Sunday, 1 March 2020

इस युग के शिक्षक फेसबुक व्हाट्सएप्प ( होली है ) डॉ लोक सेतिया

 इस युग के शिक्षक फेसबुक व्हाट्सएप्प ( होली है ) डॉ लोक सेतिया 

कथा का सार इतना है बिना देखे मिले अपनापन और दोस्ती संदेश से अचानक संबंध तोड़ने दरवाज़ा बंद करने अर्थात व्हाट्सएप्प फेसबुक मैसेंजर पर ब्लॉक करने तक का सफर। इन सब में छिपी हुई है अहंकार की भावना जो विचार विर्मश और आपस में शिष्ट वार्तालाप को जंग के अखाड़े में बदल देती है। अब कुछ घटनाओं की अनुभव की बात बिना किसी को दोष देते हुए कहना चाहता हूं। 

व्हाट्सएप्प ग्रुप में पहचान हुई संदेश आदान प्रदान के बाद व्हाट्सएप्प कॉल पर कहने लगे मिलना चाहिए। अगले दिन संदेश भेजा अगर समय है तो पास पार्क में मिलते हैं मगर जवाब नहीं मिला पता नहीं संदेश को बिना पढ़े ही डिलीट किया हो खैर। इक वीडियो भेजा जिस में साफ नहीं था कौन हैं और कब की बात है संदेश भेजा आपको पता है तो जानकारी देने का कार्य करें अच्छा होगा। कोई जवाब नहीं दिया ये भी नहीं बताया पता है या नहीं है। कल इक वीडियो आया तो लिखा जब तक सब जानकारी नहीं होती यकीन नहीं होता आपके भेजे वीडियो को फॉरवर्ड नहीं कर सकूंगा। नोटेड। संदेश इक शब्द का और ब्लॉक्ड। अब कौन उनको किस तरह समझाए कि जीवन भर लिखने से पहले सच को समझना पहचाना है अब कोई बात शेयर करने से पहले विचार करना होता है कि हज़ारों चाहने वाले पढ़ने वालों को भरोसा है ये ध्यान रखना महत्वपूर्ण होता है। हम लोग सोशल मीडिया पर रिश्ते बनाते हैं और उनको आपसी विश्वास के धागे से नहीं पिरोते हैं बड़ी कच्ची डोरी है ये आधुनिक इंटनेट और सॉफ्टवेयर ऐप्प्स वाली छूट जाती है बिखर जाती है। हम जानते हैं समझते नहीं पहचानना तो दूर की बात है। 

इक और सज्जन हैं सब जानते हैं समझाते हैं सबक सिखलाते हैं। बस अपनी बात से असहमत नहीं होने देते अन्यथा अंदाज़ बदल जाता है। कई संदेश कई वीडियो भेजते रहे अपने किसी गुरु के संबोधन वाले। मगर जब कोई गुरु अपने अनुयाइयों को अपने धर्म की अच्छी बातें समझाने उन पर अमल करने की सही दिशा दिखलाने की बात छोड़ इस पर उपदेश देने लगता है कि किसी और धर्म की क्या क्या बुराई है क्या खराब बात है कैसी शिक्षा देते हैं तब सोचना पड़ता है क्या आपके पास खुद अपने धर्म की अच्छाई बताने को कुछ नहीं जो उनकी बुराई बताकर अपने को अच्छा साबित करना पड़ रहा है। ऐसे बहुत लोग हैं जो व्यर्थ की सोशल मीडिया की बहस में आपसी नाते रिश्ते बर्बाद करने लगते हैं। 

मुझे हैरानी नहीं खेद हुआ जब देखा अपने करीबी किसी के बच्चे बड़े छोटे से वार्तालाप करने की मर्यादा की सीमा लांघ जाते हैं केवल किसी नेता के समर्थन या राजनीति की विचारधारा के मतभेद के कारण। उनका जन्म नहीं हुआ था जब से मैंने तमाम सरकारों नेताओं की आलोचना की है जनहित की खातिर मगर अपने देश की ऐतहासिक घटनाओं से अनजान ये चार किताबें पढ़ खुद को सब समझने जानने वाला कहते हैं। उनको बस वही मालूम है जो जोड़ तोड़ कर कुछ मतलबी लोगों ने अपने स्वार्थ की खातिर समझाया है। अब जब ऐसे लोगों की नफरतों का अंजाम सामने है तब भी क्या हम उनकी चालों को बांटने की राजनीति को समझ नहीं सकते। अब तो इन सब का अंत होना ही चाहिए।

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