Tuesday, 19 November 2019

शायरी हमने की , आशिक़ी हमने की ( ग़ज़ल ) लोक सेतिया "तनहा "

शायरी हमने की , आशिक़ी हमने की ( ग़ज़ल ) लोक सेतिया "तनहा "

शायरी हमने की , आशिक़ी हमने की 
इस तरह उम्र भर , बंदगी हमने की। 

हर सफर पर नये दोस्त बनते रहे 
जो जहां पर मिला दोस्ती हमने की। 

ज़ख्म भी दर्द भी हर किसी से मिले 
पर न घबरा कभी ख़ुदकुशी हमने की। 

मैं खिलौना सभी मुझसे खेला किए 
आप अपने से भी दिल्लगी हमने की। 

सी लिए लब सदा कुछ नहीं कह सके 
बोलने की नहीं ,  भूल भी हमने की।

हम सितारे , ज़मीं पर बिछाते गए
चांदनी कह रही , बेरुखी हमने की।

की वफ़ा फिर भी खुद बेवफ़ा बन गया 
भूल हर बार "तनहा" वही हमने की।


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