Wednesday, 30 October 2013

कारोबार ( लघुकथा )

प्रकाशक जी बोले , मैंने आपकी ग़ज़लें पढ़ ली हैं , बहुत ही अच्छे स्तर की रचनाएं हैं। मुझे आपका ग़ज़ल संग्रह छाप कर बेहद ख़ुशी होगी। मगर आपको हमें दो सौ पुस्तकों का मूल्य अग्रिम देना होगा , छपने पर आपको दो सौ किताबें भेज दी जायेंगी। शायर हैरान हो गया , बोला प्रकाशक जी अभी कुछ दिन पूर्व मेरे दो मित्रों की पुस्तकें आपने प्रकाशित की हैं और उनसे आपने एक भी पैसा नहीं लिया है। क्या आपको उन दोनों की ग़ज़लें अधिक पसंद आई थी।
       प्काशक जी हंस कर बोले , वो बात नहीं है। सच कहूं तो आपकी रचनायें उन दोनों से कहीं अधिक पसंद आई हैं मुझे। मगर साफ कहूं तो उनकी किताबें बिना कुछ लिये छापना हमारी मज़बूरी थी , इसलिये कि वो दोनों ही हर वर्ष अपने अपने कालेज की लायब्रेरी के लिये हज़ारों की पुस्तकें हमारे प्रकाशन से खरीदते हैं। अब आप से हमें ऐसा कोई सहयोग मिल नहीं सकता इसलिये अपनी किताब छपवानी है तो आपको ये करना ही होगा। आपकी पुस्तक छापना हमारी मज़बूरी नहीं है। आपकी पुस्तक छापना  हमारे लिये केवल कारोबार है। आप हमसे छपवाना चाहते हों मोल चुका कर तो हमें बेहद ख़ुशी होगी। 

भिखारी ( लघुकथा )

एक धनवान उस बस्ती में आया। ऊंची ऊंची आवाज़ में पुकारने लगा वहां रहने वालों को। आओ दान में मिलेंगे सभी को हीरे मोती , पैसा , कपड़े , खाने पीने का सामान। गली गली आवाज़ लगाई उसने मगर नहीं आया कोई भी उसके सामने हाथ फैलाने को। बहुत हैरान हुआ वो अपने धन पर अभिमान करने वाला। परेशान होकर उसने एक घर का दरवाज़ा खटखटाया। उस घर में रहने वाले से सवाल किया क्या यहां के लोगों को सुनाई नहीं देता , मैं कितनी देर से आवाज़ दे रहा हूं कोई भी बाहर नहीं निकला अपने घर से। क्या यहां किसी को भी धन कि ज़रूरत नहीं है। उस घर में रहने वालों ने कहा आप गलत जगह आ गये हैं। यहां पैसे की  ज़रूरत सब को होती है मगर सभी अपनी ज़रूरत खुद पूरी कर लेते हैं जैसे भी हो। इस बस्ती में हम सब स्वाभिमान पूर्वक रहते हैं , कोई भिखारी यहां नहीं रहता है। धनवान ने पूछा कि मैं भी चाहता हूं ऐसे नगर में रहना जहां कोई भी भिखारी नहीं हो। मुझे अगर घर चाहिये तो क्या करना होगा , मेरे पास बहुत धन दौलत है कितनी कीमत है यहां किसी घर की। जो भी मांगो देने को तैयार हूं। जवाब मिला अभी भी नहीं समझे यहां रहने के लिये दो बातों को छोड़ना पड़ता है , स्वार्थ को और अहंकार को। ये तो प्यार मुहब्बत की बस्ती है , इस में आकर रहना चाहो तो बड़े छोटे , अमीर गरीब के भेदभाव की बातें , अभिमान , अहंकार को छोड़ कर आओ। ये जो सब हीरे मोती पैसा जमा है उसे प्यार के सामने कंकर पत्थर समझना होगा। चाहे जैसे भी हालात हों , हर हाल में प्रसन्नता पूर्वक रह सकोगे , तभी यहां मिलेगा आपको इक घर इंसानियत की बस्ती में। खरीदना नहीं पड़ता घर , बनाना पड़ता है प्रेम और सदभाव से। धनवान वापस चल दिया था अपने उस नगर में जहां सब के सब भिखारी रहते हैं। 

Saturday, 26 October 2013

आस्मां और भी हैं ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

वाणी चाहती थी तीन सौ किलोमीटर का यह सफ़र जल्द पूरा हो जाये और वह अपने भाई केशव से मिल कर सारा हाल जान सके। जब से सुशील अर्चना को वहां अकेला छोड़ कर चुपचाप चला गया था तभी से उसे अर्चना को लेकर डर सा लगने लगा था। क्या करेगी कैसे जियेगी , कहीं कुछ गल्त न कर ले ,वाणी के मन में कई दिनों तक यही चिंता रही थी। मगर तब भी वह अर्चना को झूठी तसल्ली देती रहती थी , दिलासा देती रही थी कि जल्द ही सुशील वापस आ जायेगा ,अपनी भूल स्वीकार कर लेगा। दो साल से वे साथ साथ रह रहे थे एक ही घर में। वाणी और उसके पति आलोक ने उन्हें कभी मात्र किरायेदार नहीं समझा था , भले वो ऊपर की मंज़िल के एक कमरे के सैट में किराये पर रह रहे थे तब भी लगता था मानो चारों एक परिवार के सदस्य ही हों। बच्चे भी सुशील अर्चना को चाचा चाची कहते थे और उनसे बेहद लगाव रखते थे।
       जब कभी अर्चना और सुशील में कुछ अनबन होती थी तब वाणी ही उन्हें समझा बुझा कर एक करने का काम करती थी। उनके हर झगड़े का अंत आलोक वाणी के साथ उनके घर पर रात का खाना खा कर होता था। आलोक बेहद कम बात करता था , क्योंकि वो नहीं चाहता था कि अर्चना या सुशील को लगे कि  कोई उनके निजि जीवन में दखल देने लगा है।  मगर वाणी समझती थी कि वो दोनों उसके छोटे भाई बहन जैसे हैं और उन्हें खुश देख कर उसे प्रसन्नता होती थी। वाणी ने उन दोनों को कई बार प्यार से समझाया था कि छोटी छोटी बातों को तूल दे कर आपसी प्यार , पति पत्नी के रिश्ते को बिखरने न दें।  दोनों उसकी बात समझ भी जाया करते।वाणी को कुछ कुछ पता चल गया था कि उन दोनों में बच्चा पैदा करने की बात पर कुछ मतभेद उभर आये  हैं। उसने खुद उनको कितनी बार कहा था इस बारे विचार करने को। जाने ऐसी क्या बात हुई जो अचानक सुशील अर्चना को अकेला वहां छोड़ कर वापस अपने माता पिता के घर चला गया था और जब कुछ दिन तक नहीं लौटा तो अर्चना भी चली गई थी। जाते जाते कह गई थी अर्चना को , दीदी तुम्हारा स्नेह कभी भुला नहीं सकूंगी। मैं सुशील को मनाने को जा तो रही हूं , मगर जाने क्यों लगता नहीं फिर कभी अब लौट कर वापस आना हो पायेगा। ऊपर कमरे में थोड़ा घर का सामान जो मेरा नहीं सब आपका ही है प्यार से दिया हुआ ,
मैं नहीं लौट सकूं तो उसे मेरी याद मेरा आदर स्नेह समझ रख लेना। बिना सुशील के वो मेरे किस काम का है अब। नम आंखो से चली गई थी अर्चना अलविदा कह कर , बेहद निराश होकर। तब वाणी को समझ नहीं आया था कि क्या करे , क्या रोक ले उसे। काफी सोच विचार करने के बाद उसने अपने भाई को फोन कर बता दिया था कि पहले सुशील चला गया था वापस और अब अर्चना भी चली गई है , मुझे चिंता हो रही है आप वहां देखना सब ठीक हो सके अगर तो अच्छा है वर्ना दो जीवन बर्बाद हो जाएंगे। तुम चिंता मत करो मैं सब देख लूंगा , सब ठीक हो जायेगा , केशव ने फोन पर कहा था उसे दिलासा देते हुए।
    वाणी याद कर रही थी दो वर्ष पूर्व उसके बड़े भाई केशव का फोन आया था कि सुशील व अर्चना ने प्रेम विवाह किया है अपने अपने परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ जा कर। दोनों इस शहर को छोड़ जा रहे हैं , वहां आएंगे तुम्हारे पास , अपना समझ कर रख लेना उनको घर में थोड़े दिन। ताकि अपनी नौकरी , घर बसाने आदि का प्रबंध कर सकें। मगर जब वो दोनों आये तो महमान नहीं घर का हिस्सा ही बन गए थे। वाणी के पति आलोक ने उन दोनों की नौकरी का प्रबंध करवा दिया था और उन्हें ऊपर की मंज़िल पर रहने को जगह भी दे दी थी। पहले एक साल तक वो दोनों बहुत खुश नज़र आते थे , हमेशा हंसते मुस्कुराते से लगते ,जैसे प्यार के गगन में उड़ रहे हों एक साथ। फिर न जाने क्या हुआ था , जैसे किसी की नज़र लग गई हो। आये दिन किसी न किसी बात पर तकरार होने लगी , आपस में उलझते रहते ज़रा ज़रा सी बात को लेकर। कभी खाने की बात तो कभी दफ्तर से वापस समय पर आने की बात पर बहस हो जाया करती थी। कामकाजी जोड़ों की सामान्य सी घटनाएं लगती थी। घर , दफ्तर के तनाव ,कभी पैसे की तंगी , कभी जल्द बहुत कुछ हासिल कर लेने की इच्छायें उनको इक दुसरे से दूर करना लगी थी। तब सुशील बार बार कहता कि उसने भूल की है अर्चना से प्रेम विवाह कर के। शायद घबरा गया था जीवन की कठिनाईयों को देख कर। अर्चना ऐसी बातों से जब निराश हो जाया करती तब वाणी उसे समझती कि चिंता मत करो धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा। मगर सब ठीक नहीं हो सका और उनके मतभेद समाप्त नहीं हो सके थे। वाणी ने कभी नहीं सोचा था कि प्यार करने वाला ये जोड़ा ऐसी बातों के कारण कभी बिछुड़ भी जायेगा।
     कल जब उसने अपने भाई केशव को फोन किया तभी पता चला कि उन दोनों ने आपसी सहमति से तलाक लेने के लिये अदालत में अर्ज़ी दे दी है और कुछ महीने बाद वो सदा के लिये इक दूजे से अलग हो जायेंगे। उनका विवाह का पवित्र बंधन समाप्त हो जायेगा हमेशा हमेशा के लिये।वाणी अपने भाई के घर बहुत दिन से नहीं जा पाई थी जब अर्चना व सुशील के तलाक की बात सुनी तो उससे रहा नहीं गया। अगले ही दिन आलोक से कह कर वो अपने मायके अपने भाई के घर जाने को चल पड़ी थी।क्या वाणी उनके तलाक को रोक पायेगी ,
वो नहीं जानती क्या होगा। बस एक बार उन दोनों से मिलने को व्याकुल है और अपने बच्चों को घर पर ही आलोक के पास छोड़ आई है ,जल्द वापस आने की बात कह कर।
       केशव ने घर पहुंचने पर वाणी को जो बताया उसकी कल्पना वाणी ने नहीं की थी कभी। केशव ने बताया कि अर्चना यहां आने के बाद सीधा अपने पति सुशील के माता पिता के घर पर गई थी ,बहुत रोई थी , गिड़गिड़ाई थी ,भीख मांगी थी सुशील से प्यार की मगर उसे कुछ नहीं मिला था वहां तिरिस्कार के सिवा। बड़े बोझिल मन से , थके कदमों से जब अपने खुद के मायके वाले घर पहुंची तो उसे मां ने भी भीतर आने की अनुमति नहीं दी थी , न ही पिता ही क्षमा करने को तैयार हुआ था। जब वाणी के पास जीने का दूसरा कोई भी सहारा नहीं रहा तब उसको अपने केशव अंकल की याद आई थी जिसने कभी उनके प्यार की मंज़िल पाने को आसान बनाया था साथ देकर। केशव ने बताया , वाणी मैं अर्चना की दुर्दशा देख कर दंग रह गया था। मैंने ही उनको दो साल पहले साहस से निर्णय लेने की बात समझाई थी कि  अगर मन में सच्चा प्रेम है तो समाज की परवाह किये बिना प्रेम विवाह कर अपनी मर्ज़ी से अपना जीवन जियो। आज सोचता हूं क्या मैंने सही किया था। जब वापस लौट कर निराश हो अर्चना मेरे पास आई तब मैंने उसकी पूरी बात सुनी थी समझी थी और उसको कहा था कि कभी ऐसा मत समझना कि किसी बड़े का हाथ तुम्हारे सर पर नहीं है। मैं जैसे भी हो सका तुम्हारा जीवन संवारने का कार्य करूंगा , तुम्हारे और सुशील दोनों के परिवार वालों से बात कर के। कोई दे न दे तुम्हारा भाई केशव और तुम्हारी भाभी तुम्हें कभी अकेला बेसहारा नहीं छोड़ेंगे।
   केशव अर्चना को साथ लेकर दोनों परिवार के लोगों से मिला था। उनको बात को शांति से समझने , सुलझाने को कहा था। माना अर्चना ने भूल की थी अपनी मर्ज़ी से विवाह कर के , जिससे आप लोग आहत हुए थे लेकिन वो धोखा खा चुकी है और आपसे अपनी भूल की क्षमा मांग कर आपका प्यार और सहारा चाहती है। केशव ने उनसे सवाल किया था कि आपकी बेटी सड़कों पर दर दर की ठोकरें खाती रहे तो क्या आप खुश रह सकोगे। इससे आपको भी परेशानी भी होगी और आपकी बदनामी भी। आप उसको क्षमा कर घर में आश्रय दे दो , मैं वादा करता हूं इन दोनों की समस्या का सही हल निकाला जा सके। अर्चना के माता पिता को भरोसा दिलाया था कि आप अगर बेटी को फिर से अपना लोगे तो वो आप पर बोझ नहीं आपका सहारा बन कर रहेगी हमेशा।
                           केशव जब सुशील से मिला तो उसे लगा जैसे वो कोई और ही है। उसने सुशील से कहा मैं नहीं जानना चाहता तुम्हारी निजी समस्याएं क्या हैं , कौन सही है कौन गलत है। मैं तुमसे बस केवल इतना जानना चाहता हूं कि क्या तुम्हारे फिर से एक होने की कुछ सम्भावना है। सुशील का जवाब था कि बस उसे अर्चना से तलाक लेना ही है , वह पछता रहा है प्रेम विवाह कर के , ऐसा करने से उसे कुछ भी नहीं मिला है। सुशील ने बताया कि कुछ दिन पहले उसने अपना माता पिता से फोन पर बात की थी और उनको बता दिया था कि मैं पछता रहा हूं व घर वापस आना चाहता हूं। तब माता पिता ने कहा था कि अगर मैं अर्चना को छोड़ दूं सदा के लिये और घर आने के बाद उनकी पसंद की लड़की से शादी कर लूं तो वो मुझे अपना लेंगे। ऐसा करने से ही मुझे ज़मीन जायदाद , और तमाम सम्पति जो अब करोड़ों की हो चुकी है से हिस्सा मिल सकता है। मैं अपनी तंगहाली से परेशान हो चुका हूं और मुझे समझ आ गया है कि प्यार से पेट नहीं भर सकता , दुनिया में बिना पैसे जीना संभव नहीं है। मैं उम्र भर काम कर के नौकरी कर के भी वो सब नहीं प्राप्त कर सकता जो अपने परिवार की बात मानने से मुझे मिल जायेगा। केशव जान गया कि  यहां मामला प्यार का नहीं रह गया अब दौलत का बन चुका है। केशव अर्चना के माता पिता से आकर मिला और उनको सारी बात बता दी थी। केशव ने कहा मुझे लगता है कि अर्चना के भविष्य को ध्यान में रख कर हमें भी उनसे उनकी तरह ही बात करनी पड़ेगी ताकि उसके सुरक्षित जीवन का कुछ प्रबंध कर सकें।
      अर्चना को अचरज हुआ था सुशील की कही बातें सुनकर। क्या हमारा प्यार अब बीच बाज़ार सिक्कों से तोला जायेगा। रो पड़ी थी अर्चना। मगर केशव अंकल और माता पिता ने उसे खामोश करवा दिया था ये कह कर अब हमें वो करने दो जो हम उचित समझते हैं , तुम्हारी भलाई के लिये। सोच विचार हुआ दोनों के परिवारों की आमने सामने बातें हुई। तर्क वितर्क , गर्मा-गर्मी ,आरोप प्रत्यारोप , सब कुछ हुआ लेकिन निष्कर्ष वही , तलाक चाहिये। तब केशव ने कहा मेरा एक सुझाव है ,हालांकि अर्चना ने मुझे ऐसा कहने से मना किया था मगर मुझे उसके पूरे जीवन के लिए सोचकर कहना पड़ रहा है कि अगर आप चाहते हैं आपसी सहमति से जल्द तलाक लेना तो आपको अर्चना के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिये उसके नाम पर दस लाख जमा करवाने होंगे बैक में। अन्यथा कोर्ट कचहरी , पुलिस थाने में फैसला होने में सालों बीत जायेंगे। तब जो आप सोच रहे हैं सुशील का फिर से विवाह करना उसके लिये इंतज़ार करते करते उसकी शादी करने की उम्र ही बीत जाएगी। काफी बहस के बाद तय किया गया कि कुछ दिन सोचने के बाद बताया जायेगा। एक सप्ताह बाद सात लाख देने की बात तय हो गई थी और अगले ही दिन अदालत में अर्ज़ी दे दी गई थी आपसी सहमति से तलाक की।
                       वाणी को ये सब केशव ने बताया तो उसने कहा भइया क्या ये सब अजीब सा नहीं हो गया। प्यार का ऐसा अंजाम तो कभी नहीं सुना मैंने न सोचा था कभी। क्या कुछ लाख रुपये अर्चना के जीवन की कमी को पूरा कर सकते हैं। केशव ने कहा तुम ठीक कहती हो मगर जब हालात बिगड़ जायें तब कुछ खोकर कुछ पाकर कोई समझौता करना ही पड़ता है। तब वाणी ने सवाल किया कि यहां किसे क्या मिला और किसने क्या खोया ज़रा इसपर भी विचार किया जाता। माना सुशील को जो चाहिये उसको वो मिल जायेगा , अपना घर , ज़मीन जायदाद ,धन सम्पति और शायद इक नया जीवन साथी भी। उसके माता पिता को कुछ लाख देकर बेटा मिल गया उनके लिये भी सौदा महंगा नहीं है। अर्चना के माता पिता को कुछ लाख की पूंजी के साथ एक बेटी जो नौकरी कर कमा रही उनका सहारा बन सकती है पा संतोष हो सकता है। मगर अर्चना ने तो अपना सभी कुछ ही खो दिया है। मैं अच्छी तरह जानती हूं अर्चना को ,उसके लिये धन दौलत कोई महत्व नहीं रखते।
न ही कुछ लाख रुपये किसी का जीवन संवार सकते हैं , मेरा मानना है। इस सब में अगर किसी का जीवन बिखर गया है तो सिर्फ अर्चना का। और जो दोषी है इस सब का वो बहुत सस्ते में छूट जायेगा। अर्चना के बारे में सोचकर वाणी की आंखे भर आईं , स्वर उसके गले में अटकने लगा था। मगर अगले दिन वापस भी जाना ज़रूरी था और यहां उसके करने को बाकी बचा भी नहीं था कुछ भी। वाणी मिलने गई थी अर्चना को उसके घर में। उसे देख कर लगा जैसे इन कुछ ही दिनों में वो कई वर्ष बड़ी उम्र की लगने लगी है। उसके साथ बात की तो प्रतीत हुआ कि वो बेहद निराश है जैसे उसके जीवन का अंत हो चुका हो। वाणी ने बहुत ही प्यार से अर्चना से बात की थी , समझया था कि किसी के साथ छोड़ने से सब खत्म नहीं हो जाता , जीवन में आगे बढ़ना ही पढ़ता है , जो बीत गया उसको छोड़कर। वाणी ने जाने से पहले अर्चना को गले लगाकर कहा था , मुझे दीदी कहती हो न , अपनी दीदी पर भरोसा रखना , अभी मैं कुछ नहीं कह सकती , मगर तुम ये सारी औपचारिकतायें समाप्त करने के बाद अपने घर वापस ज़रूर आना। हम मिलकर तुम्हारे लिये एक सुखमय जीवन की तलाश करेंगे।
तुम अवश्य आना मेरी बहन , आशाओं की तलाश के लिये।
     घर पहुंच कर वाणी ने अर्चना की पूरी कहानी अपने पति आलोक को बता दी थी। कुछ दिन सोचती रही थी , फिर एक दिन आलोक से पूछा था कि क्या आपके बड़े भाई साहब जो माता जी के साथ रहते हैं और जिनकी उम्र 35 वर्ष हो चुकी है लेकिन अभी तक विवाह नहीं किया है , अर्चना जैसी लड़की को जीवन साथी बनाना चाहेंगे। मुझे लगता है ऐसा उन दोनों के लिये सही रहेगा , आप उनसे और माता जी से पूछना। आलोक ने बड़े भाई और माता जी को अर्चना के बारे सब बता दिया था और वो सहमत हो गये थे। अब वाणी को इंतज़ार था तो अर्चना के आने का और उसको मना लेने का।
               अर्चना का तलक हो गया था और वो वापस चली आई थी उसी शहर में। समझ नहीं पा रही कि  यादों को तलाश करने आई है या यादों से बचने। मगर जो भी उसे लगा था जैसे वो एक घुटन से निकल कर ताज़ी हवा में आ गई है। कुछ दिन बाद वाणी ने अर्चना की मुलाकात आलोक के बड़े भाई साहब से करवा कर अपनी सोच सपष्ट कर दी थी। मगर ये भी कह दिया था की अंतिम निर्णय तुम्हें खुद सोच समझ कर लेना है। इस प्रकार वाणी ने अर्चना को राज़ी कर लिया था अपने जीवन की नई शुरुआत के लिये। केशव ने भी अर्चना के माता पिता को तैयार कर लिया था उसके फिर से विवाह के लिये। अर्चना के जीवन की काली अंधेरी रात का अंत हो चुका है और उसके सामने है नया सवेरा , और उज्जवल भविष्य का नया आस्मां।

Saturday, 19 October 2013

फुर्सत नहीं ( लघु कथा )

बचपन के दोस्त भूल गये थे महानगर में रहते हुए। कभी अगर पुराने मित्र का फोन आ जाता तो हर बार व्यस्त हूं , बाद में बात करना कह कर टाल दिया करते। कहां बड़े शहर के नये दोस्तों के साथ मौज मस्ती , हंसना हंसाना और कहां छोटे शहर के दोस्त की वही पुरानी बातें , बोर करती हैं। लेकिन जिस दिन एक घटना ने बाहर भीतर से तोड़ डाला तब यहां कोई न था जो अपना बन कर बात सुनता और समझता। महानगर के सभी दोस्त कहां खो गये पता ही नहीं चला। तब याद आया बचपन का पुराना वही दोस्त। फोन किया पहली बार खुद उसे अपने दिल का दर्द बांटने के लिये। तब मालूम हुआ कि वो कब का इस दुनिया को अलविदा कह चुका है। पिछली बार जब उसका फोन आने पर व्यस्त हूं कहा था तब उसने जो कहे थे वो शब्द याद आ गये
आज। बहुत उदास हो कर तब उसने इतनी ही बात कही थी "दोस्त शायद जब कभी तुम्हें फुर्सत मिले हमारे लिये तब हम ज़िंदा ही न रहें"। तब सच्चे मित्र को नहीं पहचाना न ही उसकी भावना को समझा , उसका हाल पूछा न उसका दर्द बांटना चाहा तो अब उसको याद कर के आंसू बहाने से क्या हासिल।

Saturday, 12 October 2013

रास्ते का दर्द ( कहानी ) डा लोक सेतिया

अनिल का स्टोर मुख्य सड़क पर है। सड़क की दूसरी तरफ पार्क है बहुत बड़ा। पार्क के पीछे का वह मकान काफी दूर है और इतनी दूरी से किसी को ठीक से पहचाना नहीं जा सकता। मगर उस घर की बालकनी पर जब से अनिल ने उस लड़की को देखा है तब से उसका ध्यान उसी तरफ रहने लगा है। क्या ये वही है ,अनिल सोचता रहता है , क्यों उसे देख कर वो बेचैन हो जाता है , क्यों उसके दिल की धडकनें बड़ जाती हैं। दूर उस बालकनी से वो एकदम उसी जैसी नज़र आती है , बस उसका पहनावा बदला हुआ है और नई नवेली दुल्हन सा लगता है। क्या उसने विवाह कर लिया है , वह भी उसके स्टोर के ठीक सामने वाले घर में। नहीं वो मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकती , अनिल सोचने लगता है। हो सकता है ये कोई और हो जो दूर से उस के जैसी लगती है या फिर ये उसका प्यार है जो दूसरों में अपनी प्रेमिका की छवि देख रहा है। वो इतने दिनों से स्टोर पर क्यों नहीं आ रही है। मगर उन दोनों में कभी प्यार के वादों -कसमों जैसी कोई बातें भी तो कभी हुई नहीं , फिर क्यों उसको विश्वास है की वह भी चाहती है मुझे। हो सकता है ये उसका एकतरफा प्यार ही हो। क्यों रोज़ सुबह स्टोर पर आते ही उसकी नज़र सामने के मकान की बालकनी में उसे तलाश करने लग जाती है। अगर ये वही है तो किसी न किसी दिन वो कभी तो फिर से आएगी स्टोर पर। अपने मन में इक उम्मीद जगाता है अनिल। लेकिन अब क्या हासिल हो सकता है जब उसने चुपचाप किसी दूसरे से शादी रचा ली है। ऐसे में तो मेरा उसके बारे सोचना भी अनुचित बात है , अनिल एक अपराधबोध से ग्रस्त हो जाता है। काश ये वो न होकर उसके साथ मिलती जुलती कोई अन्य ही हो। उदास और परेशान रहने लगा है अनिल , काम में आजकल मन ही नहीं लगता उसका। कभी कभी सोचता है कि कुछ ही दूर उस मकान के करीब जा कर उसको ठीक से देख कर पहचान ले , बात करे उसके साथ जाकर। मगर ये छोटा सा रास्ता वह तय नहीं कर पा रहा , लगता है ये कुछ कदम की दूरी इतनी अधिक है जिसको अनिल तमाम उम्र में तय नहीं कर सकेगा।
        वह बेहद खूबसूरत है , उसकी आवाज़ में मधुरता है बातों में भोलापन। हर दिन आया करती है अनिल के स्टोर पर , कभी खरीद कर कुछ ले जाती है तो कभी फिर से वापस करने आ जाती है। अक्सर इधर उधर की बातें कर समय बिताने लगती है। अनिल को ऐसा लगता है कि वो मुझसे मिलने ही आती है। वो उम्मीद करता है कि इक दिन वो खुद अनिल से अपने प्यार का इज़हार भी करेगी। कितनी बार चाहा है अनिल ने अपने मन की बात उसको कह दे , मगर वो अपनी बातों में इस कद्र उलझाये रहती है कि अनिल कभी कुछ कह ही नहीं पाता। जिस दिन वो नहीं आती स्टोर पर ,अनिल को सब सूना सूना सा लगता है। तब सोचता है कि उससे उसका नाम पता तो पूछ लिया होता , या उसका कोई फोन नम्बर होता तो उसके न आने और ठीक ठाक होने की जानकारी तो ले पाता। लेकिन उससे कभी ये हो नहीं सका। किसी ग्राहक का नाम पता पूछना , विशेषकर लड़की का , जाने उसको असभ्यता ही लगे और वो स्टोर पर आना ही छोड़ दे , जो अनिल कभी नहीं चाहेगा। एक दो बार अनिल ने अपने दिल की बात पत्र में लिख कर रख ली थी , सोचा था दे देगा उसको ,मगर जब वो आई तो पत्र देने का सहस नहीं जुटा पाया था। लेकिन जिस तरह वो खुल कर उसके साथ दोस्ती की बात कहती है , उससे कोई भी समझेगा कि उनमें गहरी जानपहचान और आपसी समझ है , जो दो प्यार करने वालों में होनी चाहिए। इतने दिनों से परिचित हैं लेकिन अनिल को उसका नाम तक मालूम नहीं , शायद वो भी उसे उसके नाम से अधिक स्टोर के नाम से ही पहचानती हो।
      और एक दिन वो फिर से अनिल के स्टोर पर आ ही गई थी , नई नवेली दुल्हन जैसी गहनों से सजी हुई। अनिल को समझ नहीं आ रहा था कि उसको देख कर , उसके स्टोर पर आने पर खुश हो या उसे विवाहित देख कर उदास। मगर अनिल को अच्छा लगा था आना उसका , कितने दिनों से इस पल का इंतजार कर रहा था। बहुत दिन बाद आई हैं स्टोर पर , पूछ ही लिया था अनिल ने। हाँ मेरी शादी तय हो गई थी , इतने दिन उसी में ही व्यस्त रही हूं। मगर आया करूंगी रोज़ अब , आपके स्टोर के सामने वो पार्क के पीछे जो गुलाबी रंग का घर है , वही तो मेरी ससुराल है , अब वही मेरा घर है आपके सामने ही। कितने दिनों से आपके स्टोर पर आने की बात दिल में थी ,अपने पति महोदय से भी कहा कि चलकर आपका धन्यवाद तो कर आयें। मेरा धन्यवाद किसलिए , हैरानी से पूछा था अनिल ने। वह कहने लगी क्योंकि इतने दिनों तक आपका ये स्टोर ही तो हमारे प्यार की मंजिल का रास्ता रहा है। रोज़ मुलाकात करने के लिए हम दोनों ने आपके स्टोर का उपयोग किया है। मैं रोज़ यहाँ उनका इंतज़ार किया करती थी और जब वो सामने अपने घर से बाईक पर बाहर निकलते तब मैं बाहर चली जाया करती सड़क पर और वे मुझे ले जाया करते अपने साथ। आप क्या जानते नहीं , मैं इसीलिए ही तो आया करती थी आपके स्टोर पर। उसकी बात सुन अनिल को झटका सा लगा था , वो सोचता रहा कि उसको मिलने आया करती है हर दिन जब कि उसे तो इसका इस्तेमाल करना था अपने प्रेमी से मिलने के लिए। ये जानकर अनिल को अच्छा नहीं लगा था , खुद पर गुस्सा आ रहा था , कितना मूर्ख हूं जो इतने दिन ऎसी गलत फ़हमी दिल में पाले रहा , क्या क्या सपने देखता रहा। अनिल को खामोश देख कर वो बोली थी , क्या सोचने लगे , मुझे शादी की मुबारिकबाद भी नहीं दोगे। शायद आप नाराज़ हैं क्योंकि हम दोनों आपको अपनी शादी में बुलाना ही भूल गये थे। नहीं ऎसी कोई बात नहीं आपको बहुत बहुत बधाई हो विवाह की ,मेरी शुभकामनायें आप दोनों पति पत्नी के लिए हमेशा रहेंगी। वैसे आपके पति महोदय का नाम क्या है ,मिलवाना किसी दिन मुझसे उन्हें। हैरानी की बात है हम इतने दिनों से इक दूजे को जानते हैं मगर मुझे आज तक आपका नाम भी मालूम नहीं है , कभी न मैंने ही पूछा न ही आपने बताया कभी। मेरा नाम है अलका और मेरे पति का नाम कमल है , वो बोली थी। आपका नाम क्या है मैंने भी नहीं पूछा कभी आपसे ,बस अनिल स्टोर के नाम से जानती हूं आपको , हंसकर कहा था उसने। मेरा नाम अनिल ही है अपने नाम पर ही रखा है स्टोर का नाम मैंने। अच्छा चलती हूं ,अब तो मिलते ही रहेंगे , जाते जाते उसने कहा था , मेरा नाम याद रखियेगा , अलका कमल। कभी शाम को हमारे घर आना , आपकी मुलाकात हो जायेगी कमल से भी।
      अनिल समझना  चाहता है कि वो क्या है एक चलता फिरता हुआ इन्सान जिसमें दिल है भावनाएं हैं या कोई स्टोर है कारोबार का जहाँ कोई किसी काम से ही नहीं बिना काम अपने किसी मतलब से भी आ जा सकता है। उसको लगता था अलका की चाहत है वो , मंजिल है अलका की ,लेकिन अलका के लिए वो सिर्फ एक स्टोर था , एक रास्ता था उसका अपने प्यार की मंजिल को पाने के लिए। और ये सच है कि मंजिल से सभी प्यार किया करते हैं , कोई भी रास्तों से प्यार नहीं किया करता कभी। हर कोई रास्ते को जल्द से जल्द तय कर लेना चाहता है ताकि मंजिल को पा सके। यही है रास्तों का मुकद्दर। काश कि वो किसी का रास्ता नहीं उसकी मंजिल होता। रास्ते का दर्द कभी नहीं समझा है किसी भी मुसाफिर ने आज तक।

Friday, 11 October 2013

जन नायक श्री जय प्रकाश नारायण जी और आपात्काल ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

11 अक्टूबर जब भी आता है मुझे हैरानी होती है सभी टीवी चैनेल अमिताभ बच्चन जी का जन्म दिन मना रहे होते हैं उनको नायक नहीं महानायक सदी का घोषित किया जाता है। कल इक महान लेखक की बात पढ़ी थी ,
उनका कहना था नायक वो होते हैं जिनको सही राह मालूम होती है , वो खुद सही मार्ग पर चलते हैं और लोगों को भी साथ रखते हैं। जे पी जैसे वास्तविक नायक हमें याद नहीं रहते और फ़िल्मी अभिनेता को हम नायक बता उसका गुणगान करते हैं। इस से समझ सकते हैं कि हम मानसिक तौर पर कितने खोखले हो गए हैं। शायद हमें आज़ादी से पहले का तो क्या आज़ादी के बाद तक का इतिहास याद नहीं है। भूल गये हैं कि किसी भी नेता का इस कदर महिमामंडन नहीं किया जाना चाहिये कि वो खुद को संविधान से ऊपर समझने लगे। आज भी हम वही गुलामी की मानसिकता के शिकार हैं और किसी न किसी को खुदा बनाकर उसकी परस्तिश करने में लाज अनुभव नहीं करते। ऐसे कितने खुदा लोगों ने तराश लिये हैं जो उनकी इसी बात का उपयोग पैसा कमाने और अमीर बनने को कर रहे हैं। उनका धन दौलत का मोह बढ़ता ही जाता है , शास्त्र बताते हैं जिस के पास सभी कुछ हो फिर भी और पाने की हवस हो वही सब से दरिद्र होता है। लेकिन हम जे पी जैसे जननायक को भूल जाते हैं जिसने कभी किसी पद किसी ओहदे को नहीं स्वीकार किया और हमेशा जनता की बात की।
और जिस ने देश समाज को कुछ नहीं दिया जो भी किया खुद अपने लिए ही किया उसको हम भगवान तक बताने में संकोच नहीं करते। विशेष कर मीडिया को तो समझना चाहिए लोकतंत्र में चाटुकारिता कितनी खतरनाक होती है।                                        
             पच्चीस  जून 1 9 7 5 को जयप्रकाश नारायण जी के भाषण को आधार बना आपात्काल की घोषणा की गई थी। मैं उस दिन उनका भाषण सुनने वालों में शामिल था। आज वो लोग सत्ता पर आसीन हैं जो कभी आपात्काल में भूमिगत थे , आज देखते हैं वही खुद तानाशाही ढंग से आचरण करते हैं और मीडिया तब भी उनकी महिमा का गुणगान करता नज़र आता है। कोई उनको याद दिलाये कभी आपको किसी सत्ताधारी की तानाशाही लोकतंत्र विरोधी लगती थी , आज खुद दोहराते हैं वही सब। मुझे तो आज तक ये समझ नहीं आ सका कि इस अभिनेता ने देश व समाज को क्या दिया है। मगर हमारी मानसिकता बन गई है सफलता को , पैसे कमाने को महान समझने की। कोई के बी से से जीत लाये धन तो शहर वाले उसको सम्मानित करने लगते हैं। ये नहीं सोचते कि ऐसा करना कितना उचित या अनुचित है। सब जानते हैं कि ये धन जनता से आता है एस एम एस से और विज्ञापनों से। न चैनेल घर से देता है न ही अमिताभ जी , बल्कि दोनों की कमाई होती है ऐसा करके।
    जे पी जी जैसे लोग कभी कभी मिलते हैं। आज आप अन्ना हजारे जी को जानते हैं भ्रष्टाचार का विरोध करने के लिये चलाये आन्दोलन के कारण। १९७५ में जो आन्दोलन देश भर में जे पी जी ने चलाया था वो अपने आप में एक मिसाल है। इंदिरा गाँधी जिनको बहुत ही साहस वाली महिला माना जाता है डर गई थी उनके आन्दोलन से और आपातकाल की घोषणा कर दी थी। १९ महीने तक देश का लोकतंत्र कैद था एक व्यक्ति की कुर्सी की चाहत के कारण। कांग्रेस लाख चाहे ये काला दाग मिट नहीं सकता उसके दामन पर लगा हुआ। ये अलग बात है कि  उस आन्दोलन में ऐसे भी लोग शामिल हो गये थे जिनको आगे जा कर खुद सत्ता प्राप्त कर वही सब ही करना था। लालू यादव और मुलायम सिंह जैसे लोग होते हैं जिनको अपने स्वार्थ सिद्ध करने होते हैं। वे तब भ्रष्टाचार और परिवारवाद का विरोध कर रहे थे लेकिन आज खुद वही करने लगे हैं।
    मगर जे पी जी का सम्पूर्ण क्रांति का ध्येय तब भी सही था और आज भी उसकी ही ज़रूरत है। शायद आज और अधिक ज़रूरत है क्योंकि तब केवल बिहार और दिल्ली की सरकार की बात थी जब कि आज हर शाख पे उल्लू बैठा है। मगर आज के नवयुवकों को ये बताना बेहद ज़रूरी है कि नायक वो होते हैं जो पद को कुर्सी को ठोकर मरते हैं उसूलों की खातिर। देश के सर्वोच्च पद के लिए इनकार कर दिया था जयप्रकाश नरायण जी ने।
आज है कोई जो सत्ता को नहीं जनहित को महत्व दे। आज उनको याद किया जाना चाहिए , उनसे सबक सीख सकते हैं आम आदमी पार्टी के लोग कि वही सब फिर न दोहराया जा सके। भ्रष्टाचार के विरोध की बात कर सत्ता पा कर खुद और ज्यादा भ्रष्टाचार करने लगें। इधर लोग दो लोगों को भगवान कहने का काम करते हैं अक्सर। लेकिन उन दोनों तथाकथित भगवानों की  दौलत की चाहत थमने का नाम ही नहीं ले रही। क्या भगवान ऐसे होते हैं , भगवान देते हैं सब को , अपने लिए कुछ नहीं चाहिए उसको। मुझे किसी शायर के शेर याद आ रहे हैं।
इस कदर कोई बड़ा हो हमें मंज़ूर नहीं //
कोई बन्दों में खुदा हो हमें मंज़ूर नहीं।
रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की अगर //
चाँद बस्ती में उगा हो हमें मंज़ूर नहीं।
मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना //
आपकी एक अदा हो हमें मंज़ूर नहीं।  

Wednesday, 9 October 2013

वेलेनटाईन डे , प्रेम दिवस पर सच्चे प्यार की बात ( आलेख ) डा लोक सेतिया

आज प्यार की बात की जाये। अभी अभी फेसबुक पर किसी का सवाल था कि सच्चा प्यार कितनी बार कर सकते हैं। मुझे नहीं मालूम  कि झूठा प्यार क्या होता है। प्यार अगर है तो सच्चा है अन्यथा उसको प्यार मत कहना। जो धोका दे वो प्यार नहीं कुछ और होगा। कई साल पहले मैंने एक लेख लिखा था "क्या होता है प्यार "
शुभ तारिका पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। आज थोड़ी बात उसकी भी शामिल करना चाहता हूं उस में से बाकी आज की नयी बात। वैसे प्यार की नयी बात भी वही है जो सदियों पुरानी चली आ रही है।
      एक कहानी है। इक सन्यासी की कुटिया के सामने एक नौजवान युवक रहता था। इक दूध बेचने वाली दोनों को रोज़ दूध देने आया करती थी। साधू सारा दिन हाथ में माला लेकर प्रभु नाम का जाप किया करता। साधू को अचरज हुआ देख कर कि  दूध बेचने वाली जब उसको दूध देती तो माप तोल कर लेकिन उस नवयुवक के बर्तन में बिना माप तोल किये ही डाल दिया करती है। एक दिन साधू ने पूछ ही लिया कि आप उसका हिसाब किस तरह रखती हो , आप तो कभी देखती ही नहीं कि कितना डाला नवयुवक के बर्तन में आपने। दूध बेचने वाली का जवाब था कि मैं उसको प्यार करती हूं ,उसके साथ कम ज़्यादा का हिसाब कैसे रख सकती हूं। उससे बदले में लेना नहीं मुझे कुछ भी। साधू को लगा कि एक दूध बेचने वाली जिसको प्यार करती है उसका कोई हिसाब नहीं रखती और मैं हूं कि जिस परमात्मा से प्यार करने की बात कहता हूं उसके नाम की माला गिनता रहता हूं। और उस साधू ने माला को फैंक दिया और कहा कि  माई आपने मुझे सच्चा प्यार क्या है ये सबक सिखलाया है मैं आपको अपना गुरु मानता हूं।
       आज कहीं धर्म के नाम पर प्यार करने वालों का विरोध हो रहा है तो कहीं कुछ लोग प्यार का अर्थ समझे बिना किसी को सज़ा देते हैं कि उसने उनका प्यार स्वीकार नहीं किया। दोनों प्यार से अनजान हैं। कोई भी धर्म प्यार को गुनाह नहीं बताता है , पढ़ लो सभी ग्रन्थों को खोलकर। प्यार इबादत है खुदा है यही लिखा हुआ मिलेगा , बस यही नहीं लिखा कि प्यार है क्या। मगर हर कथा कहानी में प्यार की बात ही है। राधा मोहन का प्यार , मीरा श्याम का प्यार। शिव पार्वती की कथा किसको नहीं मालूम , एक जन्म में नहीं अगले जन्म में भी फिर से उसी शिव को वर बनाने की चाह। अब आप हिसाब लगाने लगोगे उनकी उम्र के अंतर का। फिर वही बात , प्यार में कोई भी हिसाब नहीं , किसी तरह का बंधन नहीं , कोई अनुबंध नहीं। मगर प्यार पा लेने का नाम नहीं है और जो पा लेने को ही प्यार समझता है उसको प्यार का अर्थ समझने को कई जन्म लेने होंगे। ये मैं नहीं कह रहा , फिल्म दो बदन की नायिका कहती है खलनायक को। एक और पुरानी फिल्म में नायिका के पति को जब उसके पुराने प्रेमी की बात पता चलती है तब नायिका बताती है प्यार का अर्थ। वो बोलती है कि हम साथ साथ पढ़ते थे और मुश्किल से कुछ मिंट ही मिलते थे मुलाकात करने को , अगर उस सारे वक़्त को जोड़ दें तो वो साड़ेसात घंटे भी नहीं होंगे , लेकिन उन कुछ घंटो में मुझे जितना प्यार उससे मिला उतना तुमसे शादी के बाद साड़ेसात सालों में भी नहीं मिला और उन साड़ेसात घंटो में उसने मुझे कभी छुआ तक नहीं। अब आजकल के युवकों को कौन बतायेगा प्यार क्या है। उनको तो इस दौर की फ़िल्में सीरियल आदि कुछ और ही पढ़ा रहे हैं , विज्ञापन भी। वासना को प्यार कहना किसी अपराध से कम नहीं है। पुरानी फिल्मों में कितनी बार सच्चे प्यार को त्याग बतलाया गया। सच्चा प्यार आदमी को खुदा बना देता है , जो इन्सान को शैतान बनाये उसको प्यार नहीं कह सकते। दिल एक मंदिर ,हँसते ज़ख्म , सफ़र , ख़ामोशी जैसी फिल्मों में बताया गया कि  प्यार किसको कहते हैं। हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू , हाथ से छू के उसे रिश्तों का इलज़ाम न दो। सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो , प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो। यही है परिभाषा सच्चे प्यार की। अंत में एक प्रेम कहानी इस आज के युग की कुछ ही साल पुरानी।
         महाराज कृष्ण जैन का नाम सुना होगा आपने भी। हरियाणा के अम्बाला में रहते थे , साहित्य के साधक थे , खुद ही नहीं लिखते थे बल्कि औरों को भी कहानी लिखना सिखाते थे पत्राचार द्वारा। और उर्मि जी जो मध्य प्रदेश में सरकारी सेवा में थी उनसे पत्राचार कर सीखा करती। एक बार शिमला जाते हुए उर्मि जी रस्ते में अम्बाला उनसे मिलने चली गई। देख कर हैरान हो गई कि जो पर्वतों की झरनों की बात और आशावादी बातें लिखता है वो वास्तव में जन्म से ही चल फिर नहीं सकता , एक कमरे तक सिमटी है दुनिया उसकी। आप सोच सकते हैं कोई ऐसे व्यक्ति से प्यार करे विवाह करे और जीवन भर उसका साथ नभाने के बाद भी उसके सपने को साकार करे। लेकिन उर्मि जी आज भी महाराज कृष्ण जैन जी के काम को जारी रखे हैं। कोई भी जाकर देख सकता है अम्बाला छावनी में जहाँ वो लेखन विद्यालय और साहित्य की पत्रिका निरंतर निकाल रही हैं।
      बात शुरू की थी प्यार की। कोई करे तो सही सच्चा प्यार , जितनी बार चाहे , जिस जिस से , चाहे तो सारी दुनिया से। किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार , किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार , जीना इसी का नाम है।  
आओ आज संकल्प करें प्यार करने का सभी से सच्चे दिल से , मिटा दें दुनिया से नफरत का निशां।

Monday, 7 October 2013

कला निकली जब भी बिकने ( कविता ) 104 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

मेला सजाया गया था रात ,
सज कर आई थी उसकी बरात ,
झूम झूम कर कला खुद नाची ,
फूलों की हो रही थी वो बरसात।
सुबह था बदला सा नज़ारा ,
जो भी सजाया बिखरा था सारा ,
कला का ज़ख़्मी था पूरा बदन ,
बन कर अपने सब ने ही मारा।
जाने था कैसा ये उसका सम्मान ,
जो बन गया जैसे हो कोई अपमान ,
फिर से वही तलवे चाटना सबके ,
बस दो पल की थी झूठी शान।
किस बात पे थी यूं इतना इतराई ,
क्या नया थी तू ले कर आई ,
तेरा मोल लगाने लगे लोग ,
रो रो कह रही थी शहनाई।
कल तक जिनको बुरा थी कहती ,
नहीं कभी जिनके घर में रहती ,
उनको ही अपना खुदा बनाया ,
हमने भी देखी उलटी गंगा बहती।
खुद को किया है जिनके हवाले ,
करते निसदिन वो हैं घोटाले ,
उनको नज़र आता जिस्म नग्न ,
नहीं देखते पांव के कभी छाले।
कला नहीं बाज़ार में कभी जाना ,
चाहे रूखी सूखी ही खाना ,
छूना मत गंदगी को भूले से ,
इन धोकों से खुद को है बचाना।

गाता फिरे गली गली यही फ़कीर ( कविता ) 103 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

प्रति दिन युद्ध होता  है ,
दिल की चाह में  ,
और ईमान की राह में ,
हर दिन बुरे कर्म ,
करने के बाद ,
आदमी को याद दिलाता ,
है उसका ज़मीर ,
अभी कल ही तो ,
किया था मुझसे वादा ,
छोड़ देने का ,
सभी अपने बुरे कर्म ,
भूल कर क्यों आज फिर  ,
चले आये हो उसी मार्ग पर।
कितनी बार पछतावा ,
होता है दिल को ,
हर शाम पीने के बाद ,
लगता है पीने वाले को ,
बड़ी ही नामुराद चीज़ है ,
मय भी मयखाना भी ,
सब लुटा है न कुछ भी ,
कभी भी मिल सका ,
छोड़ ही दे है कहता ,
ईमान इस महफ़िल को।
तेरी गली को ,
कितनी बार अलविदा कहा ,
क्या क्या नहीं उम्र भर ,
सितम भी सहा ,
जनता हूं बेवफा ,
नाम है तेरा ही लेकिन ,
तेरे हुस्न के जादू का ,
हुआ ऐसा मुझपे असर ,
हार के सभी अपना ,
खेलता हूं फिर फिर जुआ।
कितनी दौलत ,
पाप वाली जमा कर ली  ,
अपनी झोली पापों से ,
मैंने क्योंकर भर ली ,
हर सुबह जाकर ,
मांगता हूं खुदा से ,
मैं गिर रहा तूं ही ,
बचा ले आकर मुझको ,
शाम होते नहीं ,
कुछ भी याद रखता हूं ,
दिल है जो कहता ,
वही तो करता मैं हूं।
अपने ईमान की ,
सुनता कब हूं मैं भला ,
रात दिन दिल के हूं ,
कहने पर बस  चला ,
अच्छी लगती हैं ,
राहें बुरी मेरे दिल को ,
खुद भंवर चुनता हूं  ,
छोड़ कर उस साहिल को ,
दिल के हाथों है  लुटता  ,
दुनिया का हर अमीर ,
गाता  रात दिन भजन ,
गली गली है इक फ़कीर।

Sunday, 6 October 2013

कीमत घर की ( कहानी )

फिर वही पुराना ज़ख्म हरा हो गया है। सालों बाद फिर घर से बेघर होना पड़ रहा है। काश मेरा घर कालोनी की मुख्य सड़क पर न होता , अंदर किसी तंग गली में होता , जहां बाज़ार वाले इतनी बड़ी कीमत न लगा पाते कि मैं उसे बेचने को विवश हो जाता। कितनी मेहनत से कितने प्यार से इस घर को मैंने बनाया था। इसका आँगन , पेड़ पौधे ,हरी हरी बेलें जिन्हें सजाने में वर्षों तक दिन रात लगा रहा हूं। कितने साल लग गये थे मुझे ये छोटा सा घर बनाने में ,एक एक पैसा जमा कर एक एक इंट लगा कर कैसे बनाया था इस घर को ये कोई दूसरा कभी नहीं समझ सकता। आज जो लोग कह रहे हैं कि ये ख़ुशी की बात है जो तुम्हारे घर की कीमत इतनी हो गयी है कि  इस पैसे से तुम नई कालोनी में इस से बहुत बड़ा वा शानदार घर बना सकते या खरीद सकते हो , वे इस बात को नहीं समझ सकते कि मेरे लिये अपना घर क्या है और घर में और मकान में कितना अंतर है। घर बिक सकता है , खरीदा नहीं जा सकता। मकान खरीदना तो आसान है , उसे घर बनाने में उम्र बीत जाती है। अब मेरे पास बाक़ी उम्र ही कितनी है।
             पचास साल का नाता है इस घर से। देश के बंटवारे के बाद विस्थापित होकर जब इस शहर में आये थे तो सोचा भी न था कि कभी कहीं दोबारा अपना घर बना कर फिर से खुशहाल हो रह सकेंगे। फिर गली , मोहल्ला ,पास पड़ोस ,संगी साथी बन जायेंगे। फिर सब मिल जुल कर सुख दुःख बांटेगे , अपनापन नज़र आने लगेगा और धीरे धीरे विस्थापित होने की बात भूल कर जीने लगेंगे। पचास सालों में इस घर में बच्चों की किलकारियां गूंजी हैं , बच्चे खेलते खेलते बड़े हुए हैं , बरातें आईं हैं , डोलियाँ उठी भी  हैं बेटियों की और डोलियाँ आई भी हैं नयी दुल्हनों को लेकर। इस सब की गवाह है इस घर की दीवारें और गलियां। पचास सालों में यहाँ रहने वाले सभी लगने लगा है एक परिवार का हिस्सा हैं हम जैसे। सब के बच्चे अपने लगते हैं , हर घर का आँगन , हर इक खिड़की , इक इक दरवाज़ा पहचानता है हमें , हमारी हर आहट को। गली की एक एक इंट से पहचान है जैसे। क्या अब फिर कभी कहीं ऐसा कोई घर हम सभी बना सकेंगे। आजकल नयी विकसित हो रही आबादी में , जहां किसी को किसी से बात करने तक की फुर्सत नहीं , ऐसा घर कैसे बन सकता है वहां।
       क्यों मेरे इस घर का मोल इतना अधिक हो गया है कि सभी को लगता है इसको बेच देना ही बेहतर है। हम सभी के लगाव की प्यार की अपनेपन की कीमत कुछ भी नहीं। इंट पत्थर और लकड़ी से बने मकान की कीमत क्यों आदमी और उसकी कोमल भावनाओं से ज़्यादा हो गई है जो सभी अपने अपने घर यहाँ से बेच कर किसी दूसरी जगह जाने लगे हैं। पैसे की ताकत ने सब को कितना विवश कर दिया है , आज मुझे भी वही करना पड़ रहा है। कितना सोचा था कि भले बाकी लोग बेच दें मैं कभी नहीं बेचूंगा घर अपना। यहीं जीने यहीं मरने की ख्वाहिश अधूरी ही रहेगी। करते करते पूरी की पूरी कालोनी ने एक बाज़ार का रूप ले लिया है , अब तो यहाँ चैन से रहना मुश्किल लगने लगा है। बाज़ार का शोर ,भीड़ भड़ाका , वाहनों का चोबीस घंटे गुज़रना , इस सब ने क्या से क्या कर दिया है। लगता है अब शांति और चैन नहीं मिलेगा कभी , इतने पैसों से भी हम वो नहीं हासिल कर सकेंगे कभी फिर से। अब वो साहस भी नहीं बचा कि  किसी वीरान जगह को फिर से आबाद कर सकें। कितनी बार कोई घर बनाता रहे और उसको छोड़कर जाने का दर्द सहता रहे।
         दोनों बेटे कहते हैं कि उनको अपने अपने दफ्तर के , अपने कारोबार की जगह के नज़दीक फ्लैट लेना है। बेटी को भी अपना अलग घर बनाना है सास ससुर से अलग जिसमें पति पत्नी रह सकें। मेरी धर्म पत्नी भी हर माँ की तरह सोचती है कि अपना क्या है हम कैसे भी कहीं भी रह लेंगे मगर बच्चों को जो भी चाहिए उनको दिलवा सकें। मैं भी सोचता हूं , कितना जीना है अब , रह लेंगे कहीं भी किसी तरह। बच्चों को उनके अपने घर तो बनवा देते हैं। डीलर हिसाब लगा कर सब समझा गया है , इस एक घर को बेचकर हम तीन फ्लैट खरीद सकते हैं। अब मेरे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा , चाहूं न चाहूं , यही करना ही होगा। हमें प्रसन्नता होगी कि  सब बच्चों के अपने घर बन गये हैं। उन तीनों के फ्लैटों में हम बाकी उम्र शायद यही तलाश करते रहें कि  इनमें हमारा अपना घर कौन सा है। डीलर बता रहा था कि जल्दी ही इन फ्लैटों के भी दाम आसमान को छूने लगेंगे। मेरी तो यही कामना है कि कभी किसी के घर की कीमत इतनी भी न बढ़ जाये कि वो उसमें रह ही न सके , उस अपने घर को बेचने को मज़बूर हो जाये। कम से कम मेरे बच्चों को बेघर होने के दर्द का तो कभी एहसास नहीं हो। दुआ कर रहा हूं। आमीन। 

Thursday, 3 October 2013

हुस्न वालो हुस्न की सुनो कहानी ( हास्य कविता ) 17 भग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

किसलिये परेशान है , पूरा किया अरमान है ,
जादू चले तेरे हुस्न का , पाया यही वरदान है ,
सब देखते हैं प्यार से , पाना सभी हैं चाहते ,
खुद मांगती थी यही , क्यों बन रही नादान है।
कहानी बड़ी पुरानी , सुनाती थी सबकी नानी ,
औरत बना खुदा से , हुई थी इक नादानी ,
अपनी तराशी मूरत पे , वो हो गया था आशिक ,
बस तभी से हर नारी , करती है सदा मनमानी।
खुदा को खुश किया था , चाहा जो वर लिया था ,
मेरे हुस्न पर सब फ़िदा हों , कहते दिलरुबा हों ,
हर बात मेरी मानें , मेरा झूठ भी सच जानें ,
मेरे हुस्न का जादू , क्या है न कोई पहचाने।
सब बात मान ली थी , इक बात थी बताई ,
सब तुझ पे आशिक हों , न खुद पे आप होना ,
खुद को हसीन समझा , तो उम्र भर को रोना ,
अपनी नज़र से बचना , इसमें तेरी भलाई।
ये बात हर नारी को , न कभी याद है आती ,
खुद देखती आईना , खुद से भी शर्माती ,
सजती और संवरती , कर कर जतन कितने ,
मुझसे हसीं न हो और , सोच कर ये घबराती।
सजने संवरने में वो , भूली खुदा की बात है ,
चार दिन की चांदनी , फिर अँधेरी रात है ,
उम्र छिपाती है अपनी , अपने ही आशिक से ,
चालीस की होने पर है , अभी तीस ये बताती।
तेरी नज़र का जादू अब , कितने दिन है बाकी ,
मय छोड़ दे ज़माना , ऐसे पिलाओ तुम साकी ,
दिल को संभालें कैसे , हम तो सिर्फ आदमी हैं ,
तुझ पर हुआ था आशिक , खुदा में रही कमी है।
सारी हसीनों से सब आशिक , फरियाद कर रहे ,
हमको बचा लो तुम ही , तुम पे ही सब मर रहे ,
ये सोच लो बिन हमारे , बहुत ही पछताओगी ,
कब तक खुद को खुद ही , देख देख दिल बहलाओगी।