Friday, 13 December 2019

शासकों की मनमानी जनता की मज़बूरी आज़ादी नहीं है ( सच और केवल सच ) डॉ लोक सेतिया

       शासकों की मनमानी जनता की मज़बूरी आज़ादी नहीं है 

                           ( सच और केवल सच ) डॉ लोक सेतिया 

 सरकार ऐलान जारी करती है देश की जनता को स्वीकार करना होता है।  लोग परेशान हों या उनके लिए कितनी समस्याएं खड़ी हों सत्ताधारी नेताओं और सरकारी अधिकारियों की बला से। अभी फ़ास्ट टैग की ही बात ले लो जिस देश की आधी आबादी अनपढ़ है जिसको अभी आधुनिक ऑनलाइन या स्मार्ट फोन की सही जानकारी तो क्या अपनी सुरक्षा को लेकर समझ नहीं है और गरीब अशिक्षित नागरिक से उनके कार्ड या अन्य कागज़ कोई और ले कर उपयोग करता है क्या ये सब के लिए आसान होगा।  कदापि नहीं मगर सरकार को अपनी साहूलियत और सुविधा देखनी है। आपको इतने दिन में ये अपनाना ही होगा। लगता ही नहीं कि किसी भी नेता या सरकार में शामिल दल को नागरिक परेशानी से कोई सरोकार हो। बस ये महत्वपूर्ण है और तय सीमा में लागू करना ही होगा। हर बार जब शासक को फरमान जारी करना अधिकार उपयोग करना हो तब कहते हैं इस को करना लाज़मी है। 

    मगर कभी भी जो कर्तव्य देश की सरकार को पूरे करने हैं उनको लेकर ऐसा नहीं होता है। क्या कभी घोषणा की गई कि इतने दिन बाद कोई गरीबी की रेखा से नीचे नहीं रहने दिया जाएगा। सरकार को ये उस से पहले करना ज़रूरी है। कोई बना घर नहीं रहेगा की बात छोडो कोई भूखा नहीं रहेगा ये भी कब होगा किसी सत्ताधारी को चिंता नहीं है। वीवीआईपी लोगों को स्वस्थ्य सेवा तुरंत ऐम्स जैसे अस्पताल में मिलती है मगर आम नागरिक कतार में खड़ा अधमरा होकर मौत का इंतज़ार करता है कब इस भेदभाव की व्यवस्था का अंत होगा क्या कोई दिन तय है। अर्थात देश की जनता को बुनियादी अधिकार मिलने को लेकर कोई भी सरकार कभी अपने कर्तव्य को निभाने को संकल्प नहीं निभाती है। सत्ता जनसेवा नहीं इक हथियार है डंडे से हांकने को नागरिक को गुलामों की तरह। 

    राजनेता सांसद विधायक बनकर देश की जनता के पैसे से करोड़ों रूपये पाने के हकदार बन जाते हैं और इनको कोई लज्जा शर्म नहीं आती ऐसा करते देश सेवा के नाम पर ऐशो आराम और लूट करते हुए। कोई बोलता नहीं ये अनुचित ढंग कब बंद होगा और सेवक कहलाने वाले कब देश की गरीब जनता पर बोझ नहीं बनेंगे। कोई भी राजनीतिक दल हो अपनी महत्वकांक्षा या वोटों की गंदी राजनीति की खातिर आम नागरिक को तमाम अन्य परेशानियों के बीच और परेशानी देने में संकोच नहीं करते हैं। 

संसद को इक अखाड़ा बना दिया गया है। 13 दिसंबर को संसद पर हमला हुआ था और सुरक्षाकर्मी मारे गए थे उनकी याद औपचारिक ढंग से कुछ क्षण करने के बाद जिस तरह संसद में सांसद विपक्षी नेता के ब्यान को लेकर हंगामा करते रहे अपने राजनीतिक मकसद की खातिर उसे ब्यान को आपत्तिजनक मान कर भी ज़रूरी नहीं समझा जा सकता है। वैसे भी ऐसे घटिया ब्यान खुद सत्ताधारी भी विपक्ष में रहते करते रहे हैं तब यही लोग ताली बजाया करते थे , आज भी बहुत नेता हैं जो सत्ताधारी दल में होते हुए अक्सर बेहद अनुचित और आपत्तिजनक भाषण ब्यान देते हैं मगर अपने दल के नेता की बात पर खामोश रहते हैं। जिन महिला सांसदों को महिलाओं के साथ अपराध पर आवाज़ उठानी चाहिए मगर नहीं कुछ भी बोलती सत्ता उनकी है इसलिए वही विपक्षी दल के नेता के ब्यान पर उत्तेजित हो जाती हैं। काश यही भाव महिलाओं के अधिकार उनके आरक्षण या उनसे भेदभाव को लेकर भी नज़र आता। मगर अपनी दलगत राजनीति से इतर उनको देश की वास्तविक चिंता कभी नहीं दिखाई देती है। 

 ये बेहद खेद की बात है कि देश की राजनीतिक व्यवस्था इतनी स्वार्थी और सत्ता के मोह में अंधी हो चुकी है कि शासन करने वाले नेताओं सत्ताधारी दल सरकारी अधिकारियों को नेताओं सांसदों विधायकों को देश सेवा की नहीं सत्ता की चाहत होती है और इनकी जनसेवा देशभक्ति सिर्फ कहने या दिखाने को है आडंबर है। वास्तविक जनता की भलाई या उनकी समस्याओं से किसी को कोई मतलब नहीं है। हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम ए गुलिस्तां क्या होगा।

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