Thursday, 31 July 2014

शुक्रिया मित्र याद रखने का मुझे ( कविता ) 105 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कब सोचा था ,
कभी सच होगा ये सपना भी ,
किसी को यूं ही किसी दिन ,
आयेगा ये भी ख्याल ,
कि जाने कहां खो गया ,
कोई दोस्त कई दिन से ,
और वो चला आयेगा ,
मेरे घर में पूछने हाल मेरा ,
लोग कहते हैं ,
आज के नये दौर में ,
भला किसे फुर्सत है ,
जो सोचे किसी दूसरे के लिये ,
मगर फेसबुक के दोस्तों में भी ,
मुझे रही है तलाश ऐसे ही ,
दोस्त की जो रखे याद ,
वो बात जो कही थी हमने ,
दोस्त बनते समय कि ,
हम हैं इक घर के सदस्य ,
जो रहते हैं बेशक दूर ,
मगर होता है एहसास ,
उनके करीब होने का ,
शुक्रिया मेरे फेसबुक के दोस्त।

Wednesday, 30 July 2014

नियम-कानून लागू कब होते हैं ? ( आलेख ) डा लोक सेतिया

आज इक खबर छपी है शाम के अखबार में। हरियाणा सरकार ने फतेहाबाद नगर में जो सरकारी भूमि दो संस्थाओं को देनी है वो कलेक्टर रेट पर दी जायेगी और इस शर्त पर कि उसका उपयोग वाणिजयक कार्य के लिये नहीं किया जा सकेगा। ये सही बात है , मगर सवाल और भी है कि पहले जिन जिन को सरकार ने भूमि दी थी धर्मशाला बनाने के लिये क्या उन पर भी यही शर्त लागू थी। ज़रूर ये शर्त तब भी रही होगी , मगर क्या इसका पालन किया गया। हुआ ये कि तब धर्मशाला बनाने से पहले ही वहां मार्किट बना दी गई , और धर्मशाला भी कैसी जिसमें कोई मुसाफिर बिना कमरे का किराया दिये रात भर नहीं रुक सकता। जब संत महात्मा तक धर्म प्रचार के नाम पर कारोबार करने लगे हों तब बाकी समाज से क्या उम्मीद की जाये। धर्म खुद लोभ लालच के जाल में भटक रहा है। यहां एक सवाल और भी है कि क्या सरकार का समाजिक कार्य के लिये भूमि देना जनहित की बात है अथवा वोट बैंक का मोह। क्योंकि जब इन दोनों संस्थाओं को भूमि आबंटित होने की बात हुई थी तब संस्थाओं वाले सत्ताधारी नेताओं का आभार प्रकट कर रहे थे और उपकार मान रहे थे जैसे कि भूमि वो अपनी निजि दे रहे हों। अगर देश समाज को गलत दिशा में जाने से रोकना है तो ये तय करना होगा कि जिस भी संस्था को जो भूमि जिस काम के लिये दी जाये और जिन शर्तों पर उसका वही उपयोग ही हो। अगर कोई दुरूपयोग करे तो उसको रोका जाये। क्या सरकार तैयार है इसके लिये कि जो सरकारी भूमि को धर्मशाला बनाने को लेकर वाणिजयक उपयोग कर रहे हैं राज्य भर में , उनपर कठोर करवाई हो , उनके अनुचित उपयोग को बंद करवाया जाये। या फिर यहां भी वही दोहराया जायेगा।

Monday, 21 July 2014

ग़ज़ल 212 ( झूठ से दोसती नहीं करते ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

झूठ से दोस्ती नहीं करते ,
हम कभी बस यही नहीं करते।
इक खुदा ने सवाल पूछा है ,
आप क्यों बंदगी नहीं करते।
साथ जीना है साथ मरना भी ,
बस तभी ख़ुदकुशी नहीं करते।
बेवफ़ा हम उन्हें कहें कैसे ,
बेवफ़ाई वही नहीं करते।
आज कहने लगे हमें आकर ,
आप क्यों आशिक़ी नहीं करते।
क्यों बुलाते हो तुम रकीबों को ,
यार से दिल्लगी नहीं करते।
याद "तनहा" उन्हें ज़माना सब ,
बात पर आपकी नहीं करते।