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जनवरी 10, 2024

POST : 1772 धरती पर घर बनाया है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

         धरती पर घर बनाया है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

ख़ुद भगवान का सुन कर सर चकराया है 
इंसान ने धरती पर घर उसका बनवाया है 
सोने के किवाड़ हैं स्वर्गवासी हुए हैरान हैं 
धूप भी छाया लगती अजब ग़ज़ब रंग रूप है
जाने किस की माया है खोया जो पाया है ।
 
चिंता भगवान की बड़ी कौन समझ पाएगा 
इतनी कीमती चीज़ों को कोई जो चुराएगा
सुःख चैन पुजारियों का उड़ ही नहीं आएगा 
सुरक्षा करने वालों का ऐतबार नहीं कोई भी 
मुकदमा चला भी अंतिम निर्णय कब आएगा ।
 
सोने चांदी से बनते सजते कितने भगवान हैं 
मिट्टी जिनकी पहचान है वही सिर्फ इंसान हैं 
शीशे का महल उसका पत्थर से घबराता है 
हाथ ख़ाली थे सिकंदर देखा सभी ने आख़िर
नादान है व्यर्थ ही संचय करता सब सामान है ।
 
पढ़ पढ़ शिक्षक बने तनिक किया नहीं विचार 
होगा गहरे पैठना जिसको जाना भवसागर पार 
प्रेम की भाषा अच्छी जिस का हो शुभ विचार 
करुणा और विवेक से ख़ुद मिलते हैं भगवान 
आडंबर से झूठे अहंकार से है डूबा सब संसार ।  
 
अपने मन को मंदिर बनाओ तब होगा कल्याण 
अपने भीतर झांको तभी मिलते हैं प्रभु श्री राम
हमको नहीं है  पता किस का कैसा ज्ञान ध्यान 
रहा नहीं कोई भी शहंशाह और किसी का दरबार 
उपदेशक खुद मार्ग भटके देते सिर्फ व्याख्यान ।
 
हीरे मोती सोना चांदी और कितने सुंदर परिधान
हलवा पूरी भोग लगाएं कितने बना मधुर मिष्ठान 
उसको क्या , जिसने खाये झूठे शबरी के हों बेर
बाहर उजाला भीतर अंधेरा है वाह रे ओ नादान 
खोजा नहीं मिल जाते हैं कण-कण में हैं भगवान ।   
 
भगवान को किया है सावधान बता नियम कानून
इतना सोना कैसे हुआ हासिल ये मत जाना भूल 
बड़े बड़े लोगों की होती है घर दफ़्तर की तलाशी 
लक्ष्मी जी भी नहीं बचा पाती कि उनका है वरदान
शपथ-पत्र देना चाहिए नहीं ये सब मेरा साज़-सामान 
दुनिया क्या जाने कांटों संग रहते कैसे सुंदर फूल । 
 

 
 
 
  
 
 
 

मई 10, 2020

POST : 1290 नसीब में जो नहीं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

        नसीब में जो नहीं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

नहीं मिला बस कोई इक शख़्स 
जो चाहता समझना मुझे भी । 

खुशनसीब होते हैं दुनिया में वो 
जिनकी बात अच्छी लगती है ।  

मेरे नसीब में नहीं रहा कोई भी 
सुनता समझता कोई बात मेरी । 

खुद कहना भी अपनी बात को 
खुद समझना भी अपनी बात । 

बदनसीबी नहीं तो क्या है भला 
बस यही चाहा यही नहीं मिला । 

इक सन्नाटा कोई आवाज़ नहीं 
जाने ये कैसी है ज़िंदगी मेरी । 

इतनी लंबी ख़ामोशी जैसे कोई 
सदियों से भटकता रहे वीराने में । 

न कोई आहट न कोई चाहत ही 
इक मकसद बेमकसद सा है जैसे । 

सबका नसीब अपने जैसा न हो 
कुछ नहीं लिखा इस किताब में । 
 

 




सितंबर 04, 2017

POST : 731 हम सभी लोग ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

        हम सभी लोग ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

बेईमान लोग ।

झूठ के सहारे 
सच को हराकर 
धनवान बन गए।
बड़े पदों को पा लिया 
छल कपट धोखा कर सब से
ऊंची पायदान पर  हैं
बैठे भगवान बनकर ।

ईमानदार लोग ।

रात दिन जूझते बेईमानी से
मात खाते  हर बार
पल पल मरते हुए जी कर 
खुश हैं इस बात से कि 
किसी तरह अपना  बसर
कर रहे हैं बिना किसी तरह से
कोई भी समझौता किये । 

नासमझ लोग ।

बेईमान लोगों की जय
बोलकर सोचते हैं वही हैं 
देश समाज के रखवाले।
उन्हीं से चाहते हैं पाना 
सब कुछ अपने लिए जो 
कभी किसी को देते नहीं है 
कुछ भी वास्तव में । 

बदनाम लोग ।

कोई गुनाह नहीं किया
फिर भी सब को लगते हैं
मुजरिम हैं 
हर किसी को देते रहते हैं 
अपनी बेगुनाही के सबूत ।

कोई नहीं करता तब भी यकीन 
सफाई देना , बिना किये अपराध 
बना देता है गुनहगार उनको । 

नाम वाले लोग ।

खुद ही अपनी कीमत 
बढ़ा चढ़ा कर बाज़ार में 
बेचते हैं अपने आप को रोज़ ।

भीतर पीतल और बाहर है 
इक चमकती हुई सुनहरी परत 
सब खरीद रहे उन्हीं से सब 
वो भी जो नहीं रखा उनकी 
आलीशान सजी बड़ी बड़ी 
बाज़ार की दुकानों में । 
 

 

जुलाई 19, 2017

POST : 687 मैं साकी भी मैं सागर भी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

        मैं साकी भी , मैं सागर भी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

साकी ने प्यासे से नहीं पूछा मयकदे में
धर्म जाति या किस देश के वासी हो
सुराही ने पैमाने को भरते नहीं सोचा
मैं सोने की पीतल की जाम है कांच का ।

किसी पीने वाले ने समझी नहीं प्यास
कितनी है साकी के मन की सुराही की
भीतर कितनी रही है अधूरी हमेशा ही
जाम भी नहीं बुझा सके अपनी प्यास ।

नदी से नहीं पूछा सागर ने नाम पता
मैली है या साफ़ है नहीं डाली नज़र
बाहें फैला कर सब नदियों को अपनाया
लेकिन सागर का खारापन कहां मिट पाया ।

मेरा नाम मुहब्बत है ईमान है इश्क़
हर आशिक़ मेरे पास चाहत ही लाया
कब कौन किस मोड़ तक साथ रहा है
जब रात अंधेरी थी नहीं पास रहा साया ।

मैं फूल हूं खुशबू ही लुटाता मैं रहा हूं
हर हुस्न को हर दिन सजाता मई रहा हूं
मैं बारिश नहीं बस ओस की बूंद हूं मैं
सर्दियों को तुम धूप बुलाता मैं रहा हूं ।

परिंदा बैठा कभी मंदिर मस्जिद कभी
इंसानों को रास्ता भी दिखाया है मैंने
मुझको पिंजरे में कैद नहीं करना तुम
आज़ादी का परचम लहराना है मैंने ।
 

 

जुलाई 02, 2017

POST : 678 कलमकार की चाहत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

     कलमकार की चाहत (  कविता ) डॉ लोक सेतिया  

आपको किसी कवि से शायर से
किसी कथाकार से ग़ज़लकार से
हो गई है अगर मुहब्बत सच्ची
दर्द उसके अपने समझना ख़ुशी ।

शायद नहीं देगा वो महंगा उपहार
बस इक फूल देकर करेगा इज़हार
पर महक रहेगी उस फूल की सदा
आपको दिल की जगह लेगा बसा ।

उसकी कहानी शुरू तुमसे होगी
ग़ज़ल तुम्हीं पर कविता तुम होगी
हर लफ्ज़ में तुम्हारा नाम होगा
आशिक़ तेरा है क्यों बदनाम होगा ।

ज़माना कभी नहीं जान पाएगा राज़
लिखी उसने ज़माने की बता के बात
नहीं आपको मौत भी खत्म कर सकती
हर रचना में ज़िंदा रहेगी दोनों हस्ती ।

कभी मगर नहीं इक बात करना आप
उसकी रचनाओं को सौतन न समझना
बड़ी खूबसूरत जगह है प्यार वाली
रहती वहीं आप ख़ुशी खशी ही रहना ।
 

 


जून 12, 2016

POST : 510 फिर से इक बार ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    फिर से इक बार ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

हमारी आंखों पर
बंधी हुई थी कोई पट्टी ।

और हम कोल्हू के बैल बन कर
रात दिन चलते गये चलते गये
पहुंचे नहीं कहीं भी
थे चले जहां से रहे बस वहीं ही ।

सोच रहे हैं अब
उतार फैंकें इस पट्टी को
और चल पड़ें
नई राह बनाने को जीवन की ।

ताकि बर्बाद न होने पायें
बाकी बचे पल जीवन के ।

शायद अभी भी
अवसर है हमारे पास

कुछ फूल खिलाने का
कुछ दीप जलाने का

कोई साज़ बजाने का 
कोई गीत गुनगुनाने का । 
 

 

दिसंबर 08, 2014

POST : 471 रिश्तों की डोरी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

   रिश्तों की डोरी ( कविता ) डॉ  लोक सेतिया 

कभी देखा है
धागे जब उलझ जाते हैं
बहुत कठिन हो जाता है
उनको बचाकर अलग करना
ज़रा सा खींचा कोई धागा
टूट जाता है पल भर में
इक थोड़ा सा खींचने भर से ।

जीवन में रिश्ते नाते सभी
रहते हैं इक साथ ऐसे ही
हम सभी के अपने ही हाथों में
खोना नहीं चाहते हैं किसी को भी
मगर ज़रा सी भूल से हो जाता है
अक्सर ऐसा भी हम सभी से।

कोई इक रिश्ता उलझ जाता है
अपने किसी दूसरे रिश्ते से अचानक
नहीं आता सभी को ये काम
हर रिश्ते नाते को बचाकर रखना ।

मिलना जाकर किसी दिन इक बुनकर से
देखना उसको बुनते हुए धागों से
कितने रंग वाले कैसे कैसे होते हैं
सब को अपनी जगह पर रखता
सब को उतना ही कसता जितना ज़रूरी
सभी में रखता है थोड़ी थोड़ी सी दूरी ।

कोई धागा नहीं उलझने देता वो
टूटने नहीं देता इक भी धागा
और कभी कोई टूट भी जाता है
थोड़ा अधिक खींचने से अचानक
तब उसको अलग रखता दूसरे धागों से ।

गांठ नहीं लगता है कभी बुनकर
प्यार से उसी धागे के दोनों सिरे
फिर से मिला देता उनको कैसे
कभी टूटा ही नहीं था वो जैसे ।

दोस्तो सीखना सभी बुनकर से
प्यार मुहब्बत दोस्ती वाले सब रिश्ते
कैसे रखने हैं सभी हमने संभाल कर ।

और उस से बुनना है अपना जीवन
किसी खूबसूरत चादर की तरह
जिस में मिलकर हर धागा देता है
बहुत ही सुंदर शक्ल । 
 

 

अगस्त 23, 2013

POST : 360 सबक ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

     सबक ( कविता ) - डॉ लोक सेतिया 

जीवन का तुम्हारे
कुछ बुरा वक़्त हूं
आया हूं मगर
नहीं रहूंगा हमेशा
चला जाऊंगा मैं जब
लौट आयेगा अच्छा वक़्त ।

मुझे देख कर तुम
घबराना मत कभी
सीखना सबक मुझसे
आ जायेगा तुमको
पहचानना अपने पराये को ।

भूल मत जाना मुझे
मेरे जाने के बाद भी
याद रखना हमेशा
निभाया साथ किसने
छोड़ गया कौन इस हाल में ।

खोना मत कभी उनको
हैं जो आज तुम्हारे साथ
गये चले जो छोड़कर
मत करना उनका इंतज़ार
कभी आयें जो वापस
फिर नहीं करना ऐतबार । 
 

 

जुलाई 30, 2013

POST : 355 आँगन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

   आंगन ( कविता )  डॉ लोक सेतिया 

ऊंचीं ऊंची दीवारें हैं घेरे हुए मुझे
बंद है हर रास्ता मेरे लिये
धूप आंधी सर्दी गर्मी बरसात
सब कुछ सहना पड़ता है मुझे ।

खिड़कियां दरवाज़े हैं सब के लिये
मेरे लिये है खुला आसमान
देख सकता हूं उतनी ही दुनिया
जितनी नज़र आती है
ऊंची ऊंची दीवारों में से
दिखाई देते आकाश से ।

खुलते हैं दरवाज़े और खिड़कियां
हवा के लिये रौशनी के लिये
सभी कमरों के मुझ में ही आकर
जब भी किसी को पड़ती है कोई ज़रूरत ।

रात के अंधेरे में तपती लू में
आंधी में तूफान में
बंद हो जाती है हर इक खिड़की
नहीं खुलता कोई भी दरवाज़ा ।

सब सहना होता है मुझको अकेले में
सहना पड़ता है सभी कुछ चुप चाप
मैं आंगन हूं इस घर का
मैं हर किसी के लिये हूं हमेशा
नहीं मगर कोई भी मेरे लिये कभी भी । 
 
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जुलाई 27, 2013

POST : 354 अभ्यस्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      अभ्यस्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

परेशान थी उसकी नज़रें
व्याकुल थी देखने को
मेरी टूटती हुई सांसें ।

मैं समझ रहा था
बेचैनी उसकी
देख रहा था
उसकी बढ़ती हुई घबराहट ।

वक़्त गुज़रता जा रहा था
और उसके साथ साथ
बदल रहा था हर पल
उसके चेहरे का रंग ।

मुझे दिया था भर कर
अपने हाथों से उसने
जब विष का भरा प्याला
और पी लिया था
चुपचाप मैंने सारा ज़हर ।

उसके साथ साथ मैं भी
कर रहा था इंतज़ार मौत का
पूछा था सवाल उसने
न जाने किस से
मुझसे अथवा खुद अपने आप से
नहीं क्यों हो रहा है
उसके दिये ज़हर का
कोई भी असर मुझपर ।

समझ गया था मैं लेकिन
किस तरह समझाता उसे
उम्र भर करता रहा हूं
प्रतिदिन विषपान मैं
दुनिया वालों की
सभी अपनों बेगानों की
बातों का जिन में भरा होता था 
नफरत के ज़हर का ।

अभ्यस्त हो चुका हूं
विषपान का कब से
तभी कोई भी ज़हर अब मुझ पर
नहीं करता है कुछ भी असर ।  
 

 
 
 

फ़रवरी 16, 2013

POST : 298 दर्द का नाता ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

  दर्द का नाता ( कविता ) लोक सेतिया

सुन कर कहानी एक अजनबी की
अथवा पढ़कर किसी लेखक की
कोई कहानी
एक काल्पनिक पात्र के दुःख में
छलक आते हैं
हमारी भी पलकों पर आंसू।

क्योंकि याद आ जाती है सुनकर हमें
अपने जीवन के
उन दुखों परेशानियों की
जो हम नहीं कह पाये कभी किसी से
न ही किसी ने समझा
जिसको बिन बताये ही।

छिपा कर रखते हैं हम
अपने जिन ज़ख्मों को
उभर आती है इक टीस सी उनकी
देख कर दूसरों के ज़ख्मों को।

सुन कर किसी की दास्तां को
दर्द की तड़प बना देती है
हर किसी को हमारा अपना
सबसे करीबी होता है नाता 
इंसान से इंसान के दर्द का।

नवंबर 25, 2012

POST : 248 किया था वादा तुमने कृष्ण ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    किया था वादा तुमने कृष्ण ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

धरती पर बढ़ जाता है
जब अधर्म
उसका अंत करने को
लेते हो तुम जन्म
गीता में कहा था तुमने
हे कृष्ण ।

आज हमें हर तरफ
आ रहे हैं नज़र
कितने ही कंस हैं
तुम्हारी जन्म भूमि पर ।  

हम हर वर्ष मनाते हैं
जन्माष्टमी का त्यौहार
रख कर दिल में उम्मीद 
कि आओगे तुम
निभाने अपना वादा
कर दोगे अंत इन सब का ।

क्या भूल गये
अपना किया वादा तुम
अच्छा होता
न करते तुम ऐसा वादा ।

दिया होता गीता में
सब को ये सन्देश
कि हम सब को
स्वयं बनना होगा कृष्ण ।

पाप और अधर्म का
अंत करने के लिये  
तब शायद न ले पाते
नित नये नये कंस जन्म
इस धरती पर हे कृष्ण । 
 

 

नवंबर 22, 2012

POST : 246 वो साहित्य कहाँ है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      वो साहित्य कहां है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कब का मिट चुका लुट चुका
जिसको चाहते हैं ढूंढना हम सब ।

उजड़ा उजड़ा सा है चमन
मुरझाये हुए हैं फूल सभी
रुका हुआ
प्रदूषित जल तालाब का
कुम्हलाए हुए
कंवल के सभी फूल ।

हवाओं में है अजब सी घुटन
बेचैन हो रहा हमारा तन मन
हो रहा है जैसे मातम कोई ।

कहां गई
खुशियों की महफिलें ।

कहां भूल आये सभी सदभावना
क्यों खो गई संवेदनाएं हमारी
आता नहीं अब कहीं नज़र
होता था कभी जो अपनी पहचान ।

सुगंध थी जिसमें फूलों की
महक थी जो बहारों की
नदी का वो बहता पानी
समुन्दर सी गहराई लिये
प्यार का सबक पढ़ाने वाला
मानवता की राह दिखाने वाला ।

नई रौशनी लाने वाला
अंधेरे सभी मिटाने वाला
आशा फिर से जगाने वाला
पढ़ने वाला पढ़ाने वाला
साहित्य वो है कहां । 
 

 

नवंबर 21, 2012

POST : 245 फूल पत्थर के ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    फूल पत्थर के ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

साहित्य में
बड़ा है उनका नाम
गरीबों के हमदर्द हैं
कुछ ऐसी बनी हुई
उनकी है पहचान ।

गरीब बेबस शोषित लोग
उनकी रचनाओं के
होते हैं किरदार 
मानवता के दर्द की संवेदना
छलकती नज़र आती है
उनके शब्दों से ।

मिले हैं दूर से कई बार उनसे
उनके लिए
बजाई हैं तालियां
आज गये हम उनके घर
उनसे  करने को मुलाक़ात ।

देखा जाकर वहां
नया एक चेहरा उनका
उनके घर के कई काम करता है
किसी गरीब का बच्चा छोटा सा ।

खड़ा था सहमा हुआ
उनके सामने कह रहा था
हाथ जोड़ रोते हुए
मेरा नहीं है कसूर
कर दो मुझे माफ़ ।

लेकिन रुक नहीं रहे थे
उनके नफरत भरे बोल
घायल कर रहे थे
उनके अपशब्द एक मासूम को
और मुझे भी
जो सुन रहा था हैरान हो कर ।

डरने लगा था मन मेरा
देख उनके चेहरे पर
क्रूरता के भाव
उतर गया था जैसे उनका मुखौटा ।

वो खुद लगने लगे थे
खलनायक
अपनी ही लिखी कहानी के ।

लौट आया था मैं उलटे पांव
वे वो नहीं थे जिनसे मिलने की
थी मुझे तमन्ना ।

आजकल बिकते हैं बाज़ार में
कुछ खूबसूरत फूल
पत्थर के बने हुए भी
लगते हैं हरदम ताज़ा
पास जाकर छूने से लगता है पता ।

नहीं फूलों सी कोमलता का
उनमें कोई एहसास ।

मुरझाते नहीं
मगर होते हैं संवेदना रहित
खुशबू नहीं बांटते
पत्थर के फूल कभी । 
 

 

POST : 242 खुदा से बात ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      खुदा से बात ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कहते हैं लोग
दुनिया में अच्छा-बुरा
जो भी होता है
सब होता है तेरी ही मर्ज़ी से ।

अन्याय अत्याचार
धर्म तक का होता है
इस दुनिया में कारोबार ।

तेरी मर्ज़ी है इनमें
मैं कर नहीं सकता
कभी भी स्वीकार ।

सिर्फ इसलिए कि याद रखें
भूल न जाएं तुझको
देते हो सबको परेशानियां
दुःख दर्द समझते हैं
दुनिया के  कुछ लोग ।

ऐसा तो करते हैं
कुछ  इंसान
कर नहीं सकता
खुद भगवान ।

खुदा नहीं हो सकता
अपने बनाए इंसानों से
इतना बेदर्द
निभाता होगा अपना हर फ़र्ज़ ।

लगता है
कर दिया है बेबस तुझको
अपने ही बनाए इंसानों ने
जैसे माता पिता
हैं यहां बेबस संतानों से ।

अपने लिए सभी
करते तुझ से प्रार्थना
मैं विनती कर रहा हूँ
पर तेरे लिए ।

बचा लो इश्वर
अपनी ही शान
फिर से बनाओ अपना ये जहान
होगा हम सब पर एहसान ।

अब फिर बनाओ दुनिया इक ऐसी
चाहते हो तुम खुद जैसी
अच्छा प्यारा खूबसूरत
बनाओ इक ऐसा फिर से जहां ।

जिसमें न हो दुःख दर्द कोई
मिलती हों सबको खुशियां ।

अन्याय  अत्याचार का
जिसमें न हो निशां
ऐ खुदा अब बनाना
इक ऐसी नई दुनिया । 
 

 

नवंबर 19, 2012

POST : 240 मेरी खबर ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      मेरी खबर ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

पहचाना नहीं आज तुमने मुझे
तुम्हें फुर्सत नहीं थी मिलने की
करनी थी मुझको जो बातें तुमसे 
रहेंगी उम्र भर सब अब अधूरी ।

मगर शायद वर्षों बाद पढ़ कर
सुबह का तुम अखबार
या सुन कर किसी से  समाचार
आओगे घर मेरे तुम भी एक बार
ढूंढ कर मेरा ठिकाना ।

मुमकिन है सोचो तब तुम
कोई तो दे जाता मैं तुम्हें निशानी
काश दोहराते पुरानी हम यादें
सुनते-सुनाते जुबां से अपनी
नई हम कहानी ।

मिला है जो
जवाब तुमसे अभी
वही खुद अपने से
मिलेगा तुम्हें कभी
नहीं मिल सकूंगा मैं ।

होगी शायद
तुमको भी निराशा
होगी खत्म तुम्हारी भी
मुझसे मिलने की
हर आशा ।

ये सब जीते जी
नहीं  कर सकूंगा मैं
जो किया है तुमने
वो नहीं दोहराऊंगा मैं ।

होगा ऐसा इसलिये 
मेरे दोस्त उस दिन
क्योंकि मैं अलविदा
कह चुका हूंगा दुनिया को ।

और आये होगे
तुम मेरे घर पर
पढ़कर  या सुनकर
मेरे मरने की खबर । 
 

 

नवंबर 18, 2012

POST : 237 मेरी जान , मेरे दोस्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    मेरी जान , मेरे दोस्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

अक्सर आता है मुझे याद 
पहला दिन कालेज का
झाड़ियों के पीछे
पत्थरों पर बैठे हुए थे
हम दोनों कालेज के लान में ।

रैगिंग से हो कर परेशान 
कितने उदास थे हम 
कितने अकेले - अकेले
पहले ही दिन कुछ ही पल में
हम हो गये थे कितने करीब ।

अठारह बरस है अपनी उम्र 
आज भी लगता है कभी ऐसे
कितनी यादें हैं अपनी
जो भुलाई नहीं जाती 
भूलना चाहते भी नहीं थे
हम कभी ।

पहली बार मुझे
मिला था दोस्त ऐसा 
जो जानता था
पहचानता था
मुझे वास्तव में ।

बीत गये वो दिन कब जाने
छूट गया वो
शहर उसका बाज़ार
गलियां उसकी ।

बरसात में भीगते हुए  
हमारा कुछ तलाश करना
बाज़ार से तुम्हारे लिये 
खो गई सपनों जैसी
प्यारी दुनिया हमारी ।
 
मगर भूले नहीं हम
कभी वो सपने
जो सजाए थे मिलकर कभी 
अचानक तुम चले गए वहां
जहां से आता नहीं लौटकर कोई ।

मुझे नहीं मिला
फिर कोई दोस्त तुम सा 
खाली है मेरे जीवन में
इक जगह
रहते हो अब भी तुम वहां ।

आज भी सोचता हूँ
जाकर ढूंढू 
उन्हीं रास्तों पर तुम्हें जहां
चलते रहे दोनों यूं ही शामों को
अब कहां मिलते हैं
इस दुनिया में तुझसे दोस्त ।

अब क्या है इस शहर में
इस दुनिया में
बिना तेरे मेरी जान मेरे दोस्त ।

                    ( ये कविता मेरे दोस्त डॉ बी डी शर्मा , बीडी के नाम )


 

नवंबर 17, 2012

POST : 236 कोई ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    कोई ( कविता )    डॉ लोक सेतिया

कोई है धड़कन दिल की
कोई राहों की है धूल ।

कोई शाख से टूटा पत्ता
कोई डाली पे खिला फूल ।

कोई आंसू मोती जैसा
कोई हो जैसे कि पानी ।

कोई आज के दौर की चर्चा
कोई भूली हुई कहानी ।

कोई कविता ग़ज़ल हो जैसे
कोई बीते कल का अखबार ।

कोई कहीं पर डूबी नैया
कोई माझी संग पतवार ।

कोई सूना आंगन मन का
कोई है दिल का अरमान ।

कोई अपने घर को भूला
कोई घर घर का महमान ।

कोई नहीं कभी बिकता है
कोई बताता अपना दाम ।

कोई है आगाज़ किसी का
कोई किसी का है अंजाम । 
 

 

नवंबर 16, 2012

POST : 235 ऐसा भी कोई तो हो ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      ऐसा भी कोई तो हो ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

अपना ले जो मुझे
मैं जैसा भी हूं ।

हर दिन मुझको
न करवाए एहसास
मेरी कमियों का बार बार ।

सोने चांदी से नहीं
धन दौलत से नहीं
प्यार हो जिसको इंसान से
इंसानियत से ।

जिसको आता ही न हो
मेरी ही तरह
दुनिया का लेन-देन का
कोई कारोबार ।

थाम कर जो
फिर छोड़ जाए न कभी साथ 
रिश्ते-नातों को
जो समझे न इक व्योपार
जिसको आता हो बहाना आंसू
हर किसी के दुःख दर्द में ।
नफरत न हो जिसे अश्क बहाने से
जिसमें बाकी हों
मानवता की संवेदनाएं
जन्म जन्म से ढूंढ रहा हूं
उसी को मैं । 
 

     

नवंबर 15, 2012

POST : 233 रास्ते ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

     रास्ते ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मंज़िल की जिन्हें चाह थी
मिल गई
उनको मंज़िल ।

मैं वो रास्ता हूं
गुज़रते रहे जिससे हो कर 
दुनिया के सभी लोग ।

तलाश में अपनी अपनी
मंज़िल की 
मैं रुका हुआ हूं
इंतज़ार में प्यार की ।
 
रुकता नहीं
मेरे साथ कोई भी 
कुचल कर
गुज़र जाते हैं सब
मंज़िल की तरफ आगे ।
 
सबको भाती हैं
मंज़िलें 
बेमतलब लगते हैं रास्ते ।

क्या मिल पाती तुम्हें मंज़िलें 
न होते जो रास्ते ।

रास्तों को पहचान लो 
उनका दर्द
कभी तो जान लो ।