Saturday, 13 April 2019

कलयुग की आत्मकथा ( व्यंग्य कहानी ) डॉ लोक सेतिया

      कलयुग की आत्मकथा ( व्यंग्य कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

   शानदार वातानुकूलित मॉल के हॉल में स्वयं कलयुग सफ़ेद रंग का चोला धारण कर बाकायदा भीतर आने की महंगी टिकट खरीदने वालों को अपनी आत्मकथा सुना और दिखला रहे हैं। मान लिया गया है कि ये इस युग के भगवान हैं और इनकी अराधना आरती पूजा पाठ सब कुछ दे सकता है। पहले अध्याय में बात सत्ययुग की बताई थी फिर कैसे युग बदलता गया विस्तार से समझाया था। यहां सभी देवी देवता रहा करते थे धर्म भी इक गरीब की झौंपड़ी में रहा करता था उसका कोई अपना महल नहीं था मगर उसका ठिकाना हर दिल में हुआ करता था। माता पिता थोड़ा पढ़े लिखे होते थे मगर उनकी समझ ऊंची हुआ करती थी बच्चे माता पिता को गुरु भगवान से बढ़कर मानते थे और घर कितना छोटा भी होता दिल सभी के बड़े हुआ करते थे। तब घर में बच्चे भाई ताऊ चाची सब मिलकर रहते थे। घर में रौनक चहल पहल रहती थी मधुर वाणी सुनाई देती थी कोई शोर नहीं होता है धीमी आवाज़ भी सब को सुनाई देती थी। मन साफ थे और रूखी सूखी खा कर भी कोई कमी नहीं महसूस होती थी। अहंकार स्वार्थ जाने किधर से आकर सब के भीतर रहने लगे और भाई भाई अलग होने लगे बच्चे माता पिता से दूर जाने लगे सभी अपनी अपनी दुनिया बसाने लगे। घर बड़े और ऊंचे आसमान को छूने वाले बनते गए सामान बढ़ता गया घर में इंसान को रहने को दो गज़ जगह भी अपनी नहीं मिलती है। कभी जिन माता पिता के घर आंगन में सब बच्चे भाई बहन उनके साथी दोस्त सखी सहेली खेला करते थे उन्हीं माता पिता को बच्चों के घर में आकर समझौता कर वक़्त बिताना पड़ता है। पिता के घर अधिकार से सब रहते थे बच्चों के महल में रहना है तो बड़े बूढ़ों को सलीका सीखना होता था और जीने को सब सहना पड़ता है। आधुनिकता और तथाकथित सभ्यता के विकास ने बाग़ बगीचे छीन गमले की सीमा बना दी थी पेड़ पौधे सब का अपना सभी कुछ बदल गया है छांव तलाश करते हैं तो दरख्तों से आग बरसती लगती है। पत्थर के लोग क्या हुए जो देवी देवता हुआ करते थे सभी बेजान पत्थर के बन गए हैं। लोग इंसान को प्यार नहीं करते पत्थरों की पूजा का आडंबर करते हैं धर्म जिस गरीब की झौंपड़ी में रहा करता था उसे शासन ने हटवा दिया है और जगह जगह अधर्म को स्थपित कर उनको धर्मस्थल घोषित कर दिया है। अब किसी भी ऐसी जगह कोई खुदा कोई भगवान कोई देवी देवता रहता नहीं है उनका भेस धारण कर मुझ कलयुग के अनुयायी मालामाल हो रहे हैं। सब मेरी इबादत पूजा करते हैं और पाप पुण्य का भेद बचा नहीं है। 

                युगों की दास्तान सुनाने में जितना समय लगेगा उतना जीवन बाकी नहीं है किसी के पास भी , सब सांसों की गिनती को जीना समझते हैं सांस सांस की कीमत चुकानी पड़ती है। बीती बातों को जानकर क्या होगा गुज़रा हुआ ज़माना वापस लौटता नहीं कभी। अपने जो खोया है बहुत मूलयवान था जो संजोया है कौड़ी का भी मोल नहीं है अभी आज की बात आज पर ही चर्चा करते हैं। कलयुग आया तो चोरी लूट डकैती अन्याय अत्याचार होने लगा ऐसे में इक चालाक आदमी ने कलयुग को सत्ययुग बनाने की बात की और सत्ता के शिखर पर चढ़ गया। उसने सभी को चोर अपराधी गुनहगार घोषित कर दिया और हर किसी पर पहरा लगाने का उपाय करने लगा। चोरी से बचने को सब को आदेश दिया अपना धन पैसा सोना चांदी हीरे मोती सभी कीमती सामान बैंक  में जमा करवाना है और सभी बैंकों की चाबी खुद अपने पास रख ली हैं। उसने घोषित किया है वही अकेला चौकीदार बनकर देश की रखवाली करेगा। और अपने काम में वह इधर उधर भागता फिरता है इस भरोसे पर कि जब हर खज़ाने की चाबी उसी के घर सुरक्षित हैं तो कोई चोर चोरी कैसे कर सकता है। मगर उसको इस बात का पता नहीं है कि घर घर में कोई महिला पत्नी बनकर घर की रखवाली किया करती है जबकि उसकी पत्नी घर में रह नहीं सकती है। अब ऐसे लोगों के घर यार दोस्त जब मर्ज़ी बिना रोक टोक घुसते रहते हैं घर की कोई मालकिन देखने को दरवाज़ा बंद करने को नहीं है। अब चौकीदार के घर से राज़ के दस्तावेज़ चोरी हो जाते हैं लोग बैंकों का खज़ाना लूट भाग जाते है मगर चाबियां सुरक्षित हैं इसलिए चौकीदार चोरी लूट को मानने से इनकार करता है। चौकीदार अब अपनी बिरादरी कुनबा बढ़ाना चाहता है और दावत देने लगा है आप भी चौकीदार बनने की घोषणा कर दो। हर कोई उनका रुतबा देख मैं भी चौकीदार घोषित कर रहा है। 

              आज की कथा का अंत इसी बात पर करते हैं कि जो देश करोड़ों देवी देवताओं का हुआ करता था क्या उसका भविष्य चौकीदारों का देश शहर बस्ती होना विकास की बात हो सकता है। क्या इस बात पर ताली बजाई जानी चाहिए आप सभी से वही इक दिन सवाल करेगा। चौकीदार होना क्या बुरी बात है क्या चौकीदार इंसान नहीं होते हैं उनको शासक नहीं बनाया जा सकता है। ऐसे में इक छोटे से शहर की अदालत ने जाने क्या समझ कर निर्णय सुनाया है चौकीदार से आठ घंटे से अधिक काम नहीं लिया जा सकता है और उसको छुट्टी भी मिलनी चाहिए। चौकीदार की छुट्टी की बात से कितनों को पसीने आने लगे हैं कोई छुट्टी नहीं चाहता है क्योंकि चौकीदारी ऐसा कर्म है जिस में जागते रहो की आवाज़ लगाने को छोड़ कोई काम नहीं करना होता है और आजकल गली गली चौकीदार की रिकार्डेड आवाज़ गूंजती रहती है और चौकीदार मज़े लूटता रहता है। त्याग की बात हो तो हर कोई ऐसा त्याग करने को व्याकुल है। हींग लगे न फटकरी और रंग भी चौखा इसी को कहते हैं। 

   ( अभी कथा या आत्मकथा शुरू होनी है इसे आप किताब की शुरुआत की लिखी व्याख्या समझना )


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