Sunday, 10 March 2019

रामायण महाभारत अच्छे दिन की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    रामायण महाभारत अच्छे दिन की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   शासक को फिर कोई गीता रामायण महाभारत की तरह अच्छे दिन की कथा पढ़कर सुना रहा है। पिछले चुनाव में इसी का पाठ करने से वरदान मिला था बहुमत का। अभी तक लोग संशय में हैं कि अच्छे दिन क्या बला हैं क्या वास्तव में होते हैं अच्छे दिन क्या सच में अच्छे दिन आने वाले थे आये थे और अगर आये थे तो किस को मिले थे कितनों को इक जुमला लगता है और कई इसको इक वहम मानते हैं जैसे भूत होते नहीं हैं मन का डर होता है उसी तरह अच्छे दिन नहीं होते दिल की ख़ुशी को इक ख़्वाब देखते हैं। मुझे पंडित जी हर साल कुंडली देख अच्छे भाग्य जल्द आने का भरोसा देते रहे और इसी में 67 साल उम्मीद पर बिता दिये। अभी भी अच्छे दिन की राह देखते रहते हैं हम। 

        संजय उवाच , राजन आपकी तिजोरी से अच्छे दिन मिले हैं इस किताब के नीचे रखे हुए थे। गिनती की है तो पाया है बहुत थोड़े बचे हैं लगता है किसी विपक्षी दल वाले की नज़र पड़ गई थी जिसने चुपके से चुरा लिए हैं। शासक हंस दिये बोले भला मेरी तिजोरी कोई सरकारी दफ्तर है जिस से कोई सुरक्षा के दस्तावेज़ चुरा ले जाये , कोई चोरी नहीं हुई है सब चौकीदारी का कमाल है। अधिकतर अच्छे दिन मैंने खुद अपने लिए उपयोग किये हैं और पांच साल अच्छे नहीं कमाल के दिन का लुत्फ़ उठाता रहा हूं कभी कभी कुछ अच्छे दिन मैंने अपने ख़ास लोगों को उपहार की तरह बांटे हैं। मेरे दल की सरकार कितने राज्यों में बनवाई है और उन की बागडोर बस ख़ास अपने और संघ के लोगों के हाथ देकर अच्छे दिन दिखलाने का काम किया है। कितने ऐसे हैं जो सपने में कुर्सी नहीं देख सकते थे खाट भी नहीं नसीब होती थी मेरी मेहरबानी से सत्तासीन हैं। जिनकी किस्मत में अच्छे दिन थे वो सब मेरे दल में शामिल होते रहे हैं। गंगा स्नान की तरह भाजपा में आकर चोर और दाग़ी भी देशगभक्त और पाक साफ़ बन गये हैं।

   संजय उवाच , राजन क्या इस बार भी अच्छे दिन आने वाले हैं का नारा उपयोग करना है या फिर अच्छे दिन आये भी गये भी की बात की जा सकती है। शासक बोले तुम अच्छे दिन आने वाले हैं वाला अध्याय किताब से निकाल ही दो ताकि किसी को याद नहीं आये। अच्छे दिन की परिभाषा बदल चुकी है और लोग इस शब्द को सुनते ही घबराने लगते हैं। सब चाहते हैं अच्छे दिन अब फिर से वापस नहीं आने पाएं , हमने भी अब अच्छे दिन की चर्चा छोड़ दी है काला धन की बात भूल गये हैं देश की बदहाली सत्ता की मनमानी और अपनों को अंधे का रेवड़ियां बांटना भी विषय नहीं है। नफरत उन्माद को बदले ढंग से कोई अच्छा सा नाम  देशभक्ति जैसा देकर भीड़ को जोश में होश खोकर पागल बनने का उपाय करना है। काठ की हांडी इक बार चढ़ती है अच्छे दिन की बात फिर कोई काम नहीं आने वाली है। अच्छे दिन टीवी चैनल वालों को मिलते रहे हैं आगे भी मिलते रहेंगे इसका उपाय किया हुआ है बेशक कोई भी सत्ता पर काबिज़ हो। धर्म वालों को कभी बुरे दिन नहीं दिखाई दिये और बड़े बड़े उद्योगपति खिलाड़ी अभिनेता वीवीआईपी लोग हमेशा से अच्छे दिन का मज़ा लेते हैं। राजनेता किसी भी दल के हों उनके दिन अच्छे नहीं भी हों तब भी जनता की तरह खराब नहीं होते हैं कभी भी। अच्छे दिन की बात उस गठबंधन की तरह है जो आजकल इक टीवी सीरियल में पुलिस और गुंडागर्दी करने वालों के बीच होता है। असली प्यार यही है तकरार भी मुहब्बत भी साथ साथ। अच्छे दिनों की बात इक राज़ की बात थी उसको राज़ ही रहने दो। वापस रख देना तिजोरी में कभी ज़रूरत होगी तो बची पूंजी की तरह बुरे वक़्त काम आएंगे। ठीक है राजन इनको ख़ास आपके लिए रखने का उपाय करते हैं। 
         बात करते करते दोनों को नींद आ गई और फिर सपने में जय जयकार सुनाई देने लगा है।

 

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