Saturday, 26 October 2013

आस्मां और भी हैं ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

वाणी चाहती थी तीन सौ किलोमीटर का यह सफ़र जल्द पूरा हो जाये और वह अपने भाई केशव से मिल कर सारा हाल जान सके। जब से सुशील अर्चना को वहां अकेला छोड़ कर चुपचाप चला गया था तभी से उसे अर्चना को लेकर डर सा लगने लगा था। क्या करेगी कैसे जियेगी , कहीं कुछ गल्त न कर ले ,वाणी के मन में कई दिनों तक यही चिंता रही थी। मगर तब भी वह अर्चना को झूठी तसल्ली देती रहती थी , दिलासा देती रही थी कि जल्द ही सुशील वापस आ जायेगा ,अपनी भूल स्वीकार कर लेगा। दो साल से वे साथ साथ रह रहे थे एक ही घर में। वाणी और उसके पति आलोक ने उन्हें कभी मात्र किरायेदार नहीं समझा था , भले वो ऊपर की मंज़िल के एक कमरे के सैट में किराये पर रह रहे थे तब भी लगता था मानो चारों एक परिवार के सदस्य ही हों। बच्चे भी सुशील अर्चना को चाचा चाची कहते थे और उनसे बेहद लगाव रखते थे।
       जब कभी अर्चना और सुशील में कुछ अनबन होती थी तब वाणी ही उन्हें समझा बुझा कर एक करने का काम करती थी। उनके हर झगड़े का अंत आलोक वाणी के साथ उनके घर पर रात का खाना खा कर होता था। आलोक बेहद कम बात करता था , क्योंकि वो नहीं चाहता था कि अर्चना या सुशील को लगे कि  कोई उनके निजि जीवन में दखल देने लगा है।  मगर वाणी समझती थी कि वो दोनों उसके छोटे भाई बहन जैसे हैं और उन्हें खुश देख कर उसे प्रसन्नता होती थी। वाणी ने उन दोनों को कई बार प्यार से समझाया था कि छोटी छोटी बातों को तूल दे कर आपसी प्यार , पति पत्नी के रिश्ते को बिखरने न दें।  दोनों उसकी बात समझ भी जाया करते।वाणी को कुछ कुछ पता चल गया था कि उन दोनों में बच्चा पैदा करने की बात पर कुछ मतभेद उभर आये  हैं। उसने खुद उनको कितनी बार कहा था इस बारे विचार करने को। जाने ऐसी क्या बात हुई जो अचानक सुशील अर्चना को अकेला वहां छोड़ कर वापस अपने माता पिता के घर चला गया था और जब कुछ दिन तक नहीं लौटा तो अर्चना भी चली गई थी। जाते जाते कह गई थी अर्चना को , दीदी तुम्हारा स्नेह कभी भुला नहीं सकूंगी। मैं सुशील को मनाने को जा तो रही हूं , मगर जाने क्यों लगता नहीं फिर कभी अब लौट कर वापस आना हो पायेगा। ऊपर कमरे में थोड़ा घर का सामान जो मेरा नहीं सब आपका ही है प्यार से दिया हुआ ,
मैं नहीं लौट सकूं तो उसे मेरी याद मेरा आदर स्नेह समझ रख लेना। बिना सुशील के वो मेरे किस काम का है अब। नम आंखो से चली गई थी अर्चना अलविदा कह कर , बेहद निराश होकर। तब वाणी को समझ नहीं आया था कि क्या करे , क्या रोक ले उसे। काफी सोच विचार करने के बाद उसने अपने भाई को फोन कर बता दिया था कि पहले सुशील चला गया था वापस और अब अर्चना भी चली गई है , मुझे चिंता हो रही है आप वहां देखना सब ठीक हो सके अगर तो अच्छा है वर्ना दो जीवन बर्बाद हो जाएंगे। तुम चिंता मत करो मैं सब देख लूंगा , सब ठीक हो जायेगा , केशव ने फोन पर कहा था उसे दिलासा देते हुए।
    वाणी याद कर रही थी दो वर्ष पूर्व उसके बड़े भाई केशव का फोन आया था कि सुशील व अर्चना ने प्रेम विवाह किया है अपने अपने परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ जा कर। दोनों इस शहर को छोड़ जा रहे हैं , वहां आएंगे तुम्हारे पास , अपना समझ कर रख लेना उनको घर में थोड़े दिन। ताकि अपनी नौकरी , घर बसाने आदि का प्रबंध कर सकें। मगर जब वो दोनों आये तो महमान नहीं घर का हिस्सा ही बन गए थे। वाणी के पति आलोक ने उन दोनों की नौकरी का प्रबंध करवा दिया था और उन्हें ऊपर की मंज़िल पर रहने को जगह भी दे दी थी। पहले एक साल तक वो दोनों बहुत खुश नज़र आते थे , हमेशा हंसते मुस्कुराते से लगते ,जैसे प्यार के गगन में उड़ रहे हों एक साथ। फिर न जाने क्या हुआ था , जैसे किसी की नज़र लग गई हो। आये दिन किसी न किसी बात पर तकरार होने लगी , आपस में उलझते रहते ज़रा ज़रा सी बात को लेकर। कभी खाने की बात तो कभी दफ्तर से वापस समय पर आने की बात पर बहस हो जाया करती थी। कामकाजी जोड़ों की सामान्य सी घटनाएं लगती थी। घर , दफ्तर के तनाव ,कभी पैसे की तंगी , कभी जल्द बहुत कुछ हासिल कर लेने की इच्छायें उनको इक दुसरे से दूर करना लगी थी। तब सुशील बार बार कहता कि उसने भूल की है अर्चना से प्रेम विवाह कर के। शायद घबरा गया था जीवन की कठिनाईयों को देख कर। अर्चना ऐसी बातों से जब निराश हो जाया करती तब वाणी उसे समझती कि चिंता मत करो धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा। मगर सब ठीक नहीं हो सका और उनके मतभेद समाप्त नहीं हो सके थे। वाणी ने कभी नहीं सोचा था कि प्यार करने वाला ये जोड़ा ऐसी बातों के कारण कभी बिछुड़ भी जायेगा।
     कल जब उसने अपने भाई केशव को फोन किया तभी पता चला कि उन दोनों ने आपसी सहमति से तलाक लेने के लिये अदालत में अर्ज़ी दे दी है और कुछ महीने बाद वो सदा के लिये इक दूजे से अलग हो जायेंगे। उनका विवाह का पवित्र बंधन समाप्त हो जायेगा हमेशा हमेशा के लिये।वाणी अपने भाई के घर बहुत दिन से नहीं जा पाई थी जब अर्चना व सुशील के तलाक की बात सुनी तो उससे रहा नहीं गया। अगले ही दिन आलोक से कह कर वो अपने मायके अपने भाई के घर जाने को चल पड़ी थी।क्या वाणी उनके तलाक को रोक पायेगी ,
वो नहीं जानती क्या होगा। बस एक बार उन दोनों से मिलने को व्याकुल है और अपने बच्चों को घर पर ही आलोक के पास छोड़ आई है ,जल्द वापस आने की बात कह कर।
       केशव ने घर पहुंचने पर वाणी को जो बताया उसकी कल्पना वाणी ने नहीं की थी कभी। केशव ने बताया कि अर्चना यहां आने के बाद सीधा अपने पति सुशील के माता पिता के घर पर गई थी ,बहुत रोई थी , गिड़गिड़ाई थी ,भीख मांगी थी सुशील से प्यार की मगर उसे कुछ नहीं मिला था वहां तिरिस्कार के सिवा। बड़े बोझिल मन से , थके कदमों से जब अपने खुद के मायके वाले घर पहुंची तो उसे मां ने भी भीतर आने की अनुमति नहीं दी थी , न ही पिता ही क्षमा करने को तैयार हुआ था। जब वाणी के पास जीने का दूसरा कोई भी सहारा नहीं रहा तब उसको अपने केशव अंकल की याद आई थी जिसने कभी उनके प्यार की मंज़िल पाने को आसान बनाया था साथ देकर। केशव ने बताया , वाणी मैं अर्चना की दुर्दशा देख कर दंग रह गया था। मैंने ही उनको दो साल पहले साहस से निर्णय लेने की बात समझाई थी कि  अगर मन में सच्चा प्रेम है तो समाज की परवाह किये बिना प्रेम विवाह कर अपनी मर्ज़ी से अपना जीवन जियो। आज सोचता हूं क्या मैंने सही किया था। जब वापस लौट कर निराश हो अर्चना मेरे पास आई तब मैंने उसकी पूरी बात सुनी थी समझी थी और उसको कहा था कि कभी ऐसा मत समझना कि किसी बड़े का हाथ तुम्हारे सर पर नहीं है। मैं जैसे भी हो सका तुम्हारा जीवन संवारने का कार्य करूंगा , तुम्हारे और सुशील दोनों के परिवार वालों से बात कर के। कोई दे न दे तुम्हारा भाई केशव और तुम्हारी भाभी तुम्हें कभी अकेला बेसहारा नहीं छोड़ेंगे।
   केशव अर्चना को साथ लेकर दोनों परिवार के लोगों से मिला था। उनको बात को शांति से समझने , सुलझाने को कहा था। माना अर्चना ने भूल की थी अपनी मर्ज़ी से विवाह कर के , जिससे आप लोग आहत हुए थे लेकिन वो धोखा खा चुकी है और आपसे अपनी भूल की क्षमा मांग कर आपका प्यार और सहारा चाहती है। केशव ने उनसे सवाल किया था कि आपकी बेटी सड़कों पर दर दर की ठोकरें खाती रहे तो क्या आप खुश रह सकोगे। इससे आपको भी परेशानी भी होगी और आपकी बदनामी भी। आप उसको क्षमा कर घर में आश्रय दे दो , मैं वादा करता हूं इन दोनों की समस्या का सही हल निकाला जा सके। अर्चना के माता पिता को भरोसा दिलाया था कि आप अगर बेटी को फिर से अपना लोगे तो वो आप पर बोझ नहीं आपका सहारा बन कर रहेगी हमेशा।
                           केशव जब सुशील से मिला तो उसे लगा जैसे वो कोई और ही है। उसने सुशील से कहा मैं नहीं जानना चाहता तुम्हारी निजी समस्याएं क्या हैं , कौन सही है कौन गलत है। मैं तुमसे बस केवल इतना जानना चाहता हूं कि क्या तुम्हारे फिर से एक होने की कुछ सम्भावना है। सुशील का जवाब था कि बस उसे अर्चना से तलाक लेना ही है , वह पछता रहा है प्रेम विवाह कर के , ऐसा करने से उसे कुछ भी नहीं मिला है। सुशील ने बताया कि कुछ दिन पहले उसने अपना माता पिता से फोन पर बात की थी और उनको बता दिया था कि मैं पछता रहा हूं व घर वापस आना चाहता हूं। तब माता पिता ने कहा था कि अगर मैं अर्चना को छोड़ दूं सदा के लिये और घर आने के बाद उनकी पसंद की लड़की से शादी कर लूं तो वो मुझे अपना लेंगे। ऐसा करने से ही मुझे ज़मीन जायदाद , और तमाम सम्पति जो अब करोड़ों की हो चुकी है से हिस्सा मिल सकता है। मैं अपनी तंगहाली से परेशान हो चुका हूं और मुझे समझ आ गया है कि प्यार से पेट नहीं भर सकता , दुनिया में बिना पैसे जीना संभव नहीं है। मैं उम्र भर काम कर के नौकरी कर के भी वो सब नहीं प्राप्त कर सकता जो अपने परिवार की बात मानने से मुझे मिल जायेगा। केशव जान गया कि  यहां मामला प्यार का नहीं रह गया अब दौलत का बन चुका है। केशव अर्चना के माता पिता से आकर मिला और उनको सारी बात बता दी थी। केशव ने कहा मुझे लगता है कि अर्चना के भविष्य को ध्यान में रख कर हमें भी उनसे उनकी तरह ही बात करनी पड़ेगी ताकि उसके सुरक्षित जीवन का कुछ प्रबंध कर सकें।
      अर्चना को अचरज हुआ था सुशील की कही बातें सुनकर। क्या हमारा प्यार अब बीच बाज़ार सिक्कों से तोला जायेगा। रो पड़ी थी अर्चना। मगर केशव अंकल और माता पिता ने उसे खामोश करवा दिया था ये कह कर अब हमें वो करने दो जो हम उचित समझते हैं , तुम्हारी भलाई के लिये। सोच विचार हुआ दोनों के परिवारों की आमने सामने बातें हुई। तर्क वितर्क , गर्मा-गर्मी ,आरोप प्रत्यारोप , सब कुछ हुआ लेकिन निष्कर्ष वही , तलाक चाहिये। तब केशव ने कहा मेरा एक सुझाव है ,हालांकि अर्चना ने मुझे ऐसा कहने से मना किया था मगर मुझे उसके पूरे जीवन के लिए सोचकर कहना पड़ रहा है कि अगर आप चाहते हैं आपसी सहमति से जल्द तलाक लेना तो आपको अर्चना के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिये उसके नाम पर दस लाख जमा करवाने होंगे बैक में। अन्यथा कोर्ट कचहरी , पुलिस थाने में फैसला होने में सालों बीत जायेंगे। तब जो आप सोच रहे हैं सुशील का फिर से विवाह करना उसके लिये इंतज़ार करते करते उसकी शादी करने की उम्र ही बीत जाएगी। काफी बहस के बाद तय किया गया कि कुछ दिन सोचने के बाद बताया जायेगा। एक सप्ताह बाद सात लाख देने की बात तय हो गई थी और अगले ही दिन अदालत में अर्ज़ी दे दी गई थी आपसी सहमति से तलाक की।
                       वाणी को ये सब केशव ने बताया तो उसने कहा भइया क्या ये सब अजीब सा नहीं हो गया। प्यार का ऐसा अंजाम तो कभी नहीं सुना मैंने न सोचा था कभी। क्या कुछ लाख रुपये अर्चना के जीवन की कमी को पूरा कर सकते हैं। केशव ने कहा तुम ठीक कहती हो मगर जब हालात बिगड़ जायें तब कुछ खोकर कुछ पाकर कोई समझौता करना ही पड़ता है। तब वाणी ने सवाल किया कि यहां किसे क्या मिला और किसने क्या खोया ज़रा इसपर भी विचार किया जाता। माना सुशील को जो चाहिये उसको वो मिल जायेगा , अपना घर , ज़मीन जायदाद ,धन सम्पति और शायद इक नया जीवन साथी भी। उसके माता पिता को कुछ लाख देकर बेटा मिल गया उनके लिये भी सौदा महंगा नहीं है। अर्चना के माता पिता को कुछ लाख की पूंजी के साथ एक बेटी जो नौकरी कर कमा रही उनका सहारा बन सकती है पा संतोष हो सकता है। मगर अर्चना ने तो अपना सभी कुछ ही खो दिया है। मैं अच्छी तरह जानती हूं अर्चना को ,उसके लिये धन दौलत कोई महत्व नहीं रखते।
न ही कुछ लाख रुपये किसी का जीवन संवार सकते हैं , मेरा मानना है। इस सब में अगर किसी का जीवन बिखर गया है तो सिर्फ अर्चना का। और जो दोषी है इस सब का वो बहुत सस्ते में छूट जायेगा। अर्चना के बारे में सोचकर वाणी की आंखे भर आईं , स्वर उसके गले में अटकने लगा था। मगर अगले दिन वापस भी जाना ज़रूरी था और यहां उसके करने को बाकी बचा भी नहीं था कुछ भी। वाणी मिलने गई थी अर्चना को उसके घर में। उसे देख कर लगा जैसे इन कुछ ही दिनों में वो कई वर्ष बड़ी उम्र की लगने लगी है। उसके साथ बात की तो प्रतीत हुआ कि वो बेहद निराश है जैसे उसके जीवन का अंत हो चुका हो। वाणी ने बहुत ही प्यार से अर्चना से बात की थी , समझया था कि किसी के साथ छोड़ने से सब खत्म नहीं हो जाता , जीवन में आगे बढ़ना ही पढ़ता है , जो बीत गया उसको छोड़कर। वाणी ने जाने से पहले अर्चना को गले लगाकर कहा था , मुझे दीदी कहती हो न , अपनी दीदी पर भरोसा रखना , अभी मैं कुछ नहीं कह सकती , मगर तुम ये सारी औपचारिकतायें समाप्त करने के बाद अपने घर वापस ज़रूर आना। हम मिलकर तुम्हारे लिये एक सुखमय जीवन की तलाश करेंगे।
तुम अवश्य आना मेरी बहन , आशाओं की तलाश के लिये।
     घर पहुंच कर वाणी ने अर्चना की पूरी कहानी अपने पति आलोक को बता दी थी। कुछ दिन सोचती रही थी , फिर एक दिन आलोक से पूछा था कि क्या आपके बड़े भाई साहब जो माता जी के साथ रहते हैं और जिनकी उम्र 35 वर्ष हो चुकी है लेकिन अभी तक विवाह नहीं किया है , अर्चना जैसी लड़की को जीवन साथी बनाना चाहेंगे। मुझे लगता है ऐसा उन दोनों के लिये सही रहेगा , आप उनसे और माता जी से पूछना। आलोक ने बड़े भाई और माता जी को अर्चना के बारे सब बता दिया था और वो सहमत हो गये थे। अब वाणी को इंतज़ार था तो अर्चना के आने का और उसको मना लेने का।
               अर्चना का तलक हो गया था और वो वापस चली आई थी उसी शहर में। समझ नहीं पा रही कि  यादों को तलाश करने आई है या यादों से बचने। मगर जो भी उसे लगा था जैसे वो एक घुटन से निकल कर ताज़ी हवा में आ गई है। कुछ दिन बाद वाणी ने अर्चना की मुलाकात आलोक के बड़े भाई साहब से करवा कर अपनी सोच सपष्ट कर दी थी। मगर ये भी कह दिया था की अंतिम निर्णय तुम्हें खुद सोच समझ कर लेना है। इस प्रकार वाणी ने अर्चना को राज़ी कर लिया था अपने जीवन की नई शुरुआत के लिये। केशव ने भी अर्चना के माता पिता को तैयार कर लिया था उसके फिर से विवाह के लिये। अर्चना के जीवन की काली अंधेरी रात का अंत हो चुका है और उसके सामने है नया सवेरा , और उज्जवल भविष्य का नया आस्मां।

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