Saturday, 24 August 2019

कोई मंज़िल नहीं इस राह की ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

      कोई मंज़िल नहीं इस राह की ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

बात कुछ शायरी से करते हैं।  

पहले मेरी तीन ग़ज़ल और इक ग़ज़ल फ़िल्म की बहुत पुरानी लता जी की गाई हुई मुझे पसंद है :-

खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई ,
हर सांस पर पहरे लगाना सब की चाहत बन गई।

इंसान की कीमत नहीं सिक्कों के इस बाज़ार में ,
सामान दुनिया का सभी की अब ज़रूरत बन गई।

बेनाम खत लिक्खे हुए कितने छुपा कर रख दिये ,
वो शख्स जाने कब मिले जिसकी अमानत बन गई।

मतलूब सब हाकिम बने तालिब नहीं कोई यहां ,
कैसे बताएं अब तुम्हें ऐसी सियासत बन गई।
( मतलूब=मनोनित। तालिब=निर्वाचित )

अनमोल रख कर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में ,
देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई।

सब दर्द बन जाते ग़ज़ल , खुशियां बनीं कविता नई ,
मैंने कहानी जब लिखी पैग़ामे-उल्फ़त बन गई।

लिखता रहा बेबाक सच " तनहा " ज़माना कह रहा ,
ऐसे  किसी की ज़िंदगी कैसी इबादत बन गई।

 2    ये ग़ज़ल भी पढ़ कर देखते हैं :-

इन लबों पर हसी नहीं तो क्या
मिल सकी हर ख़ुशी नहीं तो क्या।

बात दुनिया समझ गई सारी
खुद जुबां से कही नहीं तो क्या।

हम खुदा इक तराश लेते हैं
मिल रहा आदमी नहीं तो क्या।

दोस्त कोई तलाश करते हैं
मिल रही दोस्ती नहीं तो क्या।

ज़ख्म कितने दिए मुझे सबने
आंख में बस नमी नहीं तो क्या।

और आये सभी जनाज़े पर
चल के आया वही नहीं तो क्या।

यूं ही मशहूर हो गए "तनहा"
दास्तानें कही नहीं तो क्या। 

 3    इक ग़ज़ल और :-

धुआं धुआं बस धुआं धुंआ

न रौशनी का कहीं निशां। 

हैं लोग अब पूछते यही

कहां रहें जाएं तो कहां। 

बहार की आरज़ू हमें

खिज़ा की उसकी है दास्तां। 

है जुर्म सच बोलना यहां

सिली हुई सच की है ज़ुबां। 

जला रहे बस्तियां सभी

नहीं बचेगा कोई मकां। 

न धर्म कोई न जात हो

हमें बनाना वही जहां। 

उसी ने मसली कली कली

नहीं वो "तनहा" है बागबां। 

अब बात हमारे समाज की वास्विकता की है :-

घर रहने को कैसा हो ये बात नहीं चर्चा इस बात की है कि घर कैसा हो जो अपनी शान को बढ़ाए। सामान अपनी सुविधा को देख कर नहीं शानो शौकत दिखाने को मगंगा और बेमिसाल होना चाहिए। ये ऐसी भटकी हुई सोच है जो कोई राह ही नहीं मंज़िल तो खैर क्या होगी। जीने को सामान होना ठीक है सामान की खातिर जीना उचित नहीं और सामान को हासिल करने को जीना हराम करना तो पागलपन है। पागलपन की भी कोई सीमा होती है चांद को पाने को हाथ ऊपर करना अलग बात है थाली में पानी में चांद की छवि को पकड़ने की कोशिश बचपन की भोली बात होती है। लोगों को ये खेल भाने लगा है। 

  सरकार भी यही करती है जनता को बच्चा समझ कर थाली में पानी में चांद की छवि दिखाने की तरह भाषण विज्ञापन से देश को खुश करना चाहती है। बहुत कुछ बिना कहे समझा जा सकता है आखिर में इक पुरानी फिल्म की ग़ज़ल को सुनते हैं क्या खूबसूरत ग़ज़ल है :-

        चांद निकलेगा जिधर हम न उधर देखेंगे , जागते सोते तेरी रहगुज़र देखेंगे।

        इश्क़ तो होटों पे फ़रियाद न लाएगा कभी , देखने वाले मुहब्बत का जिगर देखेंगे। 

        ज़िंदगी अपनी गुज़र जाएगी शाम ए ग़म में , वो कोई और ही होंगे जो सहर देखेंगे। 

        फूल महकेंगे चमन झूम के लहराएगा , वो बहारों का समां हम न मगर देखेंगे।

Thursday, 22 August 2019

पढ़नी-पढ़ानी है उल्टी पढ़ाई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  पढ़नी-पढ़ानी है उल्टी पढ़ाई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

     अध्यापक जी शब्दों के नये अर्थ खोज लाये हैं और पढ़ने वाले बच्चों को जिनकी आयु पचास से कम क्या होगी समझा रहे हैं। बचपन की शिक्षा अब काम की नहीं है आधुनिक काल की उल्टी पढ़ाई पढ़नी लाज़मी है उनको जिनको राजनीति की दुकानदारी करने का चस्का लगा है। शरीफ और शराफत का थोड़ा अंतर है जब तक बदमाशी सामने नहीं आती है कोई शरीफ माना जाता है और शराफत इसी को कहते हैं कि आपकी बदमाशी की बात आपको छोड़ किसी को खबर नहीं हो। राज़ को राज़ रखने को कोई राज़दार नहीं बनाना चाहिए नहीं तो हमराज़ ही राज़ फ़ाश किया करते हैं। अपराध अपराध नहीं होता जब तक सबूत नहीं सामने आये और बेगुनाही गुनाह बन जाती है जब आप साबित नहीं कर देते कि गुनहगार नहीं हैं। सीधी सच्ची बात है हर कोई चोर है पकड़े जाने तक साहूकार कहलाता है। 

    सरकार और विपक्ष उसी सिक्के के दो पहलू हैं जीत हार  सिक्का उछाल कर होती है हेड या टेल। जो जीता वही सिकंदर कहलाता है हारी बाज़ी को जीतने वाला बाज़ीगर कहलाता है। सत्ता रहते जिसको लूटने का अधिकार कहते हैं विरोधी दल का हो जाने पर लूट का दोषी अपराधी हो जाता है , लूट की छूट इक विशेषाधिकार की तरह है। जुर्म और इंसाफ भी साथ साथ चलते हैं हाथ पकड़ एक दूजे का उनका नाता ही असली नाता है। जिनके खिलाफ मुकदमा दर्ज था हेरा फेरी की थी वक़्त बदला तो उनको सरकारी गवाह बना उनके ब्यान का ऐतबार कर किसी और को धर पकड़ते हैं जीना नाम ही पहले नहीं था फाइल में मगर जिनके खिलाफ मुकदमा था उन पर भरोसा किया जा सकता है क्या हुआ जो उन पर कोई और कत्ल का भी मुकदमा चल रहा है। गोलमाल है जी सब गोलमाल है सीधे रस्ते की ये टेढ़ी ही चाल है। शतरंज में वज़ीर की चाल इसी तरह की होती है राजा को बचाना है प्यादे की कोई औकात नहीं है सरकारी गवाह मुकरते हैं सालों बाद जांच एजेंसी साबित नहीं कर पटी गुनाह या करना नहीं चाहती बदले हालात में। ये जांच एजेंसी सरकार की कठपुतली है जैसे सत्ता चाहती है नचवाती है उसकी धुन पर नाचना होता है। सरकार की मर्ज़ी बिना बताये समझती है अदालत भी जानती है , देखो थोड़े दिन पहले न्यायधीश ने कहा था एजेंसी वाले लोगों से आप राजनीतिक मामले में बड़ी जल्दी करते हैं और मुकदमें लंबित पड़े रहते हैं। आज खुद अपनी कही बात को भुला दिया है। निज़ाम बदलता है तो न्याय का न्यायधीश का नज़रिया बदलते देर नहीं लगती है। 

   अदालत का काम न्याय करना होता है मगर देश की सबसे बड़ी अदालत बार बार मिल बैठ कर आपसी समझौता करने को कहती रहती है। इंसाफ इंसाफ होता है और समझौता कभी इंसाफ नहीं होता क्योंकि उस का मकसद ही सभी को खुश करने को थोड़ा थोड़ा न्याय थोड़ा थोड़ा फायदा भी नुकसान भी मंज़ूर करना होता है। लोग जब अदालती तौर तरीकों से तंग आ जाते हैं तभी मिलकर समझौता करते हैं। अदालत जब कहे आपस में समझौता कर लो तब अर्थ होता है अदालत को इंसाफ नहीं करना ज़रूरी लगता है। हमारे देश में इंसाफ जीते जी नहीं मरने के बाद मिलने की उम्मीद होती है मरना आपकी मर्ज़ी नहीं है और परेशान हो कर ख़ुदकुशी की तो इक अपराध और शामिल हो जाता है। कत्ल करने पर सज़ा मिले नहीं मिले ख़ुदकुशी की तो अदालत आपको छोड़ेगी नहीं। जो नेता कभी देश की अर्थव्यवस्था और कानून व्यवस्था के रक्षक थे अब अकूत संपत्ति और अनुचित ढंग से आमदनी करने के आरोपी हैं , अगर उनके दल की सरकार होती तो जांच एजेंसी कानून अदालत बेबस होते जैसे उन लोगों के अपराधों को लेकर हैं जो अपराधी हैं मगर सत्ताधारी दल में शामिल हैं। यहां वक़्त बदलते ही खलनायक को नायक नायक को खलनायक बना दिया जाता है। देश के संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से कौन उम्मीद करता है कभी उसको ऐसे भी हिरासत में लेने का ढंग अपनाया जा सकता है। चाहे किसी भी दल के नेता हों संविधान की पालना की उनसे अपेक्षा की जानी चाहिए। विडंबना है कोई ऐसे पद पर रहा है जिसको आज जकड़ा गया है और कोई जो पहले इसी तरह कानून से जांच एजेंसी से भागता रहा आंख मिचोली खेलता रहा तब पकड़ा गया आज पद पर है।

      मगर ये टिप ऑफ़ दी आइसबर्ग ,  हिमशैल का शीर्ष है। कोई नहीं जो इन सभी धनपशुओं की वास्तविकता को उजागर करने का साहस करे। हम्माम में नंगे राजनेता ही नहीं धर्मगुरु ही नहीं जाने कितने अधिकारी कितने इंसाफ के रक्षक और अधिकांश बड़े बड़े उद्योगपति कारोबारी हैं जिन्होंने देश की संपदा का अधिकांश इस तरह से हथिया रखा है कानूनी हथकंडों से सत्ता की मिलीभगत और दुरूपयोग से। इन की कथनी महान है आचरण बेहद निम्न स्तर का चोरों से भी बढ़कर डाका डालने वालों का है। देश सेवा की ओट में यही चलता रहा और चल रहा है मगर हम देख कर भी सोचते नहीं करोड़ों रूपये चुनावी खर्च का अर्थ यही है। जो टीवी अख़बार मीडिया कभी सच बताया करता था सरकारी विज्ञापन के रूप में चोरी के माल का भागीदार बनकर शामिल है इस लूट के खेल में। सब का अपना हिस्सा है और नतीजा देश की जनता को बदहाली के रूप में मिलता है।  कुमार विश्वास की इक कविता याद आई है सुनते हैं।



      आपको याद है कि भूल गए ये वही सीबीआई है जो अपने ही दफ्तर में आधी रात को छापा डालने जैसा काम करती है। सीबीआई की अदालत में सीबीआई के अधिकारी सीबीआई के अधिकारी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करते हैं और आधी रात को जो किसी सीबीआई अधिकारी की जांच करवा रहा था उसको बदल दिया जाता है और जिस पर आरोप लगा था उसको जांच करने वाले की जगह नियुक्त कर न्यायधीश बनाने का काम किया जाता है। हम रोज़ अध्याय पढ़ते हैं भूल जाते हैं मगर राजनेता अधिकारी आपस में कुश्ती लड़ते रहते हैं। उनका ये अजब खेल हमने बचपन में खेला था , चोर सिपाही का। बारी बारी चोर सिपाही बनते हैं। मगर बच्चे भोले होते हैं उनको चोरी आती है न चोर को पकड़ना ही। मगर देश की सत्ता पर आसीन लोग जाने कब से यही खेलते हैं भरी सभा में भाषण देते हुए कितनी बार देखा है नेताओं को ये धमकी देते हुए कि सबके कच्चे चिट्ठे उनके पास हैं। उनको केवल अवसर आने पर उपयोग करना है कोई सच की न्याय की बात नहीं करनी है। 

Tuesday, 20 August 2019

उम्मीद का दामन छोड़ दिया ( दास्तान ए ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया

 उम्मीद का दामन छोड़ दिया ( दास्तान ए ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया 

  नहीं मुझे किसी से कोई गिला नहीं कोई शिकवा-शिकायत भी नहीं है। इंसान तो क्या भगवान से भी कुछ भी नहीं कहना बाकी अब। बहुत मनाया हर किसी को सरकार से भी चाहा कहना सब हाल देश समाज का अपना भी उनका भी जो मुझे बेगाना समझते हैं। हर किसी को अपनाने की कोशिश में खुद अपने आप को ही खो दिया अब तो अपनी तलाश भी करने को फुर्सत नहीं है। मुझे न दुनिया समझ आई न दुनिया के दस्तूर न भगवान से सरकार तक पता चला कि है क्या और नज़र आता क्या है। सब ने कहा हमारा समाज धार्मिक है हमारा देश महान है यहां के लोग दया धर्म की मिसाल हैं बड़ी अच्छी अच्छी परंपरा की मिसाल देते हैं हर कोई भला होने का दम भरता है हर किसी को औरों में बुराईयां दिखाई देती हैं खुद को सब सोचते हैं सबका शुभचिंतक हैं। अब ऐसे अच्छे महान लोगों में मुझ जैसा आदमी जो किसी भी काबिल नहीं जीना चाहे भी तो कैसे जी सकता है। बचपन से सभी ने कमियां बताई हैं नहीं किसी को कुछ भी अच्छाई नज़र आई कभी मुझ में। गुनहगार समझते हैं लोग बेबाक सच कहता है जो भी।  भला इस सूरत ए हाल में कोई आदमी कैसे जी सकता है , हम सभी पल भर भी मरते  हैं  इसी कोशिश में कि शायद कोई अपना या बेगाना या कोई दोस्त या अजनबी या शहर गांव समाज का कोई खुश हो जाये मगर नहीं संभव होता है ये कभी भी। सच का पक्ष लेना साथ देना कोई नहीं चाहता , सच बोलने वाले को पागल कहते हैं और झूठ की जय जयकार करते हैं समझते हैं बड़ी अच्छी बात करते है।  चलो पुरानी सब बातों को छोड़ आज की बात करते हैं। 

          सरकार जनता की भलाई को बनाई जाती है और हर सत्ताधारी जनता का सेवक होने का दावा करता है। विकास के नाम पर सरकार कितनी इमारतें बनाती है ये जितने लोग हैं पहले से इनके पास कितने आलीशान भवन हैं बंगले महल से बढ़कर सरकारी दफ्तर भी और तमाम विभाग के अनगिनत मकान ज़मीन और साधन भी। नहीं होता तो जिस मकसद से विभाग बनाये जनता की समस्याओं का निवारण का काम। आज सब से अधिक जगह भवन दफ्तर अन्य विभागीय जायदाद इन के पास है जिनका उपयोग तक नहीं होता है फिर भी और बनाने की बात की जाती है जबकि देश की करोड़ों की आबादी को रहने को घर नहीं पढ़ने को स्कूल कॉलेज धनवान लोगों के लिए अस्पताल भी गरीब लोगों के लिए कम रईस लोगों के लिए आधुनिक और तमाम सुविधा से लैस। महान देश की यही निशानी है कुछ को बहुत किसी को पेट भरने को दो वक़्त रोटी भी नसीब नहीं। जाने किस धर्म की बात करते हैं क्या नफरत सिखाने वाला कोई धर्म हो सकता है। ऐसे समाज में जीना कौन चाहता है। सरकार आदेश देती है सभा में नेता भाषण देते हैं हर दिन उनके इश्तिहार गली गली सड़क चौराहे पर नज़र आते हैं। आम नागरिक सुन सकता है बता नहीं सकता अपना दर्द अपनी व्यथा , नहीं किसी अधिकारी को नेता को सुनने की चाहत नहीं फुर्सत नहीं ज़रूरत नहीं। सब अपने खुद को जो नहीं हैं बताने की बात करते हैं। भगवान की बात क्या करें सरकार की तरह कितना उसी के नाम पर जाने किन किन लोगों ने जमा किया हुआ है जिसको धार्मिक कार्य दीन दुखियों की सहायता पर नहीं बाकी सब पर खर्च किया जाता है। संचय नहीं करने का उपदेश देते हैं मगर सबसे अधिक संचय वही करते हैं जो खुद को धर्म के जानकर बताते हैं। आशावादी कोई चाहे भी कैसे बना रह सकता है। विकास मानवता का होता तो कुछ बात थी सरकार और संस्थाओं ने अपने भवन अपने खातिर तमाम साधन खड़े करने को विकास नाम दे दिया है। अदालतों में इंसाफ की हालत दफ्तरों में काम की चाल बिगड़ी है मगर चमक दमक बढ़ रही है।

   जनता पर नियम लागू किया जाता है ये नहीं हुआ तो आपका परिसर बंद आपका कारोबार बंद किया जा सकता है। सरकारी विभाग हर काम में असफल रहते हैं उनको बंद करने की कोई बात नहीं करता। काश उन पर भी नियम लागू किया जाता जिस काम को विभाग बनाया जिस कर्तव्य को अधिकारी कर्मचारी नियुक्त किये वो काम नहीं हुआ तो उनकी होने की ज़रूरत क्या है। हर नियम की तलवार आम जनता पर दहशत कायम रखने को है और असंभव नियम बना देते हैं या फिर कमाल की बात सरकार अपने कानून को लागू करने पर बदलती रहती है पचास बिस्तर तक के अस्पताल पर कानून नहीं लागू किया जायेगा ऐसा करने से अपने तीन चौथाई लोगों को छूट दे दी। हर किसी पर समान नियम एक देश एक कानून की चर्चा होती है तो ऐसा किसी एक राज्य की बात क्यों हो देश भर में और सबसे पहले खुद कानून बनाने वालों पर सख्ती से लागू हो। किसी भी तरह का अपराध अनधिकृत निर्माण अवैध कब्ज़ा जिन सरकारी अधिकारियों के समय हुआ उन्होंने होने क्यों दिया उनके पद पर होने का औचित्य क्या था। ज़रूर उनकी मिलीभगत रही होगी उनको छोड़ना अर्थात वही सब भविष्य में होने देना।

       गरीबी की रेखा की बात कोई नहीं करता बल्कि अब सरकार आंकड़े देती है इतने करोड़ भूखे नंगे गरीबों को क्या क्या सहायता दे रही है। जनता को भिखारी रखकर देश का विकास नहीं हो सकता है। जिस बात पर सरकार को शर्म आनी चाहिए उसी को एहसान बता रहे हैं। ये भी लूट है कि आपको राजा महाराजा की तरह शानो शौकत से रहना पसंद है जिस देश में लोग दो वक़्त रोटी क्या साफ पीने के पानी को तरसते है मगर आपके सामने मिनरल वाटर की बोतल सजी रहती हैं। आपको सब सस्ते में मुफ्त में हासिल होना ये कैसी देश की जनता की भलाई है जनसेवा है। राजनीतिक चंदे को गोपनीय बनाना विदेशी चंदे का हिसाब नहीं बताना और हर दिन सभाओं पर बेतहाशा धन उड़ाना देश की जनता की बदहाली पर ठहाके लगाना है। नहीं जनसेवक नहीं हैं जो लोग संसद विधायक होने की कीमत जीवन भर लेते हैं। ये देश संपन्न है इसको गरीब रखा है कभी विदेशी लुटेरों ने तो अब अपने ही चुने विधायक संसद और नियुक्त अधिकारी कर्मचारी वर्ग ने। इनकी तथाकथित सेवा की बड़ी महंगी कीमत चुकाते हैं हम लोग। देश का मंत्री प्रधानमंत्री राज्य का मुख्यमंत्री या बड़े अधिकारी सफ़ेद हाथी की तरह हैं जिनका मकसद जनता की भलाई नहीं सत्ता की मलाई खाना है। जब ये अपने इश्तिहार छपवाते हैं तो कोई नहीं पूछता ये अपने दिया है या जनता को उन्हीं का धन भी नाम भर को देने को महान बताते हैं कोई श्वेत पत्र जारी हो कितना धन खुद इन पर खर्च किया गया और उसका औचित्य क्या है। देशभक्ति देशसेवा जनता की भलाई का नाम देकर जो किया गया उसको रहबर बनकर रहजनी कहते हैं अर्थात रखवाला बनकर लूटने का रक्षक बनकर भक्षक का काम करना। सबसे बड़ा अपराध इन्होने देश के संविधान को अपनी ज़रूरत या मर्ज़ी से बदला तोड़ा मरोड़ा है उसकी भावना को दरकिनार करते हुए। स्वार्थ में अंधे लोग देश समाज को नफरत की आग में झौंकते हैं सत्ता की रोटियां सेंकने को उनसे उम्मीद रखना खुद को धोखे में रखना होगा।

                                           

Sunday, 18 August 2019

चांद तन्हा है आस्मां तन्हा ( कहानी पाकीज़ा की ) डॉ लोक सेतिया

चांद तन्हा है आस्मां तन्हा ( कहानी पाकीज़ा की ) डॉ लोक सेतिया 

कहानी साहिबजान की है बाज़ार के कोठे से गुलाबी महल तक की सफर की। जिनको शौक होता है नाच देखने का उनको किसी औरत का दर्द कब समझ आता है। शुरुआत मीना कुमारी की शायरी से करते हैं। 

चांद तन्हा है आस्मां तन्हा , दिल मिला है कहां कहां तन्हा। 

ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं , जिस्म तन्हा है और जां तन्हा। 

बुझ गई आग छुप गया तारा , थरथराता रहा धुंआ तन्हा। 

हम सफर गर मिले भी कहीं , दोनों चलते रहे तन्हा तन्हा। 

जलती बुझती सी रौशनी के परे , सिमटा सिमटा सा इक मकां तन्हा। 

राह देखा करेगा सदियों तक , छोड़ जाएंगे ये जहां तन्हा। 




उनका निज़ाम है उन्हीं का फरमान है महिलाओं की भी चिंता है और जिनको खूबसूरती का लुत्फ़ लेने का रहीसाना शौक है उन लोगों को भी खुश करना है इसलिए गरीबी की दलदल से निकलने को उसको सभी का दिल बहलाने को नाचना गाना है। अब किस को फुर्सत है समझता उसकी मर्ज़ी क्या है किस किस ने कैसे कैसे कहां कहां उसका दुपट्टा छीना छेड़खानी की। लोग उतावले हो रहे हैं गुलाबी महल जाने को अब कोई कानूनी अड़चन नहीं है। खूबसूरत महिलाओं को अस्मत के बदले सोना चांदी गहने कपड़े और सजने धजने को बन संवर कर नाचना गाना सीख कर दिल बहलाने को सब मिल सकता है। लोग आएंगे उनसे खिलवाड़ करेंगे और लौट जाएंगे अपनी पाप की कोई निशानी देकर।  जब जब फूल खिले की कहानी कश्मीर की कली की कितनी कहानियां हैं मगर ताजमहल की कहानी की बात और है शहंशाह पहले अपनी पसंद की महिला को बेवा बनाते हैं उसके शौहर का कत्ल करते हैं फिर जी भर उसके साथ जिस्मानी प्यार खेलते हैं मर जाने पर उसकी बहन से निकाह करते हैं और अपनी मुहब्बत की यादगार ताजमहल बनवाते हैं। शाहजहां की सात बीविओं में छोटी थी मुमताज और चौदवहीं बार संतान को जन्म देते समय उसकी मौत हुई थी। किसी ने कहा था कि मुमताज बनने की आरज़ू मत करना क्योंकि ताजमहल लोगों ने देखा है मुमताज ने नहीं देखा।

  शासकों का इश्क़ पागलपन हुआ करता है जिसको अपनाना चाहते उसकी सहमति की ज़रूरत नहीं समझते हैं। बाद में मानने के इलावा कोई विकल्प नहीं होता है। मुग़ले आज़म फिल्म में कलाकार को राजा अनारकली तोहफ़े में देने की बात कहते हैं तब कलाकार कहता है अब समझ आया कि शहंशाहों के ईनाम और ज़ुल्म में कोई फर्क नहीं होता है। नाफ़रमानी का अंजाम हाथी के पांव तले कुचला जाना है समझाता है और इनकार कर देता है। अभी सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ ऐसा कहा भी है कि अभिव्यक्ति पर पाबंदी अनुचित है। मगर यही अदालत इस को अनदेखा करती है कि जिसके भविष्य की बात है उस से कोई नहीं पूछता उसको क्या चाहिए। इक कविता याद आती है महिला को लेकर , जो कहती है उसको सुनार को मत देना किसी लोहार संग ब्याह देना जो मेरी बेड़ियों को काट दे और मुझे आज़ाद कर दे। कोई भी महिला किसी की कैद में नहीं रहना चाहती
आप मैना को पिंजरे में बंद कर देंगे तो उसका मधुर संगीत नहीं सुनाई देगा। वो किसी बाज़ारी कोठे पर बिठाई गई हो या चाहे किसी शानदार राजभवन जैसे गुलाबी महल में उसकी आवाज़ का दर्द समान रहता है। किसी की आज़ादी छीनकर बदले में कुछ भी देने से कोई खुश नहीं होता है। गुलामी की ज़िंदगी से बेहतर समझा था जिन लोगों ने मौत को उन्होंने हंसते हंसते सूली को चूमा था।

    दुनिया का हर तानशाह शासक खुद को मसीहा और देशभक्त समझता रहा है। मगर वास्तव में तानाशाह को सत्ता को छोड़ किसी की चिंता नहीं हुआ करती है। पाकीज़ा फिल्म कमल अमरोही का शाहकार है जिस को बनाने में बीस साल का विलंब उन पति-पत्नी के संबंध खराब होने के कारण हुआ। कम लोग जानते हैं कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को गुस्से में आकर तलाक दे दिया था मगर बाद में पछतावा था लेकिन जब फिर से निकाह करने की बात की तब मुस्लिम धर्म गुरुओं ने पहले किसी और से निकाह और शारीरिक संबंध बनाने का नियम बताया जिस पर मीना कुमारी का कहना था अगर मेरी सहमति के बिना कोई भी मेरे साथ ऐसा रिश्ता कायम करता है तो मुझ में और किसी बाज़ारी वैश्या में क्या फर्क रह जाता है। जब चाहा पत्नी को छोड़ दिया जब मन चाहा फिर अपनाना चाहा इसको प्यार नहीं कहते हैं। संदेश समझ आया कि  नहीं एकतरफा मुहब्बत प्यार नहीं ताकत के दम पर सितम करना होता है। जिस को चाहते हैं अपनाना उसकी सहमति बिना किसी भय के है तभी उचित है।

 


 

 



  


संविधान बदलते बिना जाने बिना समझे ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  संविधान बदलते बिना जाने बिना समझे ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

       ये बात क्यों किसी ने नहीं सोची अभी तक कि जिनको संसद विधायक बनाते हैं या जिन अधिकारियों  को देश का संविधान लागू भी करना है और उसकी भावना का आदर करते हुए सुरक्षित भी रखना है पहले उनको देश के संविधान की समझ तो हो। हर उम्मीदवार को पहले ये इम्तिहान देना ज़रूरी हो कि संविधान का मकसद क्या क्या है। अन्यथा नहीं लें तो मुझे लगता है जिनको संसद विधानसभाओं में संविधान की अनुपालना करनी है उनकी परीक्षा ली जाये तो अधिकांश को उत्तीर्ण होने लायक अंक भी नहीं मिलेंगे। जिनको पता ही नहीं मतलब क्या है उन्होंने अपनी मनमानी अपनी मर्ज़ी या सुविधा से संविधान में बदलाव तक किया है। जैसे कोई अधिवक्ता अदालत में मुजरिम का जुर्म जानकर भी उसको बचाता है अपनी कमाई की खातिर और न्याय की आंखों में धुल झौंकता है न्याय का पक्ष नहीं अपने कारोबार को देखते हुए। डॉक्टर इंजीनयर या शिक्षक अगर अपनी जानकारी को इस तरह गलत मकसद से उपयोग करते हैं तो अनुचित है तो ये नियम सभी पर लागू होना चाहिए। अब जिन नेताओं को समझ ही नहीं संविधान की उनसे कानून और संविधान की सुरक्षा की उम्मीद बंदर के हाथ तलवार देने का काम जैसा है। क्या यही नहीं होता रहा सत्ताधारी नेताओं ने देश के संविधान को बदलने को उचित अनुचित की चिंता छोड़कर मनमाने ढंग से कोई भी तरीका या रास्ता अपना कर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहा है। अब तो संभलना होगा उनको पता भी है उन्हें किस संवेदनशील विषय पर सोच विचार कर निर्णय करना है अपने विवेक का उपयोग करते हुए न कि किसी आलाकमान के आदेश पर देश और संविधान के हित को दरकिनार कर देश विरोधी कार्य करना है। देश संविधान किसी भी राजनैतिक दल या राजनेता से बहुत ऊपर है। कहीं हम नीम हकीम खतरा ए जान जैसा काम तो नहीं करते आये हैं या फिर हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।



           ये कुछ उसी तरह है जैसे धार्मिक किताबों को हम पढ़ते नहीं समझते नहीं मगर उनको मानने की बात करते हैं उन की बताई राह चलना नहीं केवल हाथ जोड़ना सर झुकाना जानते हैं। माता पिता गुरु की बात नहीं मानते उनको नासमझ मानते हैं पर लोकलाज दिखावे को पांव छूते हैं हाथ जोड़ नमस्कार करते हैं उनका कहना नहीं मानते हैं। मंदिर कोई भवन नहीं केवल स्थापित मूर्ति नहीं हर धर्म देवी देवता की बताई सच्चाई अच्छाई न्याय की राह पे चलने का भाव रहने से धार्मिक स्थल बनता हैं अन्यथा आडंबर करना है। आज हम देखते हैं धर्म कोई सद्मार्ग दिखाने का नहीं इक कारोबार बन गए हैं भक्त बढ़ रहे हैं धर्म नहीं अधर्म बढ़ता नज़र आता है। हमने वोट मांगने आये नेताओं से कभी पूछा तक नहीं उनको संविधान की कितनी जानकारी है और क्या उनकी सच्ची आस्था है देश के कानून और संविधान में। जो लोग संविधान की धज्जियां उड़ाते हैं हम कैसे उनको संसद विधानसभा भेज सकते हैं।

      अब सवाल उठता है जनमत को लेकर तो सबसे पहली बात ये समझने की है कि हमारी व्यवस्था में कितने विधायक सांसद पचास फीसदी से अधिक मत पाकर विजयी होते हैं। आम तौर पर सरकार को जिस भी दल की हो देश या राज्य में हुए मतदान का पचास फीसदी से कम ही हासिल हुआ होता है। लेकिन तब भी अगर कहीं बहुमत किसी को दोषी समझ ले या ऐसा राय बना दी जाये जो किसी को अपराधी मानती हो मगर देश की अदालत और कानून उसको बेगुनाह निर्दोष समझते हैं तो भीड़ का न्याय लागू नहीं किया जा सकता है। देश का संविधान कानून के अनुसार चलता है कबीलाई इंसाफ से हर्गिज़ नहीं।


इक कहानी है पुरानी जिस में कोई घर का रखवाला बन जाता है मगर भीतर मन से डरा हुआ रहता है कहीं उसको मिला सब कोई चुरा नहीं ले जाये। बचाने को घर को हर तरफ आग के शोलों से घेर देता है और सब कुछ घर का जलाकर राख कर देता है। घर पर कब्ज़ा उसका कायम रहता है मगर घर का कुछ भी बचता नहीं है। नफरत की आग ऐसी लगाई है कि हर तरफ सभी उसी आग में खुद भी जलते हुए लगते हैं और बाकी लोगों को भी नफरत के लपेट में लेना चाहते हैं।

Friday, 16 August 2019

वफ़ा की कसम बेवफ़ा हो ( इल्ज़ाम ए मुहब्बत ) डॉ लोक सेतिया

  वफ़ा की कसम बेवफ़ा हो ( इल्ज़ाम ए मुहब्बत ) डॉ लोक सेतिया

  इश्क़ मुहब्बत ज़िंदगी का हिस्सा है , हर किसी को इश्क़ हो जाता है या होना चाहिए। इश्क़ किसी से भी हो सकता है कोई खेल से कोई संगीत से कोई समाज सेवा से करता है। मुझे इश्क़ है लेखन से और हद से बढ़कर है जनहित की बात ने किसी और काम का नहीं रहने दिया। बदनसीब होते हैं जिनको किसी से इश्क़ नहीं हुआ कभी भी। पैसे शोहरत ताकत की चाहत पागलपन हो सकती है इसको इश्क़ नहीं समझना। ये बदलते पल भी नहीं लगता है। राजनेताओं की देश से मुहब्बत सत्ता कुर्सी की मुहब्बत होती हैं इनका भरोसा नहीं कब क्या कर बैठें। इश्क़ का कारोबार नहीं होता और राजनीति वैश्यावृत्ति दोनों धंधे हैं प्यार भी बिकता खरीदा जाता है।
कितना बदल गया आशिक़ी का चलन भी , मुल्क से महबूबा से इश्क़ भी मतलब से और फुर्सत होने पर करते हैं। चांद सितारे तोड़ लाने का ख्वाब दिखला कर अस्मत लूट लेते हैं। सोशल मीडिया का प्यार और देशभक्ति बड़ी आसान है करना धरना कुछ नहीं बातें बड़ी बड़ी की जाती हैं। 

      देश समाज को लेकर गंभीर चिंतन सोशल मीडिया पर कोई नहीं करता है। मगर इन दिनों कुछ अच्छा अनुभव हुआ है। बहुत दिन बाद लगा फेसबुक व्हाट्सएप्प पर ही सही कुछ लोगों ने पढ़ा समझा और अपनी राय भी बताई और अपनी सहमति असहमति को भी उजागर किया। पहले उनका आभार व्यक्त करना ज़रूरी है क्योंकि किसी के लिखने की सार्थकता इस में है लोग पढ़ कर समझें चिंतन करें। जागते रहो कहना है कोई जागता है या नहीं ये उन पर है। सबसे पहली बात लिखने की ये है कि हर रचना कोई विषय लेकर होती है और उसी को ध्यान में रखते हुए बात की जाती है। सच लिखा जा सकता है खरा भी और आधा सच भी लिखते हैं कुछ लिखने वाले मगर मुक़्क़मल सच लिखना संभव नहीं है क्योंकि उस में एक दो नहीं कितने ही पक्ष हो सकते हैं। कभी किसी जाने माने साहित्यकार ने सवाल किया था आप हर विधा में किसलिए लिखते हैं बेहतर है कोई इक विधा चुने जिस में आपको महारत हासिल हो। मुझे महारत हासिल करने बड़ा लेखक बनने की चाहत कभी नहीं थी मुझे तो कुछ बात कहनी थी और जिस विधा में कह सकता था लिख दिया करता। तब इक ग़ज़ल कही थी। 

                   कहानी हो ग़ज़ल हो बात रह जाती अधूरी है ,

                   करें क्या ज़िंदगी की बात कहना भी ज़रूरी है। 

ग़ज़ल की ख़ासियत है बहुत थोड़े शब्दों में बहुत बड़ी बात कही जा सकती है मगर सलीके से। ग़ज़ल से मुझे मुहब्बत है मगर मेरे भीतर का व्यंग्य लिखने वाला अपने तेवर छुपा नहीं सकता है। आज शुरुआत बेग़म अख़्तर की गाई ग़ज़ल से करता हूं। 

मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे 

मैं हूं दर्द ए इश्क़ से जां-बल्भ मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे। 

मेरे दाग़ ए दिल से है रौशनी इसी रौशनी से है ज़िंदगी 

मुझे डर है ए मेरे चारागर ये चिराग़ तू ही बुझा न दे।       ( चारागर = डॉक्टर )

मुझे ऐ छोड़ दे मेरे हाल पर तेरा क्या भरोसा है चारागर 

ये तेरी नवाज़िशें -मुख़्तसर मेरा दर्द और बढ़ा न दे।       ( नवाज़िशें-मुख़्तसर = ज़रा ज़रा से एहसान )

मेरा अज़म इतना बलंद है कि पराये शोलों का डर नहीं 

मुझे ख़ौफ़ आतिशे गुल से है कि कहीं चमन को जला न दे।        ( आतिश = आग )

वो उठे हैं लेके खुमो-सुबू अरे ओ शक़ील कहां है तू 

तेरा जाम लेने को बज़्म में कोई और हाथ बढ़ा न दे। 

ग़ज़ल की बात ही कुछ और है जितना कहा उस से ज़्यादा अनकहा होता है छुपा हुआ। ग़ज़ल का दर्द से रिश्ता है क्योंकि ग़ज़ल शब्द निकला ही इसी से है। ग़ज़ल की परिभाषा यही है कि जब हिरण का बच्चा भागते भागते झाड़ियों में फंस जाता है और शिकारी का तीर खाने पर जो आवाज़ उसकी निकलती है उसी को ग़ज़ल कहते हैं। ग़ज़ल सुनकर जब लोग तालियां बजाते हैं मालूम नहीं उस में छुपे दर्द को महसूस भी करते हैं या नहीं। कल किसी ने कहा मुझे टैग नहीं करें तो पूछा नहीं पढ़ना पसंद तो जवाब था अच्छा लगता है पढ़ना मगर मेरी टाइम लाइन पर जगह नहीं मुझे मेस्सेंजर पर भेजा करें। चलो ये भी पता चला आपको साहित्य भी अपनी सुविधा से मर्ज़ी या साहूलियत से पढ़ना है। किसी का इक शेर याद आया है। 

  बादलों के पास है हर किसी के वास्ते कोई बूंद , शर्त ये है उतनी शिद्दत से कोई प्यासा तो हो।

      हमने समय बिताने को दिल बहलाने को सोशल मीडिया पर लिखना पढ़ना शुरू किया है। मकसद समाज देश को समझना नहीं समझदार होने का दावा करना है। प्यार मुहब्बत इश्क़ से लेकर देश से प्यार तक हम सार्वजनिक मंच पर जो नज़र आते हैं असली जीवन में वैसे नहीं होते। टीवी अख़बार पर कैमरे के सामने देशभक्ति का दिखावा करना कठिन नहीं है वास्तविक देशभक्ति देश की खातिर निडर होकर बिना किसी स्वार्थ कुछ करना है। हर किसी को लेकर सवाल खड़े करते हैं कभी खुद को भीतर से झांककर नहीं देखते अन्यथा शोर नहीं करते खामोश हो जाते। लिबास शानदार पहन पर आपकी शख्सियत नहीं अच्छी बनती कभी। भीतर कोई और है बाहर दिखाई और देता है। जैसे आजकल लोग किसी का जिस्म पाना चाहते हैं और उसकी तारीफ करते हैं मुहब्बत करने की झूठी बातें करते हैं निगाह में चाहत अपनी हवस की भूख मिटाने की रहती है। यकीन करें सबकी असली सूरत पता चले तो शायद ही कोई सच्चा आशिक़ मिले कोई सच्चा देशभक्त दिखाई दे। 

    जो लोग अपना काम करते हैं डॉक्टर्स इंजीनियर अध्यापक अधिकारी मज़दूर से नौकरी कारोबार करने वाले , उनको सोशल मीडिया पर रहने की फुर्सत ही नहीं मिलती। अपने काम में मन लगाकर खोये रहते हैं तभी कुछ कर दिखाते हैं। जाने सरकार को इतनी फुर्सत कैसे मिलती है जो इसी में लगी रहती है। निठल्ली है क्या सरकार को कोई वास्तविक काम नहीं करने को। वफ़ा की बहुत बातें करती हैं देश राज्य की सरकारें हर कोई परेशान है इनके इकतरफा संदेश से जो सुनाई देते हैं सुनते नहीं कोई कुछ बोलता रहे आवाज़ नहीं जाती उन तक। बंद कमरों तक जनता की चीख पुकार नहीं जाती उनकी सब कसमें सेवा की प्यार की भलाई की छलावा हैं। वफ़ा की कसम बड़े बेवफ़ा हो आप सरकार मेरी। 

जंज़ीरों में जकड़ी आज़ादी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     जंज़ीरों में जकड़ी आज़ादी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

    गब्बर सिंह कभी ख़त्म नहीं लेते भेस बदलते रहते हैं। हर गब्बर सिंह खुद को मसीहा समझता है या नहीं मगर जतलाता ज़रूर है। समय के साथ बसंती बदलती है वीरू को मना लेती है खुद भी मान जाती है इठलाती बलखाती झूमती गाती है सबका दिल बहलाती है। संसद तक पहुंच जाती है हेलीकॉप्टर से आती जाती है गेंहूं की फसल से वोटों की बालियां काट लाती है। सभी चोर डाकू गब्बर सिंह के गिरोह में शामिल होने को बेताब हैं। हर किसी के सुनहरे ख्वाब हैं। आज़ादी का जश्न मनाना है झंडा फहराना गीत गाना है सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा सुनना सुनाना है। परंपरा को निभाना है हर चुनौती को गले लगाना है। कवि कहता है विनय विश्वास , आवाज़ का मतलब चिल्लाना या मिम्याना नहीं होता है। ख़ामोशी का मतलब सहमत होना सहम जाना नहीं होता है। महिला कवि एकता शबनम की भी कुछ पंक्तियां सुनते हैं। ग़म को जिस पे नाज़ हो ऐसी ख़ुशी रखती हूं मैं , कुछ वजह होगी कि खुद से दुश्मनी रखती हूं मैं। दिल में रहकर दूर है मेरी हुदूदे चाह से , अपने एहसासों में शायद कुछ कमी रखती हूं मैं। गुलशन-ए - हस्ती में पाया गुल से बढ़कर खार को , दुश्मनों से इसलिए दोस्ती रखती हूं मैं।

        ये कमाल है अदालत कहती है गब्बर राज में क्या हो रहा है उसको नहीं खबर मगर सरकार बता रही है सब ठीक है पाबंदी अभी ज़रूरी है हालात ठीक हैं मगर ठीक रखने को पाबंदी रखनी ज़रूरी है। हालात बिगाड़े क्यों ये सवाल मायने नहीं रखता सुधारने की कोशिश भी है और ठीक होने का दावा भी। चलो इक वीडियो देखते हैं।  देखो वीरू कह रहा है बसंती नाचो गब्बर सिंह को खुश रखना है उसका इंसाफ शोले वाला है सब को सज़ा मिलेगी बराबर मिलेगी मगर बहुत नाइंसाफी है आदमी कम कारतूस ज़्यादा। अब ठीक है जितने आदमी उतनी बंदूकें बदला युग है हर निशाना पक्का है और गोलियां कितनी हैं कोई नहीं जानता है। अदालत को कोई जल्दी नहीं है गब्बर पर भरोसा रखना चाहिए मानती है मानने को कहती है। गब्बर सिंह का सरकारी वकील कहता है लोग ख़ुशी मना रहे हैं। कैद में है बुलबुल मगर गा रही है गब्बर को गीत सुना रही है। सरकारी वीडियो दिखलाता है बच्चा खुश है बूढ़ा भी था जो कुछ बोला था उसको खामोश करवाया देख बच्चा खुश है। बच्चे बहल जाते हैं मिठाई लाकर देने के वादे से ही समझदार नहीं खुश होते चिकनी चुपड़ी बातों से।

अदालत पर लोग भरोसा किया करते थे क्योंकि पहले न्याय करने वाले सच को जानने की बात ही नहीं करते थे सच को परखने ढूंढने की भी कोशिश किया करते थे। सरकार बहाने बनाती तो बेबाक पूछते भी थे। जब अदालत खुद मानती है उसे नहीं मालूम किस राज्य में क्या हो रहा है मगर नागरिक के अधिकारों और देश के संविधान की चिंता करने को बताती है कोई जल्दी की बात नहीं है समय लगता है तब इंसाफ क्या होगा क्या होगा कैसे होगा जैसे सवाल मिटा देने पड़ते हैं उसी तरह जैसे सरकारी दफ्तर से गोपनीय दस्तावेज़ खो जाते हैं। आग है धुआं है कि घना अंधकार है गुबार है कोहरा है मत कहो ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। धुंध छंटने तक घरों में कैद जंज़ीरों में जकड़ी आज़ादी का जश्न मनाना होगा। आपको देशभक्त कहलाना होगा कैमरा देख कर मुस्कुराना होगा।
   
        आरक्षण की व्यवस्था की गई थी सदियों तक दलित शोषित वर्ग को बराबरी पर लाने को। मगर स्वार्थ की अंधी राजनीति ने इसको किसी दावानल की आग की तरह बना दिया है। शिक्षा पाने को नौकरी पाने को कुछ समय तक छोटी जाति समझे गए लोगों को अवसर देने इसकी ज़रूरत थी मगर समय सीमा बढ़ाते बढ़ाते और पदोन्नति से लेकर राजनीति तक में काबलियत से अधिक महत्व स्वार्थ को देने से ये कोई लाईलाज रोग बन गया है। अब आरक्षण केवल दलित को नहीं अन्य भी अघोषित आरक्षण हासिल किया जाने लगा है। संसद में महिला आरक्षण भले नहीं मिला हो मगर धनवान और बाहुबली लोगों को अवसर मिलना उसी तरह का ही है। राजयसभा को तो धनपशु लोगों का राजनीति के नाम पर जाने क्या करने का स्थान बना दिया गया है। ये हैरानी की बात है कि अपराधी छवि के लोगों को सभी दलों ने शामिल किया है चुनावी जीत को देश हित से अधिक महत्व देकर। कितने काबिल लोग संसद की शोभा और गरिमा बढ़ाया करते थे लेकिन आजकल कैसे कैसे लोग वहां माननीय कहलाते हैं। सरकार ने सब्सिडी की सहायता खुद लोगों को लेना बंद करने की पहल की ताकि जिनको वास्तव में ज़रूरत है उनको मिल सके। फिर आरक्षण को भी जो लोग संपन्न हैं क्यों नहीं छोड़ सकते अपने ही वर्ग के ज़रूरतमंदों को मिल सके इस खातिर। सबसे अधिक गलत असर हर राज्य हर समाज में आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलनों से नफरत हिंसा और लोगों को विभाजित करने का किया है। आज हालत ये है कि इसको हटाने की बात कोई राजनेता या दल करने का साहस नहीं करता अपने दलीय हित को देशहित से पहले समझते हैं। कम से कम देश की व्यवस्था चलाने वाले संसद विधायक या बड़े पद पर नियुक्त अधिकारी काबिल होने के आधार पर बनने ज़रूरी हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि ऐसा नहीं है और चुनावी और सत्ता की रणनीति ने सभी जगह आरक्षण और चंदे या बाहुबल की ताकत का गणित साधने का काम किया है। हम कितने देशों से विकास में पिछड़े हैं ऐसी ही गलतियों के कारण और कोई इस गलती को सुधारने की बात नहीं सोचता है।

        धारा 370 का असर कुछ लोगों और कश्मीर तक रहा है लेकिन आरक्षण ने देश भर को नुकसान देने का काम किया है। आज महिलाएं शिक्षा खेल सभी जगह अपनी मेहनत और काबलियत तथा विश्वास के बल पर परचम लहरा रही हैं तो राजनीति में ही इसकी ज़रूरत क्यों है। सबसे अधिक विडंबना की बात आरक्षण का लाभ पहले राजनीति करने वाले परिवार की महिलाओं को ही नहीं मिला बल्कि पंचायत आदि में पत्नी या घर की महिला नाम की सदस्य होती हैं और उनकी जगह पुरुष पति या भाई या कोई परिवार का सदस्य उनकी जगह काम और अधिकारों का उपयोग करते हैं। छोटी से छोटी नौकरी पाने को योग्यता निर्धारित है मगर संसद विधायक बनने को कोई योग्यता नहीं बस जीतने को धन और संसाधन चाहिएं। आज़ादी के इतने साल बाद अगर परिवारवाद और बाक़ी सभी स्वार्थ की राजनीति को खत्म करने की बात की जाती है तो क्यों इस को लेकर उलटी गंगा बहती है और हर दल लोगों को आरक्षण देने का वादा कर बहलाता भी है और इस को बढ़ावा देकर असमानता को समानता लाने की राह घोषित करता है जबकि सच ये है कि हर देश काबिल लोगों को अवसर देने से ही प्रगति कर सकता है। देश को समान रूप से विकसित करने को ऐसी सभी दीवारों को हटाना ज़रूरी है। जब बात चली है तो किसी एक की नहीं सबकी समानता की की जाये।

   ऐसा कभी नहीं हुआ जब लोग आज़ाद होकर भी सहमें सहमें रहने को विवश हैं। सच कहने की आज़ादी नहीं है क्योंकि सरकार की पसंद का सच ही सच है उसका विरोध देशभक्ति पर शक का कारण बन जाता है। देशभक्त होने को देश की चिंता करनी ज़रूरी नहीं है बस कुछ शब्द रटने हैं ऊंचे स्वर में बार बार दोहराने हैं। फिर बेशक देश के नियम कानून नैतिकता की धज्जियां उड़ाओ कोई कुछ नहीं पूछेगा। देशभक्ति का अर्थ है कुछ स्लोगन कुछ गीत कुछ रंग बिरंगे परिधान को अपनाना। हर कोई बाहर से देशभक्त लगता हैं मन में क्या है कोई नहीं जानता। आधुनिक आज़ादी का यही स्वरूप है। जंज़ीरें हैं जो नज़र नहीं आती मगर आपको बंधन में जकड़े हुए हैं।

     

       

Thursday, 15 August 2019

आज़ादी संविधान के पुर्ज़े उड़ाने की ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  आज़ादी संविधान के पुर्ज़े उड़ाने की ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

  बात कुछ ऐसी है जैसे कोई जाकर किसी से फरियाद करे जनाब देखो कोई किसी का गला दबा रहा है। कुछ लोगों की सांस घुटती लगती है उसको रोको आपको अधिकार है। जिन लोगों से मौलिक अधिकार छीने गए उनका दोष कोई नहीं है सरकार को डर नहीं है यकीन है उनको सरकार का कोई काम पसंद नहीं आएगा और वो विरोध करेंगे इसलिए उन पर रोक लगाई है विरोध नहीं करने देने को। क्या यही अदालत थी जो कह रही थी विरोध की आवाज़ बंद नहीं किया जाना चाहिए ये कुकर का सेफ्टी वाल्व है अन्यथा विस्फोट की संभावना हो सकती है। अब यही अदालत कहती है उन लोगों की हालत क्या है हम नहीं जानते मगर सरकार को कुछ समय दिया जाना चाहिए सब सामान्य करने को। उधर सरकार बताती है सब सामन्य है कोई समस्या नहीं है। संगीनों के साये में ये आज़ादी अघोषित आपत्काल लगती है बल्कि उस से बढ़कर क्योंकि बिना घोषणा वही सब किया जा रहा है तब विपक्षी नेताओं को कैद किया गया था अब किसी राज्य की सारी जनता को ही उनके अधिकारों से वंचित किया गया है। मगर ये करने वाले सत्ताधारी नेता और न्यायधीश दोनों को याद नहीं है कि उन्होंने पद लेते समय संविधान की शपथ ली थी और सबको न्याय देने बिना भेदभाव का पक्षपात के न्याय की बात कही थी। इक ग़ज़ल याद आती है। 

                   वो खत के पुर्ज़े उड़ा रहा था , हवाओं का रुख बता रहा था।

                   कुछ और भी हो गया नुमाया , मैं अपना लिखा मिटा रहा था।

( अदालत अपनी कही बात को भुला रही थी बात और याद आ रही थी। नुमाया :- अधिक गहरा। )

                  वो एक दिन इक अजनबी को , मेरी कहानी सुना रहा था।

( यही लोग इमरजेंसी की कहानियां सुनाते हैं अत्याचार की और खुद दोहराते हैं उसी को उचित कह )

                 उसी का इमां बदल गया है , कभी जो मेरा खुदा रहा था। 

                वो उम्र कम कर रहा था मेरी , मैं साल अपने बड़ा रहा था।

 


 

Monday, 12 August 2019

आरक्षण भी अस्थाई है ( विचारणीय ) डॉ लोक सेतिया

      आरक्षण भी अस्थाई है ( विचारणीय ) डॉ लोक सेतिया 

                       अभी अभी किसी ने मुझे ये संदेश भेजा है। 

            " आर्टिकल 370 टेम्परेरी था इसलिए खत्म किया जाना जायज़ था , आरक्षण भी तो अस्थाई है , 
 इसे कब खत्म करेंगे "। 

        मुझे बात उचित लगी क्योंकि जैसे देश का जनमत धारा 370 को हटाने का समर्थक है क्योंकि लोग समझते हैं इस से उनको कश्मीर में कुछ अधिकारों से वंचित किया जाता रहा है और इसको हटाने को कश्मीर के लोगों से सहमति लेना संभव ही नहीं था लेकिन जब सरकार ने जैसे भी ढंग से रास्ता बनाकर ये कर दिया है तो उनको स्वीकार करना ही होगा। क्या यही बात आरक्षण को लेकर नहीं कही जा सकती है जिनको आरक्षण मिलता है उनको भी इसी तरह बेबस मज़बूर कर धारा 144 लगाकर इंटरनेट बंद कर संपर्क बंद कर कानून बना कर मनमानी करने के बाद देशहित में समानता के अधिकार को मंज़ूर करने को मनवा लेंगे। मगर मुझे पता है जिन्होंने सवाल किया है उनको भी मालूम है सरकार या सत्ताधारी दल को वोटों की राजनीति ऐसा कभी नहीं करने देगी। अन्यथा आरक्षण तो केवल दस साल तक रहना था और उसका प्रतिशत भी कम था जिसे बढ़ाते बढ़ाते पचास फीसदी को भी लांगने की नौबत आ गई है। जो दल जाति पाती की राजनीति को गलत बताया करते थे उन्हीं के नेता रोज़ किसी समुदाय की राजनीति को बढ़ावा देने का काम करते हैं। सच तो ये है कि आरक्षण का भी लाभ कुछ अमीर और राजनैतिक हैसियत वाले लोग उठाते रहे हैं और बाकी अधिकांश लोग इस झांसे में आरक्षण की चाह में दौड़ में पीछे ही नहीं रह गए बल्कि दौड़ से बाहर ही रहे हैं। 

    मगर इन दोनों में बहुत अंतर है क्योंकि कश्मीर की बात विलय के अनुबंध और विश्वास की थी और ऐसे में एकतरफा ढंग से निर्णय करना शायद समस्या का स्थाई समाधान नहीं भी साबित हो पाए। जबकि आरक्षण से देश को कितना नुकसान हुआ है और जिस मकसद से आरक्षण लागू किया 70 साल बाद भी मकसद हासिल नहीं हुआ है। करोड़पति और बड़े बड़े पद पर पहुंचे लोग आरक्षण से और भी ऊपर पहुंच जाते हैं जबकि उनको आरक्षण की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए और जो उसी वर्ग से वंचित हैं उनको कोई लाभ नहीं मिलता है। सबसे महत्वपूर्ण बात देश में काबलियत को न्याय नहीं मिलना है जब काबिल लोग नहीं बिना काबलियत के लोग सरकार या देश समाज के साथ उचित सेवाएं देने में असफल रहते हैं। डॉक्टर शिक्षक इंजिनीयर जैसे कार्य अगर धनवान पैसे से दाखिला लेकर या आरक्षण वाले आरक्षण के कारण दाखिला पाकर बनते हैं तब उनका असर लोगों की ज़िंदगी पर पड़ता है। अब तो हर कोई अपने अपने लिए स्वार्थ को महत्व देता है आरक्षण की मांग बढ़ती गई है। किस को देश की समाज की भलाई की चिंता है।

      आरक्षण की व्यवस्था की गई थी सदियों तक दलित शोषित वर्ग को बराबरी पर लाने को। मगर स्वार्थ की अंधी राजनीति ने इसको किसी दावानल की आग की तरह बना दिया है। शिक्षा पाने को नौकरी पाने को कुछ समय तक छोटी जाति समझे गए लोगों को अवसर देने इसकी ज़रूरत थी मगर समय सीमा बढ़ाते बढ़ाते और पदोन्नति से लेकर राजनीति तक में काबलियत से अधिक महत्व स्वार्थ को देने से ये कोई लाईलाज रोग बन गया है। अब आरक्षण केवल दलित को नहीं अन्य भी अघोषित आरक्षण हासिल किया जाने लगा है। संसद में महिला आरक्षण भले नहीं मिला हो मगर धनवान और बाहुबली लोगों को अवसर मिलना उसी तरह का ही है। राजयसभा को तो धनपशु लोगों का राजनीति के नाम पर जाने क्या करने का स्थान बना दिया गया है। ये हैरानी की बात है कि अपराधी छवि के लोगों को सभी दलों ने शामिल किया है चुनावी जीत को देश हित से अधिक महत्व देकर। कितने काबिल लोग संसद की शोभा और गरिमा बढ़ाया करते थे लेकिन आजकल कैसे कैसे लोग वहां माननीय कहलाते हैं। सरकार ने सब्सिडी की सहायता खुद लोगों को लेना बंद करने की पहल की ताकि जिनको वास्तव में ज़रूरत है उनको मिल सके। फिर आरक्षण को भी जो लोग संपन्न हैं क्यों नहीं छोड़ सकते अपने ही वर्ग के ज़रूरतमंदों को मिल सके इस खातिर। सबसे अधिक गलत असर हर राज्य हर समाज में आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलनों से नफरत हिंसा और लोगों को विभाजित करने का किया है। आज हालत ये है कि इसको हटाने की बात कोई राजनेता या दल करने का साहस नहीं करता अपने दलीय हित को देशहित से पहले समझते हैं। कम से कम देश की व्यवस्था चलाने वाले संसद विधायक या बड़े पद पर नियुक्त अधिकारी काबिल होने के आधार पर बनने ज़रूरी हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि ऐसा नहीं है और चुनावी और सत्ता की रणनीति ने सभी जगह आरक्षण और चंदे या बाहुबल की ताकत का गणित साधने का काम किया है। हम कितने देशों से विकास में पिछड़े हैं ऐसी ही गलतियों के कारण और कोई इस गलती को सुधारने की बात नहीं सोचता है।

        धारा 370 का असर कुछ लोगों और कश्मीर तक रहा है लेकिन आरक्षण ने देश भर को नुकसान देने का काम किया है। आज महिलाएं शिक्षा खेल सभी जगह अपनी मेहनत और काबलियत तथा विश्वास के बल पर परचम लहरा रही हैं तो राजनीति में ही इसकी ज़रूरत क्यों है। सबसे अधिक विडंबना की बात आरक्षण का लाभ पहले राजनीति करने वाले परिवार की महिलाओं को ही नहीं मिला बल्कि पंचायत आदि में पत्नी या घर की महिला नाम की सदस्य होती हैं और उनकी जगह पुरुष पति या भाई या कोई परिवार का सदस्य उनकी जगह काम और अधिकारों का उपयोग करते हैं। छोटी से छोटी नौकरी पाने को योग्यता निर्धारित है मगर संसद विधायक बनने को कोई योग्यता नहीं बस जीतने को धन और संसाधन चाहिएं। आज़ादी के इतने साल बाद अगर परिवारवाद और बाक़ी सभी स्वार्थ की राजनीति को खत्म करने की बात की जाती है तो क्यों इस को लेकर उलटी गंगा बहती है और हर दल लोगों को आरक्षण देने का वादा कर बहलाता भी है और इस को बढ़ावा देकर असमानता को समानता लाने की राह घोषित करता है जबकि सच ये है कि हर देश काबिल लोगों को अवसर देने से ही प्रगति कर सकता है। देश को समान रूप से विकसित करने को ऐसी सभी दीवारों को हटाना ज़रूरी है। जब बात चली है तो किसी एक की नहीं सबकी समानता की की जाये।

  सोशल मीडिया पर जो लोग कश्मीर को लेकर जाने क्या क्या ऊल -जुलूल बातें कह रहे थे अब इस विषय पर भी बोल सकते हैं उसी तरह से या फिर अपनी बारी आई तो बोलती बंद हो जाती है। अगर कश्मीर में सबका अधिकार बराबर हो तो फिर ये आरक्षण भी समानता का अधिकार छीनता है। मगर विडंबना है कि यहां तो ऐसे भी लोग हैं जो साहित्य को भी दलित और अन्य नाम देते हैं उनकी दुकानदारी है।

   


Sunday, 11 August 2019

नहीं सीखा राग-दरबारी ( बात कहनी है ) डॉ लोक सेतिया

      नहीं सीखा राग-दरबारी ( बात कहनी है ) डॉ लोक सेतिया 

    इक बहुत पुरानी ग़ज़ल से बात शुरू करता हूं। बहुत सीखा समझा जाना मगर यही कभी नहीं आया और न ही कभी आएगा। सीखा भी नहीं सीखना भी नहीं कभी मुझे राग-दरबारी। 

सब से पहले आपकी बारी - लोक सेतिया "तनहा"

सब से पहले आप की बारी ,
हम न लिखेंगे राग दरबारी।

और ही कुछ है आपका रुतबा ,
अपनी तो है बेकसों से यारी।

लोगों के इल्ज़ाम हैं झूठे ,
आंकड़े कहते हैं सरकारी।

फूल सजे हैं गुलदस्तों में ,
किन्तु उदास चमन की क्यारी।

होते सच , काश आपके दावे ,
देखतीं सच खुद नज़रें हमारी।

उनको मुबारिक ख्वाबे जन्नत ,
भाड़ में जाये जनता सारी।

सब को है लाज़िम हक़ जीने का ,
सुख सुविधा के सब अधिकारी।

माना आज न सुनता कोई ,
गूंजेगी कल आवाज़ हमारी।

        देश में कुछ भी आपके सामने होता रहे बेशक आप भी उस सब में शामिल होकर देश की व्यवस्था नियम कानून नैतिकता को ठेंगे पर रखकर अपने स्वार्थ सिद्ध करते रहें जैसे चाहे उचित अनुचित कार्य करते हुए पैसा पद पाने को सब करते रहें मगर साथ में देशभक्त होने का शोर भी करते रहें मुझे नहीं पसंद ऐसी बात। बस इक सवाल जो हर कोई खुद से नहीं करता बाकी सभी से पूछते हैं क्या देशभक्ति का अर्थ समझते हैं। ज़रा अपनी बात को दूसरी तरफ से देखते हैं खुद सच अपने आप से पूछते हैं मैंने अपने देश समाज को दिया क्या है। देश की बदहाली में मैं भी शामिल नहीं कभी अपने स्वार्थ को दरकिनार कर किया है देश समाज को कुछ बेहतर बनाने को हम सभी को किसी एक दिन 15 अगस्त 26 जनवरी को नहीं हर दिन इस पर चिंतन करना चाहिए। आज़ादी का मतलब केवल जश्न मनाना नहीं है आज़ादी का वास्तविक अर्थ देश देशवासियों की एकता भाईचारा और समानता है। औरों को देश भक्त हैं नहीं है का उपदेश देने से नहीं खुद कुछ अच्छा वास्तव में कर दिखाने को देश से प्यार करते हैं समझा जा सकता है।

      देशभक्ति कोई इश्तिहार नहीं है न कोई तमगा है टांग कर दिखाने को ये इक भावना है एहसास है देश की खातिर सर्वस्व अर्पित करने का। हम जब गीतकार प्रदीप जी के शब्द सुनते हैं , जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी। लता जी ने गाया था 27 जनवरी 1963 , ऐ मेरे वतन के लोगो , ज़रा आंख में भर लो पानी , तब हर आंख नम थी। ऐसे ही दम निकले इस देश की खातिर बस इतना अरमान है , एक बार इस राह में मरना सौ जन्मों के समान है। देख के वीरों की कुर्बानी अपना दिल भी बोला , मेरा रंग दे बसंती चोला। ऐसे कितने गीत सुनकर हमारी भावनाएं जागती हैं मगर क्या ये भाव स्थाई रहते हैं हर वक़्त पल पल , अगर रहें तो हम बहुत कुछ है जो देश की खातिर करते और ऐसा भी बहुत कुछ होगा जो कभी नहीं करते अपनी खातिर अपने स्वार्थ की खातिर। देशभक्त कहलाने नहीं देशभक्त होने का निश्चय करना चाहिए और देश कोई सरकार नहीं सत्ता नहीं देशवासी हैं और नफरत भेदभाव की की हर बात अनुचित है। आजकल जो लोग इस बेकार की बहस में उलझे रहते हैं कि भूतकाल में किस ने क्या अच्छा बुरा किया क्या उनको आज समझ आता है खुद क्या करते हैं या कोई और क्या करता है। भीड़ बनकर नहीं अकेले खड़े होकर खुद कितना साहस करते हैं देश संविधान न्याय की बात पर अडिग रहने का। सच्ची देशभक्ति लगता है जैसे इतिहास की किताबों देशभक्ति की फिल्मों गीतों नाटकों तक सिमित रह गई है जो सामने दिखाई देता है वो देशभक्त होने का शोर है और कुछ भी नहीं है। शायद चिंतन की ज़रूरत है कि हम किस तरफ जाने को चले था और अब किस दिशा को बढ़ रहे हैं।

Wednesday, 7 August 2019

कलयुग का राम-राज्य और रामायण ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया ( भाग तीसरा )

  कलयुग का राम-राज्य और रामायण ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                                        ( भाग तीसरा )

   लव-कुश टीवी सीरियल की तीसरी कड़ी 7 अगस्त को दिखाई गई। पिछली बार की तरह आज भी उस युग की बात को आज की देश समाज की दशा राजनीति से जोड़कर समझने की कोशिश करते हैं। इक बात पिछले भाग में कहनी रह गई थी वो ये कि जब राजा राम भाई लक्ष्मण को सीता जी को वन में छोड़ आने का आदेश देते हैं तब लक्ष्मण बताते हैं कि जब भी आपकी संतान को पता चलेगा अपने ऐसे समय अपनी पत्नी को अकेली छोड़ दिया उनकी नज़रों में आपके लिए आदर की नहीं नफरत की भावना होगी। तीसरे दिन के अंक में सीता ऋषि  बाल्मीकि से कहती है कि जैसा उन्होंने कहा उनके आश्रम में उनकी बेटी बनकर रह सकती है मगर इस शर्त पर कि आप आश्रम में रहने वालों को मेरी  वास्तविक पहचान नहीं बताएंगे। कारण पूछते हैं ऋषि बाल्मीकि तो सीता बताती हैं क्योंकि जब यहां रहने वालों को मेरी संतान को लेकर पता होगा कि राजा राम की संतान है तो उसको आदर तो मिलेगा मगर अपनापन नहीं और वो संतान यहां रहकर न तो राजा के महल का आनंद ले सकेगी न ही यहां के सामन्य रहने वालों में रहकर आम उनकी तरह होकर जीने का आनंद ही। जैसे किसी बड़े बरगद के पेड़ की छांव में कोई बीज डालने पर उगता तो है मगर उसकी छाया ही उसको बढ़ने नहीं देती और इसी कारण वो मिट जाता है। ऋषि कहते हैं ये गहराई की बात केवल आप ही सोच सकती हैं और मान जाते हैं। 

      अब आज की देश समाज की वास्तविकता को देखते हैं तो हर कोई अपने जीवन में संघर्ष से बचकर कोई सहारा पाकर ऊंचाई पाना चाहता है। आधुनिक युग में कोई अपनी अलग राह नहीं बनाना चाहता बनी बनाई डगर पर चलना चाहता है। किसी राजनीति की शख्सीयत के निधन पर सोशल मीडिया टीवी अखबार सभी शोक को भी किसी तमाशे की तरह बना देते हैं शायद हम भूल गये हैं दुःख की घड़ी में संवेदना जताने को आडंबर की ज़रूरत नहीं होती है। मुझे याद है 1964 में जब जवाहर लाल नेहरू जी के निधन की खबर रेडियो पर सुनी तो हर किसी की आंख नम थी मगर आजकल हम टीवी चैनल पर एक दिन को किसी की जीवन की निजि बातों से लेकर भाषण तक देखते सुनते हैं सोशल मीडिया पर लिखते हुए लगता ही नहीं कोई संवेदना रही होगी। सच बताओ कोई इक आंसू आपकी पलकों से ढलका भी था। जैसे टीवी की बहस जैसे कोई सीरियल जैसे कोई फिल्म देखते हैं और टीवी बंद होते ही उसको भूल अन्य अपने अपने रोज़ के कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं बस इक घटना पल भर को महत्वपूर्ण थी। पिछले कुछ दिनों में कुछ लोगों को लेकर ये हुआ जो पहले भी होता रहा मगर अब हद से बढ़कर जैसे इक पागलपन छाया हुआ होता है। और हम कहते हैं जानते हैं ऐसा स्वाभाविक है हर किसी को इक दिन अलविदा कहना है। 

    किसी व्यक्ति विशेष की बात नहीं है अक्सर यही होता है जब कोई शोहरत की बुलंदी या सफलता की सीढ़ी चढ़ जाता है भले अभिनय या खेल या राजनीति या किसी कारोबार में यहां तक योग जो किसी की अपनी खोज नहीं केवल उसको बाज़ार में बेचने से मुनाफा कमाने का काम किया हो या फिर किसी चेहरे को आंदोलन का मुखौटा बना कर राजनीति की गई हो और जिस बात का आंदोलन था उसी को छोड़ दिया गया हो। मगर हर कोई मकसद को छोड़ स्वार्थ पाने को महान समझने लगा है। अपने कभी विचार किया है कोई अधिकारी या नेता या कोई भी काम करने वाला जब अपना सामन्य कर्तव्य निभाने का काम करता है तो भी विशेष घटना होने पर सबको जानकारी मिलती है तो जय जयकार करने लगते हैं। अर्थात अपना काम ईमानदारी से करना हम बड़ी बात मानते हैं जबकि हमें करना ये चाहिए कि जब कोई उचित कर्तव्य का निर्वाहन नहीं करता हो तब सामने आकर सवाल करना चाहिए। कितने ऐसे लोग हैं जिनको हम महान क्या भगवान का दर्जा देने की बात करते हैं जबकि उन्होंने अपना सामान्य कर्तव्य निभाया था खेल में अभिनय में या अन्य किसी काम में योगदान देकर। इस बात में जो बात बिना कहे समझी जाती है वो ये कि हर किसी को अपना काम करते रहना कोई ज़रूरी नहीं है। अदालत ने आदेश दिया हम सोचते हैं कमाल किया जबकि ऐसा क्यों करना पड़ा और क्यों कितना अनुचित होता रहा और जिनको कुछ करवाई करनी चाहिए थी की ही नहीं उनको छोड़ देते हैं। तभी ख़ास लोगों को अपराध करने की छूट देने अपराध करने के बाद उनको सहयोग देकर बचाने और जिस किसी से अन्याय हुआ उसको परेशान करने वालों की चिंता नहीं करते और ये बार बार होता रहता है। 
       
           हम लोग भेड़चाल के आदी होकर भीड़ के साथ चलने लगते हैं अपनी कोई सोच नहीं रखते हैं। जिस तरफ अधिक शोर हो हम उधर हो लेते हैं। बहुत अधिक शोर में धीमी आवाज़ दब कर रह जाती है और बहुत अधिक रौशनी आंखों को चुंधिया देती है हम साफ नहीं देख सकते। जो सरकार या जिनको विज्ञापन इश्तिहार से अपनी बात का शोर मचाना आता है उनका पक्ष जानते हैं , हर कहानी में तीन पक्ष होते हैं। हम किसी भी एक का पक्ष जानकर नतीजा नहीं निकाल सकते हैं आपके उनके इलावा कहानी का एक और पक्ष भी हो सकता है या होता है सत्य का इसलिए किसी एक की बात सुनकर तय नहीं करते कि सच क्या है। आजकल जो सच आपको समझाने की कोशिश की जाती है आधा सच भी कई बार नहीं होता है झूठ को सच का लेबल लगाकर लोग मालामाल हो रहे हैं और हम मूर्ख ही नहीं विवेकहीन होकर पागलपन जैसी हरकतें करने लगे हैं। आदमी आदमी बनकर रहे ये भी आसान नहीं है किसी को मसीहा समझोगे तो ठोकर खाओगे और किसी शायर की बात की तरह सोचोगे। 
  

तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला ,

मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला।



                                              
                                                  ( विषय जारी है )

Tuesday, 6 August 2019

कलयुग का राम-राज्य और रामायण ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया ( भाग दूसरा )

  कलयुग का राम-राज्य और रामायण ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                                         ( भाग दूसरा ) 

   हम जो पढ़ते हैं समझते हैं और जो अर्थ बताया जाता है दिखाया जाता है समझ आने में समझते समझते पता नहीं चलता कि सच है क्या। 6 अगस्त को अदालत ने अयोध्या मामले की सुनवाईफिर से हर दिन शुरू की और लव-कुश टीवी पर सीरियल का अगला भाग दिखाया गया। राम को मानते हैं तो मर्यादा की बात होनी ज़रूरी है और मर्यादा का अर्थ जो जैसा होना चाहिए वैसा किया जाना चाहिए। गांधी राम बुद्ध क्या हिंसा और देश के कानून संविधान को दरकिनार कर कुछ करने पर खुश होते और भगवान राम जी क्या किसी मंदिर में रहते हैं या कण कण में बसते हैं दिलों में राम समाये हैं। विवाद और आपसी झगड़े से बने भवन में क्या राम का निवास हो सकता है। अदालत अभी भी विवादित ढांचा गिराने वालों की अपराधी दोषी मानती है और जो कहते थे हमने अच्छा किया बचते फिरते हैं अदालत में जाकर अपना सच कहने से और सज़ा के डर से साबित करना चाहते हैं हमने नहीं किया था। कश्मीर भारत का था सब जानते थे मानते थे विशेष दर्जा हटाना हर कोई चाहता था मगर जिस तरह छीन कर ज़ोर से ताकत से छल कपट की तरह किया गया बांटने और विभाजित करने का काम उसको बेबस बनाने और अपने अधीन करने को राज्य से राज्य का दर्जा भी छीन लेने का काम इस तरह से कश्मीर के लोगों को बिना भरोसे में लिए किसको अपना बना रहे हैं। अपनापन प्यार सहमति से मिलता है ज़बरदस्ती से अपने पराये हो जाते हैं। आम ख़ास की बात है तो पहले वीआईपी और आम लोग का खात्मा हो हम सब एक सामान देश के नागरिक हैं संविधान कहता है। लिखा है कहीं संविधान में जनता के निर्वाचित सेवक विशेषाधिकार छीनेंगे और शासक बनकर गरीब जनता से उपहास करेंगे। साहस करते अपना विशेष दर्जा मिटाने छोड़ने का सब ताम झाम हटाकर सामान्य नगरिक की तरह रहने का। लव-कुश में सीता जी के बन जाने के बाद राजा राम घोषणा करते हैं अब से वह भी जनता की सेवा करेंगे मगर राजा की तरह नहीं रहेंगे विलासिता पूर्ण जीवन त्याग कर जैसे बन में पत्नी सीता रहेगी उसी तरह रहेंगे।

क्या सत्ताधारी और विरोधी दल देश भर में असमानता को मिटाना चाहते हैं तो फिर किसी एक जगह नहीं हर राज्य में ऐसा होना चाहिए। मगर हम हरियाणवी हैं पंजाबी गुजराती राजस्थानी बिहारी यूपी वाले हिमाचली जाने क्या क्या हैं बंगाली हैं तमिल हैं और उस से आगे धर्म सम्प्रदाय के नाम पर बंटे हैं राजनेता विभाजित कर सत्ता हासिल करने को क्या नहीं करते। रोज़ कौन ऐसी सभाएं आयोजित करते हैं। देश में हरियाणा पंजाब में एक ही दल की सरकार रही तब भी भाई भाई को पानी नहीं देने की बात करता रहा पानी सरहद पार चला जाये पड़ोसी राज्य को हक नहीं देने की ज़िद है क्योंकि जनता को भड़काने की राजनीति से उनके स्वार्थ सिद्ध होते हैं मिल कर प्यार भाईचारा करने से उनकी गंदी राजनीति काम नहीं करती है। अशोक कलिंग राज्य को पाना चाहता था और घोर मानववादी था हज़ार लोगों को खिलाकर खुद खाना खाता था। कलिंग वासी समृद्ध और साहसी थे और अपनी आज़ादी कायम रखना चाहते मगर अपने पहले ही युद्ध में विजयी होकर भी खून खराबा देख उस ने फिर कभी युद्ध नहीं लड़ने का संकल्प लिया और बौद्ध धर्म अपना लिया जो आज विश्व का सबसे अधिक देशों का धर्म बन गया है। इस वीडियो को सुनते हैं।


क्या कोई अशोक को महान मानने से इनकार कर सकता है। भारत के तिरंगे पर अशोकचक्र है और भारत देश की अंकित छवि जिस पर तीन तरफ शेर का मुख है उसके नीचे भी अशोकचक्र बना हुआ है। क्या इन सबका कोई मतलब नहीं है। हम भरवासी दिल जीतने पर विश्वास करते हैं जंग जीतने के पक्ष में नहीं है और जो लोग आज किसी नेहरू की पंचशील की भावना को नहीं जानते गांधी की अहिंसा को नहीं मानते उनको गोडसे जैसे कातिल नायक लगते हैं। मगर उनकी विचारधारा देश के संविधान की भावना के विपरीत है। ऐसे लोग अदालत क़ानून का पालन नहीं करते संविधान का पालन नहीं करते मगर सत्यमेव जयते की सोच के देश में सच कहने को अपराध समझते हैं और खुद सब अनुचित करने को भी देशभक्ति बताते हैं। बहुमत या भीड़ बनकर हिंसक होकर ताकत से अपनी मर्ज़ी का इंसाफ करना अराजकता है ये जिसको धर्म या कोई भी और नाम देते हैं। मुमकिन है कल अदालत उनकी पसंद का निर्णय नहीं दे तो अदालत कानून का आदर और उनकी अकांक्षा उनके विवेक को चीन सकती है और मर्यादा पुरुषोत्तम राम का मंदिर मर्यादा की परवाह नहीं कर बनाने की ज़िद की जा सकती है। इस का अर्थ ये है इनकी मनमानी नहीं चले तो धर्म के नियम देश के कानून सब को नुकसान देकर भी मनमानी की जा सकती है। धर्म ईश्वर इनकी आस्था नहीं राजनीति करने का साधन हैं। आजकल लोग भगवान को मानते हैं का दावा करते हैं भगवान की शिक्षा को नहीं मानते हैं भगवान को बेबस कर दिया है कुछ लोगों ने जिनको ईश्वर और धर्म की जानकारी इतिहास की जानकारी उतनी ही है जितनी नासमझ अनपढ़ लोगों का सोशल मीडिया से मिला ज्ञान। कुवें के मेंढक को अपनी दुनिया समंदर लगती है।

                                       (  हरि अनंत हरिकथा अनंता )



Monday, 5 August 2019

चलती फिरती लाशें हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

        चलती फिरती लाशें हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

 अब तो विज्ञान और डॉक्टर्स भी मानते हैं जब दिमाग़ काम नहीं करता तभी ज़िंदगी ख़त्म होती है। दिल की धड़कन सांसों का चलना किसी काम का नहीं रहता ऐसे लंबी मदहोशी में जाने के बाद जिस्म से जिगर गुर्दा निकाल लेने की बात की जाती है। बस कुछ ऐसा ही सोचने समझने की क्षमता के बगैर इंसान चलती फिरती लाश बन जाता है। तमाम ऐसे लोग हैं जो आपको सोचने समझने नहीं देना चाहते हैं शिक्षक बनकर आपको जो जैसे पढ़ाया यकीन करने या रटने को कहते हैं उस को लेकर विचार चिंतन करना उस जानकारी को वस्तविक्ता के तराज़ू पर तोलने की बात उनकी नागवार लगती है। धार्मिक किताबों को पढ़ कर सुनाते हैं और उनकी अपनी अपनी व्याख्या करते हैं पर आपको उस पर कुछ भी बोलने की छूट नहीं है अन्यथा आपको नास्तिक घोषित किया जा सकता है। नास्तिक होना कोई गुनाह नहीं है जिन किताबों की बात करते हैं उन की कथाओं में कितने सवाल किये गए होते हैं तभी उनके जवाब खोजने का काम होता है। मगर धर्म का कारोबार करने के लिए अंधभक्त हों लोग ये ज़रूरत है उनकी। कबीर होना सबसे कठिन है हर धर्म वालों को खरी खरी कहने का साहस करना बनारस में गंगा के तट पर खड़े होकर। ये जो आज धर्म को लेकर विवाद खड़े करते हैं जानते भी नहीं कबीर की जाति क्या थी धर्म क्या था उनकी बाणी हिन्दू मुस्लिम सिख सभी धर्मों के लोग सुनते हैं। 

        हम किसी न किसी को मसीहा बनाकर उसकी आरती पूजा ईबादत करने के आदी हैं। ईश्वर को पाना उसको समझना नहीं उसको मानते हैं बिना विचारे हुए। आज़ादी को भी हमने समझने की कोशिश नहीं की कोई हम सभी को कहता है देश की भलाई इसी में है कि आपको कैदी बनाकर रखा जाये और हम बेबस होकर स्वीकार कर लेते हैं। जो किसी और के आपत्काल की घोषणा को अक्षम्य अपराध बताते हैं खुद सत्ता मिलते उस से बढ़कर तानाशाही करने लगते हैं। हमारी गलती है भूल है या फिर कायरता है जो हम कभी भी सच और झूठ को परखने की बात नहीं करते। राजनेताओं की बातों से खुश हो जाते हैं उनका असली आचरण क्या है नहीं देखते समझते। अब तो लोग इस कदर पागलपन करने लगे हैं कि राजनीति का मोहरे बनकर भीड़ में शामिल होकर हैवान बन हैवानियत को अंजाम देने लगते हैं। कोई भी धर्म किसी को इस तरह घायल करने जान से मारने की बात नहीं उचित बताता। क्षमा की बात हर धर्म में है हमने माफ़ करना सीखा ही नहीं खुद न्यायधीश बनकर फैसला भी करते हैं सज़ा भी देते हैं और अपने पाप को अपराध को देश समाज के कायदे कानून को तोड़ने को देश के संविधान को अपमानित करने को महान कार्य घोषित कर और भी समाज विरोधी काम करते हैं। 

    कुलदीप सलिल जी की ग़ज़ल है :-

इस कदर कोई बड़ा हो मुझे मंज़ूर नहीं 
कोई बंदों में खुदा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

रौशनी छीन के घर घर से चिराग़ों की अगर 
चांद बस्ती में उगा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना 
आपकी एक अदा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

इस ग़ज़ल का सबसे ख़ास शेर ये है :-

आज मैं जो भी हूं हूं बदौलत उसकी 

मेरे दुश्मन का बुरा हो मुझे मंज़ूर नहीं।


कलयुग की रामायण और रामराज्य ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   कलयुग की रामायण और रामराज्य ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

 शायद ये अजीब इत्तेफ़ाक़ की बात है कि आज 5 अगस्त को टीवी पर लव-कुश सीरियल शुरू हुआ है जो अभी अभी देखा तो आज की सुबह की राजनीति की बड़ी घटना को लेकर विचार आते गए। नहीं साहित्य में राजनीति और धर्म की मिलावट की बात नहीं करना चाहता। मगर कुछ संवाद सुनकर बातें जुड़ती हुई लगीं लेकिन बदले हुए ढंग से। शुरआत राजा राम की बात से हुई जो अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण से धोबी की बात उसके अपनी पत्नी को कुलटा समझने और मार पीट करने पर वार्ता करते राम कहते हैं विश्वास या भरोसा ताकत के बल से नहीं पाया जा सकता है। मोदी सरकार ने संसद में कश्मीर को लेकर धारा 370 हटाने और उस राज्य को विभाजित करने उसे पूरे राज्य का दर्जा नहीं देने जैसे निर्णय करने से पहले कश्मीर की जनता और वहां के राजनेताओं को नज़रबंद कर धारा 144 लगा कर फोन इंटरनेट बंद कर दिया। सेना और संसद में संख्या बल को लेकर मनमाने ढंग से वहां की जनता का भरोसा नहीं पाया जा सकता है। बीच में धोबी का राजा के आदेश पर पत्नी को अपनाना मगर दिल से नहीं विश्वास करना राम को विवश कर देता है। लक्ष्मण कहते हैं धोबी को दंड देने को तब राम बोलते हैं कि प्रजा राजा की संतान होती है उसको मार नहीं सकता रक्षक होता है शासक। लोकतंत्र है अब कोई राजा नहीं है भले शानो शौकत शाही ढंग से सज धज मौज मस्ती उनसे बढ़कर करते हैं मगर जनता की चिंता वोट पाने तक ही। वास्तविक रामायण में शायद नहीं था मगर टीवी सीरियल की रामायण का राम सीता को बन नहीं भेजना चाहता खुद सीता जी जाने की ज़िद करती हैं और महिलाओं के सम्मान की बात करती हैं। लक्ष्मण सवाल करता है बड़े भाई से कि राजा का कर्तव्य निभाना याद है पत्नी के लिए पति का धर्म याद है क्या , राम कहते हैं तुम मेरे सेनापति हो मेरे आदेश का पालन करना ही होगा। लक्ष्मण बोलते हैं मैंने सवाल भाई से किया था जवाब राजा ने दिया है। कितनी मिलती जुलती है ये बात आज की देश की राजनीती से। मोदी जी महिलाओं की चिंता बहुत करते हैं किसी ने उनसे नहीं पूछा उनकी पत्नी भी महिला है उनको अधिकार मिले क्या कभी। जवाब नहीं देते ये  शासक हैं सबसे सवाल करते हैं औरों पर सवाल उठाते हैं खुद जवाब नहीं देते हैं। 

मुझे जाने क्यों आज आपातकाल की घटना फिर से दोहराई जाती नज़र आई , 25 जून 1975 की आधी रात को जो जैसे इंदिरा गांधी ने किया उसी तरह से दिन दहाड़े कश्मीर में मोदी सरकार ने कर दिखाया। ठीक उसी तरह से इनकी पसंद के बड़े पद पर बिठाये लोगों ने ख़ामोशी से सब करने में साथ दिया। याद आया लव-कुश सीरियल में राम याद करते हैं ताज पहनते समय शपथ ली थी , शपथ इन सभी ने भी ली हुई है न्याय बिना पक्षपात और संविधान और सभी के अधिकारों की रक्षा करनी है। ये कलयुग की नई लिखी रामायण है और कलयुगी राजनीति का नया अध्याय है। अब सरकार दावा करती है कुछ पांच-सात साल दे दो कश्मीर को बदल कर दिखा देंगे। पचास दिन मांगते थे पांच साल बीत गए अच्छे दिन खो गए नहीं मिले जनता को , बंद हैं भाजपा की तिजोरी में तभी विश्व की सबसे अमीर पार्टी बन गई है। हद तो ये है अब सरकार की किसी बात पर सवाल करते ही आपको कटघरे में खड़ा कर देते हैं। सेवक बनकर चौकीदार होने का दम भरते रहने के बाद इस बार कहते हैं फकीर हैं और आजकल कलयुग के भिक्षुक जितना भी मिल जाये लालच मिटता नहीं है। चार दिन पहले तीन तलाक कानून बन गया मगर तलाक से पहले निकाह की बात होती है उनको बाद में याद आई तो निकाह की रस्म कुछ ऐसे निभाई है।

                        कबूल  ? कबूल  ? कबूल ? (  जवाब ? )

  निकाह हो गया सब खुश हैं अब कोई फासला नहीं रहा। तीन तलाक खराब था मान लेते हैं मगर गठबंधन तो ख़ुशी रज़ामंदी से होता। जिनकी बात है उनकी आवाज़ बंद है उनको कुछ सुनाई भी नहीं देता और मुंह पर ताला लगा है बोल भी नहीं सकते। निकाहनामा तीन बार कबूल है कबूल है कबूल है पूछने और जवाब हां कबूल है हां कबूल है हां कबूल है मिलने के बाद दोनों की रज़ामंदी से होता है। मगर अपने अपने आप नियम बदल दिया है कि आवाज़ सुनाई देने की ज़रूरत नहीं है सर हिलाया था आपका भरोसे का गवाह गवाही दे देगा और सब ठीक हो गया समझ लिया जाएगा। ये भी होता है जिस को हासिल करना चाहा कोशिश की बहुत दिन तक साथ सरकार चलाई सत्ता की कुर्सी से प्यार हुआ। जब नहीं मानी तो अपहरण करने की परंपरा रही है ताकत से अपना बनाने की। जंग में सब जायज़ है मुहब्बत उनकी समझ की बात नहीं जिनको खुद से अच्छा कोई लगता ही नहीं है। 

    सरकार की साख कम होती जा रही थी चुनाव जीतने के बाद भी लगता था खेल तमाशे और जाने क्या क्या हथकंडे आज़मा कर सत्ता फिर हासिल कर ली मगर देश की जनता को नज़र कुछ नहीं आता किया क्या है अभी तक। झांसे में आकर भावना में बहकर या फिर विवशता कोई सही विकल्प ही नहीं मज़बूरी है जानते हैं हालात कितने बिगड़े हुए हैं। ज़ोर का धमाका करना ज़रूरी है ताकि शोर में चीख पुकार दब कर रह जाए। जिस तन लागे वो ही जाने कश्मीर की जनता को छोड़ सब खुश हैं जैसे उनको कश्मीर मिल गया है जबकि वास्तव में कश्मीर था ही अपना शायद अब भरोसे की दीवार में दरार आने का डर है। गांव की पंचायत कभी निर्णय करती है जिस ने किसी लड़की से बलात्कार किया उसी के साथ शादी करने का। क्या कोई महिला उस को जीवनसाथी मान कर आदर विश्वास करेगी नहीं जानते ये लोग फरमान जारी करते हैं। 

         ये रिवायत भी कमाल है सरकार महीनों  सालों गुनहगार को पकड़ने सज़ा देने में नाकाम रहती है अपराधी पहले बलात्कार फिर कत्ल  फिर सबूत मिटाने का काम करते रहते हैं। जब बदनामी हद से बढ़ जाती है तो सरकार संवेदना जताने जाती है मुआवज़ा देने की रकम खासी बड़ी रखी जाती है ज़ख्म भरते नहीं फिर से हरे हो जाते हैं। मगर सरकार सहानुभूति जताकर समझती है जिस पर अन्याय हुआ उसको राहत मिल होगी। ये जो बिना कबूलनामे निकाह अंजाम दिया है कुछ उसी तरह की बात है। सबको लगता है जन्नत मिल गई है दुल्हन मायके से ससुराल आने की देर है। दुल्हन के मन की बात कोई नहीं जनता न कोई समझता है। सब चाहते थे ये होना चाहिए मगर ज़ोर ज़बरदस्ती और रज़ामंदी का फर्क होता है। चलो शायद दुल्हन स्वीकार कर लेगी उसके अपने नसीब की लिखी बात को। लिखने वाले ने लिख दी तकदीर।

  सबसे गहरी बात आज के टीवी सीरियल लव-कुश में ये थी कि लक्ष्मण अपने भाई राम को कहता है मुझे तो लगा था अपनी पत्नी पर बुरी नज़र डालने और उसका स्पर्श करने वाले को अपने मार दिया है। लेकिन अब देख रहा हूं मरने के बाद भी आपके मन में ज़िंदा है रावण तभी पति - पत्नी के संबंध के बीच खड़ा हुआ है। कितना बड़ा सच है हमने रावण के पुतले को जलाने की परंपरा में उसको मरने नहीं दिया है। हमारे भीतर का रावण ज़िंदा है मगर राम शायद हमारे अंदर है ही नहीं , राम राम जपने से कुछ नहीं होता राम को जानना भी ज़रूरी है।

Sunday, 4 August 2019

महानता पाने की चाहत ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       महानता पाने की चाहत ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   पढ़ तो इक किताब से इक कहानी रहा था मगर कुछ शब्द पढ़कर सोचने की ज़रूरत महसूस हुई। कहानी में इक किरदार दूसरे को कहता है आपने अमुक धार्मिक किताब तो पढ़ी हुई है। किताब का नाम नहीं बता रहा अन्यथा सुनकर खुद उनको शर्मिन्दगी होगी जिस की जय जयकार करते हैं उसी को लेकर लिखी किताब की बात नहीं समझते। शब्द जो लिखे हुए हैं वो ये हैं , तुम मुझे छोटा बनाने की लाख कोशिश करो तुम्हारा बौनापन कम नहीं होने वाला। ऊंचे सिंघासन पर बैठने से अपने सामने नीचे बैठे लोगों से बड़े नहीं बन जाते और महान तो कदापि नहीं। ताकत से सेना के दम पर आवाम के दिलों को नहीं जीत सकते तुम जंग में किसी को हराकर भी विजयी नहीं होते अगर राज्य की जनता के दिलों में आदर नहीं भय या आतंक है। शासक की सफलता राज्य की सत्ता की ताकत या विस्तार से नहीं राज्य के निवासी लोगों की खुशहाली और राजा पर विश्वास करने से आंकते हैं। इक दोहा याद आता है :-

          बड़े बढ़ाई न करें बड़े न बोलें बोल , रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरो मोल। 

बड़बोलापन छोटा साबित करता है बड़ा नहीं बना सकता है। मगर आजकल हर कोई अपनी कीमत खुद ही बताता है। क्या क्या नहीं करते हैं अपनी शोहरत का डंका पीटने को , बात केवल राजनीति की नहीं है। हर लिखने वाला हर खबर देने वाला चैनल अख़बार हर शिक्षा देने का कारोबार करने वाला स्वास्थ्य सेवा का व्यौपार करने वाला योग से लेकर दाल चावल सौंदर्य प्रसाधन बेचने वाले से छोटे से शहर गांव का अधिकारी या चुना हुआ अथवा मनोनीत किया व्यक्ति नेता खुद को किसी से कम नहीं समझता है। हर शायर देश विदेश जाकर पैसा वाह वाह लूट सकता है मगर ग़ालिब मीर नहीं हो सकता है। सत्ता की बुलंदी की शोहरत वैसे भी भरोसा नहीं कब जिस शाख पे बैठे हैं वो टूट भी सकती है इक शायर कहता है। 

मुझे इक जन्म दिन पर किसी अपने ने डायरी दी थी जिस पर लिखा था , अगर शोहरत पाने की ख्वाहिश करते हैं तो वो इक गुनाह की तरह है। शोहरत आपको अपने आप मिलेगी आपके वास्तविक काम से और काबलियत से। शासक को राज्य की जनता की भलाई करने पर ध्यान देना चाहिए और नागरिक की खुशहाली से अच्छे राज को आकंते हैं। इतिहास लिखने वाले कभी हरने वाले के पक्ष की बात को उजागर नहीं करते अन्यथा उनको रामायण में लिखना पड़ता उसने अपनी लंका सोने की कैसे बनाई थी। रावण ने सीता का हरण क्यों किया था उस के साथ राम के अपनी पत्नी जो रानी थी को अग्नि परीक्षा के बाद भी वन क्यों भेजा था। अपनी पत्नी को न्याय नहीं देने उसका बिना अपराध त्याग करने वाले से राज्य की महिअलों को भला कैसा न्याय मिलता होगा। शासक राम नाम की रट लगाते हैं मगर उनकी कही बात को जानते ही नहीं हैं। रावण को हराने के बाद भी राम उनसे सीख लेने को भाई लक्ष्मण को क्यों भेजते हैं। खुद राम चाहते तो ताज पाने के बाद पिता के दिए वचन को निभाने की औपचारिकता निभा सकते थे लाव लश्कर के साथ बनवास को भी अपने लिए अवसर बना सकते थे या सत्ता मिलते अधिकार का उपयोग कर माता से ही वचन के बदले कुछ और मांगने को कह सकते थे। लेकिन उन्होंने परंपरा को निभाया क्योंकि हर शासक को पिछले शासक के दिए वचन संधि को निभाना होता है। लेकिन आजकल अपने से पहले के शासक की कमियां निकालने और उसको बुरा या छोटा साबित करने की बात होती है जो वास्तव में चांद सूरज पर थूकने की बात है।

 हर शासक को विरासत में जो थाती मिलती है उसको सहेजना संभालना संवारना होता है। न्याय का आधार ही सभी बड़े छोटों की समानता है अपने खास लोगों को पद बांटना सत्ता का मनमाना दुरूपयोग करना अनुचित तो है ही नाकाबिल लोगों को अधिकार देकर देश राज्य को विनाश की तरफ ले जाना भी है। शासक की महानता उसके बनवाये महल या सतंभ नहीं होते हैं उसके शासन में नागरिक को मिले अधिकार बताते हैं उनकी वास्तविक पहचान। किसी धोबी के झूठे आरोप लगाने पर अपनी पत्नी का त्याग करना क्या था समय उसकी व्याख्या दोनों पक्ष समझ करेगा। नागरिक की आमजन की राय जनमत को शासकीय न्याय से अधिक महत्व देना भी और उसी के साथ इक नारी को बिना अपराध निष्कासित करने पर सवाल उठना भी। मगर शासक को खुद को महान बनाने को कोई काम या निर्णय नहीं करना होता है उसके निर्णय से देश को भविष्य में क्या मार्गदर्शन मिलेगा इस से तय होता है।

  धार्मिक किताब में लिखा हुआ है कि पूर्वज की अच्छी बातों से सबक लेना चाहिए उनके आधार पर खुद को बदले में कुछ पाने की चाहत नहीं रखनी चाहिए। आपको माता पिता से हुई भूल का सुधार करने का फ़र्ज़ निभाना है और उनकी अच्छी बातों को अपनाना है। अपने पिता या पूर्वज से किसी को मुकाबला नहीं करना चाहिए क्योंकि उनके हालात और समय आपके हालात और समय से अलग हैं। पिछली सरकार की या सत्ताधारी की कमियां गलतियां बताने से आपकी अच्छाई साबित नहीं होती है। इतिहास ने उनको अच्छा नहीं बताया है जो खज़ाना अपने खुद पर खर्च नहीं करते थे बल्कि उनको अच्छा माना जो औरों की सहायता करने नागरिक के दर्द समझने का काम रहम दिली से करते थे। मगर अच्छा कर्म महान कहलाने को नहीं किया जाता है जैसे कई लोग माता पिता के नाम पर दान देने का कार्य करते हैं अपनी शोहरत की खातिर। वास्तविक दान वही होता है जिसका डंका नहीं पीटा जाता चुपके से किया जाता है मानवीय धर्म समझ कर। बदले में कुछ भी चाहना धर्म के खिलाफ है और उसको दान धर्म नहीं व्यौपार समझते हैं। रहीम से सीख ली जा सकती है दो दोहे इस बारे में हैं। गंगभाट कवि थे रहीम जागीर के मालिक बनकर हर किसी को सहायता देते थे मगर गंगभाट ने देखा जिसकी सहायता कर रहे होते हैं उसकी तरफ नहीं नीचे को आंखे झुकाकर दान देते हैं। उन्होंने सवाल किया रहीम से इक दोहा पढ़कर और रहीम ने दोहे से उनको जवाब दिया था दोनों दोहे पढ़ कर फिर समझते हैं अर्थ को।

गंगभाट :-

सिखियो कहां नवाबजू ऐसी देनी दैन , ज्यों ज्यों कर ऊंचो करें त्यों त्यों नीचे नैन। 

अर्थात नवाब साहब ये आपका अजीब तरीका लगता है जब भी किसी को कुछ सहायता देते हैं उसकी तरफ नहीं देखते अपनी नज़रें नीचे को झुकी हुई होती हैं। 

रहीम :-

देनहार कोऊ और है देवत है दिन रैन , लोग भरम मोपे करें याते नीचे नैन। 

अर्थात देने वाला तो कोई और है अर्थात ऊपर वाला मुझे देता है मैं तो उसका दिया आगे सौंपता हूं अमानत की तरह मगर लोग लेने वाले समझते हैं मैं देता हूं इस बात से मेरी नज़र झुकी रहती है। 

अब विचार करें ये राजनेता तो कोई नवाब नहीं विरासत नहीं मिली बाप दादा से कोई। जो भी है देश की जनता का है उसी से मिलता है कर वसूल कर के। खुद जनता के पैसे से शान से रहते हैं कोई उपकार नहीं किया करते जब देते हैं कुछ भी किसी को या कोई भी काम करते हैं अपनी जेब से नहीं देश की मालिक जनता के खज़ाने से। फिर इश्तिहार अपने नाम से हमने क्या क्या किया है , ये बड़ा होना नहीं छोटा बनना है।  
  
  

आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक - आलेख - डॉ लोक सेतिया

 आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक - आलेख - डॉ लोक सेतिया

        बहुत देर कर दी मेहरबां आते आते। जब तथाकथित आधुनिक तौर तरीके एफआईआर से लेकर सीएम पीएम को शिकायत करने को लेकर दावे किये जाते हैं यहां तक कि हरियाणा जैसे राज्य की सरकार करोड़ों रूपये खर्च करती है बताने को कि कितनी संख्या की शिकायत का निवारण किया जा चुका है देश की सरकार ऐप्स से लेकर ट्विटर तक पर आपकी बात सुनती है। उन्नाव की महिला की शिकायती चिट्ठियां तीस चालीस जगह रद्दी की टोकरी में फेंकी जा चुकी होती हैं और सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर ये बताने के बाद देश की सबसे बड़ी अदालत के मुख्य न्यायधीश अपने दफ्तर से पता करते हैं और जागते हैं करवाई करने को। अदालत को बड़ी आलीशान इमारतों की नहीं इंसाफ करने और इंसाफ किया जाता है भरोसा कायम करने की अधिक ज़रूरत है। काश न्यायपालिका से जुड़े लोग विलंब से न्याय मिलना अन्याय ही होता है इस बात को समझते और चरमराती व्यवस्था को बचाने को संवेदनशील होकर काम करते न कि जब गली गली शोर है और सब जानते हैं सत्ताधारी दल सबसे अधिक अपराधी लोगों को विधायक सांसद बनाने का गंभीर अपराध करता है बाकी सभी दल भी उसी राह चलते हैं। राजनीति अड्डा बन गई है अपराध का। मगर हमारी पुलिस कितने विभाग इस सब से बेपरवाह नाच गाने की महफ़िल सजाते हैं किसी नाम से। आज भी हरियाणा में मेरे शहर में पुलिस राहगीरी नाम से मौज मस्ती नाचने झूमने रागनी गाने से लेकर योग का मसाला शामिल कर किसी चाटमसाले की तरह सब परोसने को लगा है जब कनून व्यवस्था की हालत सबके सामने है। मगर उनको उन्नाव या किसी और जगह की घटना से सीखना नहीं जब अपने राज्य शहर की घटना होगी तब देखा जाएगा। वास्तविक कर्तव्य को दरकिनार कर आडंबर तामाशे करना आसान है और सत्तधारी नेता भी यही चाहता है। शायद अभी भी नेताओं अधिकारियों को कोई कमी नज़र आती है कानून व्यवस्था की बदहाली में कोई कसर बाकी है। शर्म की बात तो कोई नहीं करता शर्म किसी और ज़माने की बात है।

     देश से जनता से किसी भी दल को कुछ भी सरोकार नहीं है सबका एक ही मकसद है सत्ता हासिल करना और सत्ता को किसी भी तरह से जाने नहीं देना। ऐसी मानसिकता के चलते देश की जनता ठगी जाती रही है और हर दल विरोधी को दोष देता रहा है अपने आप को कोई नहीं देखता क्या कथनी है और क्या वास्तविक आचरण करते हैं। देशभक्ति को ख़ास दिन झंडा फहरा कर सलामी देकर भाषण पढ़कर औपचरिकता निभाना बना दिया गया है। देश संविधान लोकमत और न्याय अन्याय की बात की चिंता नहीं बस चुनावी गणित साधना है उस के लिए गुंडे बदमाश अपराधी सबको गले लगा सकते हैं। वोट की खातिर कुछ भी करते कोई लज्जा नहीं आती बेशक समाज को बांटना पड़े लड़वाना भिड़वाना नफरत फैलाना पड़े किया जा सकता है। करोड़ों लोग बिना अपराध सज़ा पाते हैं सत्ता के अधिकार और ताकत को मनमानी करने और गुंडई करने को उपयोग किया जाता है। जानते हैं हर राज्य हर शहर गांव में सत्ताधारी नेता मनमानी करते हैं अधिकारियों के सहयोग से छूट पाकर। शायद उनको लगता है करोड़ों लोग कायर बनकर हमेशा उनके ज़ुल्म सहते रहेंगे , मगर क्या ऐसा संभव है। हमेशा सभी को मूर्ख कोई नहीं बना सकता है कभी तो हम निडर होकर उनके ऐसे आपराधिक आचरण और सत्ता की मनमानी लूट के खिलाफ डटकर खड़े होंगे। अत्याचारी की अत्याचार की किसी सीमा के बाद तो हम अपने अधिकार अपनी आज़ादी की खातिर सामने आकर आवाज़ उठाएंगे।

दोस्ती से दुश्मनी प्यार से नफरत तक ( फेसबुक से व्हाट्सएप्प तक ) डॉ लोक सेतिया

दोस्ती से दुश्मनी प्यार से नफरत तक ( फेसबुक से व्हाट्सएप्प तक ) 

                               डॉ लोक सेतिया 

 करीब सात साल का अनुभव है सोशल मीडिया पर इत्तेफ़ाक़ से नहीं अनजाने से शामिल हो गया था। कंप्यूटर पर लिखने की आदत शुरू की थी पता नहीं कब कैसे सामने ऑप्शन आया फेसबुक का और नासमझी में क्लिक करते करते फेसबुक में शामिल हो गया। समझ नहीं था क्या बला है कुछ भी नहीं जानता था बस नोटिफ़िकेशन मिलते रिक्वेस्ट भेजी किसी ने। याद नहीं था पासवर्ड भी और कैसे उपयोग करते हैं ये भी। मुझे कोई बात नहीं मालूम हो तो समझने या पूछने में संकोच नहीं किया करता और किसी ने बताया दोस्त बनाते हैं दोस्ती की बात है अपने विचार सांझा करते हैं। बचपन से दोस्ती की या यूं कहना उचित है किसी एक सच्चे दोस्त की तलाश थी , पागलपन या ख्वाब रहा है कहीं कोई है कभी न कभी मिलेगा। उसी चाहत से मुझे फेसबुक अकाउंट बनाने का विचार आया और फिर नई फेसबुक बनाई। अच्छी खराब कई बातें हुईं और कभी मोहभंग होने पर छोड़ दिया कभी दोबारा फिर वापस चला आया , नशा नहीं है मगर इक ज़रूरत बन गई। ब्लॉग से रचनाएं शेयर करने की आदत बनती चली गई। दोस्त बनाता रहा हटाता भी बहुत जल्दी था जब कुछ बातें जो मंज़ूर नहीं थी कोई आपत्तिजनक आचरण करता तब नहीं सहन होता था। खैर हर जगह कुछ पसंद कुछ नापसंद की बात होती रहती हैं धीरे धीरे अपना लिया था मगर आज सोच रहा हूं जब इस तथाकथित सामाजिकता की बस्ती में आया था तब से अभी तक कितना बदलाव हुआ है इस में। 

      आज साफ कहूं तो घबराहट होती है बेचैनी होती है डर सा लगता है ये देख कर कि फेसबुक व्हाट्सएप्प पर दोस्ती की नहीं दुश्मनी की मुहब्बत की नहीं नफरत की बात दिखाई देती है। जाने कैसी उल्टी पढ़ाई पढ़ रहे हैं कि लोग या तो किसी की चाटुकारिता करते हैं या फिर नफरत फैलाने का काम करते हैं। मुझे बड़ी हैरानी होती है अच्छी पढ़ाई लिखाई अच्छे व्यवसाय में शामिल देखने में बेहद शालीन लगने वाले सभ्य कहलाने वाले लोग अपने भीतर दिमाग़ में कितना ज़हर पाले हुए हैं। मज़हब के नाम पर धर्म को समझे जाने बिना धर्म के ठेकेदार बनकर देश को समाज को विभाजित करने की बातें करते हैं मगर समझते हैं देश समाज से प्यार करते हैं। खुद गुमराह हैं औरों को भी गुमराह करने का काम करते हैं। भटके हुए लोग दावा करते हैं मार्गदर्शन करते हैं। 

               सोशल मीडिया का वास्तविक मकसद था सामाजिकता की बात करना आपसी मेल मिलाप बढ़ाना विचारों का आदान प्रदान करना जानकारी हासिल करना। मगर तमाम लोगों ने इसका उपयोग ठीक बंदर के हाथ उस्तरा होने की तरह किया है। कोई सोचता समझता नहीं इस से किसी पर कैसा असर पड़ेगा , अफवाह और अधकचरी गलत जानकारी को सच समझना और झूठ सच को परखे बिना यकीन ही नहीं करना बल्कि औरों को भी अपनी मर्ज़ी की व्याख्या समझने को विवश करना जैसे बातें होने लगी हैं। हैरानी की बात है टीवी चैनल वालों को ये भी चर्चा का बढ़ावा देने का सनसनी पैदा करने टीआरपी बढ़ाने का माध्यम लगा जो हर कोई विशेष नाम से किसी सोशल मीडिया के वीडियो की वास्तविकता असली नकली साबित करने को जासूसी उपन्यास की तरह कौतूहल पैदा करने की बात करता है और हम उसे मनोरंजन समझते हैं जो वास्तव में हमारी सोच को कुंद करने का काम करता है। राजनीतिक दलों ने चुनावी गणित साधने को जितना गलत इस्तेमाल सोशल मीडिया का किया है उसे निजता का हनन और अभिव्यक्ति के अधिकार का दुरुपयोग अपने स्वार्थ की खातिर किया है। अख़बार में या किसी किताब में लिखी बात की सत्यता को परखा जा सकता है मगर सोशल मीडिया पर कौन क्या झूठ गलत जानकारी देकर आपसी भाईचारा खराब कर तनाव पैदा करने का अनैतिक आचरण करता है कोई परखता नहीं और विश्वास करते हैं इस तरह से पेश किया जाता है। 

देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए अनुचित है कि राजनैतिक दल जनता से संवाद करने को आमने सामने मिलने की जगह एकतरफा अपना पक्ष थोपने का काम करने लगे हैं। असंवैधानिक है ये बहस सोशल मीडिया पर करवाना किसको जीत हार वोट देने का विषय पोस्ट पर करना किसी का समर्थन या विरोध करने को। क्यों अनावश्यक आपत्तिजनक ढंग से जनमत को अपनी साहूलियत से बदलने की कोशिश करनी चाहिए। हद है अब राजनैतिक दल सोशल मीडिया का माहौल अपने पक्ष में बनाने को झूठी लाखों फेसबुक या कुछ लोगों को फोन और पैसे देकर व्हाट्सएप्प  पर उनकी महिमा के संदेश भेजने का फरेब करते हैं और उनको भरोसा है चुनाव इस तरह से लड़ा और जीता जा सकता है।

Saturday, 3 August 2019

दोस्ती का अर्थ किस्से कहानियां ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   दोस्ती का अर्थ किस्से कहानियां ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

दोस्त दोस्ती मेरे लिए दुनिया से सबसे महत्वपूर्ण यही संबंध है। मेरा तो सारा लेखन दोस्त के नाम है। कविता कहानी ग़ज़ल आलेख क्या नहीं लिखा। बहुत दोस्त मिले बिछुड़े हैं फिर भी अभी भी मुझे उस सच्चे दोस्त की खोज है जो साथ हो तो कुछ भी और नहीं चाहिए। दोस्त से बढ़कर कीमती कोई चीज़ दुनिया की नहीं हो सकती है। दो शब्दों में दोस्त मिल जाये तो भगवान की भी ज़रूरत नहीं है। आज संक्षेप में बताना है आज के दिन पर दोस्ती का अर्थ क्या है। पहले कुछ रचनाओं को फिर से पढ़ते हैं। 

और कुछ भी नहीं बंदगी हमारी - लोक सेतिया "तनहा"

और कुछ भी नहीं बंदगी हमारी ,
बस सलामत रहे दोस्ती हमारी।

ग़म किसी के सभी हो गए हमारे ,
और उसकी ख़ुशी अब ख़ुशी हमारी।

अब नहीं मांगना और कुछ खुदा से ,
झूमने लग गई ज़िंदगी हमारी।

क्या पिलाया हमें आपकी नज़र ने ,
ख़त्म होती नहीं बेखुदी हमारी।

याद रखनी हमें आज की घड़ी है ,
जब मुलाक़ात हुई आपकी हमारी।

आपके बिन नहीं एक पल भी रहना ,
अब यही बन गई बेबसी हमारी।

जाम किसने दिया भर के आज "तनहा" ,
और भी बढ़ गई तिश्नगी हमारी।  


दोस्त भूले दोस्ती हम क्या करें - लोक सेतिया "तनहा"

दोस्त भूले दोस्ती हम क्या करें ,
बन गए सब मतलबी हम क्या करें।

प्यार से देखा हमें जब आपने ,
ले गई दिल सादगी हम क्या करें।

अब बताएं सब हुस्न वाले हमें ,
जब सताए आशिकी हम क्या करें।

एक दिन हम ढूंढ ही लेते खुदा ,
खो गई है ज़िंदगी हम क्या करें।

दिल हमारा लूट कर कल ले गईं ,
सब अदाएं आपकी हम क्या करें।

प्यार उनको जब रकीबों से हुआ ,
फिर हमारी बेबसी हम क्या करें।

आज कितना दूर देखो हो गया ,
आदमी से आदमी हम क्या करें।

सब परेशां लग रहे इस शहर में ,
हम यहाँ पर अजनबी हम क्या करें।

आज "तनहा" मार डालेगी तुम्हें ,
अब किसी की बेरुखी हम क्या करें। 

जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर - लोक सेतिया "तनहा"

जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर ,
हमारा भी इक दोस्त होगा कहीं पर।

यही काम करता रहा है ज़माना ,
किसी को उठा कर गिराना ज़मीं पर।

गिरे फूल  आंधी में जिन डालियों से  ,
नये फूल आने लगे फिर वहीं पर।

वो खुद रोज़ मिलने को आता रहा है ,
बुलाते रहे कल वो आया नहीं पर।

किसी ने लगाया है काला जो टीका ,
लगा खूबसूरत बहुत उस जबीं पर।

भरोसे का मतलब नहीं जानते जो ,
सभी को रहा है यकीं क्यों उन्हीं पर।

रखा था बचाकर बहुत देर "तनहा" ,
मगर आज दिल आ गया इक हसीं पर।


मिला था कभी इक पैगाम दोस्ती का - लोक सेतिया "तनहा"

मिला था कभी इक पैगाम दोस्ती का ,
हमें अब डराता है नाम दोस्ती का।

बुझाता नहीं साकी प्यास क्यों हमारी ,
कभी तो पिलाता इक जाम दोस्ती का।

नहीं दोस्त बिकते बाज़ार में कभी भी ,
चुका कौन पाया है दाम दोस्ती का।

करेगा तिजारत की बात जब ज़माना ,
रखेंगे बहुत ऊँचा दाम दोस्ती का।

हमें जीना मरना है साथ दोस्तों के ,
सभी को है देना पैग़ाम दोस्ती का।

वफ़ा नाम देकर करते हैं बेवफाई ,
किया नाम "तनहा" बदनाम दोस्ती का।


ये सबने कहा अपना नहीं कोई - लोक सेतिया "तनहा"

ये सबने कहा अपना नहीं कोई ,
फिर भी कुछ दोस्त बनाये हमने।

फूल उनको समझ कर चले काँटों पर ,
ज़ख्म ऐसे भी कभी खाये हमने।

यूँ तो नग्में थे मुहब्बत के भी ,
ग़म के नग्मात ही गाये हमने।

रोये हैं वो हाल हमारा सुनकर ,
जिनसे दुःख दर्द छिपाये हमने।

ऐसा इक बार नहीं , हुआ सौ बार ,
खुद ही भेजे ख़त पाये हमने।

हम फिर भी रहे जहां में "तनहा" ,
मेले कई बार लगाये हमने।  


   मेरी जान , मेरे दोस्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

अक्सर आता है मुझे याद 
पहला दिन कालेज का
झाड़ियों के पीछे
पत्थरों पर बैठे हुए थे
हम दोनों कालेज के लान में।

रैगिंग से हो कर परेशान 
कितने उदास थे हम 
कितने अकेले अकेले
पहले ही दिन कुछ ही पल में
हम हो गये थे कितने करीब।

अठारह बरस है अपनी उम्र 
आज भी लगता है कभी ऐसे
कितनी यादें हैं अपनी
जो भुलाई नहीं जाती 
भूलना चाहते भी नहीं थे
हम कभी।

पहली बार मुझे
मिला था दोस्त ऐसा 
जो जानता था
पहचानता था
मुझे वास्तव में।

बीत गये वो दिन कब जाने
छूट गया वो
शहर उसका बाज़ार
गलियां उसकी।

बरसात में भीगते हुए  
हमारा कुछ तलाश करना
बाज़ार से तुम्हारे लिये 
खो गई सपनों जैसी
प्यारी दुनिया हमारी।
 
मगर भूले नहीं हम
कभी वो सपने
जो सजाए थे मिलकर कभी 
अचानक तुम चले गए वहां
जहां से आता नहीं लौटकर कोई।

मुझे नहीं मिला
फिर कोई दोस्त तुम सा 
खाली है मेरे जीवन में
इक जगह
रहते हो अब भी तुम वहां।

आज भी सोचता हूँ
जाकर ढूंढू 
उन्हीं रास्तों पर तुम्हें जहां
चलते रहे दोनों यूं ही शामों को
अब कहां मिलते हैं
इस दुनिया में तुझसे दोस्त।

अब क्या है इस शहर में
इस दुनिया में
बिना तेरे मेरी जान मेरे दोस्त।


साया ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

पी लेता हूं 
यूं तो अक्सर
ज़िंदगी का
मैं ज़हर।

जाने क्यों
फिर भी कभी
भर आती हैं आंखें 
और घुटने
लगता है दम।

रोकने से
तब रुकते नहीं
आंखों से आंसू
तनहाई में अक्सर।

मन करता है
जा कर पास तुम्हारे
चुप चाप बैठ कर
जी भर के रो लेने को।

सोचता हूं 
मैं कभी कभी
अकेले में ये भी
जिसकी तलाश है मुझे 
तुम वही हो कि नहीं।

भीगी पलकों के
हम दोनों के शायद
इस नाते को कभी
मैं नहीं कोई भी
नाम दे पाया।

तुम्हें भी
याद आता है कभी
छत के कोने में देर रात तक
राह तकता हुआ
गुमसुम सा
खड़ा कोई साया।
ऊपर की रचनाओं से कुछ समझ आया होगा लिखा हुआ बहुत है कहानियां भी बड़ी बड़ी मगर अब थोड़े में असली बात कहना चाहता हूं। कुछ मिसालें भी हैं फिल्म से और कथा कहानियों से लेकर। दोस्त साथ रहें या दूर भी कभी दोस्ती कायम रहती है। बात फिल्मों से की जाये तो दोस्ती फिल्म की कहानी गीत सभी दोस्ती को समझने को बहुत हैं। दोस्ती की खातिर कुछ भी करते हैं कोई एहसान कोई क़र्ज़ नहीं समझते हैं। बाकी हर रिश्ते नाते में हिसाब होता है दोस्ती में कभी हिसाब किताब नहीं होता है। संगम फिल्म में दोस्त जिसको चाहता है अपनी चाहत उस पर कुर्बान कर देते हैं जान भी दे देते हैं हंसते हंसते। आदमी फिल्म में भी यही दोहराया गया था चौदवीं का चांद फिल्म में दोस्ती की खातिर नायिका से जाने बिना विवाह करने के बाद जब पता चलता है कि गलती से दोस्त ने खुद जिसको पसंद करता उसी से विवाह करने को कह दिया तो हर रिश्ते से पहले दोस्त की ख़ुशी ज़रूरी लगती है। कृष्ण अर्जुन की दोस्ती और सुदामा की दोस्ती दोनों अपनी जगह हैं मगर कर्ण की दोस्ती गलत होने पर भी दोस्त का साथ जंग में देना अपनी जगह है। इतिहास में भी दोस्त शासक को खरी बात कहने से नहीं डरते ऐसा मिलता है और सही मार्गदर्शन आपका सच्चा हितेषी दोस्त ही हो सकता है। शोले फिल्म की जय वीरू की दोस्ती भी याद रहती है और जंज़ीर फिल्म में इक गुंडे की पुलिस अधिकारी से दोस्ती उसको क्या से क्या बना देती है। फिल्मों ने दोस्ती पर कई लाजवाब गीत दिए हैं।

यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िंदगी। कोई जब राह न पाए मेरे संग आये कि पग पग राह दिखाए मेरी दोस्ती मेरा प्यार। दोस्ती में निराशा भी मिलती है और कभी कोई गलतफ़हमी भी मगर सच्ची दोस्ती कभी मिटती नहीं है। जो लोग मतलब से दोस्ती करते हैं या अनबन होने पर दुश्मनी करने लगते हैं कभी सही मायने में दोस्त नहीं होते। जिनके पास अच्छे दोस्त होते हैं दुनिया के सबसे खुशनसीब और धनवान लोग वही होते हैं। इतना बहुत है कहा तो बहुत जा सकता है मगर आज दोस्तों को दोस्ती के शुभ दिन की बधाई और शुभकामना संदेश इतना ही है कि इक सच्चा दोस्त हज़ार रिश्तेदारों से बढ़कर है अपने दोस्त को संभाल कर रखना खो नहीं जाये कहीं कोई भी। 

           एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तो , ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तो।

Thursday, 1 August 2019

पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

आज की बात से पहले इक ग़ज़ल कैफ़ी आज़मी जी की कहना चाहता हूं विषय को समझने को उचित है। 

मैं ढूंढता हूं जिसे वो जहान नहीं मिलता , नई ज़मीन नया आसमान नहीं मिलता। 
नई ज़मीन नया आसमान भी मिल जाये , नये बशर का कहीं कुछ निशान नहीं मिलता। 
वो तेग मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मेरा , किसी के हाथ का उस पर निशां नहीं मिलता।
जो इक खुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्या , यहां तो कोई मेरा हमज़बां नहीं मिलता। 
खड़ा हूं कब से मैं चेहरों के एक जंगल में , तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहां नहीं मिलता। 

         आज जो बात कहनी है वो किसी एक की नहीं सारे समाज की है। साहित्य हो राजनीति हो धर्म हो समाज सेवा कोई कारोबार हो या कोई शिक्षा स्वस्थ्य समाज सेवा का क्षेत्र हो अजीब विसंगती है विडंबना है खेद की चिंता की बात है कि अपना योगदान देकर उसको समृद्ध कोई नहीं करना जनता हर कोई उस से बहुत कुछ हासिल करने को व्याकुल है। क्या हम सब इतने खाली हो चुके हैं जो जितना भी भरता रहे कोई भी फिर भी खालीपन ख़त्म नहीं होता है। ये देश समाज कभी ऐसा तो नहीं था जो सिर्फ मांगता है छीनता है देता किसी को कुछ भी नहीं है। ये कैसी हवस है और अधिक पाने की जो बढ़ती जाती है , ऊंचे से ऊंचे सिंहासन पर बैठा व्यक्ति भी वास्तव में बहुत छोटा है देना नहीं पाना चाहता है। राजनीति में लोग देश को सेवाएं देने नहीं अपने लिए धन साधन अधिकार शोहरत ताकत पाने को आते हैं। अर्थात हर कोई भिखारी है मांगता है देश को देने को पास है ही नहीं कुछ भी। 

धर्म वालों की हालत इतनी खराब है कि उपदेश देते हैं संचय नहीं करें गरीब दर्दमंद की सहायता करें मगर खुद धन दौलत का जायदाद का अंबार लगाने को लगे हैं। समाज सेवा या सरकारी नौकरी हो कर्तव्य नहीं अधिकार याद रहते हैं और उनका दुरूपयोग करना अनुचित नहीं लगता है। नैतिकता का पतन इस सीमा तक हो चुका है कि अपने पद की गरिमा को भी संभाल नहीं पाते हैं। जो जितना धनवान कारोबारी है उसको उतनी ही ज़्यादा भूख और किसी भी तरह पाने की है। हर कोई चलता है बड़े होने का मकसद लेकर मगर ऊपर जाने को नीचे गिरने से संकोच कोई नहीं करता है। खुद आत्मसम्मान स्वाभिमान को खोकर किसी की चाटुकरिता कर क्या हासिल किया नहीं समझते हैं। अंतरात्मा को ज़मीर को मारकर ज़िंदा रहना मौत से बदतर है। 

नहीं मिलता कुछ भी। जिस जहान की तलाश थी नहीं मिलता। कुछ भी नयापन नहीं है नई ज़मीन नया आसमान कोई ढूंढता ही नहीं चांद तारों की बात होती है। धरती को रहने के काबिल नहीं बनाते हैं। कोई इंसान इंसान जैसा नहीं मिलता मिलती है हर किसी में छुपी हुई हैवानियत जिधर भी जाओ। चर्चा होती है सब गलत होने की अन्याय की व्यवस्था की बदहाली की , ये भी जानते हैं किस तलवार से ये खून मानवता का बहा है मगर उस तलवार पर किसी क़ातिल के हाथ का निशां नहीं मिलता है। आपको खुदा अल्लाह की नहीं मिलने की कमी लगती है वो नहीं मिले तो मातम करने की क्या ज़रूरत है दुःख तो इसका है आदमी आदमी की बात नहीं समझता है। ये दुनिया किसी चेहरों के जंगल की तरह है मगर कोई भी चेहरा आदमियत का इंसानियत का दिखाई नहीं देता है। 

           सबको मंज़िल पानी है रास्ता कोई नहीं बनाना चाहता , शायद राह पर चलना भी नहीं चाहता कोई भी। राह की मुश्किलों को रास्ते की रुकावटों को हटाए बिना कभी कोई मंज़िल मिलती नहीं है। हम सभी बस खड़े हुए हैं ये उलझन लेकर कि कोई पूछे तो क्या बताएं कि जाना किधर है। निकले थे कहां जाने के लिए पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं , अब अपने भटकते कदमों को मंज़िल के निशां मालूम नहीं।