Friday, 16 August 2019

वफ़ा की कसम बेवफ़ा हो ( इल्ज़ाम ए मुहब्बत ) डॉ लोक सेतिया

  वफ़ा की कसम बेवफ़ा हो ( इल्ज़ाम ए मुहब्बत ) डॉ लोक सेतिया

  इश्क़ मुहब्बत ज़िंदगी का हिस्सा है , हर किसी को इश्क़ हो जाता है या होना चाहिए। इश्क़ किसी से भी हो सकता है कोई खेल से कोई संगीत से कोई समाज सेवा से करता है। मुझे इश्क़ है लेखन से और हद से बढ़कर है जनहित की बात ने किसी और काम का नहीं रहने दिया। बदनसीब होते हैं जिनको किसी से इश्क़ नहीं हुआ कभी भी। पैसे शोहरत ताकत की चाहत पागलपन हो सकती है इसको इश्क़ नहीं समझना। ये बदलते पल भी नहीं लगता है। राजनेताओं की देश से मुहब्बत सत्ता कुर्सी की मुहब्बत होती हैं इनका भरोसा नहीं कब क्या कर बैठें। इश्क़ का कारोबार नहीं होता और राजनीति वैश्यावृत्ति दोनों धंधे हैं प्यार भी बिकता खरीदा जाता है।
कितना बदल गया आशिक़ी का चलन भी , मुल्क से महबूबा से इश्क़ भी मतलब से और फुर्सत होने पर करते हैं। चांद सितारे तोड़ लाने का ख्वाब दिखला कर अस्मत लूट लेते हैं। सोशल मीडिया का प्यार और देशभक्ति बड़ी आसान है करना धरना कुछ नहीं बातें बड़ी बड़ी की जाती हैं। 

      देश समाज को लेकर गंभीर चिंतन सोशल मीडिया पर कोई नहीं करता है। मगर इन दिनों कुछ अच्छा अनुभव हुआ है। बहुत दिन बाद लगा फेसबुक व्हाट्सएप्प पर ही सही कुछ लोगों ने पढ़ा समझा और अपनी राय भी बताई और अपनी सहमति असहमति को भी उजागर किया। पहले उनका आभार व्यक्त करना ज़रूरी है क्योंकि किसी के लिखने की सार्थकता इस में है लोग पढ़ कर समझें चिंतन करें। जागते रहो कहना है कोई जागता है या नहीं ये उन पर है। सबसे पहली बात लिखने की ये है कि हर रचना कोई विषय लेकर होती है और उसी को ध्यान में रखते हुए बात की जाती है। सच लिखा जा सकता है खरा भी और आधा सच भी लिखते हैं कुछ लिखने वाले मगर मुक़्क़मल सच लिखना संभव नहीं है क्योंकि उस में एक दो नहीं कितने ही पक्ष हो सकते हैं। कभी किसी जाने माने साहित्यकार ने सवाल किया था आप हर विधा में किसलिए लिखते हैं बेहतर है कोई इक विधा चुने जिस में आपको महारत हासिल हो। मुझे महारत हासिल करने बड़ा लेखक बनने की चाहत कभी नहीं थी मुझे तो कुछ बात कहनी थी और जिस विधा में कह सकता था लिख दिया करता। तब इक ग़ज़ल कही थी। 

                   कहानी हो ग़ज़ल हो बात रह जाती अधूरी है ,

                   करें क्या ज़िंदगी की बात कहना भी ज़रूरी है। 

ग़ज़ल की ख़ासियत है बहुत थोड़े शब्दों में बहुत बड़ी बात कही जा सकती है मगर सलीके से। ग़ज़ल से मुझे मुहब्बत है मगर मेरे भीतर का व्यंग्य लिखने वाला अपने तेवर छुपा नहीं सकता है। आज शुरुआत बेग़म अख़्तर की गाई ग़ज़ल से करता हूं। 

मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे 

मैं हूं दर्द ए इश्क़ से जां-बल्भ मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे। 

मेरे दाग़ ए दिल से है रौशनी इसी रौशनी से है ज़िंदगी 

मुझे डर है ए मेरे चारागर ये चिराग़ तू ही बुझा न दे।       ( चारागर = डॉक्टर )

मुझे ऐ छोड़ दे मेरे हाल पर तेरा क्या भरोसा है चारागर 

ये तेरी नवाज़िशें -मुख़्तसर मेरा दर्द और बढ़ा न दे।       ( नवाज़िशें-मुख़्तसर = ज़रा ज़रा से एहसान )

मेरा अज़म इतना बलंद है कि पराये शोलों का डर नहीं 

मुझे ख़ौफ़ आतिशे गुल से है कि कहीं चमन को जला न दे।        ( आतिश = आग )

वो उठे हैं लेके खुमो-सुबू अरे ओ शक़ील कहां है तू 

तेरा जाम लेने को बज़्म में कोई और हाथ बढ़ा न दे। 

ग़ज़ल की बात ही कुछ और है जितना कहा उस से ज़्यादा अनकहा होता है छुपा हुआ। ग़ज़ल का दर्द से रिश्ता है क्योंकि ग़ज़ल शब्द निकला ही इसी से है। ग़ज़ल की परिभाषा यही है कि जब हिरण का बच्चा भागते भागते झाड़ियों में फंस जाता है और शिकारी का तीर खाने पर जो आवाज़ उसकी निकलती है उसी को ग़ज़ल कहते हैं। ग़ज़ल सुनकर जब लोग तालियां बजाते हैं मालूम नहीं उस में छुपे दर्द को महसूस भी करते हैं या नहीं। कल किसी ने कहा मुझे टैग नहीं करें तो पूछा नहीं पढ़ना पसंद तो जवाब था अच्छा लगता है पढ़ना मगर मेरी टाइम लाइन पर जगह नहीं मुझे मेस्सेंजर पर भेजा करें। चलो ये भी पता चला आपको साहित्य भी अपनी सुविधा से मर्ज़ी या साहूलियत से पढ़ना है। किसी का इक शेर याद आया है। 

  बादलों के पास है हर किसी के वास्ते कोई बूंद , शर्त ये है उतनी शिद्दत से कोई प्यासा तो हो।

      हमने समय बिताने को दिल बहलाने को सोशल मीडिया पर लिखना पढ़ना शुरू किया है। मकसद समाज देश को समझना नहीं समझदार होने का दावा करना है। प्यार मुहब्बत इश्क़ से लेकर देश से प्यार तक हम सार्वजनिक मंच पर जो नज़र आते हैं असली जीवन में वैसे नहीं होते। टीवी अख़बार पर कैमरे के सामने देशभक्ति का दिखावा करना कठिन नहीं है वास्तविक देशभक्ति देश की खातिर निडर होकर बिना किसी स्वार्थ कुछ करना है। हर किसी को लेकर सवाल खड़े करते हैं कभी खुद को भीतर से झांककर नहीं देखते अन्यथा शोर नहीं करते खामोश हो जाते। लिबास शानदार पहन पर आपकी शख्सियत नहीं अच्छी बनती कभी। भीतर कोई और है बाहर दिखाई और देता है। जैसे आजकल लोग किसी का जिस्म पाना चाहते हैं और उसकी तारीफ करते हैं मुहब्बत करने की झूठी बातें करते हैं निगाह में चाहत अपनी हवस की भूख मिटाने की रहती है। यकीन करें सबकी असली सूरत पता चले तो शायद ही कोई सच्चा आशिक़ मिले कोई सच्चा देशभक्त दिखाई दे। 

    जो लोग अपना काम करते हैं डॉक्टर्स इंजीनियर अध्यापक अधिकारी मज़दूर से नौकरी कारोबार करने वाले , उनको सोशल मीडिया पर रहने की फुर्सत ही नहीं मिलती। अपने काम में मन लगाकर खोये रहते हैं तभी कुछ कर दिखाते हैं। जाने सरकार को इतनी फुर्सत कैसे मिलती है जो इसी में लगी रहती है। निठल्ली है क्या सरकार को कोई वास्तविक काम नहीं करने को। वफ़ा की बहुत बातें करती हैं देश राज्य की सरकारें हर कोई परेशान है इनके इकतरफा संदेश से जो सुनाई देते हैं सुनते नहीं कोई कुछ बोलता रहे आवाज़ नहीं जाती उन तक। बंद कमरों तक जनता की चीख पुकार नहीं जाती उनकी सब कसमें सेवा की प्यार की भलाई की छलावा हैं। वफ़ा की कसम बड़े बेवफ़ा हो आप सरकार मेरी। 

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