Thursday, 30 July 2020

मां ने कहा है बेटा बहु को ले आओ ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

   मां ने कहा है बेटा बहु को ले आओ ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

चिट्ठी लिखी है मां ने बेटे के नाम। सबसे ऊपर लिखा है राम जी का नाम। फिर लिखा है करना है इक ज़रूरी काम। इस से पहले कि आगाज़ करो याद करो शपथ निभाने को भूलने का अंजाम। दो शब्दों में समझ लो किस्सा तमाम देखो ढलने लगी है जीवन की शाम। बनाओ जो भी बनाना है बनाओ पर पहले मेरी बहु को घर पर ले कर आओ फिर आशिर्वाद दोनों मिलकर मुझसे पाओ। संग संग भूमिपूजन करते हैं ये बात है सच सच से नहीं मुकरते हैं। रामायण पढ़ी है तुमने कभी बच्चे धार्मिक अनुष्ठान बिन अर्धांगनी हैं आधे अधूरे कच्चे। बनवानी होगी कोई सोने की सबसे ऊंची मूर्ति छोटी बनाना तुम नहीं जानते क्या अपनी मां का कहा भी नहीं मानते। तैयार है कब वो आने को दुलारी है सुहागिन मेरी है दुलारी तुम राजकुंवर तो वो भी है इक राजकुमारी। इक बात समझ लो पत्नी से नहीं जीतोगे ये है वो जिस से सब दुनिया है हारी। ये राम राज्य कैसा है महलों में शान से रहते राजा और बन बन भटकती है जनक दुलारी। मां हूं बेटे के अवगुण कैसे बताऊं मुझे नहीं मालूम घर को स्वर्ग कैसे बनाऊं मैं ये ज़िद छोड़ो घर बहु लो लाऊं मैं मन की बात मैं भी उसको बताऊं मैं अपने हाथों से महंदी उसको लगाऊं मैं दुल्हन की तरह खुद उसको सजाऊं मैं। मेरा घर बने मंदिर कहीं और क्यों जाऊं मैं। खत्म करो सुनी थी दादी नानी से जो कहानी। इक था राजा इक थी रानी। शर्म को चाहिए चुल्लू भर पानी कब तक चलेगी आखिर मनमानी। खत को तार समझना कहीं मत बात को बेकार समझना पहले कभी नहीं समझे हो इस बार समझना। सात कसम निभाने का व्यवहार समझना।

चिट्ठी पढ़कर सुनाई अधिकारी ने और पूछा लिखना है कोई जवाब भेजना है आपको मां को। सरकार को हंसी आई कहने लगे कौन किसकी मां अब कौन किसका भाई। तुमको हमारी बात अभी तक समझ नहीं आई। मेरा नहीं है कोई किसी से नाता कुर्सी है भगवान मेरा कुर्सी है मेरी माता दुनिया के रिश्ते नाते और सभी भली बातें इश्तिहार की है बात मेरे दिन उनकी हैं घनी अंधेरी रातें। मां से होती हैं इक दिन मुलाकातें हमने कभी किसी की समझी नहीं मन की बातें ये चालें राजनीति की सीखी हैं हमने घातें भोले हैं लोग क्या जाने सत्ता की होती हैं सूखी बरसातें। मां ही नहीं भगवान भी हमने नहीं बुलाये ये मामले अजब हैं अब कौन उनको बताये मंदिर मस्जिद क्यों जाते हैं बनवाये राजनेता कभी किसी के होते नहीं हैं अपने हम हैं सभी के अपने और सभी हमारे लिए पराये। मतलब है जिनसे वही लोग हैं बुलाये पत्नी और मां हैं दूर से अच्छी लगती कोई पांव की है बेड़ी हमने ली छुड़ाय मां को कौन पैर उसके दबाये हर गलत बात पर कोई क्यों डांट खाय। हमने सीखा है बस यही उपाय जवाब लिखेंगे सब कुछ बीत जाये लिख देंगे चिट्ठी मिली है बाद में मां आपकी मिलती समय पर तो क्या सकते थे आदेश को ठुकराय। ये राम जानते हैं कोई झूठ मत बुलवाय आएगी घड़ी सासु-बहु को आएंगे हम लिवाय ये सपना आपका कहीं सच हो नहीं जाये। दिल मोरा मैया मोरी सोच सोच घबराये बासी रोटी कौन भला खाये जब हलवा पूरी मिले छपन्न भोग लगवाय।

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