Sunday, 10 February 2019

फ़साना-ए-मुहब्बत ताराना-ए-मुहब्बत ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

  फ़साना-ए-मुहब्बत ताराना-ए-मुहब्बत ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया 

       हम जिसे प्यार समझते हैं वो कोई सपनों की दुनिया है। कोई हसीना खूबसूरत अदा दिलकश सितारों की रंगीनियां कोई लड़का जो बस प्यार की बातें करता हो चांद तारे लाने के ख्वाब बुनता हो और जिसका साथ आप किसी और दुनिया में चले जाना चाहते हो जहां बस दो प्यार करने वाले हों और कोई रोकने टोकने वाला नहीं हो। मुहब्बत की इस दुनिया में भूख गरीबी और जीवन की वास्तविक उलझनों कठिनाईओं समस्याओं की कोई जगह नहीं है। महबूबा तेरी तस्वीर किस तरह मैं बनाऊं ऐसी ही एक फिल्म का गीत है , फ़िल्मी कहानी में लेखक कोई न कोई रास्ता नकाल लेता है अपने नायक को उसके सपनों की रानी से मुलाकात का। हम सब के साथ ऐसा होना संभव नहीं है और हम अपने महबूब महबूबा की छवि किसी फ़िल्मी अदाकार अदाकारा या कहानी के किरदार में ढूंढते हैं। ये इश्क़ असली ज़िंदगी में कायम रहता नहीं है क्योंकि कोई भी आपसे पल दो पल को मिलता है तब सब से सुंदर पहनावा खूबसूरत बातें और किसी मनपसंद जगह मुलाकात में सब लुभावना होता है लेकिन जिस के साथ जीवन भर साथ निभाना होता है उस के साथ तकरार भी इनकार भी और वो सब जो सपना नहीं हक़ीक़त होता है देख लगता है ख्वाब टूटता हुआ। जो लोग जिस्म की खूबसूरती को देख कर नहीं इक दूजे की शख्सियत को समझ और स्वीकार करने के बाद रिश्ता बनाते हैं उनके संबंध में कोई दरार कोई दिवार कोई उलझन कोई अड़चन नहीं होती है। मगर अधिकतर लोग आकर्षण को प्यार मान उसके मिलने नहीं मिलने पर भाव बदलते हैं जो सच्चा प्यार होता नहीं है।
               ये प्यार इश्क़ मुहब्बत के फ़साने नये पुराने दिल लुभाते हैं मगर इस नामुराद रोग का ईजाल क्या अभी तक रोग है कि बला है कोई नहीं समझ पाया है। अपने अपने अनुभव से लोग बातें करते हैं कभी कहते हुए डरते हैं कभी बात से मुकरते हैं। झूठे आशिक़ साथ जीने मरने का दम भरते हैं जब बात बिगड़ती है तो बच कर गुज़रते हैं। कहानी से पहले कुछ गीत कुछ ग़ज़ल कुछ नग्मों पर गौर करते हैं। शुरुआत धूल का फूल से करते हैं। वफ़ा की राह में कितने गुनाह होते हैं , ये उनसे पूछो जो तबाह होते हैं। ए मुहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया , जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया। जो मैं ऐसा जानती प्रीत किये दुःख होय , नगर ढिंढोरा पीटती प्रीत ना कारिओ कोय। ज़माने में अजी ऐसे कई नादान होते हैं , वहां ले जाते हैं कश्ती जहां तूफ़ान होते हैं। बहुत हैं पर आखिर में मुगल-ए -आज़म की ग़ज़ल। मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोये , बड़ी चोट खाई जवानी पे रोये। ये सब को पता होता है मगर जानकर अन्जान बन जाते हैं मुझे अपनी इक ग़ज़ल का मतला याद आया है यहां सही लगता है उस को सुनाता हूं फिर कहानी पर आता हूं। 

           हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना , कोई कभी हिदायत ये आज तक न माना। 

    मुझे सख्त ऐतराज़ है कोई किसी को बेवफ़ा कहकर बदनाम करता है और खुद को उसी का चाहने वाला बताता है। जिसको प्यार करते हो उसकी रुसवाई कैसे कर सकते हो और किसी को बदनाम करते हो तो फिर आपका प्यार कितना मतलबी है। मुझे इक गीत सुनकर लगता है कोई किसी को उस से बढ़कर बद्द्दुआ नहीं दे सकता है मगर दिलजले आशिक़ यही किया करते हैं ज़रा सुनो क्या क्या नहीं कहा आशिक़ ने। 

मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे , मुझे ग़म देने वाले तू ख़ुशी को तरसे। 

तू फूल बने पतझड़ का तुझपे बहार न आये कभी , मेरी ही तरह तू तड़पे तुझको करार न आये कभी। 

जिए तू इस तरह कि ज़िंदगी को तरसे। 

तेरे गुलशन से ज़्यादा वीरान कोई वीराना न हो , इस दुनिया में कोई तेरा अपना तो क्या बेगाना न हो। 

किसी का प्यार क्या तू बेरुखी को तरसे। 

इतना तो असर कर जाएं मेरी वफ़ाएं ओ बेवफ़ा , इक दिन तुझे याद आएं तेरी ज़फाएं ओ बेवफ़ा। 

पशेमां हो के रोये तू हंसी को तरसे। 

              जिस प्यार में ये हाल हो उस प्यार से तौबा। आजकल प्यार का बाज़ार सुनते हैं करोड़ों का है आप भी उनके जाल में अपना सब कुछ लुटवा दें उस से पहले कुछ वास्तविक कहानियों को एक बार ध्यान से समझ लोगे तो बच सकते हैं। गुलाब दे दिया चॉकलेट भी मगर अभी समय है और बात बढ़ाने से पहले जाने माने आशिक़ों की असलियत जान सकते हैं। साहिर लुधियानवी जी की नज़्म ताजमहल बहुत काम की है। कोई किसी को अच्छा लगता है मिलते हैं इक दूजे को समझते हैं मगर अगर किसी मोड़ पर किसी को लगता है साथ निभाना मुश्किल है तो हाथ छोड़ कर जा सकते हैं , साहिर कहते हैं तुम्हारे हाथ में मेरा हाथ है जंज़ीर नहीं। आपको साहिर से मुहब्बत की अमृता की कहानी के साथ इमरोज़ की भी कहानी मालूम होगी , मगर कोई भी किसी को बेवफा नहीं कहता है। समझ आये तो कोई किसी को पसंद करता है मगर जिसको पसंद करता है जब उसी को साथ चलना नहीं पसंद तो उसको मज़बूर नहीं किया जाना चाहिए , प्यार कोई कैद नहीं है और अपने आशिक़ को महबूबा को आज़ादी नहीं देना तो हर्गिज़ प्यार नहीं है। चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों। अभिनेता राजकपूर की कितनी कहानियां हैं नरगिस की ही नहीं मगर नरगिस ने अपनी जान बचाने वाले सुनील दत्त से विवाह किया तो आपको सच्चा इश्क़ समझ नहीं आया। जो बिना किसी संबंध अनुबंध आपकी जान बचाने को आग में कूद कर आपको बचाता है उस से अच्छा कोई और नहीं हो सकता है। धर्मेंदर हेमा की काहनी में किरदार और भी हैं धर्मेंदर की काहनी में उनकी पत्नी के इलावा मीना कुमारी भी रही जिसको सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया और हेमा मालिनी की बात किसी और से सगाई होते होते रह गई। प्यार एक से होता है की परिभाषा बदलनी होगी , खुशवंत सिंह को आशिक़ मिजाज़ कहते हैं जिसने वास्तव में मुहब्बत को कभी समझा भी नहीं। जिन महिलाओं से रिश्ता बनाया उनकी निजि बातों को गॉसिप का विषय बना दिया। कोई नहीं जनता अमिताभ बच्चन के दिल की बात रेखा के मन की बात मगर उनके फ़िल्मी किरदार को किस्सा बना दिया है सोशल मीडिया वालों ने और फ़िल्मी जगत ऐसी बातों को भुनाता है बेचता है पैसा बनाता है। सिलसिला फिल्म बन जाती है यहां कोई सामाजिक बंधन की बात नहीं है कोई विवाहित है या कुंवारा है और कितने लोगों से नाता रखता है कोई सवाल नहीं उठाता है। आजकल टीवी चैनल पर किसी रियल्टी शो में जाने पर हर कोई मंच पर किसी से इश्क़ मुहब्बत की बात करता है तब हम देखते हैं हंसते हैं मगर कोई खराबी नहीं लगती है। टीवी शो पर महिला लड़की नारी को लेकर एक ही नज़रिया दिखाई देता है बाकी कोई रिश्ता महत्व नहीं रखता है , लेकिन हम वही लोग अपने समाज में किसी लड़की लड़के को महिला पुरुष को बात करते देखते हैं तो हंगामा खड़ा कर देते हैं। रंग बदलती हमारी दुनिया का असली चेहरा बेहद भयानक है और शायद महिलाओं के असुरक्षित भी। अवसर मिलते मुहब्बत की पावनता हवस में बदल जाती है तभी हम उसी पक्ष को देखते हैं जो डरावना है। 
                             इश्क़ करना है तो खुदा से वतन से करो और टूटकर करो जो सबसे ऊपर है। कितने लोग हुए हैं देश की आज़ादी की खातिर जीते रहे हंसते हंसते सूली चढ़ गये। दुनिया की बात की सच्चाई है कोई किसी के साथ नहीं मरता है , मन रे तू काहे न धीर धरे। कोई न संग मरे। जिस के साथ जितना साथ निभ जाए उसी को अच्छा जान लेना उचित है। कल तक जिसकी मुहब्बत की कसम खाई आज बात बिगड़ी तो उसी में बुराई नज़र आने लगी। मेरे दोस्त जवाहर ज़मीर का शेर है। वो जब पहलू में थे तो था मुहब्बत का यकीन , गैर से की गुफ्तगू तो बदगुमानी बन गई। जिस पर आपको भरोसा नहीं जिसको आप उसकी मर्ज़ी से जीने नहीं देना चाहते उस से आपका प्यार झूठा है सच्चा नहीं। किसी और शायर का कहना है " प्यार में बहुत ज़रूरी है बेवफ़ाई कभी कभी कर ली "।  इक बात हर कोई कहता है मगर वास्तव में उस में सच्चाई बिल्कुल भी नहीं है वो है दिल से प्यार का रिश्ता। किसी मनोचिकित्स्क से पूछना इश्क़ प्यार मुहब्बत जैसा खलल दिमाग़ की शरारत है दिल बेचारा बेवजह बदनाम है। दिल किसी पर आना दिल लेना देना सभी बनी बनाई बातें हैं किसी का दिल किसी के पास नहीं होता है। ये इक ज़िद है कोई किसी को पसंद हो तो चाहना भी और चाहते हैं तो उसको अपना बनाना भी। जिसको जो पसंद किया उसका  मिल जाना ज़रूरी तो नहीं है। और जब कोई ये सोचता है कि मेरी नहीं तो किसी की नहीं हो ये तो प्यार भी तानाशाही हो गया। जिसको कोई पसंद उसकी मर्ज़ी भी होनी चाहिए। लोग मिलते हैं शुरुआत में जितनी कशिश होती है कुछ दिन बाद नहीं रहती बाकी। इधर तो सोशल मीडिया ने मामला आसान भी किया है और उलझाया भी है बहुत। सोशल मीडिया पर जैसे नज़र आते हैं और जैसी बातें करते हैं जिस दिन आमने सामने मिलते हैं तो लगता है आकाश से ज़मीन पर पहुंच गये हैं। इधर तो संबंध टूटने पर भी पार्टी करने लगे हैं इक फिल्म बना डाली इसी पर। कितनी बार प्यार हुआ कितनी बार किस ने किस को छोड़ा समझना आसान नहीं। कैसे कह दूं कि मुझे छोड़ दिया है उसने , बात तो सच है मगर बात है रुसवाई की। मुहब्बत की बात की जाती है तो मानते हैं सुंदरता से ही प्यार किया जा सकता है मगर बात ये भी मशहूर है कि खूबसूरत है वफ़ादार नहीं हो सकता। मेरी इक ग़ज़ल का मतला कुछ इस तरह है।

               सभी को हुस्न से होती मुहब्बत है , हसीं कितनी हसीनों की शिकायत है। 

             निराश मत होना सच्चा प्यार अभी भी करते हैं जो उनकी बात बताना बाकी है। राजनेताओं का कुर्सी से सत्ता से प्यार वास्तव में कभी नहीं खत्म होता। जान रहती है बिना सत्ता मगर उसी तरह जैसे बिन जल मछली। इनसे अधिक कोई किसी को नहीं चाहता सत्ता पाने को भाई दोस्त सब को छोड़ सकते है , जो भी करना पड़े कर सकते हैं। राजनेताओं का आपसी रिश्ता बनता बिगड़ता है सत्ता की चाहत और ज़रूरत के अनुसार। सत्ता पाने को गधे को बाप बाप को गधा कहना कोई मुश्किल काम नहीं है। इस का खुमार जब चढ़ता है सत्ता पाकर तो इंसान खुद को भगवान से बड़ा समझने लगता है। जब कोई राजनेता आपको वेलेनटाइन डे पर रोके तो उस से पूछना सत्तारानी से अलग होकर कैसा लगेगा।  इक और बात कही जाती है जीने का मतलब है मरने से पहले किसी से इश्क़ कर लेना। मेरा आपको सुझाव है कि अपने दिमाग़ से काम लेना और दुनिया की बातों में आकर कोई मुसीबत नहीं खरीदना। फिर भी वैलेंटाइन डे पर इक शेर कहना लाज़मी है। 

                              अभी तो प्यार का मौसम है और रुत सुहानी है ,

                              कभी किसी हसीना को गुलाब क्यों नहीं देते।

                                

 


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