Monday, 29 April 2019

गुलामों की मंडी का सौदागर है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   गुलामों की मंडी का सौदागर है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

 कहानी वही पुरानी है इक सरकार बनानी है। इक वही खरीदार है उसी का पूरा बाज़ार है। गुलामों की होती बोली है सबको उतनी खैरात मिलती जितनी जिसकी झोली है। कहती मीनाकुमारी है हर गुलबदन तुम्हारी है खुद को मुर्दा समझती है इक श्मशान जा बैठी है इस्मत किस ने लूटी है किस्मत अपनी फूटी है। बच्चन की याद आई है सौदागर की चर्चा छाई है। शादी नहीं व्यौपार किया गुड़ का चोखा कारोबार किया। उसका गुड़ सबसे मीठा था झट पट सारा बिक जाता था। शादी की दौलत कमाई छोड़ दिया इक अबला का दिल तोड़ दिया। आज़ादी से पहले यही होता था इक पिजंरा था इक तोता था इक नाम रटता रहता था हरी मिर्ची खा खुश रहता था। फिर से मंडी लगाई है बाज़ार पुराने में दुकान लगाई है उसकी गुलामी अच्छी है झूठी बात भी सच्ची है। भरी सभा में बताता है बिकने वालों से मेरा नाता है जो भी बिकता जाता है वही खरीदार कहलाता है। दाग़ी अपराधी उसके पास आते हैं गंगा उसी की है नहाते हैं फिर ईमानदार और शरीफ कहलाते हैं। 

    बंधक बनाना अपराध नहीं है उसकी कैद हवालात नहीं है। उसके पिंजरे के जितने पंछी हैं सबको दाना मिलता है बाकी सब जो भूखे हैं नासमझ हैं बस रूठे हैं। उसको मनाना आता है सरकार चलाना आता है। उस पर लागू संविधान नहीं उसके सिवा कोई भी महान नहीं। शोरूम है कोई दुकान नहीं। अब तो ऐसा हाल है वो खुश है जो दलाल है। उसकी टेड़ी चाल है सत्ता का धमाल है फिर वही सुर ताल है उल्लू डाल डाल है पांच साल पांच साल है जाने कैसा कमाल है सरकारी जाल है। खेल उसी का वही खिलाड़ी है उसी बल्ला उसकी बॉल है। चलता उल्टी चाल है उसकी नई मिसाल है। जनता की धोती फ़टी हुई है महंगा सरकारी रुमाल है। सरकार को खतरा नहीं जनता बस बदहाल है। नैतिकता के भाव गिर गये हैं अनैतिकता की कीमत में उछाल है। उनके मन भाये जो भी वो बकरा हलाल है। झूठ बैठा सिंहासन पर सच खड़ा फटेहाल है। सोना सस्ता महंगा पीतल राजनीति की टकसाल है। पल पल रंग बदलता ये अखबारी आईना बेमिसाल है अक्स बनाता अक्स बिगाड़ता टीवी चैनल मालामाल है। नसीहत देता है नाम फजीहत लाल है। जो हल नहीं करना उनको कभी भी गरीबी ऐसा सवाल है। भूखे पेट किसान मरते हैं गोदामों में सड़ता माल है। चुनावी दौड़ धूप है अभी फिर तो बेढंगी चाल है। सूअर की आंख में किसी लोमड़ी का बाल है , जांच कर रहा खुद कोतवाल है। विलंब नहीं है थोड़ा अंतराल है। आप निकालते बाल की भी खाल है जब घोटालों का देश है कैसे फिर कंगाल है।

   करोड़पति बनाता कोई मुंगेरीलाल है। पानी बोतल बंद है जूतों में बंटती दाल है। सत्ता के गलियारे में अपनी करताल है उनका सब हराम है अपने लिए हलाल है। फूल तोड़ता खुद माली अधखिले देख रही हर डाल है। पनघट की डगर हुई वाचाल है। खलियानों को रौंदती जाती राजनीति की घुड़ताल है। सुनते थे जो बिहार में देख लो वही बंगाल है। दफ्तर दिल्ली घर भोपाल है कल जो पर्वत था अब बना पाताल है। इक फ़साना बन गया खुद हक़ीकतलाल है। हर नज़र बन गई अनसुलझा सवाल है। बड़ा गुरु से हुआ गुरुघंटाल है घर आया था मेहमान बनकर मालिक को दिया बाहर निकाल है। गुंडों बदमाशों के लिए जेल भी ससुराल है। अय्याशी के लिए होटल सा हाल है। जीने की नहीं बात अब मरने का सवाल है। लोकतंत्र तू बता तेरा क्या हुआ हाल है। हर दम तेरी चिंता है इक तेरा ख्याल है। हास्य व्यंग्य भी हुआ दर्द से बेहाल है। इक हास्य व्यंग्य की कविता से बात का अंत करते हैं।


        अब तो ऐसा हाल है ( हास्य-वयंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

                                          

जूतों में बंटती दाल है ,

अब तो ऐसा हाल है ,

मर गए लोग भूख से ,

सड़ा गोदामों में माल है।


बारिश के बस आंकड़े ,

सूखा हर इक ताल है,

लोकतंत्र की बन रही ,

नित नई मिसाल है।


भाषणों से पेट भरते ,

उम्मीद की बुझी मशाल है,

मंत्री के जो मन भाए ,

वो बकरा हलाल है।


कालिख उनके चेहरे की ,

कहलाती गुलाल है,

जनता की धोती छोटी है ,

बड़ा सरकारी रुमाल है।


झूठ सिंहासन पर बैठा ,

सच खड़ा फटेहाल है,

जो न हल होगा कभी ,

गरीबी ऐसा सवाल है।


घोटालों का देश है ,

मत कहो कंगाल है,

सब जहां बेदर्द हैं ,

बस वही अस्पताल है।


कल जहां था पर्वत ,

आज इक पाताल है,

देश में हर कबाड़ी ,

हो चुका मालामाल है।


बबूल बो कर खाते आम ,

हो  रहा कमाल है,

शीशे के घर वाला ,

रहा पत्थर उछाल है।


चोर काम कर रहे ,

पुलिस की हड़ताल है,

हास्य व्यंग्य हो गया ,

दर्द से बेहाल है।


जीने का तो कभी ,

मरने का सवाल है।

ढूंढता जवाब अपने ,

खो गया सवाल है।




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