके लिये सरकारी जॉब वाला लड़का ही सही रहेगा। देखने में सुंदर नहीं तो क्या हुआ , और प्यार तो शादी के बाद हो ही जाता है। बीस साल की उम्र का प्यार तो नासमझी में हो जाता है। तब लड़की किसी बेल की जैसी होती है जो सहारा मिले उसी को लिपट जाती है। कोई जवाब नहीं मिला था ललित को न उसकी मां को , वो इंतज़ार करते रहे और पता चला कि उस प्रेमिका की चट मंगनी पट शादी हो गई। ललित ने कोई शिकायत नहीं की थी किसी से , मान लिया था कि प्यार में अपनी नहीं उसकी खुशी देखनी चाहिये जिसको चाहते हो। शायद उसके लिये वही ठीक होगा। मां को भी समझा लिया था कि ये बात कभी किसी को नहीं कहनी है। मां ललित के लिये लड़की , अपनी बहू की तलाश अधूरी छोड़ दुनिया को अलविदा कहने से पहले अपनी ननद को ये काम पूरा करने को कह गई थी।
        ललित को आंटी ने अपना दूसरा बेटा मान लिया था और उसका ध्यान रखने लगी , दो घर थे साथ साथ , बीच की दीवार हटा कर एक बड़ा घर बन गया। आंटी जॉब करती , अपने बेटे की शिक्षा पूरी करवाती रही और ललित को शादी करने को मनाती रही।  ललित को कोई भी पसंद ही नहीं आती थी , आंटी सेवानिवृत हो गई , उसके बेटे की शादी भी हो गई मगर ललित अभी तक कुंवारा ही था। चालीस की उम्र में उसकी पसंद की लड़की मिलना और भी कठिन हो गया। आंटी चाहती थी ललित की बहू आये उसका घर संभाल ले ताकि वो अपने बेटे और बहू के साथ दूसरे नगर में जाकर रह सके। आंटी की इक सहेली को उनकी बहू ने बताया अपनी दोस्त राधिका के बारे में जो उनके राज्य में सरकारी नौकरी करती है और जो बहुत ही सुशील है मगर उसकी शादी नहीं हो पा रही क्योंकि उसकी जन्मकुंडली ही नहीं मिलती जिस किसी को भी पसंद करती जब रिश्ते की बात होती माता पिता से। जब उसने आंटी के भतीजे ललित के बारे बताया तो उसने कहा कि लगता तो दोनों के लिए सही है हां ललित की उम्र सात साल ज़्यादा है जबकि राधिका अपनी उम्र से भी कम की नज़र आती है। उस सहेली ने राधिका की बड़ी बहन को फोन पर बताया था। वंदना अपनी बहन राधिका के लिये ललित को देखने आई थी , उसको पसंद आया था ललित बहुत , वो कुंडली भी साथ लेकर आई थी और इक फोटो भी राधिका का। पंडित जी को फोन पर सब जानकारी देकर वंदना ने कुंडली मिलवा ली थी , जो मिल गई थी। ललित को आंटी ने तैयार कर लिया था और वो गया था राधिका को देखने। दोनों दो घंटे मिले थे अकेले में और खुल कर हर बात की थी , जाने कैसे क्या हुआ कि दोनों को महसूस हुआ था कि यही तो है जिसकी मुझे तलाश है। ललित ने राधिका को कहा था कि अभी हम दोनों सब सोच लें और एक दो बार और मिलते हैं ताकि बाद में कोई बात दिल में नहीं रह जाये , राधिका मान गई थी। मिले थे दो बार , रविवार को ललित आता था मिलने घर से बाहर। कुछ ही दिन में उनको प्यार हो गया था इक दूजे से। घर पर बता दिया था दोनों ने कि हमको रिश्ता मंज़ूर है , लगा बात बन गई है , मगर जो हुआ वो हैरान करने वाला था। पिता को लगा की दूसरे राज्य के शहर विवाह किया तो बेटी की नौकरी का क्या होगा और उन्होंने ये कह दिया ललित की आंटी को कि रिश्ता केवल तभी हो सकता अगर ललित यहां आकर कारोबार करने को राज़ी हो। ये बात आंटी को बिल्कुल भी पसंद नहीं थी कि कोई लड़का ससुराल जाकर रहे।बात बीच में ही रह गई थी।
        मगर ललित को लगा कि एक बार राधिका से बात करनी चाहिये दोस्त बन कर। जब उसने राधिका से पूछा कि क्या कोई रास्ता नहीं है इस समस्या का हल निकालने का। साफ साफ बता दो आपके दिल में मेरे लिये क्या भावना है। राधिका का जवाब था कि ललित जी आपको क्या लगता है मेरे बारे पहले आप मुझे बताओ। ललित ने कहा मुझे आप बेहद पसंद हैं और मैं आपको अपना जीवनसाथी बनाना चाहता हूं। राधिका बोली थी ललित जी मुझे भी आप बहुत ही अच्छे लगते हैं और मुझे भी आपको जीवनसाथी बनाना है। सच कहूं तो मुझे लगता है मुझे प्यार हो गया है आपसे मगर समझ नहीं पा रही थी आपसे कैसे कहूं। आज लगा कि अगर नहीं कहा तो आप मुझे कभी मिल नहीं सकोगे। मुझे अपनी नौकरी की चिंता नहीं है मैं आपके लिये उसको छोड़ सकती हूं मगर अपने परिवार को कैसे समझाऊं मैं नहीं जानती। तब ललित ने कहा था राधिका जी मैं भी इन कुछ ही दिनों में आपको दिलोजान से प्यार करने लगा हूं और आपके लिये सब कुछ कर सकता हूं। मेरा कारबार दस साल पुराना है और स्थापित है फिर भी मैं अगर आप कहोगी तो उसको बंद कर आपके राज्य में किसी शहर में नया फिर से शुरू कर सकता हूं , लेकिन किसी शर्त को मान कर नहीं , आपकी ख़ुशी के लिये। मगर आपके इस शहर को छोड़कर , क्योंकि ऐसा मुझे अनुचित लगता है , आप जिस भी शहर में अपना तबादला करवा लगी मैं वहीं आपके लिये घर खरीद लूंगा। आप अपने मॉम डैड को मना लो। राधिका ने कहा कि आपकी बात सही है और अगर आप मेरे लिये ये सब करने को तैयार हैं तो मुझ से भाग्यशाली और कोई नहीं हो सकती , लेकिन आपको ऐसा करने को विवश करके मैं खुद अपनी ही नज़र में गिर जाऊंगी इसलिये ये बात मैं कभी नहीं होने दूंगी। मुझे आपसे कोई शर्त नहीं मनवानी है मॉम डैड की। शायद अब मेरे प्यार का भी इम्तिहान है और मेरा प्यार स्वार्थी नहीं है। मैं आज ही सब को बता दूंगी कि मुझे आपको छोड़ किसी से भी शादी नहीं करनी है और मुझे अपने इस राज्य में नौकरी नहीं करनी है। हम आपके शहर में दूसरी नौकरी तलाश कर लेंगे। राधिका और ललित ने तभी वंदना दीदी को ये निर्णय बता दिया था ताकि वो घर में बाकी सब को मना सके। ललित और राधिका ने तय कर लिया था कि चाहे जो भी हम दोनों अलग नहीं होंगे। हर रविवार बीच में इक शहर में मिलते रहेंगे , वही प्रेमियों का पुराना बहाना , सतसंग को जाना और प्यार से मिलना।
              ललित ने आंटी को बता दिया था कि राधिका और मैं प्यार करते हैं और हमने तय किया है कि राधिका अपनी जॉब छोड़ देगी और यहां नई जॉब ढूंढ लेंगे हम मिलकर। उधर वंदना ने जब घर पर बताया कि ललित और राधिका इक दूजे को चाहते हैं और ये भी कि राधिका अपनी नौकरी छोड़ने को तैयार है ललित की खातिर। पुरानी सोच के माता पिता ये सुन कर आग बबूला हो गये थे , उनको लगा कि बेटी उनकी मर्ज़ी के बिना शादी करने को कैसे तय कर सकती है। वो अपनी पुरानी बात पर अडिग थे कि रिश्ता तभी हो सकता है अगर ललित उनके शहर में आकर रहने को राज़ी हो। इस तरह बहुत बातें दो परिवारों में होने लगी इक दूजे को अपनी बात समझाने को। वंदना ने ललित की आंटी को कहा था कि आंटी बेशक ऐसा मुझे भी उचित नहीं प्रतीत होता तब भी अगर आप और हमारे मॉम डैड अपनी अपनी बात पर अड़े रहे तो ये दोनों चाह कर भी खुश नहीं रह सकेंगे। फोन पर ही बात हुई थी , आंटी ने कहा था कि उनका मकसद कोई ज़िद नहीं है केवल ललित और राधिका का भविष्य है। आज ललित की बहुत ही अच्छी आमदनी है , चलता हुआ पुराना कारोबार है , कल अगर नई जगह ईश्वर न करे नहीं चल पाया तो परेशानी उन्हीं को होगी। और राधिका को जॉब हम यहां भी दिलवा सकते हैं। मैं आपके मॉम डैड से बात करूंगी और उम्मीद है वो भी समझेंगे। आखिर बेटी को जाना ही होता है पति के घर , आप भी तो उनसे दूर रहती हो अपने पति के साथ। आंटी ने उसी दिन शाम को फोन किया था और राधिका के डैड को कहा था कि मेरे लिये राधिका मेरी बेटी है मैं उसको कोई परेशानी नहीं आने दूंगी , आप ये शर्त छोड़ कर मेरी झोली में डाल दो राधिका को। अब वो मेरी बेटी है। मगर राधिका के माता पिता नहीं माने थे। राधिका के पिता ने कहा था कि आप धर्म को मानने वाली महिला होने की बात करती हैं और किसी से उसकी बेटी ज़बरदस्ती छीन लेना चाहती हैं , क्या ऐसा करना आपको शोभा देता है। आंटी ने कहा था भाई साहब मैं तो दोनों बच्चों की ख़ुशी चाहती हूं तभी आपसे निवेदन किया है , विवश करने का तो सवाल ही नहीं और छीनना तो कदापि नहीं। आपसे ये मेरा वादा है कि मैं कभी आपकी मर्ज़ी के बिना राधिका की शादी ललित से नहीं करना चाहूंगी , उनको ऐसा कोई कदम उठाने को मैं नहीं कह सकती। और ललित अगर चाहे तो कहीं भी राधिका के संग रह सकता विवाह करके , मैं रोकूंगी नहीं उसको , लेकिन जब खुद राधिका ही अपनी जॉब छोड़ना चाहती है तब उसको इतनी तो आज़ादी मिलनी ही चाहिये। आप ठंडे मन से सोच कर फैसला करें यही आग्रह करती हूं।
                      बात वहीं रुक कर रह गई थी , मगर ललित और राधिका हर रविवार मिलते रहे। शायद दोनों ने इसको नियति मान लिया था कि चाह कर भी वो एक नहीं हो सकते थे। फोन पर बात होती रहती थी ये बात ललित की आंटी भी जानती थी और राधिका के मॉम डैड और बड़ी बहन वंदना भी। और इस बीच इक घटना हुई या फिर इक इतेफाक कि जब शाम को राधिका को उसकी ट्रैन पर चड़ा कर ललित बसस्टैंड पहुंचा तब बस निकल चुकी थी उसके शहर जाने वाली , और वो सड़क पर किसी अन्य वाहन की राह देख रहा था। तभी एक कार रुकी थी और उसका मालिक चाय पीने लगा था स्टॉल पर , ललित ने जाकर उनसे पूछा था , अंकल जी आपको किधर जाना है।  मेरी आखिरी बस छूट गई है और मुझे अपने अमुक शहर जाना है , क्या आप मुझे लिफ्ट दे सकते अगर उसी तरफ जाना है। और वो मान गये थे , बताया था कि उनको जिस शहर तक जाना है वहां तक चल सकते और वहां से बस चौबीस घंटे मिलती भी है। रस्ते में इक दूजे को बताया दोनों ने अपना अपना परिचय। वो इक कहानीकार हैं और ललित उनके नाम से परिचित भी था इसलिये उनसे मिलकर ख़ुशी हुई उसको। इस बीच राधिका का फोन आया था , बताने को कि वो घर पहुंच चुकी है , ललित कहां तक पहुंचा है पूछना चाहती थी।  ऐसे में नेटवर्क चला गया और बात बीच में कट गई थी , कार चला रहे व्यक्ति ने पूछा क्या आपकी पत्नी का फोन था , अगर आपके फोन का नेटवर्क नहीं है तो मेरा उपयोग कर सकते हो। नहीं , वो मेरी प्रेमिका है हमारी दोनों की शादी हुई नहीं अभी तलक , मगर शुक्रिया आपका फोन उपयोग नहीं कर सकता न ही ज़रूरत है।  उनको ललित की साफगोई अच्छी लगी थी , उन्होंने कहा था बेटे मुझे आपकी निजि ज़िंदगी से कोई मतलब नहीं है मगर इतना अवश्य समझाना चाहता हूं कि जीवन में सच्चा प्यार पाने को सब कुछ करना चाहिये। ये इसलिये कहता हूं क्योंकि मुझे भी जवानी में किसी से प्यार हुआ था लेकिन मैंने उसका इज़हार तक नहीं किया था इस डर से कि वो इनकार कर देगी। बेशक मैं खुश हूं मेरी शादी हो चुकी है , बीवी अच्छी है , बच्चे हैं जो प्यारे हैं तब भी कभी कभी सोचता हूं कि मुझे उसको न केवल बताना चाहिये था कि मुझे उस से प्यार है बल्कि हर कोशिश करनी चाहिये थी। मैं नहीं जनता मेरी प्रेम कहानी का अंजाम क्या होता , और ये बात मेरी कहानियों में भी झलकती है अक्सर। मगर तुम अपनी प्रेम कहानी को सही अंजाम तक ज़रूर ले जाना। ललित ने कहा था अंकल आपसे मिलकर बेहद अच्छा लगा है , और मैं आपकी बात याद रखूंगा। शायद कभी आप हम दोनों की प्रेम कहानी भी पाठकों तक पहुंचा दो और लोग जान सकें कि आज भी ऐसा प्यार कोई किसी को करता है। अंकल बोले थे आप दोनों बताओगे और मुझे अनुमति दोगे तो ज़रूर लिखने की कोशिश करूंगा , लेकिन ऐसा तभी हो सकता है अगर मुझे सब की हर बात की सही जानकारी हो। ललित ने कहा था कि अपनी प्रेमिका से पूछ कर बतायेगा , सम्पर्क नंबर ले लिया था , उनको दे भी दिया था।
             उन अंकल ने ही फेसबुक की बात भी की थी और बताया था कि बहुत लोग उसपर ही पहचान करते हैं दोस्त बनते हैं। मगर सावधान भी रहना सब सच नहीं होता है , आजकल झूठ बहुत है। जाने क्या सोचकर ललित ने उस दिन अपना फेसबुक अकाउंट शुरू किया था और कुछ अजनबी लोगों को दोस्त बना लिया था। उन्हीं में इक महिला भी थी आशा रानी , उनसे चैट पर बात करते ललित ने अपनी बात बता दी थी। राधिका भी चाहती है और ललित भी तो कोई दूसरा कैसे रोक सकता है आशा जी को ये समझ नहीं आया था , भाग कर शादी कर लेने की सलाह दी थी उन्होंने ललित को। ललित ने अपनी उलझन बताई थी कि अगर मेरी आंटी नहीं चाहती , राधिका के मॉम डैड नहीं चाहते , यहां तक कि जिसने ये सब शुरू किया वो राधिका की बड़ी दीदी भी नहीं पसंद करती वो कैसे सही हो सकता है।   क्या हम अपने प्यार में इतने स्वार्थी हो जायें कि बाकी सभी की भावनाओं की परवाह ही नहीं करें। ललित ने राधिका को भी फेसबुक पर आशा रानी से दोस्ती कर सलाह करने को कहा था , राधिका ने ललित की बात मान ली थी मगर ये भी विचार प्रकट कर दिया था की यूं किसी की बात को बिना समझे नहीं मानेंगे हम दोनों।  जब जो वर्षों से हमें जानते हैं वो भी नहीं समझते कि हमारी भलाई किस में है तो ऐसे फेसबुक की पहचान के लोग कुछ ही दिन में क्या समझ सकते हैं।
           राधिका की बड़ी दीदी ज्योतिष पर यकीन रखती है , उनके पंडित जी ने ललित और राधिका की जन्म पत्री देख कर बताया है कि अभी उन दोनों के दिन ठीक नहीं हैं , जल्द ही अच्छे दिन आने वाले हैं। उन्होंने कोई पूजा करने को भी कहा है और पूजा को बुलाया है वंदना दीदी ने उनको। शायद अब भगवान ही उनको राह दिखा सकता है। दो प्रेमी इंतज़ार कर रहे उनके अच्छे दिन जाने कब आयेंगे। देश में अच्छे दिन आने का शोर बहुत था , मालूम नहीं किस किस को नसीब होते हैं अच्छे दिन।  मित्रो उनके लिये अपने अपने देवी देवता से प्रार्थना करना , शायद कोई दुआ कबूल हो जाये। आमीन।      

Wednesday, 20 August 2014

कौन बनेगा करोड़पति में पूछे जाने चाहिएं ये सवाल ( तरकश ) डा लोक सेतिया

" बिका ज़मीर कितने में हिसाब क्यों नहीं देते ,
  सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते। "
मेरी ग़ज़ल का मतला है। अब क्या बतायें कि किन लोगों के बारे सोच कर लिखा था। सब जानते हैं अब सब से अधिक सवाल कौन पूछते हैं। हर किसी से पूछते हैं कटघरे में खड़ा करके। मगर सब को आईना दिखलाने वाले खुद को नहीं देखते कभी। कभी माना जाता था कि जो बिक गया वो खरीदार नहीं हो सकता , मगर अब वही खरीदार हैं जो खुद बिक चुके हैं। इधर फिर से कौन बनेगा करोड़पति का खेल शुरू हो चुका है जिसमें सदी का महानायक और मीडिया द्वारा घोषित भगवान चौदह प्रश्न पूछ कर आपको सात करोड़ जीतने का अवसर देता है। मगर कभी किसी ने उनसे नहीं पूछा कि आप कैसे धनवान बने हैं। ये तथाकथित भगवान इतना भी नहीं जनता कि वो खुद क्या है , अभिनेता है या झूठे विज्ञापन करने वाला इक चालाक कारोबारी है जिसके लिये पैसा ही खुदा है। या फिर वो छलिया है जो अपनी मधुर वाणी से ठगता है। या जैसा उसने लोनावाला में बीस एकड़ भूमि खरीदने के लिये शपथपत्र दिया था कि वो इक किसान है। और उसको साबित करने के लिये किसी ज़माने में मित्र रहे नेता के सहयोग से उत्तर प्रदेश में जालसाज़ी कर के प्रमाण एकत्र किये थे। मगर इस महानायक कहलाने वाले का एक चेहरा और भी है , कभी ये लिखता है अपने ब्लॉग पर कि उसकी ईश्वर से ईमेल पर बात होती है। जनाब अगर थोड़ी सी मेहरबानी कर सब को भगवान का ईमेल ही दे दें तो सब लोग अपनी समस्या सीधे ईश्वर को लिख कर भेज सकें। क्या हम उसको झूठा कह सकते हैं जिसको लोग भगवान का दर्जा देते हों। हां इस बात की हैरानी ज़रूर है कि इस कलयुगी भगवान की धन हवस बढ़ती ही जा रही है , और धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि जिसके पास सब कुछ हो फिर भी और पाने की चाह हो वो सब से दरिद्र होता है। अब ऐसा मनुष्य किसी को क्या दे सकता है। इक टीवी शो आया था जिसमें सच बोलने पर इनाम दिया जाता था , मगर वो सच बहुत कड़वा होता था। महाकरोड़पति के खेल में एक दिन इस कार्यक्रम पर ऐसे ही सवाल हों और उनका जवाब वही दे जो अब तक बाकी लोगों से सवाल पूछता है। ये सच बताया जाये कि आज तक इस खेल से कितने लोगों को कितना धन मिला है और उस से कितने गुणा इनको मिला है और कितने हज़ार गुणा चैनेल को मिला है। ये भी कि ये पैसा आया किसको उल्लू बना कर है , यूं भी उल्लू बनाने की बात का विज्ञापन करने वाले भी प्रयोजक हैं इनके खेल में। जाने कैसी राह दिखाना चाहते हैं ये लोग , क्या ऐसे ही गरीबी दूर हो सकती है सब की , बेशक इनकी होती है मगर अभी और कितना चाहिये इनको। ये अपनी तरह का ढंग है लोगों से छीनने का एस एम एस का जाल बिछा कर। अंत में किसी शायर के चंद शेर इनके नाम।
  " इस कदर कोई बड़ा हो हमें मंज़ूर नहीं ,
   कोई बन्दों में खुदा हो हमें मंज़ूर नहीं।
   रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की अगर ,
  चांद बस्ती में उगा हो हमें मंज़ूर नहीं।
 मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना ,
 आपकी एक अदा हो हमें मंज़ूर नहीं। "
( पत्र पत्रिका वाले अगर चाहें तो इसको प्रकाशित कर सकते हैं , मगर पूरा और साभार )

Thursday, 7 August 2014

काठ की हंडिया कब तक चढ़ती रहेगी ( तरकश ) डा लोक सेतिया

इक नायक है देश का दूसरा सदी का महानायक कहलाता है। नायक अच्छे दिन लाने वाला है महानायक सब को करोड़पति बनाना चाहता है। दोनों की जोड़ी खूब है जय-वीरू की जोड़ी की तरह। अब देश में सब कुछ सही हो जायेगा। नायक जो मांगता था उसको वो मिल गया है लोकसभा में पूर्ण बहुमत। महानायक के पास तो पहले से सभी कुछ है , कुछ लोगों ने उसको भगवान तक घोषित कर रखा है। नायक कभी चाय बेचता था , खुद गरीब रहा है , उसको पता है भूख-बेबसी क्या होती है। ये महानायक भी बहुत फिल्मों में गरीबों का हितेषी वाला किरदार बखूबी निभा चुका है। आनंद फिल्म में बाबू-मोशाय इक डॉक्टर है जो जानता है कि देश में गरीबी है भूख है कुपोषण है। ऐसे ही किरदार निभाते निभाते महानायक उस जगह जा पहुंचा है जहां उसको कुछ मिंट का विज्ञापन करने के लिये ही करोड़ों मिलते हैं। पहले भी कई बार वो लोगों को करोड़पति बनने का सपना बेच चुका है। वो बताता है कि एसएमएस करो अपनी तकदीर बदलने के लिये , कुछ आसान से सवालों का जवाब ही तो देना है। पिछली बार उसने दावा किया था बहुत लोगों की तकदीर बदलने का। हर सवाल के बाद पूछता था हॉट सीट पर बैठे व्यक्ति से कि ये रकम उसके लिये क्या मायने रखती है। लगता था गरीबी का उपहास उड़ा रहा हो , दिखलाता था मानो दानवीर है और भीख दे रहा है। प्रतिभागी लोगों ने उनसे कई बातें पूछी हैं केवल यही नहीं पूछा कि इस केबीसी का सच क्या है। इसने किसको कितना अमीर बनाया है और किस किस से कितना लूटा है सपनों का जाल बिछा कर। मगर क्या किया जाये इधर परोपकार ऐसे ही किया जाता है , जितना देते हैं या देने का दावा करते हैं उस से कई गुणा खुद अपनी जेब में आ जाता है। सब से बड़ा कारोबार है अब समाज सेवा भी। अगर इस बार केबीसी में कोई एपीसोड इसको लेकर हो कि अब तक वहां कितने लोगों को करोड़पति बनाया गया है , लोग कितनी राशि जीत कर ले गये हैं और उस से कितने हज़ार गुणा कौन मुनाफा कमा गया है। इक वो भी थे जो कहते थे कि " देनहार कोऊ और है देत रहत दिन रैन , लोग भरम मोपे करें याते नीचे नैन " और इक ये हैं जो लोगों से छीन कर बहुत धन बहुत चालों से , उसमें से नाम मात्र का देकर दानवीर कहलाते हैं। और वो जो अच्छे दिन लाने की बात करते थे अब राजसी जीवन जी रहे हैं , उनका पूरा ध्यान अपना वर्चस्व बनाये रखने पर है।  जनता के पैसे से वो भी खूब मनमानी करने लगे हैं , ये भुला कर कि लोग किस दशा में हैं। लगता है उन्होंने ने भी देश की जनता की समस्यायें भगवान भरोसे छोड़ दी हैं , गरीबों की अब कोई बात नहीं की जाती। वही दलगत राजनीति , वही वोटों का गणित , वही अपनी सत्ता का विस्तार प्रमुख बन गये हैं। सत्ता मिलते ही चाय बेचने वाला जनता का धन उपयोग कर राजसी पूजा में शामिल होकर करोड़ रुपये की चंदन की लकड़ी दान कर आता है बिना सोचे कि उसको इस धन की रखवाली करनी है , ये उसकी विरासत नहीं है जिसको दिल खोल कर लुटा सके। ये कोई धर्म नहीं है। नायक के भाषण में और महानायक की बातों में अच्छी लगने वाली बातें क्या सच में अच्छी हैं या झूठ और छल को किसी आवरण से ढक दिया गया है। जो भी हो संसद में वही जंग जारी है , काठ की तलवारों वाली।

Sunday, 3 August 2014

जश्न आज़ादी का ( तरकश ) डा लोक सेतिया

नेता जी सलामी ले रहे थे। ऐसे चल रहे थे मानो कोई ठेल रहा हो। कदम थे कि उठने का नाम ही नहीं ले रहे थे। देश के विकास की तरह गति थी। सुरक्षा कर्मी उनको हिदायत दे रहा था कि लाल कालीन पर ही चलना है। नेता जी देश को सही दिशा में ले जाने और विकास करने की बात दोहरा रहे थे भाषण में। पूरा देश छुट्टी मना रहा था। हम भी टीवी पर वही तमाशा देख रहे थे। घर से बाहर निकले तो एक रिक्शा वाला नज़र आया , हमने उसको बुलाया तो वो वो हमारे पास चला आया। हमने पूछा तुम्हारा नाम क्या है। "भारत नाम है मेरा साहिब " बताया उस फटेहाल ने। नाम सुनकर अच्छा लगा , वास्तविक पहचान लगी , महान लगा। हमने उसको प्यार से कहा , भारत तुम आज़ाद हो , आज आज़ादी का दिन है आज तो छुट्टी मनाओ , आज जानवरों की तरह बोझा न ढोवो। वो कहने लगा अरे बाबू ज़रा ये तो बताओ कि हमें किस बात की आज़ादी है। अगर छुट्टी मनायेंगे तो शाम को घर का चूल्हा कैसे जलेगा , पूरा परिवार भूखा सोयेगा रात को आज के दिन।
     ये आज़ादी का जश्न मनाना तो उन लोगों का चोंचला है जिनको पेट भरने की चिंता है न रहने की कोई समस्या। वो भले कोई काम नहीं करें फिर भी ठाठ से रहते हैं। जनता के पैसे से राजसी ठाठ से रह गरीबी पर भाषण देते हैं हर बार। ये घोटाले करें , लूट मार करें , अपराधियों से गठजोड़ करें इनको आज़ादी है। ये वोट लेने के लिये हमको झूठे वादे करें , प्रलोभन दें कि अगर हमारी सरकार बनी तो क्या क्या मुफ्त में बांटेगे , कोई इनसे सवाल नहीं करता कि ये सब आपका दल देगा , आपके नेता देंगे अपने पास जमा की हुई लूट की दौलत से या जनता का सरकारी धन बर्बाद करेंगे अपनों को खुश करने को। चुनाव आयोग को क्या नज़र नहीं आता ये अनुचित ढंग से वोटर को ललचाने का तरीका। सतसठ साल में इनसे इतना भी नहीं हुआ कि देश की दो तिहाई जनता को दो वक़्त रोटी ही मिल सकती , और हर दिन देश का धन बर्बाद करते रहते हैं ऐसे ही समारोहों पर आयोजनों पर। कसके लिये है ये जश्न , क्या उनके लिये जो आज भी गरीबी की रेखा से नीचे हैं। यही पैसा उनको बुनियादी सुविधायें देने , उनकी शिक्षा , स्वस्थ्य आदि पर खर्च होता तो बेहतर था।
           हमने कहा भारत तुम कहते तो ठीक हो फिर भी तुम आज तो मिठाई खाना क्योंकि आज ही के दिन हमने विदेशी गुलामी से मुक्ति पाई थी। वो बोला क्यों उपहास की बात करते हो बाबू , रोटी खाने को पैसे नहीं हों , घर में आटा दाल चावल कुछ भी नहीं हो , बच्चे बीमार हों तब मैं सब को भुला कैसे मिठाई खा लूं। ये तो नेता लोग ही कर सकते हैं कि जनता की हालत जो भी हो इनको शाही शानो-शौकत से रहना है। हमने कहा हे मूर्ख जब ख़ुशी मनानी हो जश्न मनाना हो तब सब समस्याओं को भुला क़र्ज़ लेकर भी मिठाई खा लेते हैं। देश पर अरबों रुपये का क़र्ज़ है , लोग भूखे हैं , बेघर हैं , बेरोज़गार हैं ,उग्रवाद है , विपतियां हैं , दुर्घटनायें हैं तब भी सरकार नित नया जश्न मनाती रहती है। नई आर्थिक नीति लागू है जिसमें इंसान इंसान नहीं हैं उपभोक्ता है , कम्पनियों से लेकर सरकारों तक के लिये। तुम भी अपना ढंग बदल लो और नये ज़माने के साथ कदम से कदम मिला कर चलो। रिक्शा वाला हमें वहां ले आया था जहां सरकारी समारोह चल रहा था।
                                       धूप में , गर्मी में स्कूली छात्र छात्रायें कर्यक्रम की शोभा बढ़ा रहे थे , मनोरंजक प्रस्तुति देकर। नेता अफ्सर , खास लोग ताली बजा रहे थे , शामियाने में छांव में बैठ कर आनंद लेते हुए , शीतल पेय का पान करते हुए। मगर जो बच्चे घंटों से धूप में , गर्मी में प्यास से व्याकुल थे उनको हिलने तक की आज़ादी नहीं थी। ऐसे में इक बच्ची बेहोश होकर गिर गई थी , उसको छाया में ले जाया गया और पानी पिला होश में लाया गया। अध्यापक उसको ऐसे देख रहा था मानो उसने कोई अपराध किया हो। उसको घर वापस जाने को कह दिया गया , उसको आज़ादी का सबक याद करवाना था , उसको आज़ादी तो नहीं थी। अब चौदह नवंबर को उसकी बात होगी , फिर किसी दिन मानव अधिकारों की भी बात होगी , आज उस सब का कोई मतलब नहीं था। परेड के बाद रेवड़ियों की तरह ईनाम - पुरुस्कार वितरित किये गये , तालियां बजाई गईं , जन-गण-मन गीत गाया गया।
                                    कुछ मज़दूर जो कई दिन से समारोह की तैयारी में दिहाड़ी पर लगे हुए थे , समारोह की समाप्ति पर फिर सब ठीक पहले सा करने के काम पर लग गये। उनको कई दिन की बकाया मज़दूरी मिलने की उम्मीद थी , मगर उनको बताया गया कि आज छुट्टी का दिन है उनका पैसा आज नहीं दिया जा सकता। वो आज भी प्रशासन के सामने हाथ जोड़े खड़े थे , अपने हक की भीख मांगते। उनकी गुलामी का अंत अभी भी नहीं हुआ है , साहूकार , मिल मालिक , ज़मीदार सब आज भी उसको बंधक बनाये हुए हैं। उधर सरकारी बाबू अधिकारी को बता रहा है कि कितना पैसा खर्च हुआ और कितना बचा लिया है मिल बांट कर खाने को। सब  कर्मचारी - अधिकारी अपना हिस्सा लेकर जा रहे हैं ताकि अपने परिवार के साथ आज़ादी का जश्न मना सकें , फिर जाने कब ऐसा अवसर मिलेगा छुट्टी मनाने का। बाहर सड़क पर  पुलिस वाले लोगों को रोके खड़े हैं , मंत्री जी का काफिला जो गुज़रना है। कोई भूले से उधर से जाने की कोशिश करे तो डंडा चलने को तैयार है। मंत्री जी की सुरक्षा भारी है आम जनता की आज़ादी पर।
( ये मन घड़ंत नहीं है , ऐसा देखा है खुद अपनी नज़र से। शायद हर जगह हर साल दोहराया भी जाता है )