Monday, 30 December 2019

तुम नहीं मालिक मेरी है ये दुनिया ( अध्यात्म ) डॉ लोक सेतिया

 तुम नहीं मालिक मेरी है ये दुनिया ( अध्यात्म ) डॉ लोक सेतिया 

                आपको समझना है धर्म क्या है और ईश्वर अल्लाह खुदा भगवान क्या है। चलो आज मिलकर उसी से पूछते हैं जिस ने दुनिया बनाई है। आपको बाहर नहीं नज़र आएगा अपने भीतर झांकना है। आंखें बंद करते हैं और सुनते हैं इक आवाज़ सुनाई दे रही है , अगर आपको सुनाई नहीं दे रही तो आपका विश्वास अभी पूर्ण नहीं है। आवाज़ आ रही है , ये जो सब धर्म धर्म का शोर है कौन कर रहा है धर्म वालों को खुद नहीं पता मैं कौन हूं। उनको ऊपरवाला इक सामान जैसा लगा जिसको बाज़ार में बेचकर इनको अपने स्वार्थ साधने हैं। इक बात बड़ी आसान है और सीधी भी कि मेरी मर्ज़ी से जन्म मृत्यु से लेकर सभी कुछ होता है निर्माण विनाश सब कोई और नहीं कर सकता है जो लोग मिट्टी के खिलौने बनाना जानते हैं खुद को निर्माता मानते हैं मगर उनकी बनाई रचना को पल भर में जो मिट्टी बना देता है उस का उनको पता ही नहीं है। इंसान विज्ञान लाख कोशिश कर ले जीवन का संचार कदापि नहीं कर सकता है। धर्म के नाम पर दंगे फसाद क़त्ल करने वाले सिर्फ गुनाहगार हो सकते हैं परमात्मा को समझने वाले नहीं। मैंने किसी इंसान को क्या पशु पक्षी पेड़ पौधे भी बनाने में कोई भेदभाव नहीं किया है और जो आदमी आदमी में अंतर करते हैं झगड़ा करवाते हैं उन्हें क्या समझ अच्छाई और सच्चाई किसे कहते हैं। रटते हैं ईश्वर सत्य है मगर सच बोलने का साहस नहीं और झूठ को सच साबित करते हैं। 

           अदालत में मुकदमा चल रहा था मंदिर मस्जिद के झगड़े को लेकर। हर कोई किसी को अपराधी मानता है अपने अपने खुदा ईश्वर का घर तबाह करने का और गर्व करते हैं खुद किसी की इबादतग़ाह को तोड़ने का। अदालत जाने किस किस को पक्ष बनाती है असली पक्षकार का कोई नाम तक नहीं जानता। मुझ ऊपरवाले से नहीं पूछते सच क्या है मुझे क्या चाहिए। भला मुझे इन सभी इमारतों की क्या ज़रूरत है और कब किस को मैंने अपना हितेषी या वकील घोषित किया है। मुझे कोई चढ़ावा कोई इबादत कोई दान कोई वस्तु इन से क्यों चाहिए जिनको सभी को खुद मैंने बनाया है और दिया है जो भी जिस के पास है। क्या मुझे नासमझ समझते हैं जो खुद हज़ार देकर एक मांगता हो उसी से जिसे दे दिया। ये तो विश्व की जनता है जो अपने अपने देश की सरकार से अपने दिए धन का छोटा सा हिस्सा भीख की तरह मांगती रहती है। इन धर्म वालों ने मुझे भी राजनेताओं की तरह ठग बनाने का काम किया है ये कहकर कि धार्मिक स्थल बनाने को या कोई आडंबर अनुष्ठान करने को पैसे सामन देकर मुझे खुश कर सकते हैं। अदालत किसी को नियम तोड़ने का दोषी घोषित करती है किसी को अपराधी या क़ातिल। मगर क्या किसी ने विचार किया कि मैं अपनी मर्ज़ी से जिसे भी जब चाहूं अपने पास बुला लेता अथवा उसका जीवन का अंत कर देता हूं। भगवान की मर्ज़ी है कहने के इलावा कोई कुछ नहीं कर सकता। किसी भी देश की किसी भी अदालत में कोई केस दायर नहीं हो सकता है। आंधी तूफ़ान भूकंप बाढ़ कितनी आपदाओं को मेरे नाम करते हैं फिर कोई तो मेरे ख़िलाफ़ एफआईआर लिखवाता कहीं। मगर ये सब होता इंसान की अपनी गलती से है। 

    विधाता एक ही है और एक ही हो सकता है फिर किसने नाम बदल कर अपने अपने भगवान देवी देवता घोषित कर लिए हैं। वास्तव में उनको ईश्वर को समझने जानने की चाहत नहीं थी उनको मेरे नाम का दुरूपयोग करना था अपने मकसद हासिल करने को। उनको लगता है कोई ऐसा नहीं है और होगा भी तो ऊपर बैठा आराम करता होगा उसे क्या करना कोई क्या कर रहा है। मगर कहते हैं ऊपरवाला जानता है सब देखता है अगर ये भरोसा करते तो फिर मुझे लेकर नफरत का धंधा नहीं करते। उपदेश देते हैं औरों को जिन बातों को लेकर खुद उन्हीं पर नहीं चलते हैं। धरती पर आये हैं कुछ लोग जिन्होंने चिंतन और मनन और अध्यन से समझना चाहा समझाना चाहा जैसे नानक जैसे विवेकानंद जैसे लोग या किसी भी धर्म की शुरुआत करने वाले गुरु मगर बाद में उन्हीं के अनुयाई चेले खुद को भगवान बताने लगे और सत्य की खोज ईश्वर की तलाश छोड़ मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरुद्वारा बनाने लगे। कोई बुत कोई मूर्ति कोई शब्द लिख उसको पूजा ईबादत का साधन बना लिया बिना समझे कि जिसने दुनिया बनाई कोई भी उसको नहीं बना सकता है। ये दुनिया बनाने वाले को बनाने वाले बन बैठे हैं मगर मुझ दुनिया बनाने वाले का कोई अंत नहीं है कोई ओर छोर नहीं शुरुआत नहीं जानते पर इनका जन्म इनका अंत मेरी इच्छा से है। 

अब आप समझना चाहते हैं आपको क्या करना है पूजा आरती ईबादत और कैसे मुझे खुश करना है। नहीं मुझे कोई अपना गुणगान नहीं करवाना है कोई चढ़ावा कोई उपहार कोई घर रहने को नहीं चाहिए। मैंने आप सभी को इंसान बनाया है आपको अच्छे कर्म करने हैं अच्छे इंसान बनकर जीना है। कोई आपसी भेदभाव बड़े छोटे का धर्म जाति का रंग का देश का नहीं रखना है। नफरत की जंग की  अहंकार की सब बातें छोड़कर प्यार से मिलजुलकर रहना और अपने पास अधिक जमा नहीं कर बांटकर खाना इक दूजे के सुःख दुःख को समझना इंसानियत का पालन करना यही आदेश है उपदेश है और मुझे पाने को खुश करने को यही रास्ता भी है।

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