Sunday, 6 October 2019

दिल लगता नहीं नकली नज़ारों में ( हाल-ए-दिल ) डॉ लोक सेतिया

 दिल लगता नहीं नकली नज़ारों में ( हाल-ए-दिल ) डॉ लोक सेतिया

   आज लिखने से पहले जानता हूं किसी को फुर्सत ही नहीं इतनी जो किसी और की बात को पढ़े मेरी हो किसी की कोई नहीं पढ़ता बस इक नज़र देख कर लाइक कमेंट औपचारिकता सी है पढ़ भी लिया तो समझना ज़रूरी नहीं और कोई समझ कर भी मुझे क्या सोच लेता है। फिर लिखने का मकसद बस दिल की तसल्ली या फिर खाली समय बिताना खुद से खुद की बात कहना। मगर ऐसा क्यों है भरी दुनिया में आस पास ही नहीं अब सोशल मीडिया ने विश्व को मुट्ठी में भरने की बात कर दी है फिर भी शायद मेरी तरह कितने और लोग भीड़ में अकेले घबराते हैं अजनबी सी लगती है मुझे ये दुनिया। कोई भी एक दोस्त तक नहीं जिसको अपना कह भी सकते हों और अपनापन का एहसास भी होता हो। जान पहचान हर किसी से है बाहरी दिखावे की भीतर से हम खालीपन लिए भटकते हैं। ये मेरी दुनिया नहीं है मुझे नहीं चाहिए ये झूठ फरेब और नकली नज़रों की दुनिया , आज याद आ रही है छोटी सी इक प्यारी सी दुनिया हुआ करती थी कभी मेरे सपनों की और शायद यहीं कहीं हुआ करता था उसके होने का एहसास भी दिल को अक्सर। मिल जाते थे ये कभी मिले थे कुछ लोग जो जैसे भी थे बहुत अच्छे थे मगर खो गए वक़्त की आंधी उन्हें जाने कहां उड़ा ले गई। अब जो दुनिया है मुझे अजीब लगती है अपने देखा है कभी इसको कैसी बन गई है आपकी दुनिया। 

      लगते हैं अमीर लोग मगर वास्तव में भिखारी हैं मांगते हैं दिल भरता नहीं चाहे जितना भी पास हो। क्या लोग होते थे थोड़ा भी पास होता था तो उसी में खुश रहते थे इतना ही नहीं चाहते थे कुछ बांट देना औरों को भी जिनके पास नहीं होता था कुछ भी। अब सभी पागल हैं अधिक हासिल करने को किसी भी सीमा तक जाने को राज़ी हैं। ख़ास होने के बाद दौलत शोहरत ताकत की हवस बढ़ती जाती है और बाहर से ऊंचे लगने वाले खुद अपने भीतर से डरे सहमे लगते हैं खो जाने का डर उनको और पाने को उकसाता है। अमीरी से दिल नहीं भरता बल्कि गरीबी का एहसास बढ़ता जाता है करोड़ों भी कम लगते हैं। और दौलत ताकत शोहरत हासिल करने को अपने आप को खो देते हैं। जिसे भी देखते हैं राजनीति की तरफ आकर्षित है ताकि ऐशो आराम और तमाम सत्ता के साधन पाकर देश के खज़ाने जनता के धन से खिलवाड़ कर सके। राजनीति का पतन इस हद तक गिर गया है कि राजनेताओं और शासन करने वाले अधिकारियों को कर्तव्य की बात क्या ईमानदारी की बात क्या मानवता तक नहीं याद रहती है। जिसे देखो देश सेवा जनता की भलाई की बात कह कर अपनी हवस मिटाना चाहता है। हम जिनको चुनते हैं जानते हैं उनका मकसद कोई देशभक्ति नहीं है जनकल्याण की भावना होती ही नहीं स्वार्थ ही उनका सब कुछ है। देख कर समझ कर भी खुद ही केवल अपने नहीं समाज और देश के हित की अनदेखी करते हैं और ऐसे गलत लोगों को सांसद विधायक बनाने का अपराध करते हैं देश के खिलाफ बिना विचारे। 

       मुझे नहीं भाती है ये दुनिया जो नज़र आती है खूबसूरत है चमकीली है मगर वास्तव में बड़ी डरावनी भयानक तस्वीर है इसकी जो अपने पीछे घना अंधकार समेटे हुए है। लोग शानदार लिबास और आलीशान घरों में रहते हैं मगर उनका मन और सोच घटिया और निचले स्तर की मतलबपरस्त होती है। रिश्ते नाते झूठे दिखावे के और केवल स्वार्थ को देखने वाले बन गए हैं। हमने जिनको नायक कहना शुरू कर दिया है उनका सच बेहद अजीब है उनका नैतिकता से कोई वास्ता नहीं है और वो देश समाज को कुछ भी देते नहीं हैं। आपने देखा होगा ख़ास वीवीआईपी लोगों को गांव की गरीबी की पुरानी यादों पर नम आंखे पौंछते हुए मगर क्या उनको अपने देश राज्य को तो क्या गांव से लगाव होता तो अपने पास दौलत का अंबार होते अपने उन बचपन के साथी लोगों की बदहाली मिटाने को कुछ भी नहीं कर सकते थे। कैमरे पर झूठा प्यार अपनापन दिखावा ही नहीं ये भी शोहरत पाने का ढंग बन गया है। आपको कई लोगों के भलाई और गरीबों की सहायता को किसी एनजीओ या संस्था की पता होगी जो कुछ उसी तरह है जैसे कोई डाकू लूट का कुछ हिस्सा अपने अपराधबोध मिटाने को दान आदि पर खर्च करते थे। कोई नहीं पूछता उनके पास हज़ारों करोड़ कैसे आते हैं काश सोचो तो समझोगे कि ये पैसा छल कपट धोखा ही नहीं कभी तो आपको ज़हर बेच कर भी हासिल किया होता है। हैरानी हुई होगी तो समझ लो , उनको विज्ञापन से करोड़ों मिले आपको खराब सामान बेचने की लूट के मुनाफे से। उनको पता होता है जिस को खरीदने की सलाह देते हैं खुद कभी उपयोग नहीं करते हैं। 

 ऐसा ही सरकार का भी हाल है विज्ञापन पर जितना धन बर्बाद किया जाता है अपने स्वार्थ की खातिर और जनता को मूर्ख बनाने को उसी से कितना कुछ जनता का कल्याण किया जा सकता था। मगर जिनको खुद अपने रहन सहन विलासिता पूर्वक शान से रहने पर रोज़ लाखों करोड़ों खर्च करना उचित लगता है उन से देश की बदहाली मिटाने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। देशभक्ति या देशसेवा अपने लिए सब हासिल करना नहीं जो भी पास है देश समाज को देने को कहते हैं। खुद को महान कहना या समझना वास्तव में सबसे अधिक छोटेपन का सबूत है। अपने जिनको बनाया आपके दिए कर से कुछ भी कर दावा करते हैं हमने ये किया है ये कितनी बेशर्मी की बात है। कोई और लोग हुआ करते थे जिनको नैतिकता का पास था और जो समझते थे उनको अपने नहीं देश समाज की चिंता पहले करनी है सत्ता मकसद नहीं था साधन था देश की समाज को आगे बढ़ाने का। अब देश समाज को पीछे धकेल कर दावा किया जाता है बड़े काम किया है। शायद फिर से विचार करना होगा कि भूल किस से हुई है कैसे हमने झूठे स्वार्थी और आडंबर करने वाले लोगों को नायक महानायक घोषित करने का कार्य कर अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने की बात की है। आपको लगता होगा मुझे ये समाज जीने के लायक लगता नहीं है। ये मेरी कल्पना का समाज नहीं है जिस में सभी को जीने का अधिकार होता समानता की न्याय की बात होती , यहां तो सब अपने स्वार्थ में पागल हैं।

1 comment:

Kavita Rawat said...

सच ये संसार जैसा नज़र आता है ठीक वैसा हो, यह मुमकिन नहीं, फिर भी कोई न कोई तो होता है जो अपने जैसा होता है, सोचता है, इसी दुनिया में रहता है,
बहुत अच्छी सामयिक चिंतनशील प्रस्तुति