अक्टूबर 20, 2013

POST : 371 फुर्सत नहीं ( लघु कथा ) - डॉ लोक सेतिया

          फुर्सत नहीं ( लघुकथा ) डॉ लोक सेतिया

     बचपन के दोस्त भूल गये थे महानगर में रहते हुए। कभी अगर पुराने मित्र का फोन आ जाता तो हर बार व्यस्त हूं , बाद में बात करना कह कर टाल दिया करते। कहां बड़े शहर के नये दोस्तों के साथ मौज मस्ती , हंसना हंसाना और कहां छोटे शहर के दोस्त की वही पुरानी बातें , बोर करती हैं। लेकिन जिस दिन एक घटना ने बाहर भीतर से तोड़ डाला तब यहां कोई न था जो अपना बन कर बात सुनता और समझता।

    महानगर के सभी दोस्त कहां खो गये पता ही नहीं चला। तब याद आया बचपन का पुराना वही दोस्त। फोन किया पहली बार खुद उसे अपने दिल का दर्द बांटने के लिये। तब मालूम हुआ कि वो कब का इस दुनिया को अलविदा कह चुका है। पिछली बार जब उसका फोन आने पर व्यस्त हूं कहा था तब उसने जो कहे थे वो शब्द याद आ गये आज। बहुत उदास हो कर तब उसने इतनी ही बात कही थी ,

         " दोस्त शायद जब कभी तुम्हें फुर्सत मिले हमारे लिये तब हम ज़िंदा ही न रहें "।

    तब सच्चे मित्र को नहीं पहचाना न ही उसकी भावना को समझा , उसका हाल पूछा न उसका दर्द बांटना चाहा तो अब उसको याद कर के आंसू बहाने से क्या हासिल।

अक्टूबर 13, 2013

POST : 370 रास्ते का दर्द ( कहानी ) डा लोक सेतिया

          रास्ते का दर्द ( कहानी ) डा लोक सेतिया

अनिल का स्टोर मुख्य सड़क पर है। सड़क की दूसरी तरफ पार्क है बहुत बड़ा। पार्क के पीछे का वह मकान काफी दूर है और इतनी दूरी से किसी को ठीक से पहचाना नहीं जा सकता। मगर उस घर की बालकनी पर जब से अनिल ने उस लड़की को देखा है तब से उसका ध्यान उसी तरफ रहने लगा है। क्या ये वही है ,अनिल सोचता रहता है , क्यों उसे देख कर वो बेचैन हो जाता है , क्यों उसके दिल की धडकनें बड़ जाती हैं। दूर उस बालकनी से वो एकदम उसी जैसी नज़र आती है , बस उसका पहनावा बदला हुआ है और नई नवेली दुल्हन सा लगता है। क्या उसने विवाह कर लिया है , वह भी उसके स्टोर के ठीक सामने वाले घर में। नहीं वो मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकती , अनिल सोचने लगता है। हो सकता है ये कोई और हो जो दूर से उस के जैसी लगती है या फिर ये उसका प्यार है जो दूसरों में अपनी प्रेमिका की छवि देख रहा है। वो इतने दिनों से स्टोर पर क्यों नहीं आ रही है। मगर उन दोनों में कभी प्यार के वादों -कसमों जैसी कोई बातें भी तो कभी हुई नहीं , फिर क्यों उसको विश्वास है की वह भी चाहती है मुझे। हो सकता है ये उसका एकतरफा प्यार ही हो। क्यों रोज़ सुबह स्टोर पर आते ही उसकी नज़र सामने के मकान की बालकनी में उसे तलाश करने लग जाती है। अगर ये वही है तो किसी न किसी दिन वो कभी तो फिर से आएगी स्टोर पर। अपने मन में इक उम्मीद जगाता है अनिल। लेकिन अब क्या हासिल हो सकता है जब उसने चुपचाप किसी दूसरे से शादी रचा ली है। ऐसे में तो मेरा उसके बारे सोचना भी अनुचित बात है , अनिल एक अपराधबोध से ग्रस्त हो जाता है। काश ये वो न होकर उसके साथ मिलती जुलती कोई अन्य ही हो। उदास और परेशान रहने लगा है अनिल , काम में आजकल मन ही नहीं लगता उसका। कभी कभी सोचता है कि कुछ ही दूर उस मकान के करीब जा कर उसको ठीक से देख कर पहचान ले , बात करे उसके साथ जाकर। मगर ये छोटा सा रास्ता वह तय नहीं कर पा रहा , लगता है ये कुछ कदम की दूरी इतनी अधिक है जिसको अनिल तमाम उम्र में तय नहीं कर सकेगा।

        वह बेहद खूबसूरत है , उसकी आवाज़ में मधुरता है बातों में भोलापन। हर दिन आया करती है अनिल के स्टोर पर , कभी खरीद कर कुछ ले जाती है तो कभी फिर से वापस करने आ जाती है। अक्सर इधर उधर की बातें कर समय बिताने लगती है। अनिल को ऐसा लगता है कि वो मुझसे मिलने ही आती है। वो उम्मीद करता है कि इक दिन वो खुद अनिल से अपने प्यार का इज़हार भी करेगी। कितनी बार चाहा है अनिल ने अपने मन की बात उसको कह दे , मगर वो अपनी बातों में इस कद्र उलझाये रहती है कि अनिल कभी कुछ कह ही नहीं पाता। जिस दिन वो नहीं आती स्टोर पर ,अनिल को सब सूना सूना सा लगता है। तब सोचता है कि उससे उसका नाम पता तो पूछ लिया होता , या उसका कोई फोन नम्बर होता तो उसके न आने और ठीक ठाक होने की जानकारी तो ले पाता। लेकिन उससे कभी ये हो नहीं सका। किसी ग्राहक का नाम पता पूछना , विशेषकर लड़की का , जाने उसको असभ्यता ही लगे और वो स्टोर पर आना ही छोड़ दे , जो अनिल कभी नहीं चाहेगा। एक दो बार अनिल ने अपने दिल की बात पत्र में लिख कर रख ली थी , सोचा था दे देगा उसको ,मगर जब वो आई तो पत्र देने का सहस नहीं जुटा पाया था। लेकिन जिस तरह वो खुल कर उसके साथ दोस्ती की बात कहती है , उससे कोई भी समझेगा कि उनमें गहरी जानपहचान और आपसी समझ है , जो दो प्यार करने वालों में होनी चाहिए। इतने दिनों से परिचित हैं लेकिन अनिल को उसका नाम तक मालूम नहीं , शायद वो भी उसे उसके नाम से अधिक स्टोर के नाम से ही पहचानती हो।

      और एक दिन वो फिर से अनिल के स्टोर पर आ ही गई थी , नई नवेली दुल्हन जैसी गहनों से सजी हुई। अनिल को समझ नहीं आ रहा था कि उसको देख कर , उसके स्टोर पर आने पर खुश हो या उसे विवाहित देख कर उदास। मगर अनिल को अच्छा लगा था आना उसका , कितने दिनों से इस पल का इंतजार कर रहा था। बहुत दिन बाद आई हैं स्टोर पर , पूछ ही लिया था अनिल ने। हाँ मेरी शादी तय हो गई थी , इतने दिन उसी में ही व्यस्त रही हूं। मगर आया करूंगी रोज़ अब , आपके स्टोर के सामने वो पार्क के पीछे जो गुलाबी रंग का घर है , वही तो मेरी ससुराल है , अब वही मेरा घर है आपके सामने ही। कितने दिनों से आपके स्टोर पर आने की बात दिल में थी ,अपने पति महोदय से भी कहा कि चलकर आपका धन्यवाद तो कर आयें। मेरा धन्यवाद किसलिए , हैरानी से पूछा था अनिल ने। वह कहने लगी क्योंकि इतने दिनों तक आपका ये स्टोर ही तो हमारे प्यार की मंजिल का रास्ता रहा है। रोज़ मुलाकात करने के लिए हम दोनों ने आपके स्टोर का उपयोग किया है। मैं रोज़ यहाँ उनका इंतज़ार किया करती थी और जब वो सामने अपने घर से बाईक पर बाहर निकलते तब मैं बाहर चली जाया करती सड़क पर और वे मुझे ले जाया करते अपने साथ। आप क्या जानते नहीं , मैं इसीलिए ही तो आया करती थी आपके स्टोर पर। उसकी बात सुन अनिल को झटका सा लगा था , वो सोचता रहा कि उसको मिलने आया करती है हर दिन जब कि उसे तो इसका इस्तेमाल करना था अपने प्रेमी से मिलने के लिए। ये जानकर अनिल को अच्छा नहीं लगा था , खुद पर गुस्सा आ रहा था , कितना मूर्ख हूं जो इतने दिन ऎसी गलत फ़हमी दिल में पाले रहा , क्या क्या सपने देखता रहा। अनिल को खामोश देख कर वो बोली थी , क्या सोचने लगे , मुझे शादी की मुबारिकबाद भी नहीं दोगे। शायद आप नाराज़ हैं क्योंकि हम दोनों आपको अपनी शादी में बुलाना ही भूल गये थे। नहीं ऎसी कोई बात नहीं आपको बहुत बहुत बधाई हो विवाह की ,मेरी शुभकामनायें आप दोनों पति पत्नी के लिए हमेशा रहेंगी। वैसे आपके पति महोदय का नाम क्या है ,मिलवाना किसी दिन मुझसे उन्हें। हैरानी की बात है हम इतने दिनों से इक दूजे को जानते हैं मगर मुझे आज तक आपका नाम भी मालूम नहीं है , कभी न मैंने ही पूछा न ही आपने बताया कभी। मेरा नाम है अलका और मेरे पति का नाम कमल है , वो बोली थी। आपका नाम क्या है मैंने भी नहीं पूछा कभी आपसे ,बस अनिल स्टोर के नाम से जानती हूं आपको , हंसकर कहा था उसने। मेरा नाम अनिल ही है अपने नाम पर ही रखा है स्टोर का नाम मैंने। अच्छा चलती हूं ,अब तो मिलते ही रहेंगे , जाते जाते उसने कहा था , मेरा नाम याद रखियेगा , अलका कमल। कभी शाम को हमारे घर आना , आपकी मुलाकात हो जायेगी कमल से भी।

      अनिल समझना  चाहता है कि वो क्या है एक चलता फिरता हुआ इन्सान जिसमें दिल है भावनाएं हैं या कोई स्टोर है कारोबार का जहाँ कोई किसी काम से ही नहीं बिना काम अपने किसी मतलब से भी आ जा सकता है। उसको लगता था अलका की चाहत है वो , मंजिल है अलका की ,लेकिन अलका के लिए वो सिर्फ एक स्टोर था , एक रास्ता था उसका अपने प्यार की मंजिल को पाने के लिए। और ये सच है कि मंजिल से सभी प्यार किया करते हैं , कोई भी रास्तों से प्यार नहीं किया करता कभी। हर कोई रास्ते को जल्द से जल्द तय कर लेना चाहता है ताकि मंजिल को पा सके। यही है रास्तों का मुकद्दर। काश कि वो किसी का रास्ता नहीं उसकी मंजिल होता। रास्ते का दर्द कभी नहीं समझा है किसी भी मुसाफिर ने आज तक।

अक्टूबर 11, 2013

POST : 369 लोकनायक जे पी नारायण की बात ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   लोकनायक जे पी नारायण की बात ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

         11 अक्टूबर जब भी आता है मुझे हैरानी होती है सभी टीवी चैनेल अमिताभ बच्चन जी का जन्म दिन मना रहे होते हैं उनको नायक नहीं महानायक सदी का घोषित किया जाता है। कल इक महान लेखक की बात पढ़ी थी , उनका कहना था नायक वो होते हैं जिनको सही राह मालूम होती है , वो खुद सही मार्ग पर चलते हैं और लोगों को भी साथ रखते हैं। जे पी जैसे वास्तविक नायक हमें याद नहीं रहते और फ़िल्मी अभिनेता को हम नायक बता उसका गुणगान करते हैं। इस से समझ सकते हैं कि हम मानसिक तौर पर कितने खोखले हो गए हैं। शायद हमें आज़ादी से पहले का तो क्या आज़ादी के बाद तक का इतिहास याद नहीं है। भूल गये हैं कि किसी भी नेता का इस कदर महिमामंडन नहीं किया जाना चाहिये कि वो खुद को संविधान से ऊपर समझने लगे। आज भी हम वही गुलामी की मानसिकता के शिकार हैं और किसी न किसी को खुदा बनाकर उसकी परस्तिश करने में लाज अनुभव नहीं करते। ऐसे कितने खुदा लोगों ने तराश लिये हैं जो उनकी इसी बात का उपयोग पैसा कमाने और अमीर बनने को कर रहे हैं। उनका धन दौलत का मोह बढ़ता ही जाता है , शास्त्र बताते हैं जिस के पास सभी कुछ हो फिर भी और पाने की हवस हो वही सब से दरिद्र होता है। लेकिन हम जे पी जैसे जननायक को भूल जाते हैं जिसने कभी किसी पद किसी ओहदे को नहीं स्वीकार किया और हमेशा जनता की बात की। और जिस ने देश समाज को कुछ नहीं दिया जो भी किया खुद अपने लिए ही किया उसको हम भगवान तक बताने में संकोच नहीं करते। विशेष कर मीडिया को तो समझना चाहिए लोकतंत्र में चाटुकारिता कितनी खतरनाक होती है। अमिताभ बच्चन को सदी का महानयक कहना वास्तव में नायकत्व को अपमानित करना है। कौन बनेगा करोड़पति का धंधा लोगों को झूठे सपने गलत राह दिखाना है जिस में टीवी चैनल और ये अभिनेता दोनों शामिल हैं।
                                     
             पच्चीस  जून 1 9 7 5 को जयप्रकाश नारायण जी के भाषण को आधार बना आपात्काल की घोषणा की गई थी। मैं उस दिन उनका भाषण सुनने वालों में शामिल था। आज वो लोग सत्ता पर आसीन हैं जो कभी आपात्काल में भूमिगत थे , आज देखते हैं वही खुद तानाशाही ढंग से आचरण करते हैं और मीडिया तब भी उनकी महिमा का गुणगान करता नज़र आता है। कोई उनको याद दिलाये कभी आपको किसी सत्ताधारी की तानाशाही लोकतंत्र विरोधी लगती थी , आज खुद दोहराते हैं वही सब। मुझे तो आज तक ये समझ नहीं आ सका कि इस अभिनेता ने देश व समाज को क्या दिया है। मगर हमारी मानसिकता बन गई है सफलता को , पैसे कमाने को महान समझने की। कोई के बी से से जीत लाये धन तो शहर वाले उसको सम्मानित करने लगते हैं। ये नहीं सोचते कि ऐसा करना कितना उचित या अनुचित है। सब जानते हैं कि ये धन जनता से आता है एस एम एस से और विज्ञापनों से। न चैनेल घर से देता है न ही अमिताभ जी , बल्कि दोनों की कमाई होती है ऐसा करके।

    जे पी जी जैसे लोग कभी कभी मिलते हैं। आज आप अन्ना हजारे जी को जानते हैं भ्रष्टाचार का विरोध करने के लिये चलाये आन्दोलन के कारण। 1975  में जो आन्दोलन देश भर में जे पी जी ने चलाया था वो अपने आप में एक मिसाल है। इंदिरा गाँधी जिनको बहुत ही साहस वाली महिला माना जाता है डर गई थी उनके आन्दोलन से और आपातकाल की घोषणा कर दी थी। 19  महीने तक देश का लोकतंत्र कैद था एक व्यक्ति की कुर्सी की चाहत के कारण। कांग्रेस लाख चाहे ये काला दाग मिट नहीं सकता उसके दामन पर लगा हुआ। ये अलग बात है कि  उस आन्दोलन में ऐसे भी लोग शामिल हो गये थे जिनको आगे जा कर खुद सत्ता प्राप्त कर वही सब ही करना था। लालू यादव और मुलायम सिंह जैसे लोग होते हैं जिनको अपने स्वार्थ सिद्ध करने होते हैं। वे तब भ्रष्टाचार और परिवारवाद का विरोध कर रहे थे लेकिन आज खुद वही करने लगे हैं।

    मगर जे पी जी का सम्पूर्ण क्रांति का ध्येय तब भी सही था और आज भी उसकी ही ज़रूरत है। शायद आज और अधिक ज़रूरत है क्योंकि तब केवल बिहार और दिल्ली की सरकार की बात थी जब कि आज हर शाख पे उल्लू बैठा है। मगर आज के नवयुवकों को ये बताना बेहद ज़रूरी है कि नायक वो होते हैं जो पद को कुर्सी को ठोकर मरते हैं उसूलों की खातिर। देश के सर्वोच्च पद के लिए इनकार कर दिया था जयप्रकाश नरायण जी ने।

आज है कोई जो सत्ता को नहीं जनहित को महत्व दे। आज उनको याद किया जाना चाहिए , उनसे सबक सीख सकते हैं आम आदमी पार्टी के लोग कि वही सब फिर न दोहराया जा सके। भ्रष्टाचार के विरोध की बात कर सत्ता पा कर खुद और ज्यादा भ्रष्टाचार करने लगें। इधर लोग दो लोगों को भगवान कहने का काम करते हैं अक्सर। लेकिन उन दोनों तथाकथित भगवानों की  दौलत की चाहत थमने का नाम ही नहीं ले रही। क्या भगवान ऐसे होते हैं , भगवान देते हैं सब को , अपने लिए कुछ नहीं चाहिए उसको। मुझे किसी शायर के शेर याद आ रहे हैं।

इस कदर कोई बड़ा हो हमें मंज़ूर नहीं
कोई बन्दों में खुदा हो हमें मंज़ूर नहीं।

रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की अगर
चाँद बस्ती में उगा हो हमें मंज़ूर नहीं।

मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना
आपकी एक अदा हो हमें मंज़ूर नहीं।  
 

 

अक्टूबर 09, 2013

POST : 368 सच्चे प्यार की बात ( आलेख ) डा लोक सेतिया

         सच्चे प्यार की बात  ( आलेख ) डा लोक सेतिया

   एक कहानी है । इक सन्यासी की कुटिया के सामने एक नौजवान युवक रहता था । इक दूध बेचने वाली दोनों को रोज़ दूध देने आया करती थी । साधू सारा दिन हाथ में माला लेकर प्रभु नाम का जाप किया करता । साधू को अचरज हुआ देख कर कि  दूध बेचने वाली जब उसको दूध देती तो माप तोल कर लेकिन उस नवयुवक के बर्तन में बिना माप तोल किये ही डाल दिया करती है । एक दिन साधू ने पूछ ही लिया कि आप उसका हिसाब किस तरह रखती हो , आप तो कभी देखती ही नहीं कि कितना डाला नवयुवक के बर्तन में आपने । दूध बेचने वाली का जवाब था कि मैं उसको प्यार करती हूं ,उसके साथ कम ज़्यादा का हिसाब कैसे रख सकती हूं । उससे बदले में लेना नहीं मुझे कुछ भी । साधू को लगा कि एक दूध बेचने वाली जिसको प्यार करती है उसका कोई हिसाब नहीं रखती और मैं हूं कि जिस परमात्मा से प्यार करने की बात कहता हूं उसके नाम की माला गिनता रहता हूं । और उस साधू ने माला को फैंक दिया और कहा कि  माई आपने मुझे सच्चा प्यार क्या है ये सबक सिखलाया है मैं आपको अपना गुरु मानता हूं ।

       आज कहीं धर्म के नाम पर प्यार करने वालों का विरोध हो रहा है तो कहीं कुछ लोग प्यार का अर्थ समझे बिना किसी को सज़ा देते हैं कि उसने उनका प्यार स्वीकार नहीं किया । दोनों प्यार से अनजान हैं । कोई भी धर्म प्यार को गुनाह नहीं बताता है , पढ़ लो सभी ग्रन्थों को खोलकर । प्यार इबादत है खुदा है यही लिखा हुआ मिलेगा , बस यही नहीं लिखा कि प्यार है क्या । मगर हर कथा कहानी में प्यार की बात ही है । राधा मोहन का प्यार , मीरा श्याम का प्यार । शिव पार्वती की कथा किसको नहीं मालूम , एक जन्म में नहीं अगले जन्म में भी फिर से उसी शिव को वर बनाने की चाह । अब आप हिसाब लगाने लगोगे उनकी उम्र के अंतर का । फिर वही बात , प्यार में कोई भी हिसाब नहीं , किसी तरह का बंधन नहीं , कोई अनुबंध नहीं । मगर प्यार पा लेने का नाम नहीं है और जो पा लेने को ही प्यार समझता है उसको प्यार का अर्थ समझने को कई जन्म लेने होंगे । ये मैं नहीं कह रहा , फिल्म दो बदन की नायिका कहती है खलनायक को । एक और पुरानी फिल्म में नायिका के पति को जब उसके पुराने प्रेमी की बात पता चलती है तब नायिका बताती है प्यार का अर्थ । वो बोलती है कि हम साथ साथ पढ़ते थे और मुश्किल से कुछ मिंट ही मिलते थे मुलाकात करने को , अगर उस सारे वक़्त को जोड़ दें तो वो साड़े सात घंटे भी नहीं होंगे , लेकिन उन कुछ घंटो में मुझे जितना प्यार उससे मिला उतना तुमसे शादी के बाद साड़े सात सालों में भी नहीं मिला और उन साड़े सात घंटो में उसने मुझे कभी छुआ तक नहीं । अब आजकल के युवकों को कौन बतायेगा प्यार क्या है । उनको तो इस दौर की फ़िल्में सीरियल आदि कुछ और ही पढ़ा रहे हैं , विज्ञापन भी । वासना को प्यार कहना किसी अपराध से कम नहीं है । पुरानी फिल्मों में कितनी बार सच्चे प्यार को त्याग बतलाया गया । सच्चा प्यार आदमी को खुदा बना देता है , जो इन्सान को शैतान बनाये उसको प्यार नहीं कह सकते । दिल एक मंदिर ,हँसते ज़ख्म , सफ़र , ख़ामोशी जैसी फिल्मों में बताया गया कि  प्यार किसको कहते हैं । हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू , हाथ से छू के उसे रिश्तों का इलज़ाम न दो । सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो , प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो । यही है परिभाषा सच्चे प्यार की । अंत में एक प्रेम कहानी इस आज के युग की कुछ ही साल पुरानी ।

         महाराज कृष्ण जैन का नाम सुना होगा आपने भी । हरियाणा के अम्बाला में रहते थे , साहित्य के साधक थे , खुद ही नहीं लिखते थे बल्कि औरों को भी कहानी लिखना सिखाते थे पत्राचार द्वारा । और उर्मि जी जो मध्य प्रदेश में सरकारी सेवा में थी उनसे पत्राचार कर सीखा करती । एक बार शिमला जाते हुए उर्मि जी रस्ते में अम्बाला उनसे मिलने चली गई । देख कर हैरान हो गई कि जो पर्वतों की झरनों की बात और आशावादी बातें लिखता है वो वास्तव में जन्म से ही चल फिर नहीं सकता , एक कमरे तक सिमटी है दुनिया उसकी । आप सोच सकते हैं कोई ऐसे व्यक्ति से प्यार करे विवाह करे और जीवन भर उसका साथ नभाने के बाद भी उसके सपने को साकार करे । लेकिन उर्मि जी आज भी महाराज कृष्ण जैन जी के काम को जारी रखे हैं । कोई भी जाकर देख सकता है अम्बाला छावनी में जहाँ वो लेखन विद्यालय और साहित्य की पत्रिका निरंतर निकाल रही हैं ।

      बात शुरू की थी प्यार की । कोई करे तो सही सच्चा प्यार , जितनी बार चाहे , जिस जिस से , चाहे तो सारी दुनिया से । किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार , किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार , जीना इसी का नाम है । आओ आज संकल्प करें प्यार करने का सभी से सच्चे दिल से , मिटा दें दुनिया से नफरत का निशां ।
ये पोस्ट उर्मि कृष्ण जी को समर्पित करता हूं । 
 

 
 
 
 


 

अक्टूबर 08, 2013

POST : 367 कला निकली जब भी बिकने ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कला निकली जब भी बिकने ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मेला सजाया गया था रात
सज कर आई थी उसकी बरात
झूम झूम कर कला खुद नाची
फूलों की हो रही थी वो बरसात ।

सुबह था बदला सा नज़ारा
जो भी सजाया बिखरा था सारा
कला का ज़ख़्मी था पूरा बदन
बन कर अपने सब ने ही मारा ।

जाने था कैसा ये उसका सम्मान
जो बन गया जैसे हो कोई अपमान
फिर से वही तलवे चाटना सबके
बस दो पल की थी झूठी शान ।

किस बात पे थी यूं इतना इतराई
क्या नया थी तू ले कर आई
तेरा मोल लगाने लगे लोग
रो रो कह रही थी शहनाई ।

कल तक जिनको बुरा थी कहती
नहीं कभी जिनके घर में रहती
उनको ही अपना खुदा बनाया
हमने भी देखी उलटी गंगा बहती ।


खुद को किया है जिनके हवाले
करते निसदिन वो हैं घोटाले
उनको नज़र आता जिस्म नग्न
नहीं देखते पांव के कभी छाले ।

कला नहीं बाज़ार में कभी जाना
चाहे रूखी सूखी ही खाना
छूना मत गंदगी को भूले से
इन धोकों से खुद को है बचाना । 
 

 

POST : 366 गाता फिरे गली गली यही फ़कीर ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 गाता फिरे गली गली यही फ़कीर ( कविता )  डॉ लोक सेतिया

प्रति दिन युद्ध होता  है
दिल की चाह में 
और ईमान की राह में
हर दिन बुरे कर्म
करने के बाद
आदमी को याद दिलाता
है उसका ज़मीर
अभी कल ही तो
किया था मुझसे वादा
छोड़ देने का
सभी अपने बुरे कर्म
भूल कर क्यों आज फिर 
चले आये हो उसी मार्ग पर ।

कितनी बार पछतावा
होता है दिल को
हर शाम पीने के बाद
लगता है पीने वाले को
बड़ी ही नामुराद चीज़ है
मय भी मयखाना भी
सब लुटा है न कुछ भी
कभी भी मिल सका
छोड़ ही दे है कहता
ईमान इस महफ़िल को ।

तेरी गली को
कितनी बार अलविदा कहा
क्या क्या नहीं उम्र भर
सितम भी सहा
जनता हूं बेवफा
नाम है तेरा ही लेकिन
तेरे हुस्न के जादू का
हुआ ऐसा मुझपे असर
हार के सभी अपना
खेलता हूं फिर फिर जुआ ।

कितनी दौलत
पाप वाली जमा कर ली 
अपनी झोली पापों से
मैंने क्योंकर भर ली
हर सुबह जाकर
मांगता हूं खुदा से
मैं गिर रहा तूं ही
बचा ले आकर मुझको
शाम होते नहीं
कुछ भी याद रखता हूं
दिल है जो कहता
वही तो करता मैं हूं ।

अपने ईमान की
सुनता कब हूं मैं भला
रात दिन दिल के हूं
कहने पर बस  चला
अच्छी लगती हैं
राहें बुरी मेरे दिल को
खुद भंवर चुनता हूं 
छोड़ कर उस साहिल को
दिल के हाथों है  लुटता 
दुनिया का हर अमीर
गाता  रात दिन भजन
गली गली है इक फ़कीर । 



अक्टूबर 06, 2013

POST : 365 कीमत घर की ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

         कीमत घर की ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

   फिर वही पुराना ज़ख्म हरा हो गया है। सालों बाद फिर घर से बेघर होना पड़ रहा है। काश मेरा घर कालोनी की मुख्य सड़क पर न होता , अंदर किसी तंग गली में होता , जहां बाज़ार वाले इतनी बड़ी कीमत न लगा पाते कि मैं उसे बेचने को विवश हो जाता। कितनी मेहनत से कितने प्यार से इस घर को मैंने बनाया था। इसका आँगन , पेड़ पौधे ,हरी हरी बेलें जिन्हें सजाने में वर्षों तक दिन रात लगा रहा हूं। कितने साल लग गये थे मुझे ये छोटा सा घर बनाने में ,एक एक पैसा जमा कर एक एक इंट लगा कर कैसे बनाया था इस घर को ये कोई दूसरा कभी नहीं समझ सकता। आज जो लोग कह रहे हैं कि ये ख़ुशी की बात है जो तुम्हारे घर की कीमत इतनी हो गयी है कि  इस पैसे से तुम नई कालोनी में इस से बहुत बड़ा वा शानदार घर बना सकते या खरीद सकते हो , वे इस बात को नहीं समझ सकते कि मेरे लिये अपना घर क्या है और घर में और मकान में कितना अंतर है। घर बिक सकता है , खरीदा नहीं जा सकता। मकान खरीदना तो आसान है , उसे घर बनाने में उम्र बीत जाती है। अब मेरे पास बाक़ी उम्र ही कितनी है।

             पचास साल का नाता है इस घर से। देश के बंटवारे के बाद विस्थापित होकर जब इस शहर में आये थे तो सोचा भी न था कि कभी कहीं दोबारा अपना घर बना कर फिर से खुशहाल हो रह सकेंगे। फिर गली , मोहल्ला ,पास पड़ोस ,संगी साथी बन जायेंगे। फिर सब मिल जुल कर सुख दुःख बांटेगे , अपनापन नज़र आने लगेगा और धीरे धीरे विस्थापित होने की बात भूल कर जीने लगेंगे। पचास सालों में इस घर में बच्चों की किलकारियां गूंजी हैं , बच्चे खेलते खेलते बड़े हुए हैं , बरातें आईं हैं , डोलियाँ उठी भी  हैं बेटियों की और डोलियाँ आई भी हैं नयी दुल्हनों को लेकर। इस सब की गवाह है इस घर की दीवारें और गलियां। पचास सालों में यहाँ रहने वाले सभी लगने लगा है एक परिवार का हिस्सा हैं हम जैसे। सब के बच्चे अपने लगते हैं , हर घर का आँगन , हर इक खिड़की , इक इक दरवाज़ा पहचानता है हमें , हमारी हर आहट को। गली की एक एक इंट से पहचान है जैसे। क्या अब फिर कभी कहीं ऐसा कोई घर हम सभी बना सकेंगे। आजकल नयी विकसित हो रही आबादी में , जहां किसी को किसी से बात करने तक की फुर्सत नहीं , ऐसा घर कैसे बन सकता है वहां।

       क्यों मेरे इस घर का मोल इतना अधिक हो गया है कि सभी को लगता है इसको बेच देना ही बेहतर है। हम सभी के लगाव की प्यार की अपनेपन की कीमत कुछ भी नहीं। इंट पत्थर और लकड़ी से बने मकान की कीमत क्यों आदमी और उसकी कोमल भावनाओं से ज़्यादा हो गई है जो सभी अपने अपने घर यहाँ से बेच कर किसी दूसरी जगह जाने लगे हैं। पैसे की ताकत ने सब को कितना विवश कर दिया है , आज मुझे भी वही करना पड़ रहा है। कितना सोचा था कि भले बाकी लोग बेच दें मैं कभी नहीं बेचूंगा घर अपना। यहीं जीने यहीं मरने की ख्वाहिश अधूरी ही रहेगी। करते करते पूरी की पूरी कालोनी ने एक बाज़ार का रूप ले लिया है , अब तो यहाँ चैन से रहना मुश्किल लगने लगा है। बाज़ार का शोर ,भीड़ भड़ाका , वाहनों का चोबीस घंटे गुज़रना , इस सब ने क्या से क्या कर दिया है। लगता है अब शांति और चैन नहीं मिलेगा कभी , इतने पैसों से भी हम वो नहीं हासिल कर सकेंगे कभी फिर से। अब वो साहस भी नहीं बचा कि  किसी वीरान जगह को फिर से आबाद कर सकें। कितनी बार कोई घर बनाता रहे और उसको छोड़कर जाने का दर्द सहता रहे।

         दोनों बेटे कहते हैं कि उनको अपने अपने दफ्तर के , अपने कारोबार की जगह के नज़दीक फ्लैट लेना है। बेटी को भी अपना अलग घर बनाना है सास ससुर से अलग जिसमें पति पत्नी रह सकें। मेरी धर्म पत्नी भी हर माँ की तरह सोचती है कि अपना क्या है हम कैसे भी कहीं भी रह लेंगे मगर बच्चों को जो भी चाहिए उनको दिलवा सकें। मैं भी सोचता हूं , कितना जीना है अब , रह लेंगे कहीं भी किसी तरह। बच्चों को उनके अपने घर तो बनवा देते हैं। डीलर हिसाब लगा कर सब समझा गया है , इस एक घर को बेचकर हम तीन फ्लैट खरीद सकते हैं। अब मेरे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा , चाहूं न चाहूं , यही करना ही होगा। हमें प्रसन्नता होगी कि  सब बच्चों के अपने घर बन गये हैं। उन तीनों के फ्लैटों में हम बाकी उम्र शायद यही तलाश करते रहें कि  इनमें हमारा अपना घर कौन सा है। डीलर बता रहा था कि जल्दी ही इन फ्लैटों के भी दाम आसमान को छूने लगेंगे। मेरी तो यही कामना है कि कभी किसी के घर की कीमत इतनी भी न बढ़ जाये कि वो उसमें रह ही न सके , उस अपने घर को बेचने को मज़बूर हो जाये। कम से कम मेरे बच्चों को बेघर होने के दर्द का तो कभी एहसास नहीं हो। दुआ कर रहा हूं। आमीन। 

अक्टूबर 04, 2013

POST : 364 हुस्न वालो हुस्न की सुनो कहानी ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

हुस्न वालो  हुस्न की सुनो कहानी ( हास्य कविता )  डॉ लोक सेतिया 

किसलिये परेशान है , पूरा किया अरमान है
जादू चले तेरे हुस्न का , पाया यही वरदान है
सब देखते हैं प्यार से , पाना सभी हैं चाहते
खुद मांगती थी यही , क्यों बन रही नादान है ।

कहानी बड़ी पुरानी , सुनाती थी सबकी नानी
औरत बना खुदा से , हुई थी इक नादानी
अपनी तराशी मूरत पे , वो हो गया था आशिक
बस तभी से हर नारी , करती है सदा मनमानी ।

खुदा को खुश किया था , चाहा जो वर लिया था
मेरे हुस्न पर सब फ़िदा हों , कहते दिलरुबा हों
हर बात मेरी मानें , मेरा झूठ भी सच जानें
मेरे हुस्न का जादू , क्या है न कोई पहचाने ।

सब बात मान ली थी , इक बात थी बताई
सब तुझ पे आशिक हों , न खुद पे आप होना
खुद को हसीन समझा , तो उम्र भर को रोना
अपनी नज़र से बचना , इसमें तेरी भलाई ।

ये बात हर नारी को , न कभी याद है आती
खुद देखती आईना , खुद से भी शर्माती
सजती और संवरती , कर कर जतन कितने
मुझसे हसीं न हो और , सोच कर ये घबराती ।

सजने संवरने में वो , भूली खुदा की बात है
चार दिन की चांदनी , फिर अँधेरी रात है
उम्र छिपाती है अपनी , अपने ही आशिक से
चालीस की होने पर है , अभी तीस ये बताती ।

तेरी नज़र का जादू अब , कितने दिन है बाकी
मय छोड़ दे ज़माना , ऐसे पिलाओ तुम साकी
दिल को संभालें कैसे , हम तो सिर्फ आदमी हैं
तुझ पर हुआ था आशिक , खुदा में रही कमी है ।

सारी हसीनों से सब आशिक , फरियाद कर रहे
हमको बचा लो तुम ही , तुम पे ही सब मर रहे
ये सोच लो बिन हमारे , बहुत ही पछताओगी
कब तक खुद को खुद ही , देख दिल बहलाओगी । 
 

  

सितंबर 17, 2013

POST : 363 निभा सको अगर करना मुहब्बत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 निभा सको अगर करना मुहब्बत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

मैं नहीं जानता 
क्या तुम
कोई अप्सरा हो
स्वर्ग की
मेनका की तरह ।

मगर मुझे
मालूम है
मैं कोई विश्वामित्र
नहीं हूं
मैं कोई तपस्या
नहीं कर रहा था
किसी इंद्रलोक का
राज पाने के लिये ।

मैं तो इक इंसान हूं
धरती की दुनिया का
और तमाम उम्र
तरसता रहा मैं  
किसी के प्यार को
तुम मिल गई मुझे
यूं ही सरे राह चलते
और में आवाक
देखता रह गया तुम्हें ।

अपनी तकदीर पर
भरोसा नहीं मुझको
छलती रही है मुझे
बार बार उम्र भर
डरता रहा हूं मैं
खूबसूरत अपसराओं से ।

खुद को नहीं समझा
इस काबिल कभी मैंने
कि कोई अप्सरा
मुझसे करने लगे प्यार
टूटा हूं जाने कितनी बार
ज़माने की बेवफाई से ।

अब के टूटा तो
बिखर ही जाऊंगा
रेत के घर जैसा
इसलिये किसी भी
प्यार के बंधन में
बंधने से पहले
चाहता हूं पूछना
अपना सवाल ।

फिर तुम से इक बार
क्या वास्तव में
तुमको मुझसे
हो गया है सच्चा प्यार
मुझे नहीं रहा खुद पर
तुमको तो है न 
अपने पर ऐतबार ।

चाहो तो अभी आज 
मुझे बेशक
कर दो इनकार
निभा सको हमेशा
तभी करना
प्यार का इज़हार । 
 

 

सितंबर 11, 2013

POST : 362 धुंधली धुंधली यादें ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

        धुंधली धुंधली यादें ( कविता )  डॉ लोक सेतिया

क्या क्या लिखा था
हर इक वर्क पर
कितने बरसों तक
रखी थी संभाल कर
अपनी निजि डायरी मैंने ।

कितनी कवितायें
कितनी ग़ज़ल
कितने नाम
कितनी तारीखें
कितनी प्यार की बातें ।

इक इक शब्द में
छुपी हुई थी कोई
जीवन की कहानी
जो जानता था मैं
और जानता नहीं था
कोई भी दूसरा ।

पढ़ भी लेता अगर
समझ नहीं पाता कभी
छुपे हैं उनमें मेरे
कैसे कैसे मधुर एहसास
कभी पढ़ ही कहां पाया
लिखा हुआ था सब
जिसके भी नाम
मेरा हर पैग़ाम ।

सब का सब
मिट गया
मिटा दिया
सभी कुछ
आंसुओं ने मेरे
बह कर
धुंधला धुंधला
अभी भी
नज़र आता है
लिखा हुआ
शब्द कोई कहीं कहीं
मेरी धुंधली
यादों की तरह ।
 

 

अगस्त 26, 2013

POST : 361 परीक्षा प्रेम की ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 परीक्षा प्रेम की  ( कविता  )  डॉ लोक सेतिया 

उसने कहा है
मुझे लाना है
नदी के उस पार से
इक फूल उसकी पसंद का ।

मगर नहीं पार करना
तेज़ धार वाली गहरी नदी को
उस पर बने हुए पुल से
न ही लेना है सहारा
कश्ती वाले का ।

मालूम है उसे भी
नहीं आता है तैरना मुझको
अंजाम जानते हैं दोनों
डूबना ही है आखिर
डर नहीं इसका
कि नहीं बच सकूंगा मैं
दुःख तो इस बात का है
कि मर के भी मैं
पूरी नहीं कर सकूंगा
अपने प्यार की
छोटी सी अभिलाषा ।

परीक्षा में प्यार की
उतीर्ण नहीं हो सकता
मगर दूंगा अवश्य
अपने प्यार की
परीक्षा मैं आज । 
 

 

अगस्त 23, 2013

POST : 360 सबक ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

     सबक ( कविता ) - डॉ लोक सेतिया 

जीवन का तुम्हारे
कुछ बुरा वक़्त हूं
आया हूं मगर
नहीं रहूंगा हमेशा
चला जाऊंगा मैं जब
लौट आयेगा अच्छा वक़्त ।

मुझे देख कर तुम
घबराना मत कभी
सीखना सबक मुझसे
आ जायेगा तुमको
पहचानना अपने पराये को ।

भूल मत जाना मुझे
मेरे जाने के बाद भी
याद रखना हमेशा
निभाया साथ किसने
छोड़ गया कौन इस हाल में ।

खोना मत कभी उनको
हैं जो आज तुम्हारे साथ
गये चले जो छोड़कर
मत करना उनका इंतज़ार
कभी आयें जो वापस
फिर नहीं करना ऐतबार । 
 

 

अगस्त 20, 2013

POST : 359 हक़ नहीं खैरात देने लगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हक़ नहीं खैरात देने लगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हक़ नहीं खैरात देने लगे
इक नई सौगात देने लगे ।

इश्क़ करना आपको आ गया
अब वही जज़्बात देने लगे ।

रौशनी का नाम देकर हमें
फिर अंधेरी रात देने लगे ।

और भी ज़ालिम यहां पर हुए
आप सबको मात देने लगे ।

बादलों को तरसती रेत को
धूप की बरसात देने लगे ।

तोड़कर कसमें सभी प्यार की
एक झूठी बात देने लगे ।

जानते सब लोग "तनहा" यहां
किलिये ये दात देने लगे । 
 

 

अगस्त 12, 2013

POST : 358 चाहत प्यार की ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       चाहत प्यार की  ( कविता  )  डॉ लोक सेतिया 

दूर दूर तक फैली है
नफरत की रेत यहां 
सब भटक रहे हैं
इक जलते हुए रेगिस्तान में
प्यार के अमृत कलश की
है सभी को तलाश ।

मिलती है हर किसी को
हर दिन हर पल नफरत
मिलता है इस जहां में
केवल तिरिस्कार ही तिरिस्कार
भाग जाना चाहता है हर कोई
इस दुनिया से किसी दूसरी दुनिया में ।

मगर नहीं मालूम किसी को भी
ऐसे किसी जहान का पता
मिल जाये जहां पर सभी को
कोई एक तो अपना उसका
जिससे कर सके प्यार और स्नेह की
पल दो पल को ही सही  कुछ बातें ।

भर चुका है सभी का मन
झूठे दिखावे की रिश्ते नातों की बातों से
जी रहे हैं घुट घुट कर लोग
अपनी अपनी इस पराई दुनिया में
बिना किसी का सच्चा प्यार पाये ।

दम घुटता है
सांसें टूटती हैं
धुंधली नज़रों को नहीं आता
कुछ भी नज़र कहीं पर भी
यूं ही ढोये जा रहे हम सब
बोझ अपने अपने जीवन का
बस इक प्यार की चाहत में
तमाम उम्र । 
 

 

अगस्त 06, 2013

POST : 357 अब लगे बोलने पामाल लोग ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

अब लगे बोलने पामाल लोग ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

अब लगे बोलने पामाल लोग 
देख हैरान सब वाचाल लोग ।
 
कौन कैसे करे इस पर यकीन 
पा रहे मुफ़्त रोटी दाल लोग ।

ज़ुल्म सहते रहे अब तक गरीब 
पांव उनके थे हम फुटबाल लोग ।

मुश्किलों में फंसी सरकार अब है
जब समझने लगे हर चाल लोग ।

कब अधिकार मिलते मांगने से
छीन लेंगे मगर बदहाल लोग ।

मछलियां तो नहीं इंसान हम हैं  
रोज़ फिर हैं बिछाते जाल लोग । 

कुछ हैं बाहर मगर भीतर हैं और
रूह "तनहा" नहीं बस खाल लोग । 
 
पामाल =  दबे कुचले  
 
वाचाल = बड़बोले 



अगस्त 05, 2013

POST : 356 जाना था कहाँ आ गये कहाँ ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 जाना था कहाँ आ गये कहाँ  ( कविता  ) डॉ लोक सेतिया

ढूंढते पहचान अपनी
दुनिया की निगाह में , 

खो गई मंज़िल कहीं 
जाने कब किस राह में , 

सच भुला बैठे सभी हैं
झूठ की इक चाह में ।

आप ले आये हो ये
सब सीपियां किनारों से , 

खोजने थे कुछ मोती
जा के नीचे थाह में ,  

बस ज़रा सा अंतर है 
वाह में और आह में ।

लोग सब जाने लगे
क्यों उसी पनाह में ,

क्यों मज़ा आने लगा
फिर फिर उसी गुनाह में 

मयकदे जा पहुंचे लोग 
जाना था इबादतगाह में । 
 

 

जुलाई 30, 2013

POST : 355 आँगन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

   आंगन ( कविता )  डॉ लोक सेतिया 

ऊंचीं ऊंची दीवारें हैं घेरे हुए मुझे
बंद है हर रास्ता मेरे लिये
धूप आंधी सर्दी गर्मी बरसात
सब कुछ सहना पड़ता है मुझे ।

खिड़कियां दरवाज़े हैं सब के लिये
मेरे लिये है खुला आसमान
देख सकता हूं उतनी ही दुनिया
जितनी नज़र आती है
ऊंची ऊंची दीवारों में से
दिखाई देते आकाश से ।

खुलते हैं दरवाज़े और खिड़कियां
हवा के लिये रौशनी के लिये
सभी कमरों के मुझ में ही आकर
जब भी किसी को पड़ती है कोई ज़रूरत ।

रात के अंधेरे में तपती लू में
आंधी में तूफान में
बंद हो जाती है हर इक खिड़की
नहीं खुलता कोई भी दरवाज़ा ।

सब सहना होता है मुझको अकेले में
सहना पड़ता है सभी कुछ चुप चाप
मैं आंगन हूं इस घर का
मैं हर किसी के लिये हूं हमेशा
नहीं मगर कोई भी मेरे लिये कभी भी । 
 
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जुलाई 27, 2013

POST : 354 अभ्यस्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      अभ्यस्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

परेशान थी उसकी नज़रें
व्याकुल थी देखने को
मेरी टूटती हुई सांसें ।

मैं समझ रहा था
बेचैनी उसकी
देख रहा था
उसकी बढ़ती हुई घबराहट ।

वक़्त गुज़रता जा रहा था
और उसके साथ साथ
बदल रहा था हर पल
उसके चेहरे का रंग ।

मुझे दिया था भर कर
अपने हाथों से उसने
जब विष का भरा प्याला
और पी लिया था
चुपचाप मैंने सारा ज़हर ।

उसके साथ साथ मैं भी
कर रहा था इंतज़ार मौत का
पूछा था सवाल उसने
न जाने किस से
मुझसे अथवा खुद अपने आप से
नहीं क्यों हो रहा है
उसके दिये ज़हर का
कोई भी असर मुझपर ।

समझ गया था मैं लेकिन
किस तरह समझाता उसे
उम्र भर करता रहा हूं
प्रतिदिन विषपान मैं
दुनिया वालों की
सभी अपनों बेगानों की
बातों का जिन में भरा होता था 
नफरत के ज़हर का ।

अभ्यस्त हो चुका हूं
विषपान का कब से
तभी कोई भी ज़हर अब मुझ पर
नहीं करता है कुछ भी असर ।  
 

 
 
 

जुलाई 14, 2013

POST : 353 कविता को क्या होने लगा है आज ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कविता को क्या होने लगा है आज ( कविता  )   डॉ लोक सेतिया

रात कविता सुन रहा था मैं
घर में बैठा
टीवी पर बन दर्शक ।

सुना रहा था कोई कवि
कविता व्यंग्यात्मक
देश की दशा पर
बात आई थी
देश में नारी की अस्मत लुटने की ।

और टीवी कार्यक्रम में
शामिल सुनने देखने वाले
कह रहे थे
वाह वाह क्या बात है ।

कोई झूमता नज़र आ रहा था
जब कह रहा था कवि
बेबसी  भूख विषमता की बात ।

मेरे भीतर का कवि रो रहा था
देख कर ऐसी संवेदनहीनता
अपने सभ्य समाज की ।

और सोच रहा हूं
क्या इसलिये लिखते हैं
हम कविता  ग़ज़ल
लोगों का मनोरंजन कर
वाह वाह सुनने के लिये ।

या चाहते हैं जगाना संवेदना
सभी सुनने वालों
कविता पढ़ने वालों में
समाज में बढ़ रहे
अन्याय अत्याचार आडंबर के लिये ।

भला कैसे कोई हंस सकता है
नाच सकता है
गा सकता है मस्ती में
किसी के दुःख दर्द की बात सुन ।

कविता में गीत में ग़ज़ल में
क्यों असफल होती लग रही है
आज के दौर की ये नयी कविता
सुनने वाले , पढ़ने वाले में
मानवीय संवेदना के भाव
जागृत करने के
अपने वास्तविक कार्य में । 
 

 

जुलाई 10, 2013

POST : 352 तुम्हारी विजय , मेरी पराजय ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

तुम्हारी विजय , मेरी पराजय ( कविता )  डॉ लोक सेतिया

छल कपट झूठ धोखा
सब किया तुमने क्योंकि
नहीं जीत सकते थे कभी भी
तुम मुझसे
इमानदारी से जंग लड़कर ।

इस तरह
तुमने जंग लड़ने से पहले ही
स्वीकार कर ली थी
अपनी पराजय ।

मैं नहीं कर सका तुम्हारी तरह
छल कपट कभी किसी से
मुझे मंज़ूर था हारना भी
सही मायने में
इमानदारी और उसूल से
लड़ कर सच्चाई की जंग ।

हार कर भी नहीं हारा मैं
क्योंकि जनता हूं
मुश्किल नहीं होता
तुम्हारी तरह जीतना
आसान नहीं होता हार कर भी
हारना नहीं अपना ईमान । 
 

 

जुलाई 09, 2013

POST : 351 झूठ वाला पर कदे नां अखबार बणना ( पंजाबी ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

     झूठ वाला पर कदे नां अखबार बणना ( पंजाबी ग़ज़ल )

                          डॉ  लोक सेतिया

कुझ वी भांवें होर बंदे सौ वार बणना
झूठ वाला पर कदे नां अखबार बणना ।

दुश्मनी करना बड़ा सौखा कम है लोको
पर बड़ा औखा है हुंदा दिलदार बणना ।

राह मेरी रोक लैणा मैं भुल न जावां
मैं नहीं भुल के कदीं वी सरकार बणना ।

लोक तैनूं जाणदे हन सौ झूठ बोलें
सिख नहीं सकिया किसे दा तूं यार बणना ।

हर किसे दे नाल करदा हैं बेवफाई
कम अदीबां दा नहीं इक हथियार बणना ।

नावं चंगा रख के कीते कम सब निगोड़े
सोच लै हुण छड वी दे दुहरी धार बणना ।

शौक माड़ा हर किसे दे दिल नूं दुखाणा
आखदे ने लोक मंदा हुशियार बणना । 
 

 
 


 

POST : 350 मंगण तां अग तू आई ते चुल्ले दी मालक बण बैठी ( एक पंजाबी कविता ) डॉ लोक सेतिया

         मंगण तां अग तू आई ते चुल्ले दी मालक बण बैठी            

                   इक पंजाबी कविता - डॉ लोक सेतिया

मंगण तां अग तू आई ते चुल्ले दी मालक बण बैठी
तैनू सी भैन बणाया मैं तू मेरी ही सौतण बण बैठी ।

खसमां नूं अपणे खाण दी गंदी हे आदत वी तेरी
छडिया ना इक वी घर जिसने इनी डायन बण बैठी ।

भौरा वी अपणे कीते ते आई न तैनू शरम कदे
तेरा हथ पकड़िया जिस जिस ने सभ दे सर चढ़ बैठी ।

जाणदी एं की करदी हें अपणे आप नू वेखा है कदी
माड़े माड़े करमां नाल वेख आपणी झोली भर बैठी ।

धुप विच जिस रुख ने तैनू ठंडी ठंडी छां सी दित्ती
अपणे हथां नाल अज कटदी हैं उसदी तू जड़ बैठी ।

न कदे किसे दी होई तू छड आई एं सारियां नूं
किचड़ मिट्टी विच जा बैठी मिट्टी दे ढेले घढ़ बैठी ।  
 
 
 ਜਿੰਦਗੀ ਜਾਲੀ Punjabi kavita - ਮੇਰੇ ਜਜ਼ਬਾਤ

जुलाई 07, 2013

POST : 349 जीना सीखना है मैंने ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 जीना सीखना है मैंने ( कविता )   डॉ लोक सेतिया

मुझे याद है बचपन में
जब भी कोई कहता था
सब है ईश्वर
और भाग्य के हाथ में
मेरे मन में
उठा करते थे बहुत सवाल
जो पूछता था मैं
उन सभी से
जिनका काम था
फैलाना अंधविश्वास ।

लेकिन जैसे जैसे बड़ा हुआ
मैं भी बन ही गया
उसी भीड़ का ही हिस्सा
और अपनी हर मुश्किल
हल करने के लिये
करने लगा
भरोसा भाग्य का
और देवी देवताओं का ।

खुद पर नहीं रह गया
मुझको यकीन
करने लगा जाने क्या क्या
ईश्वर को प्रसन्न करने को
अपना भाग्य बदलने को ।

मुश्किलें ही मुश्किलें
मिलीं हैं उम्र भर मुझे
ज़िंदगी कभी आसान हो न सकी
मेरे ऐसे हर दिन किये
ऐसे सभी प्रयासों से ।

दुआ मेरी आज तक
नहीं ला सकी कुछ भी असर
हुआ नहीं आज तक
किसी समस्या का कभी
समाधान भाग्य भरोसे
न ही ईश्वर को
प्रसन्न करने को की बातों से ।

आज सोचता हूं फिर से वही
बचपन की पुरानी बात
किसलिये वो सभी हैं परेशान
जो करते हैं तेरी पूजा अर्चना
हरदम रहते हैं डरे डरे
तुझसे हे ईश्वर
करते हैं विश्वास
कि सब अच्छा करते हो तुम
जबकि कुछ भी
नहीं अच्छा होता आजकल ।

सीखा नहीं अभी तक
जीने का सलीका हमने
समझना होगा आखिर इक दिन
सब करना होगा अपने आप
जूझना होगा मुश्किलों से
समस्याओं से  परेशानियों से
और लेना होगा ज़िंदगी का मज़ा ।

खुद पर
अपने आत्मविश्वास पर
कर भरोसा
भाग्य और ईश्वर के भरोसे कब तक
पाते रहेंगे
बिना किये जुर्मों की
हम सज़ा । 
 

 

जुलाई 04, 2013

POST : 348 कलम के कातिल ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कलम के कातिल ( कविता )  डॉ लोक सेतिया 

आपके हाथ में रहती थी मैं
लिखा निडरता से हमेशा ही सत्य
नेताओं का भ्रष्टाचार
प्रशासन का अत्याचार
समाज का दोहरा चरित्र
सराहा आपने
अन्य सभी ने मेरी बातों को
प्रोत्साहित किया मुझे
आपने अपने अंदर दी जगह मुझे
मैं समझने लगी खुद को हिस्सा आपका
मेरी आवाज़ को अपनी आवाज़ बनाकर
मेरी पहचान करवाई दुनिया से
मेरे सच कहने के कायल हो
मुझे चाहने लगे लोग
जो कल तक अनजान थे मुझसे ।

आपका दावा रहा है सदा ही
निष्पक्षता का
विचारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी का
मैंने आपकी हर बात पर
कर लिया यकीन
और कर बैठी कितनी बड़ी भूल
आपके कड़वे सच को लिखकर
आपसे भी बेबाक सच कहने की
मगर आप नहीं कर सके स्वीकार
जीत गया आपका झूठ
मेरा सच
सच होते हुए भी गया था हार ।

आपने तोड़ डाला मुझे
सच लिखने वाली कलम को
और दिया फैंक चुपके से अपने कूड़ेदान में
आपने क़त्ल कर दिया मुझे
सच लिखने के अपराध में
मैं अभी भी हर दिन
सिसकती रहती हूं
आपके आस पास
मुझे नहीं दुःख
अपना दम घुटने का
यही रहा है हर कलम का नसीब
ग़म है इसका
कि मुझे किया क़त्ल आपने
जिसको समझा था
मैंने अपना रक्षक
सोचती थी मैं उन हाथों में हूं
जो स्वयं मिट कर भी
नहीं मिटने देंगे मुझे
मगर अब
आप ही मेरे कातिल
क़त्ल के गवाह भी
और आप ही करते हैं
हर दिन मेरा फैसला
देते हैं बार बार
सच लिखने की सज़ा
मैं करती हूं फरियाद
अपने ही कातिल से
रहम की मांगती हूं भीख
मैं इक कलम हूं
सच लिखने वाले
बेबस किसी लेखक की । 
 

 

जून 26, 2013

POST : 347 नहीं मिला तुम सा कोई ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 नहीं मिला तुम सा कोई ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

तुन्हें अच्छा लगता था
कोई और
जिसके प्यार में
तुमने छोड़ दिया
मुझे ही नहीं
सारी ही दुनिया को भी ।

बेरुखी से तुम्हारी
तड़पता रहा मैं
रात दिन बहाता रहा अश्क
तुम्हारे प्यार में मैं बरसों ।

कर दिया हालात ने
जुदा हम दोनों को
मगर दिल से नहीं हुए कभी
हम इक दूजे से जुदा उम्र भर ।

अब नहीं हो तुम
अपनी दुनिया में
अब नहीं हो तुम
किसी दूजे की दुनिया में
छोड़ कर चले गये
इस जहां को तुम
अलविदा कहे बिना किसी से
मगर फिर भी रहते हो
मेरे दिल की
दुनिया में  सदा तुम ।

तुम्हें भी कुछ नहीं मिल सका
कभी किसी से
उम्र भर दुनिया में
मैं भी नहीं बसा सका
बिना तुम्हारे
अपने ख्वाबों की
कहीं कोई दुनिया ।

आज
अकेला बैठा सोचता हूं
हम दोनों फिर से
मिलें शायद एक बार
अगले किसी जन्म में
और बसायें
अपना प्यार का कोई जहां
जिसमें दूजा कोई भी नहीं हो
मेरे और तुम्हारे सिवा मेरे दोस्त । 
 

 

जून 24, 2013

POST : 346 बिना मंजिल का सफ़र है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

बिना मंज़िल का सफर है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

दौड़ रहे हैं
सभी दौड़ रहे हैं
क्यों  किसलिये
नहीं जानते
कहां जा रहे हैं
क्यों जा रहे हैं
फुर्सत नहीं है 
किसी को सोचने की
बस हर किसी को
यही  डर है
कहीं पीछे न रह जायें हम
सभी को सब से
आगे निकलना है ।

कौन सी मंज़िल है
कौन सा रास्ता
किसका साथ है
छूट गया क्या क्या कैसे
नहीं जानता कोई भी
अपना अंजाम
बस भाग रहे हैं
तेज़ और तेज़
वक़्त से आगे
निकलना है सभी को
जीवन भर
भागते जाना है
बेमकसद
इस अंधी दौड़ में
छूट गया जीवन भी
हासिल कर लिया बहुत
बहुत अभी करना है
अंत में मिलनी है
हर किसी को
दो गज़ ज़मीन
भागते भागते
निकल जानी है
किसी दिन जान ।

विकास के नाम पर
विनाश की ओर जा रहे
मानवता के मूल्यों को
लोग सब बिसरा रहे
भौतिकता में
उलझे हैं हम
सुबह से शाम तक
रात को सुबह बताते
दिन को रात बता रहे
जानते हैं
समझते हैं
सही नहीं दिशा हमारी
मगर नासमझने को
समझदारी मानते
जो नहीं आया
खुद को भी अभी तक समझ
वही सबक लोग सब
औरों को समझा रहे ।

चल रहे हैं लोग
ऐसी राह पर
जिस पर नहीं है
कोई भी मंज़िल कहीं
ख़त्म हो सकती नहीं
ज़िंदगी की दूरियां
चाहते हैं सभी खोजना
अपनी अपनी ज़िंदगी
हो रहे हर पल
मगर हैं दूर सभी लोग 
अपनी ज़िंदगी से । 
 

 

जून 20, 2013

POST : 345 सितम रोज़ दुनिया के सहते रहेंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 सितम रोज़ दुनिया के सहते रहेंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सितम रोज़ दुनिया के सहते रहेंगे
नहीं पर शिकायत कभी कर सकेंगे ।

तेरा शहर गलियां तेरी छोड़ देंगे
नहीं अब कभी आपसे हम मिलेंगे ।

कहें और क्या हम यही बस है कहना
तुम्हें खुश रखे हम खुदा से कहेंगे ।

मिली ज़िंदगी मांगते मौत रहते
हैं ज़िन्दा नहीं हम , न हम मर सकेंगे ।

न कोई भी मंज़िल न कोई ठिकाना
चले रास्ते जिस तरफ चल पड़ेंगे ।

मेरे दिल के टुकड़े हज़ारों ही होंगे
किसी दिन तेरा तीर खाकर मरेंगे ।

बुझानी हमें प्यास "तनहा" सभी की
सभी जाम खाली हुए हम भरेंगे । 
 

 

जून 07, 2013

POST : 344 खुदा देखता तेरे गुनाह , डरना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खुदा देखता तेरे गुनाह , डरना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खुदा देखता  तेरे  गुनाह , डरना
सितमगर सितम की इन्तिहा न  करना ।

कई लोग फिसले , फिसलते गये हैं
वहीं पर खड़े हो , संभलकर उतरना ।

किये दफ़्न तुमने , जिस्म तो हमारे
बहेगा हमेशा प्यार का ये झरना ।

परिंदे यही फरियाद कर रहे हैं
किसी के परों को मत कभी कतरना ।

नहीं दूर अपनी मौत जानते हैं
किया पर नहीं मंजूर रोज़ मरना ।

बिना नीवं देखो बन गई इमारत
किसी दिन पड़ेगा टूटकर बिखरना ।

सुबह शाम "तनहा" देखकर के सूरज
हैं कहते, सिखा दो डूबकर उभरना । 
 

 

जून 06, 2013

POST : 343 कलयुगी भक्त , कलयुगी भगवान ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

 कलयुगी भक्त , कलयुगी भगवान ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

सभी धर्मों के ईश्वर
वहीं पर थे
सभी के सामने
लगी हुई थी
भक्तों की लंबी लंबी कतारें ।

सभी बढ़ा कर हाथ
दे रहे थे अपने भक्तों को आशीष
खुश हो रहे थे
पा कर ढेर सारा चढ़ावा ।

किसी को नहीं था मतलब
कौन है अच्छा और कौन बुरा
कोई नहीं दे रहा था
जैसे जिसके कर्म हों
उसको वैसा फल ।

देख कर चुप नहीं रह पाया
आखिर को वो था इक पत्रकार
छोड़ सभी को पीछे
चला आया था वो सबसे आगे
बढ़ा दिया अपना कैमरा
सामने उन सभी भगवानों के ।

और माइक पकड़
पूछने लगा उन सब से
अपने सवाल
ये क्या देख रहा हूं मैं
क्या कर रहे हैं सभी आप
सोचते नहीं -देखते नहीं ।

किसने किये कितने पुण्य
नहीं किसी को भी कह रहे
करते रहे कितने पाप।

मुस्कुराने लगे
सभी के सभी ईश्वर
सुन उसकी बात ।

फिर समझाया उसको
किस युग की करते तुम बात
कलयुग में नहीं
लागू हो सकते नियम
सत्य युग वाले ।

इस युग में खुली छूट है
लूट ले छीन ले
जैसे भी कमा ले
बस हर बार हमें याद रख
सर झुका चढ़ा चढ़ावा
खुश कर हमें ।

और फलने फूलने का
हमसे आशीष पा ले
पत्रकार हो  इतना नहीं जानते ।

कलयुग कैसे कलयुग रहेगा
अगर पाप ही नहीं रहेगा
पापियों के लिये ही है ये युग
इसमें पाप हमेशा ही बढ़ेगा । 
 
 विकट बाढ़ की करुण कहानी नदियों का संन्‍यास लिखा है - अदम गोंडवी | जखीरा,  साहित्य संग्रह

जून 03, 2013

POST : 342 बेहयाई हुनर हो गई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

बेहयाई हुनर  हो गई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '


बेहयाई ,  हुनर हो गई 
हर किसी को खबर हो गई । 

सर झुकाए हुए सब खड़े 
बेकसी इस कदर हो गई ।

इश्क़ के राज़ मत पूछना 
आशिक़ी दर - बदर हो गई । 
 
फिर अचानक मुलाकात इक 
कल  उसी मोड़ पर हो गई ।

आज नीची किसी की नज़र
क्यों हमें देख कर हो गई ।

हम अकेले खड़े थे मगर 
शायरी हमसफ़र हो गई ।  
 
उम्र ' तनहा ' बिता कर चले  
जुस्तजू  , बेअसर हो गई । 
 

 

जून 01, 2013

POST : 341 कह रहे कुछ लोग उनको भले सरकार हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     कह रहे कुछ लोग उनको भले सरकार हैं ( ग़ज़ल ) 

                     डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कह रहे कुछ लोग उनको भले सरकार हैं
तुम परखना मत कभी खोखले किरदार हैं ।

छोड़कर ईमान को लोग नेता बन गये
दो टके के लोग तक बन गये सरदार हैं ।

देखकर तूफ़ान को, छोड़ दी पतवार तक
डूबने के बन गये अब सभी आसार हैं ।

फेर ली उसने नज़र, देखकर आता हमें
इस कदर रूठे हुए आजकल दिलदार हैं ।

पास पहली बार आये हमारे मेहरबां
और फिर कहने लगे फासले दरकार हैं ।

हम समझते हैं अदाएं हसीनों की सभी
आपके इनकार में भी छुपे इकरार हैं ।

गैर जब अपने बने, तब यही ' तनहा ' कहा
ज़िंदगी तुझसे हुए आज हम दो चार हैं । 
 

 

मई 27, 2013

POST : 340 उड़ानें ख़्वाब में भरते , कटे जबसे हैं पर उनके ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     उड़ानें ख़्वाब में भरते , कटे जबसे हैं पर उनके ( ग़ज़ल ) 

                         डॉ लोक सेतिया "तनहा"

उड़ानें ख़्वाब में भरते , कटे जबसे हैं पर उनके
अभी तक हौसला बाकी , नहीं झुकते हैं सर उनके ।

यही बस गुफ़्तगू करनी , अमीरों से गरीबों ने
उन्हें भी रौशनी मिलती , अंधेरों में हैं घर उनके ।

उन्हें सूली पे चढ़ने का , तो कोई ग़म नहीं था पर
यही अफ़सोस था दिल में , अभी बाकी समर उनके ।

कहां पूछा किसी ने आज तक साकी से पीने को
रहे सबको पिलाते पर , रहे सूखे अधर उनके ।

हुई जब शाम रुक जाते , सुबह होते ही चल देते
ज़रा कुछ देर बस ठहरे , नहीं रुकते सफ़र उनके ।

दिये कुछ आंकड़े सरकार ने , क्या क्या किया हमने
बढ़ी गिनती गरीबों की , मिटा डाले सिफ़र उनके ।

हमारे ज़ख्म सारे वक़्त ने ऐसे भरे "तनहा"
चलाये तीर जितने सब हुए अब बेअसर उनके । 
 

 

मई 26, 2013

POST : 339 तन्हा राह का तन्हा मुसाफिर ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

 तन्हा राह का तन्हा मुसाफिर ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

जुड़ा था सभी कुछ
मेरे ही नाम के साथ लेकिन
ज़माने में नहीं था
कुछ भी कहीं पर भी मेरा
बहुत रिश्ते-नाते थे
मेरे नाम से वाबस्ता
मगर उनमें कोई भी
नहीं था मेरा अपना ।

रहने को इक घर
मिलता रहा उम्र भर मुझे
मैं रहता रहा वहां
मगर परायों की तरह
कहने को जानते थे
मुझे शहर के तमाम लोग
लेकिन नहीं किसी ने
पहचाना कभी मुझे ।

जो दोस्त बनाये
हुए न कभी मेरे अपने
दुश्मन भी मुझसे
दुश्मनी निभा नहीं पाये
साथ हमसफ़र चल नहीं सके
मंज़िल तलक
रहबर भी राह मुझको
दिखला नहीं सके ।

इख़्तियार मेरा खुद पर भी कहां था
अपने खिलाफ़ खुद हमेशा खड़ा रहा
अकेला था नहीं था
साया तक भी मेरा साथ
बस अपने आप से ही
बेगाना बन गया मैं ।  
 

 

मई 22, 2013

POST : 338 भुला नफरत सभी की हम मुहब्बत याद रखते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

    भुला नफरत सभी की हम मुहब्बत याद रखते हैं ( ग़ज़ल ) 

                    डॉ लोक सेतिया "तनहा"

भुला नफरत सभी की , हम मुहब्बत याद रखते हैं
सितम जितने हुए भूले इनायत याद रखते हैं ।

तुन्हें भेजे हज़ारों खत , मुहब्बत के कभी हमने
नहीं कुछ भेज पाये हम वही खत याद रखते हैं ।

हमेशा पास रखते हैं , तेरी तस्वीर को लेकिन
ज़माने से छिपाने की हिदायत याद रखते हैं ।

मुहब्बत में कभी कोई , शरारत की नहीं हमने
सताया ख्वाब में आकर शिकायत याद रखते हैं ।

बनेंगे एक दिन मोती , हमारी आंख के आंसू
तेरा दामन इन्हें पौंछे ये हसरत याद रखते हैं ।

किसी को बेवफ़ा कहना , हमें अच्छा नहीं लगता
निभाई थी कभी उसने भी उल्फ़त याद रखते हैं ।

तुम्हारी पास आने , दूर जाने की अदा "तनहा"
वो सारी शोखियां सारी नज़ाकत याद रखते हैं ।  
 

 

मई 04, 2013

POST : 337 बहुत ढूंढा जमाने में नहीं तुम सा मिला कोई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

    बहुत ढूंढा जमाने में नहीं तुम सा मिला कोई ( ग़ज़ल ) 

                        डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बहुत ढूंढा ज़माने में , नहीं तुम सा मिला कोई
तुम्हारे बिन नहीं सुनता , हमारी इल्तिजा कोई ।

इबादत छोड़ मत देना ,परेशां हाल हो कर तुम
यही रखना भरोसा बस , कहीं होगा ख़ुदा कोई ।

हुई वीरान जब महफ़िल , करोगे याद सब उस दिन
वही महफ़िल जमाता था ,कहां उठकर गया कोई ।

किया करते सभी से बेवफ़ाई जो हमेशा हैं
शिकायत क्यों उन्हीं को है नहीं उनका हुआ कोई ।

कभी कह हम नहीं पाये , कभी वो सुन नहीं पाये
शुरू कुछ बात जब करते , तभी बस आ गया कोई ।

छिपा कर इस जहां से तुम  इन्हें पलकों पे रख लेना
तुम्हारे अश्क मोती हैं ,  नहीं ये जानता कोई ।

खताएं भी हुई होंगी , कई हमसे यहां "तनहा"
सभी इंसान दुनिया में , नहीं है देवता कोई ।
 

 

अप्रैल 29, 2013

POST : 336 आखिरी तम्मना ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

आखिरी तम्मना ( नज़्म ) डॉ  लोक सेतिया

रात ख़्वाब में मुझसे खुदा ने कहा
तुम्हारे लिये है किसी ने मांगी दुआ
क्या चाहते हो मांगना सोचकर तुम
आज होगी पूरी हर इक इल्तजा ।

मुझसे ताउम्र तुम्हें शिकायत रही
आप खुद से रहते हो हमेशा ही खफ़ा
इबादत सीखी न आया माला जपना
फिर भी कर लो जो भी आरज़ू करनी ।

कहा मैंने पूछा है तो बस यही है कहना
ऐसी दुनिया में मुझे नहीं अब और रहना
जन्नत चाहिये न कोई दोज़ख ही मुझे
बात  है इक ज़रूरी पूरी उसको करना ।

बाद मरने के मुझे इक ऐसा जहां मिले
छोटा और बड़ा नहीं कोई भी जहां  हो
है कहां ऐसी जगह मुझको वो दिखा दो 
कोई परस्तार हो , न जहां कोई खुदा हो ।              ( परस्तार :::: उपासक ) 
 

 

अप्रैल 27, 2013

POST : 335 बड़ा ही मुख़्तसर उसका फ़साना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बड़ा ही मुख़्तसर उसका फ़साना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"  

बड़ा ही मुख्तसर उसका फसाना है
बना सच का सदा दुश्मन ज़माना है ।

इधर सब दर्द हैं उस पार सब खुशियां
चला जाये जिसे उस पार जाना है ।

कंटीली राह पर चलना यहां पड़ता
यही सबको मुहब्बत ने बताना है ।

गुज़ारी ज़िंदगी आया कहां जीना
नया क्या है वही किस्सा पुराना है ।

जिसे जब जब परख देखा वही दुश्मन
नहीं अब दोस्तों को आज़माना है ।

हमें सारी उम्र इक काम करना है
अंधेरों को उजालों से मिलाना है ।

ये सारा शहर बदला लग रहा "तनहा"
अभी वैसा तुम्हारा आशियाना है । 
 

 

अप्रैल 25, 2013

POST : 334 नहीं मालूम जिसको खुद पता अपना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       नहीं मालूम जिसको खुद पता अपना ( ग़ज़ल ) 

                     डॉ लोक सेतिया "तनहा"

नहीं मालूम जिसको खुद पता अपना
बना आये उसी को तुम खुदा अपना ।

बड़ी बेदर्द दुनिया में हो आये तुम
बनाना खुद पड़ेगा रास्ता अपना ।

न करना आरज़ू अपना बनाने की
यहां कोई किसी का कब हुआ अपना ।

तड़पना उम्र भर होगा मुहब्बत में
बहुत प्यारा नसीबा लिख दिया अपना ।

हमारा वक़्त कुछ अच्छा नहीं यारो
चले जाओ सभी दामन छुड़ा अपना ।

नहीं आता किसी के वार से बचना
ज़माने को लिया दुश्मन बना अपना ।

बतायें शर्त से होता है क्या  "तनहा"
लगाई शर्त इक दिन सब बिका अपना । 
 

 

अप्रैल 24, 2013

POST : 333 आज हर झूठ को हरा डाला ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आज हर झूठ को हरा डाला ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आज हर झूठ को हरा डाला
आईना सच का जब दिखा डाला ।

बन गये कुछ , लगे उछलने हैं
आपने आस्मां बता डाला ।

आपके सामने बसाया था
घर हमारा तभी जला डाला ।

धर्म वालो कहो किया क्या है
हर किसी को ज़हर पिला डाला ।

जिसपे दीवार को चुना इक दिन
आज पत्थर वही हटा डाला ।

मुस्कुराये लगे हमें कहने
आपके प्यार ने मिटा डाला ।

आज देखा उदास "तनहा" को
रुख से परदा तभी हटा डाला ।