Monday, 2 December 2013

दोस्त , दोस्ती और मेरे अनुभव - डॉ लोक सेतिया

    दोस्त , दोस्ती और मेरे अनुभव - डॉ लोक सेतिया 

दोस्त बनाने कि चाहत मुझे बचपन से रही है। मुझे बहुत ही प्यारे लगते थे स्कूल के दो सहपाठी। अभी भी मित्र हैं हम , चाहे मिलते हों कितनी ही मुद्दत के बाद। मगर एक बात शायद वो दोनों आज तक नहीं जानते कि उनके बिना मेरा दिल नहीं लगता था। इत्तेफाक से वे दोनों एक साथ एक ही कॉलेज में पढ़ने को गये और मुझे अलग शहर में जाना पड़ा चिकित्स्या के क्षेत्र में आने के लिये। मगर उनसे संपर्क बना रहा पत्राचार के माध्यम से। कॉलेज में मुझे यूं तो तमाम लोग मिले सहपाठी भी , कुछ सीनियर भी , कुछ जुनियर भी। और बहुत ही मधुर यादें हैं मन में उन सब कि याद रखने के लिये। मगर सब से अधिक मेरे मन में बसी हुई है एक दोस्त की याद जो मुझे अपनी जान से प्रिय रहा है। जिसको मैं हर दिन हर पल याद करता हूं किसी न किसी बहाने से। ये गीत उसको पसंद था ये फ़िल्म ये कहानी ये बात जाने क्या क्या। सब कुछ जुड़ा हुआ है उसके साथ , जब भी बरसात आती है तो किसी को अपनी महबूबा याद आती होगी , मुझे याद आता है हम दोनों का इक पागलपन। शाम का वक़्त था हम मैटिनी शो में फ़िल्म देख निकले तो बादल गरज रहे थे। और भी छात्रावास के मित्र थे साथ , मगर जब बाक़ी लोग वापस जल्द जाना चाहते थे छात्रावास जब हम दोनों चल दिये थे और भी आगे बाज़ार की ओर। सच कहें तो कुछ खास ज़रूरी नहीं जाना , बस उसको अपनी घड़ी के लिये इक स्ट्रेप लेना था जो तब नया नया चलन में आया था चिपक जाने वाला जिसमें न कोई सुराख़ था न कोई पिन। आज बहुत मामूली सी चीज़ लगती है तब बहुत खास लगती थी। और उसको हर नई चीज़ सबसे पहले पाने की चाहत भी होती थी। शहर का बाज़ार घुटनों घुटनों तक बरसात के पानी से भरा हुआ था , थोड़ी थोड़ी सर्दी लग रही थी , पूरा बाज़ार खाली था और हम दोनों मज़े से बिना किसी बात कि परवाह किये पानी में चल रहे थे। दुकान दुकान एक स्ट्रेप की तलाश में। उस उम्र में ये पागलपन अजीब नहीं लगता , अंधेरा होने लगा था बहुत देर हो चुकी थी , छात्रावास के लिये रिक्शा तांगा मिलना भी मुश्किल होता था तब। लेकिन तब ये बातें कहां ध्यान में रखते थे हम। बीच में रेस्टोरेंट में कुछ लिया था और फिर चल दिये थे अपनी तलाश में जो अधूरी रही थी , मेरी अपने सपनों के इक मित्र कि तलाश की तरह। शायद उससे बेहतर कोई और दोस्त नहीं हो सकता था मेरे लिये मगर समस्या इतनी सी थी कि मेरे लिये वो बहुत अहम था मगर उसके लिए कोई दूसरा दोस्त ज़यादा अहम था। मुझे कभी किसी से कोई जलन नहीं हुई शायद , मगर अपने दोस्त के उस ज़यादा अज़ीज़ दोस्त से कहीं न कहीं ये भावना अवश्य रही थी मुझे ये स्वीकार करना ही होगा।
              स्कूल छूटा तो स्कूल के मित्रों से दूरी और कॉलेज छूटा तो बाकी मित्रों के साथ उससे भी दूरी , तब भी दिल से कभी दूर नहीं हुए हम सब। उसके बाद तो दोस्ती से जैसे कड़वे अनुभव ही होते रहे , बहुत चाहा कितनी बार प्रयास किया मगर वो दोस्ती जिसमें कोई अहम् न हो कोई स्वार्थ न हो नहीं मिल सकी। तब समझ आया कितनी बहुमूल्य होती है मित्रता। जीवन में बहुत लोगों से जानपहचान होती रही , बहुत अधिक बनी नहीं लोगों से मेरी , मेरे सवभाव के कारण जो भावुकता में भूल जाता कि लोग अब मतलब पड़ने पर दोस्त बनाते भी हैं और जब मतलब निकल जाता तो छोड़ भी देते हैं। मालूम नहीं किसलिये मुझे बड़े ओहदे वाले लोगों से दोस्ती करना कभी भी पसंद नहीं रहा। कितने लोग मिले , दोस्तों कि तरह रहे कुछ दिन , लेकिन जैसे कोई खास पद मिला उनमें अपने विशेष होने का एहसास हमारी दोस्ती पर भारी पड़ा।
                    आज ये सब क्यों याद आया। फेसबुक पर बहुत मित्र मिले , बिछुड़े भी कई कारणों से। देखता हूं बहुत नाम जो मित्रों ने सजावट को लगा रखे हैं।  देखा इतने बड़े व्यक्ति से फेसबुक पर मित्रता है मेरी। देखा बनाकर मैंने भी कुछ लोगों को फेसबुक पर मित्र मगर जब देखा उनको सम्पर्क नहीं रखना किसी भी तरह का मात्र इक नाम चाहिये मेरा भी तमाम लोगों की तरह तो मुझे उनको अलविदा कहने में कभी संकोच नहीं हुआ। मगर अभी बहुत ही सुखद अनुभव हुआ दोस्ती का मुझे। नाम नहीं बताना चाहता अन्यथा वही बात होगी कि देखो कितना विशेष व्यक्ति मेरा मित्र है। मैंने जब उसके साथ मित्रता की तो नहीं जानता था कि उसका उस जानी मानी शख्सियत से कोई नाता भी है। बहुत कम लोग हैं जो वास्तव में साहित्य कला के प्रति इतना आदर इतना समर्पण रखते हैं जितना उस नये मित्र में देखा मैंने। सभी की रचनाओं को खुले दिल से स्वीकारना और उसकी सराहना करना और अपनी खुद कि रचनाओं को लेकर कोई बात ही नहीं करना , ऐसा उनसे पहले नहीं देखा किसी भी जाने माने लोगों में मैंने।  आज ये रचना उसी मित्र के नाम जिसको आज भी मित्रता का सही अर्थ पता है।  नहीं तो लगता था कि वो किसी और पुराने युग की बातें हैं और मैं किसी गुज़रे ज़माने का आदमी हूं। चलो कोई तो मिला वो पुराने लोगों के जैसा जो मित्र को सम्मान देना जनता हो। आपकी मित्रता का मन  से धन्यवाद , आप नहीं जानते शायद मेरे लिये ऐसी मित्रता का क्या महत्व है। एक शब्द है ईबादत जो मुझे मित्रता के लिये हमेशा उपयुक्त लगता है। चाहूं भी ये बात कभी समाप्त नहीं हो सकती , मगर आज यहीं विराम देना काफी होगा। 

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