Monday, 18 February 2019

बिक रहा है आतंकवाद ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        बिक रहा है आतंकवाद ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

  आजकल आतंकवाद का मौसम है। अख़बार टीवी चैनल से सोशल मीडिया तक सब जगह आतंकवाद की धूम मची हुई है। कभी अमेरिका और लादेन को लेकर अफ़ग़ानिस्तान पर हमले की बात होती थी आजकल कितने नाम सामने आते जाते रहते हैं पलक झपकते ही कहीं गुम भी हो जाते हैं। विश्व में शांति की बात करने वाले तमाम देश हथियारों के सौदागर भी हैं उनकी अर्थव्यवस्था निर्भर है जंग पर। उन से हथियार कोई भी खरीदे उनको सामान बेचना है और मौत का सामान सस्ता महंगा नहीं देखा जाता जिनको मौत का खेल खेलना है हर मोल देने को तैयार हैं। टीवी अख़बार वाले नई स्टोरी नया शीर्षक ढूंढते रहते हैं हम हादसे की जगह से सीधा दिखा रहे हैं सबसे पहले और सच्ची तस्वीरें। पर्दे के पीछे इस सब की भी कीमत ली जाती है चुकाई जाती है। हम शोर मचाते रहते हैं आतंकवाद पीड़ित हैं सभी देश हमारे साथ खड़े हो जाओ मगर हर देश को हर घटना अपनी सुविधा से आतंकवादी लगती है अथवा कुछ और लगती है। राजनेताओं को आतंकवादी घटना खुद को देशभक्त बताने का अवसर लगती है।
         कोई घर पर पत्नी के आतंकवाद की बात करता है तो कोई लिखने वाला इस विषय पर दो अलग अलग लेख लिखता है और दो जगह भेजता है दोनों जगह छपती है रचना और मानदेय मिलता है। लिखने वालों को हर बात विषय नज़र आती है और टीवी चैनल पर कई लोग विशेषज्ञ बनकर चर्चा करते हैं तभी उनका गुज़र बसर होता है। स्कूल का संचालक बच्चों की उदंडता से परेशान है अध्यापक से अनुशासन की बात कहता है , अध्यापक बच्चों की मां से शिकायत करते हैं आपका बच्चा पढ़ाई पर नहीं लड़ाई पर ध्यान देता है। पत्नी अपने पति से गिला करती है अपने बिगाड़ा हुआ है बच्चों को , तंग आ चुकी हूं इनकी शरारतों से। कब किस ने क्या तोड़ फोड़ दिया पता नहीं चलता है , पिता बच्चों को धमकाते हैं सुधर जाओ वर्ना अध्यापक से शिकायत कर देंगे। सुनकर बच्चे मन ही मन मुस्कुराते हैं आतंक की बात हास्य की सिथ्ति बन गई है। देश में भी सरकार विपक्ष बाकी लोग गेंद दूसरे के पाले में डालते हैं सरकार पड़ोसी देश पर आरोप लगाती है। खुद अपनी गलती किसी को समझ नहीं आती है। मामला समझ से परे है दो गायक एक सुर में गा रहे हैं , बात रोने की लगे फिर भी हंसा जाता है , यूं भी हालात से समझौता किया जाता है। 
                 अब उनकी याद बाकी है कभी व्यंग्य में सबसे बड़ा नाम था उनका। पत्नी पर व्यंग्य लिख लिख कर खूब पैसा कमाया था उन्होंने। ओसामा बिन लादेन पर लिखते हुए अपने घर पर बंब डालने का न्यौता तक देने की बात की थी अपनी पत्नी को सबसे खतरनाक आंतकवादी कह डाला था। पत्नी पर हास परिहास चुटकुले पहले भी कम नहीं थे मगर ये तो हद पार करना हो गया था। मामला हत्या का और धारा 307 का बनता था कत्ल की योजना खुद बनाते हैं और कविता में किसी महबूबा की कातिल अदा की बात कर तालियां बटोरते हैं। व्यंग्यकार की पत्नी होना कितना दुश्वार है कोई मेरी पत्नी से पूछे कभी , मगर हाय री नारी अपने पति की इस खराबी की बात नहीं करती जबकि थाने में रपट लिखवाना बनता है महिला को मानसिक परेशानी देना अपराध है। कब तक अबला की सहनशीलता का इम्तिहान लिया जाता रहेगा , वास्तव में पत्नी का आतंक होता तो क्या भरी सभा में ये बार बार कहने का साहस करते। ऐसे लिखने वाले उन पतियों के दर्द से वाक़िफ़ नहीं हैं जो पत्नी की तानशाही की बात ज़ुबान पर लाने का सपना भी नहीं देख सकते। ऐसे व्यंग्य पढ़कर उनके ज़ख्म फिर से हरे हो जाते हैं। ज़ख्मों पर नमक छिड़कना व्यंग्य वालों को खूब आता है। दर्द में हास्य ऐसे ही नहीं पैदा होता है। अमेरिका बाकी देशों में आतंकी खेल खेलता रहा था , इसकी शुरुआत उसी की की हुई है जब खुद उसी के सीने में दर्द उठा तब कराह उठा और आजकल सभी देश उसी से मसीहाई की गुहार लगाते हैं। तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना। 
                 आंतकवाद के सामने घुटने टेकने का काम किस ने नहीं किया और कौन है जिसने मानवता के कातिलों से बात करने और समझौता करने की वकालत नहीं की। बीच का कोई रास्ता सही नहीं होता है आतंकवाद को नामंज़ूर करना है तो उसके रंग की बात नहीं की जानी चाहिए। जिनकी राजनीति ही उन्माद फैला कर विध्वंस कर वोट पाने की रही हो उनको आतंकवाद भी देशभक्त होने का सबूत देकर सत्ता पाने की सीढ़ी लगता हो तो अचरज नहीं है। कोई संगठन भीड़ बनकर दंगे करता है तो क्या उस आतंक को अच्छा वाला आतंकवाद मान सकते हैं अपने अपने गिरेबान में झांकना होगा। नेताओं का भी आतंक है जो लोग सच बोलने से डरते हैं सत्ता और सरकारी विभाग खुद जो मर्ज़ी करते हैं मगर आम नागरिक पर नियम कानून का डंडा चलाते हैं आतंक पैदा कर रिश्वत या जुर्माना वसूल करने को उचित मानते हैं। ध्यान से देखना कोई बॉस अपने कर्मचारी के साथ मनचाहा काम लेने और उसकी महनत से कमाई करने के बाद भी नौकरी से निकालने का भय देकर मानसिक डर किसी आतंकी से बढ़कर देता है। आतंकवाद के चेहरे कई हैं जिन पर विस्तार से बात फिर कभी की जाएगी।

Saturday, 16 February 2019

कहां से कहां पहुंचे खोया क्या पाया क्या ( आत्मनिरीक्षण का समय ) आलेख - डॉ लोक सेतिया

कहां से कहां पहुंचे खोया क्या पाया क्या ( आत्मनिरीक्षण का समय )

                                          आलेख - डॉ लोक सेतिया 

    बस अब आतंकवाद को खत्म करने का वक़त आ गया है , ये ब्यान उस समय का है जब संसद पर आतंकी हमला हुआ था। तब समझ आया था तब तक आतंकवाद को खत्म करने का समय ही नहीं आया था। अपने घर को आग लगी तब समझ आया वर्ना देश जलता रहा शासक बंसी बजाते रहे। अमेरिका भी 11 सितंबर से पहले आतंकवाद को हथियार बेचने का कारोबार समझता रहा था। हमारे नेता हर समस्या पर उचित समय पर कदम उठाने की बात करते हैं। गरीबी भूख बदहाली खराब शिक्षा और स्वास्थ्य दवाओं को ठीक करने का वक़्त कभी नहीं आने वाला है क्योंकि राजनीति करने को इनकी बहुत ज़रूरत है। आतंकवाद पर कहते हैं पड़ोसी देश बढ़ावा देता है और सीमा पार से आतंकी आते हैं मगर क्या हमने आतंकवाद को अपने घर महमान बनाने की बात नहीं की है। अज़हर मसूद जैसे आतंकवादी को खुद कंधार ले जाकर रिहा करने का फल था संसद पर हमला। आज बात का विषय केवल आतंकवाद नहीं है और न ही किसी भी दल की सरकार की ही बात है बात देश के हर वर्ग की है केवल राजनेताओं की ही नहीं है आम नागरिक से कारोबार करने वाले नौकरशाही और उद्योग जगत के साथ टीवी अख़बार और समाज को दर्पण दिखाने वाले बुद्धीजीवी वर्ग की भी है। ये बेहद ज़रूरी है कि आज चिंतन और मनन ही नहीं किया जाये कि हमने आज़ादी के बाद क्या खोया क्या पाया है बल्कि अपनी गलतियों को स्वीकार कर उनको सुधारना भी होगा। अपनी महानता का डंका पीटना छोड़ खुद को सक्षम बनाना होगा और ऐसा आंखें बंद कर नहीं किया जा सकता है। 
       जिस देश की महिमा का गुणगान किया जाता है वो ऐसा तो नहीं था। झूठ मक्कारी बेईमानी ख़ुदपरस्ती और कर्तव्य पालन की नहीं अधिकारों और ताकत सत्ता धनबल के दुरूपयोग की खराब आदतों ने देश की जड़ों में दीमक की तरह खोखला करने का काम किया है सारी व्यवस्था को ही। देशभक्ति और साहस केवल भाषण देने बोलने और लिखने का नाम नहीं है। हम अन्याय अत्याचार के सामने घुटने टेकने के आदी होकर किसी भी तरह से मतलब पूरा करने में विश्वास रखते हैं। आतंकवाद हिंसा कोई भी किसी भी कारण करता है उचित नहीं ठहराया जाना चाहिए। पूर्वोतर की बात हो या पंजाब में हुए आतंकवादी हमले उनका कोई धर्म नहीं होता है मगर खेद की बात है आज भी कोई भिंडरावाले को संत बताता है तो किसी ने गोडसे का मंदिर बना रखा है। ये दोगलापन आतंकवाद को बढ़ावा देता है। हर सरकार दोषी है जनता की समस्याओं पर ध्यान नहीं देकर केवल सत्ता की राजनीति करते रहे हैं। बेशर्मी है कि देश की आधी आबादी को दो वक़्त रोटी नसीब नहीं और राजनेता और अधिकारी राजाओं की तरह विसालिता पूर्वक जीवन जीते हैं और अपने खुद के ऐशो आराम पर ही नहीं अपने झूठे गुणगान करने पर बेतहाशा धन खर्च करते हैं। जिस आज़ादी की बात भगतसिंह गांधी सुभाष ने सोची थी वो कहां है। हमने अपने पूर्वजों से अंगेरजी शासन की निर्दयता की बात सुनी है तो उनकी देश के धन को ईमानदारी से खर्च करने की भी मिसाल देखी है क्योंकि उनकी बनाई हुई इमारत पुल अवधि बीत जाने के बाद भी कायम रहे हैं जबकि हमारे नेताओं के अपने खास लोगों को ठेके देने की बात आम है जिस में घटिया सामान और अन्य कारणों से हादसे हुए हैं। जिस भी दल की सरकार जिस भी राज्य में रहती है उसके लोग लूट को अपना अधिकार मानते हैं। इतना ही नहीं बड़े बड़े नेता अधिकारी वर्ग को अपने दल के लोगों की बात नहीं मानने पर अंजाम भुगतने की बात तक कहते हैं। 
         हमारी पुलिस हमारे सभी विभाग के अधिकारी कर्मचारी अगर अपना कर्तव्य निष्ठा से और देश के लिए ईमानदार होकर निभाते तो शायद हालत बहुत हद तक अच्छी हो चुकी होती। मगर उनके लालच और स्वार्थ के साथ नेताओं की चाटुकारिता ने देश की दशा को बदहाली तक ला खड़ा किया है। हम आम लोग भी नियम कानून को तोड़ने में संकोच नहीं करते हैं मगर अपने देश के संविधान की उपेक्षा करने के बाद भी नेता अधिकारी और आम नागरिक खुद को देशभक्त कहते हैं। उद्योग जगत ने केवल अपने मुनाफे कमाने को उद्देश्य बना लिया है और तमाम करोड़पति लोग देश की खातिर कोई योगदान नहीं देते हैं अन्यथा हमारे देश की परंपरा रही है समाज कल्याण पर अपनी आमदनी खर्च करने की खुद अपने पर केवल ज़रूरत भर को खर्च करने की। धर्म के नाम पर भी संचय करने का कार्य किया है हर किसी ने और ये कहना अनुचित नहीं होगा कि सभी धर्म साधु संत वास्तविक उद्देश्य से धर्म के मार्ग से भटक गये हैं। कलाकार टीवी फिल्म वाले देश को जनता को जगाने और संदेश देने की जगह पैसा बनाने को टीआरपी और विज्ञापन जाल में उलझे रसातल को जाते जा रहे हैं। नारे लगाना जुलूस निकलना गीत गाना झंडा फहराना देशभक्ति क्या यही है या हम सभी को अपना सर्वस्व देश को अर्पित करने की वास्तविक देशभक्ति की ज़रूरत है। जिस दिन हम देश को बाकी सबसे अधिक महत्व देंगे और अपने पास और अधिक की लालसा को छोड़ सभी को समानता की बात का विचार करने लगेंगे शायद देश को सारे जहां से अच्छा बनाने की ओर उस दिन चलने लगेंगे।
             हम जिनको आदर देते हैं और जिनकी कही बात को आंखें बंद कर यकीन करते हैं उनकी बात सच साबित नहीं होने पर भी हम नहीं समझते कि उनकी कथनी और करनी अलग अलग है। किसी को याद है कभी किसी ने देश के सबसे बड़े पद पर होते इक सपना दिखलाया था कलाम जी ने 2020 में भारत से गरीबी भूख जैसी समस्याओं का अंत होने और हर नागरिक खुशहाल होगा ऐसी योजना पर काम करने का दावा किया गया था। अगले साल 2020 आने को है मगर देश की समस्याएं कम नहीं हुई बढ़ती गई हैं। देश के बड़े पद के नेताओं का काम झूठी तसल्ली देना और झूठे ख़्वाब दिखलाना नहीं होना चाहिए। और जब कोई ऐसा कहता है तो हम को उनसे सवाल करना चाहिए कि कैसे होगा और अगर नहीं हुआ तो किसकी ज़िम्मेदारी होगी। ये कहना कि गरीबी हटाओ अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे नारे केवल जुमले थे और वोट पाने को ऐसा              हम जिनको आदर देते हैं और जिनकी कही बात को आंखें बंद कर यकीन करते हैं उनकी बात सच साबित नहीं होने पर भी हम नहीं समझते कि उनकी कथनी और करनी अलग अलग है। किसी को याद है कभी किसी ने देश के सबसे बड़े पद पर होते इक सपना दिखलाया था कलाम जी ने 2020 में भारत से गरीबी भूख जैसी समस्याओं का अंत होने और हर नागरिक खुशहाल होगा ऐसी योजना पर काम करने का दावा किया गया था। अगले साल 2020 आने को है मगर देश की समस्याएं कम नहीं हुई बढ़ती गई हैं। देश के बड़े पद के नेताओं का काम झूठी तसल्ली देना और झूठे ख़्वाब दिखलाना नहीं होना चाहिए। और जब कोई ऐसा कहता है तो हम को उनसे सवाल करना चाहिए कि कैसे होगा और अगर नहीं हुआ तो किसकी ज़िम्मेदारी होगी। ये कहना कि गरीबी हटाओ अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे नारे केवल जुमले थे और वोट पाने को ऐसा करना पड़ता है तो देश की जनता से छल करना है। जिस देश के राजनेताओं को चुनाव जीतना ही सबसे बड़ा मकसद लगता हो उस देश का भगवान भी कुछ नहीं कर सकते हैं। विचारधारा नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल होकर हमने खोया जो सब है वो बेहद कीमती था और जिसको पाने की बात करते हैं उसकी अहमियत कुछ भी नहीं मगर वास्तव में उसको भी पाया कुछ मुट्ठी भर लोगों ने है। चंद घरानों पर धन की बारिश और अधिकतर के हिस्से कुछ भी नहीं ऐसी व्यवस्था नहीं चाहिए थी। जिस समाजवाद की बात थी उसको कभी का छोड़ पूंजीवादी व्यवस्था अपनाने का अंजाम यही होना ही था। करना पड़ता है तो देश की जनता से छल करना है। जिस देश के राजनेताओं को चुनाव जीतना ही सबसे बड़ा मकसद लगता हो उस देश का भगवान भी कुछ नहीं कर सकते हैं। विचारधारा नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल होकर हमने खोया जो सब है वो बेहद कीमती था और जिसको पाने की बात करते हैं उसकी अहमियत कुछ भी नहीं मगर वास्तव में उसको भी पाया कुछ मुट्ठी भर लोगों ने है। चंद घरानों पर धन की बारिश और अधिकतर के हिस्से कुछ भी नहीं ऐसी व्यवस्था नहीं चाहिए थी। जिस समाजवाद की बात थी उसको कभी का छोड़ पूंजीवादी व्यवस्था अपनाने का अंजाम यही होना ही था।

Sunday, 10 February 2019

फ़साना-ए-मुहब्बत ताराना-ए-मुहब्बत ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

  फ़साना-ए-मुहब्बत ताराना-ए-मुहब्बत ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया 

       हम जिसे प्यार समझते हैं वो कोई सपनों की दुनिया है। कोई हसीना खूबसूरत अदा दिलकश सितारों की रंगीनियां कोई लड़का जो बस प्यार की बातें करता हो चांद तारे लाने के ख्वाब बुनता हो और जिसका साथ आप किसी और दुनिया में चले जाना चाहते हो जहां बस दो प्यार करने वाले हों और कोई रोकने टोकने वाला नहीं हो। मुहब्बत की इस दुनिया में भूख गरीबी और जीवन की वास्तविक उलझनों कठिनाईओं समस्याओं की कोई जगह नहीं है। महबूबा तेरी तस्वीर किस तरह मैं बनाऊं ऐसी ही एक फिल्म का गीत है , फ़िल्मी कहानी में लेखक कोई न कोई रास्ता नकाल लेता है अपने नायक को उसके सपनों की रानी से मुलाकात का। हम सब के साथ ऐसा होना संभव नहीं है और हम अपने महबूब महबूबा की छवि किसी फ़िल्मी अदाकार अदाकारा या कहानी के किरदार में ढूंढते हैं। ये इश्क़ असली ज़िंदगी में कायम रहता नहीं है क्योंकि कोई भी आपसे पल दो पल को मिलता है तब सब से सुंदर पहनावा खूबसूरत बातें और किसी मनपसंद जगह मुलाकात में सब लुभावना होता है लेकिन जिस के साथ जीवन भर साथ निभाना होता है उस के साथ तकरार भी इनकार भी और वो सब जो सपना नहीं हक़ीक़त होता है देख लगता है ख्वाब टूटता हुआ। जो लोग जिस्म की खूबसूरती को देख कर नहीं इक दूजे की शख्सियत को समझ और स्वीकार करने के बाद रिश्ता बनाते हैं उनके संबंध में कोई दरार कोई दिवार कोई उलझन कोई अड़चन नहीं होती है। मगर अधिकतर लोग आकर्षण को प्यार मान उसके मिलने नहीं मिलने पर भाव बदलते हैं जो सच्चा प्यार होता नहीं है।
               ये प्यार इश्क़ मुहब्बत के फ़साने नये पुराने दिल लुभाते हैं मगर इस नामुराद रोग का ईजाल क्या अभी तक रोग है कि बला है कोई नहीं समझ पाया है। अपने अपने अनुभव से लोग बातें करते हैं कभी कहते हुए डरते हैं कभी बात से मुकरते हैं। झूठे आशिक़ साथ जीने मरने का दम भरते हैं जब बात बिगड़ती है तो बच कर गुज़रते हैं। कहानी से पहले कुछ गीत कुछ ग़ज़ल कुछ नग्मों पर गौर करते हैं। शुरुआत धूल का फूल से करते हैं। वफ़ा की राह में कितने गुनाह होते हैं , ये उनसे पूछो जो तबाह होते हैं। ए मुहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया , जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया। जो मैं ऐसा जानती प्रीत किये दुःख होय , नगर ढिंढोरा पीटती प्रीत ना कारिओ कोय। ज़माने में अजी ऐसे कई नादान होते हैं , वहां ले जाते हैं कश्ती जहां तूफ़ान होते हैं। बहुत हैं पर आखिर में मुगल-ए -आज़म की ग़ज़ल। मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोये , बड़ी चोट खाई जवानी पे रोये। ये सब को पता होता है मगर जानकर अन्जान बन जाते हैं मुझे अपनी इक ग़ज़ल का मतला याद आया है यहां सही लगता है उस को सुनाता हूं फिर कहानी पर आता हूं। 

           हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना , कोई कभी हिदायत ये आज तक न माना। 

    मुझे सख्त ऐतराज़ है कोई किसी को बेवफ़ा कहकर बदनाम करता है और खुद को उसी का चाहने वाला बताता है। जिसको प्यार करते हो उसकी रुसवाई कैसे कर सकते हो और किसी को बदनाम करते हो तो फिर आपका प्यार कितना मतलबी है। मुझे इक गीत सुनकर लगता है कोई किसी को उस से बढ़कर बद्द्दुआ नहीं दे सकता है मगर दिलजले आशिक़ यही किया करते हैं ज़रा सुनो क्या क्या नहीं कहा आशिक़ ने। 

मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे , मुझे ग़म देने वाले तू ख़ुशी को तरसे। 

तू फूल बने पतझड़ का तुझपे बहार न आये कभी , मेरी ही तरह तू तड़पे तुझको करार न आये कभी। 

जिए तू इस तरह कि ज़िंदगी को तरसे। 

तेरे गुलशन से ज़्यादा वीरान कोई वीराना न हो , इस दुनिया में कोई तेरा अपना तो क्या बेगाना न हो। 

किसी का प्यार क्या तू बेरुखी को तरसे। 

इतना तो असर कर जाएं मेरी वफ़ाएं ओ बेवफ़ा , इक दिन तुझे याद आएं तेरी ज़फाएं ओ बेवफ़ा। 

पशेमां हो के रोये तू हंसी को तरसे। 

              जिस प्यार में ये हाल हो उस प्यार से तौबा। आजकल प्यार का बाज़ार सुनते हैं करोड़ों का है आप भी उनके जाल में अपना सब कुछ लुटवा दें उस से पहले कुछ वास्तविक कहानियों को एक बार ध्यान से समझ लोगे तो बच सकते हैं। गुलाब दे दिया चॉकलेट भी मगर अभी समय है और बात बढ़ाने से पहले जाने माने आशिक़ों की असलियत जान सकते हैं। साहिर लुधियानवी जी की नज़्म ताजमहल बहुत काम की है। कोई किसी को अच्छा लगता है मिलते हैं इक दूजे को समझते हैं मगर अगर किसी मोड़ पर किसी को लगता है साथ निभाना मुश्किल है तो हाथ छोड़ कर जा सकते हैं , साहिर कहते हैं तुम्हारे हाथ में मेरा हाथ है जंज़ीर नहीं। आपको साहिर से मुहब्बत की अमृता की कहानी के साथ इमरोज़ की भी कहानी मालूम होगी , मगर कोई भी किसी को बेवफा नहीं कहता है। समझ आये तो कोई किसी को पसंद करता है मगर जिसको पसंद करता है जब उसी को साथ चलना नहीं पसंद तो उसको मज़बूर नहीं किया जाना चाहिए , प्यार कोई कैद नहीं है और अपने आशिक़ को महबूबा को आज़ादी नहीं देना तो हर्गिज़ प्यार नहीं है। चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों। अभिनेता राजकपूर की कितनी कहानियां हैं नरगिस की ही नहीं मगर नरगिस ने अपनी जान बचाने वाले सुनील दत्त से विवाह किया तो आपको सच्चा इश्क़ समझ नहीं आया। जो बिना किसी संबंध अनुबंध आपकी जान बचाने को आग में कूद कर आपको बचाता है उस से अच्छा कोई और नहीं हो सकता है। धर्मेंदर हेमा की काहनी में किरदार और भी हैं धर्मेंदर की काहनी में उनकी पत्नी के इलावा मीना कुमारी भी रही जिसको सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया और हेमा मालिनी की बात किसी और से सगाई होते होते रह गई। प्यार एक से होता है की परिभाषा बदलनी होगी , खुशवंत सिंह को आशिक़ मिजाज़ कहते हैं जिसने वास्तव में मुहब्बत को कभी समझा भी नहीं। जिन महिलाओं से रिश्ता बनाया उनकी निजि बातों को गॉसिप का विषय बना दिया। कोई नहीं जनता अमिताभ बच्चन के दिल की बात रेखा के मन की बात मगर उनके फ़िल्मी किरदार को किस्सा बना दिया है सोशल मीडिया वालों ने और फ़िल्मी जगत ऐसी बातों को भुनाता है बेचता है पैसा बनाता है। सिलसिला फिल्म बन जाती है यहां कोई सामाजिक बंधन की बात नहीं है कोई विवाहित है या कुंवारा है और कितने लोगों से नाता रखता है कोई सवाल नहीं उठाता है। आजकल टीवी चैनल पर किसी रियल्टी शो में जाने पर हर कोई मंच पर किसी से इश्क़ मुहब्बत की बात करता है तब हम देखते हैं हंसते हैं मगर कोई खराबी नहीं लगती है। टीवी शो पर महिला लड़की नारी को लेकर एक ही नज़रिया दिखाई देता है बाकी कोई रिश्ता महत्व नहीं रखता है , लेकिन हम वही लोग अपने समाज में किसी लड़की लड़के को महिला पुरुष को बात करते देखते हैं तो हंगामा खड़ा कर देते हैं। रंग बदलती हमारी दुनिया का असली चेहरा बेहद भयानक है और शायद महिलाओं के असुरक्षित भी। अवसर मिलते मुहब्बत की पावनता हवस में बदल जाती है तभी हम उसी पक्ष को देखते हैं जो डरावना है। 
                             इश्क़ करना है तो खुदा से वतन से करो और टूटकर करो जो सबसे ऊपर है। कितने लोग हुए हैं देश की आज़ादी की खातिर जीते रहे हंसते हंसते सूली चढ़ गये। दुनिया की बात की सच्चाई है कोई किसी के साथ नहीं मरता है , मन रे तू काहे न धीर धरे। कोई न संग मरे। जिस के साथ जितना साथ निभ जाए उसी को अच्छा जान लेना उचित है। कल तक जिसकी मुहब्बत की कसम खाई आज बात बिगड़ी तो उसी में बुराई नज़र आने लगी। मेरे दोस्त जवाहर ज़मीर का शेर है। वो जब पहलू में थे तो था मुहब्बत का यकीन , गैर से की गुफ्तगू तो बदगुमानी बन गई। जिस पर आपको भरोसा नहीं जिसको आप उसकी मर्ज़ी से जीने नहीं देना चाहते उस से आपका प्यार झूठा है सच्चा नहीं। किसी और शायर का कहना है " प्यार में बहुत ज़रूरी है बेवफ़ाई कभी कभी कर ली "।  इक बात हर कोई कहता है मगर वास्तव में उस में सच्चाई बिल्कुल भी नहीं है वो है दिल से प्यार का रिश्ता। किसी मनोचिकित्स्क से पूछना इश्क़ प्यार मुहब्बत जैसा खलल दिमाग़ की शरारत है दिल बेचारा बेवजह बदनाम है। दिल किसी पर आना दिल लेना देना सभी बनी बनाई बातें हैं किसी का दिल किसी के पास नहीं होता है। ये इक ज़िद है कोई किसी को पसंद हो तो चाहना भी और चाहते हैं तो उसको अपना बनाना भी। जिसको जो पसंद किया उसका  मिल जाना ज़रूरी तो नहीं है। और जब कोई ये सोचता है कि मेरी नहीं तो किसी की नहीं हो ये तो प्यार भी तानाशाही हो गया। जिसको कोई पसंद उसकी मर्ज़ी भी होनी चाहिए। लोग मिलते हैं शुरुआत में जितनी कशिश होती है कुछ दिन बाद नहीं रहती बाकी। इधर तो सोशल मीडिया ने मामला आसान भी किया है और उलझाया भी है बहुत। सोशल मीडिया पर जैसे नज़र आते हैं और जैसी बातें करते हैं जिस दिन आमने सामने मिलते हैं तो लगता है आकाश से ज़मीन पर पहुंच गये हैं। इधर तो संबंध टूटने पर भी पार्टी करने लगे हैं इक फिल्म बना डाली इसी पर। कितनी बार प्यार हुआ कितनी बार किस ने किस को छोड़ा समझना आसान नहीं। कैसे कह दूं कि मुझे छोड़ दिया है उसने , बात तो सच है मगर बात है रुसवाई की। मुहब्बत की बात की जाती है तो मानते हैं सुंदरता से ही प्यार किया जा सकता है मगर बात ये भी मशहूर है कि खूबसूरत है वफ़ादार नहीं हो सकता। मेरी इक ग़ज़ल का मतला कुछ इस तरह है।

               सभी को हुस्न से होती मुहब्बत है , हसीं कितनी हसीनों की शिकायत है। 

             निराश मत होना सच्चा प्यार अभी भी करते हैं जो उनकी बात बताना बाकी है। राजनेताओं का कुर्सी से सत्ता से प्यार वास्तव में कभी नहीं खत्म होता। जान रहती है बिना सत्ता मगर उसी तरह जैसे बिन जल मछली। इनसे अधिक कोई किसी को नहीं चाहता सत्ता पाने को भाई दोस्त सब को छोड़ सकते है , जो भी करना पड़े कर सकते हैं। राजनेताओं का आपसी रिश्ता बनता बिगड़ता है सत्ता की चाहत और ज़रूरत के अनुसार। सत्ता पाने को गधे को बाप बाप को गधा कहना कोई मुश्किल काम नहीं है। इस का खुमार जब चढ़ता है सत्ता पाकर तो इंसान खुद को भगवान से बड़ा समझने लगता है। जब कोई राजनेता आपको वेलेनटाइन डे पर रोके तो उस से पूछना सत्तारानी से अलग होकर कैसा लगेगा।  इक और बात कही जाती है जीने का मतलब है मरने से पहले किसी से इश्क़ कर लेना। मेरा आपको सुझाव है कि अपने दिमाग़ से काम लेना और दुनिया की बातों में आकर कोई मुसीबत नहीं खरीदना। फिर भी वैलेंटाइन डे पर इक शेर कहना लाज़मी है। 

                              अभी तो प्यार का मौसम है और रुत सुहानी है ,

                              कभी किसी हसीना को गुलाब क्यों नहीं देते।

                                

 


Friday, 8 February 2019

महानायक के किरदार का अभिनय ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   महानायक के किरदार का अभिनय ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    पता नहीं हम लोग ही आंखे खुली होते हुए भी देखते रहे फिर भी नहीं समझे। शुरुआत से ही वह अभिनय ही करते रहे हैं। साल पहले ही नकली लालकिला बनवा भाषण देने का कार्य उसी आने वाली फिल्म का हिस्सा था , जैसे कैमरे के सामने आने से पहले रिहसल करते हैं अदाकार लोग। नेता जी का सपना सच हुआ मगर समस्या बनी रही कि उनको चार साल तक सपना ही लगता रहा और किसी महानायक के किरदार का अभिनय करने से उनको फुर्सत नहीं मिली। जब पता चला फिल्म बनकर पूरी होने के बाद असली इम्तिहान दर्शक पसंद करते हैं या नहीं बाद में मालूम होता है की ही तरह आपका अभिनय सज धज जनता को कितना मोह पाई और क्या कोई करिश्मा आपके अभिनय आपके तौर तरीके ढंग और बोले गये डॉयलॉग दिखा पाए सामने आता है ठीक उसी तरह आपने देश जनता को क्या दिया भविष्य के चुनाव में दिखाई देता है। नेताजी को भरोसा है सब कुछ उनकी लिखवाई पटकथा के अनुसार हुआ है और उनका किरदार हिट होना ही चाहिए। मगर यहां अमिताभ बच्चन सलमान शारुख आमिर सब के दिल की धड़कन बढ़ जाती है कितने अनुभव के बाद भी फिर आपकी तो पहली असली फिल्म है बेशक आपने किसी पुरानी शोले जैसी सुपरहिट फिल्म का रीमेक चोरी से बना लिया है थोड़ा इधर थोड़ा उधर से मसाला जोड़कर चटनी बनाई है मगर अभी बाज़ार में स्वाद का इम्तिहान होना बाकी है और आजकल बच्चे भी जाने किस को पसंद करते हैं किसको नहीं पता नहीं चलता है। 
                 रामायण महाभारत में शानदार अभिनय करने वाले लोगों को उस समय वास्तविक राम सीता कृष्ण अर्जुन मानकर आरती उतारते थे मगर आजकल उनकी हालत मत पूछो पछताते हैं अपनी हैसियत से बड़ा किरदार निभा कर। तीन घंटे की फिल्म और घंटे आधे घंटे रोज़ाना का सीरियल के हज़ार एपिसोड देखना अलग अनुभव है मगर चार साल तक लगातार किसी को सामने देखना बिल्कुल अलग बात है। अभिनय करने वाला भूल जाता है पिछले बोले डॉयलॉग मगर सुनने देखने वाले उनको दोहराते रहते हैं और जिस पल बात उल्टी तरफ की नज़र आती है मोहभंग होते देर नहीं लगती। अपने हर दिन इतने रंग बदले हैं कि तस्वीर सतरंगी नहीं बनी बदरंगी बनती लगती है। आपने परिधान और छवि पर इतना ध्यान दिया कि आपको ये भी समझना ज़रूरी नहीं लगा कि जिस तरह का किरदार निभाना था उस को ये सब जंचता नहीं है। तैनू सूट सूट करदा सुना है वो पंजाबन की बात है जो साड़ी पहनती हैं उनकी अपनी बात होती है और मुंबई में चोली का चलन बदलता है तो दिल्ली में फैशन पल पल बदलता है। गंगा जमुना में नायक बोली भी खड़ी बोलता है और पहनावा भी धोती कमीज़ और लहज़ा भी देसी तब जानदार अभिनय से शानदार शाहकार बनता है। 
         अब जब तीन चैथाई फिल्म बन चुकी है और चार साल तक किरदार निभाया जा चुका है आखिरी सीन की शूटिंग बची है तब कहानी को बदलना कठिन है। अंत आपकी मर्ज़ी का बना सकते हैं मगर कोई नहीं जनता कि नतीजा क्या होगा। दर्शक चैंक सकते हैं या आपको हैरान कर सकते हैं , शायद आपको फिल्मों का अधिक पता नहीं हो यहां बेहतरीन कहानी और निर्देशन से बनी फिल्म नहीं चलती तो कभी लचर किस्म की बनाई फिल्म भी चल जाती है। जनता का मिजाज़ और दर्शकों का कोई भरोसा नहीं है। इक बात तय है कि फिल्म के कुछ समय बाद लोग फ़िल्मी किरदार को याद रखते हैं मगर अभिनय करने वाले का कोई पता नहीं होता उसका क्या हुआ। समझदार को इशारा काफी है बाकी बची कहानी को सही अंजाम तक पहुंचाना होगा। जाते जाते मेरा इक ग़ज़ल का मतला हाज़िर है। 

                                सब लिख चुके आगाज़ हम अंजाम लिखेंगे 

                                 हम ज़िंदगी को ज़िंदगी के नाम लिखेंगे।


Thursday, 7 February 2019

गुनहगार की तरह ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

          गुनहगार की तरह ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

      ये हमारी व्यथा कथा है कि मुजरिम होने का कबूलनामा नहीं मालूम , पर झूठी कसम नहीं खाते सच सच बताते हैं कि हम देश के तीस फीसदी गरीब लोग वास्तव में रहते हैं भूखे नंगे बेबस होकर भी गुनहगार की तरह ही और मरने की राह देखते रहते हैं। जो दस बीस फीसदी बड़े लोग राज चलाते हैं और जो बीस तीस फीसदी उनके नीचे खुशहाल हैं और जो हमसे थोड़ा ऊपर बीस फीसदी जो जी लेते हैं किसी हाल में आप सब लगता है हमारी तरफ ऐसी नफरत भरी नज़र से देखते हैं जैसे हमने देश में जन्म लेकर इक अपराध किया है। बदसूरत लोग आपकी चमकती जगमग दुनिया पर मखमल में टाट का पैबंद की तरह हैं। आप सब लोग देश को बहुत कुछ देते हैं अपनी आमदनी से हर तरह से मगर हम पास होता ही नहीं कुछ भी देने को। इक फिल्म की कहानी में हम में ही कोई गरीब किसी होटल के बाहर भिखारी की तरह खड़ा देखता है बड़ी सी कार से उतरते हुए किसी अमीर की जेब से उसका बटुआ गिरते हुए और फिर उस नीचे पड़े बटुए को उठाकर लेकर होटल के भीतर जाकर उस अमीर को देता है। अमीर कहता है या पूछता है तुम्हारे पास खाली जेब कुछ भी नहीं है तुम चाहते तो रख सकते थे मिला बटुआ जिस में बहुत पैसा था तो गरीब कहता है जी मैं कोई चोर नहीं हूं किसी का बटुआ लेकर धनवान नहीं बनना है। तब वो अमीर होटल में पार्टी में नाचते झूमते हुए लोगों की तरफ इशारा कर बोलता है कि ये सभी कभी तुम्हारी तरह गरीब थे मगर इन्होने किसी का गिर गया पैसों से भरा बटुआ वापस नहीं किया और आज अमीर बन गये हैं। तब बात फ़िल्मी कहानी की थी मगर आज यही देश की वास्तविकता है बस ज़रा अंतर इस बात का है कि कोई बटुआ जेब से नहीं गिरा मिलता कोई रास्ता कोई छेद सरकारी गोदाम से या देशवासियों के घर की दिवार से बना हासिल करना सीख लोग ऊपर बढ़ते जाते हैं। महनत से ईमानदारी से किसी का गुज़र बसर होता ही नहीं है चोरी और सीनाज़ोरी यही देश की व्यवस्था बन गई या बना डाली है। 
                                 नसीब की बात नहीं मालूम मगर बदनसीबी की पता है , गरीब जिस पिता के घर जन्म लेता है गाली सुनकर बड़ा होता है और जब जीवन भर कोशिश कर अपने घर जन्म लेने वाली संतान को बड़े होकर गरीबी की दलदल से बाहर निकालता है तब भी खुद ही अपने को गाली देता महसूस करता है कि बाप भी अच्छा था बच्चे भी बड़े बन अच्छे हैं इक मैं ही बुरा और कमनसीब हूं। देश का हर गरीब जागते हुए सपना देखता है अमीर होने के नहीं केवल ख्वाब देखता है दो वक़्त रोटी के और किसी भी तरह थोड़ा हंसी ख़ुशी के चार पल मिलने के। सरकार भी कुछ लोग भी हम गरीबों को कोई खैरात देते हैं दया करने का दिखावा करते हुए मगर वास्तव में बदले को पुण्य पाना या हमारे पार जो अधिकार रहता है वोट देने का , उसको मांगना भी खरीदना भी और झूठे सपने दिखला छीन लेना भी मकसद रहता है। जब भी देश में चुनाव होता है तब लगता है हम भी देश के बराबर के मालिक हैं हमारा भी वोट बाकी लोगों के बराबर है। समझते हैं शायद इस बार सरकार बराबर बराबर सबको सब बांटेगी और हम भी अपना हिस्सा पाकर जीने के काबिल बन जाएंगे। अपना वोट कीमती वोट लगता है देश की हर संपत्ति पर समानता का हिस्सा पाने का साधन है। मगर हम सभी इक पल को राजा होने का वहम पाले जिस पल वोट डालते हैं अपना सब कुछ लुटवा आते हैं। बाद में फिर पांच साल इंतज़ार उस इक पल का और हमेशा अपने इक पल के अवसर को खोते रहते हैं। देश की राजनीति जाने क्या क्या शोर रहता है हर दिन गली गली नगर गांव हम भी सामने देखते रहते हैं पर नहीं समझ पाते उनका क्या मतलब है। 
                                          जीना मरना एक जैसा है ज़िंदगी मिलती नहीं मौत आती नहीं आसानी से। कोई हादिसा होता है तभी हमारी मौत को सरकार भी समाज भी सिक्कों से तोलते हैं और कुछ हज़ार का कभी अधिक मुआवज़ा मिलता है मरने के बाद उसके वारिस को जीते जी नहीं मिला जो लगता है मर कर पा लिया है। ऐसी मौत की चाहत रखते हैं कुछ लोग ये सोच कर जिस पिता को पत्नी को बच्चों को खुद जीते हुए नहीं दे पाए मरने से ही कुछ दे कर जाएंगे तो चैन से मर तो पाएंगे। सरकार चाहती है हमारी संख्या का अनुपात आंकड़ों में घटाना मगर कम नहीं होता संख्या बढ़ती जाती है। गरीबी का फीसदी आंकड़ा और गरीबों की जनसंख्या का आंकड़ा मिलता नहीं इक कम होता है दूजा बढ़ता जाता है। सालों पहले जब देश के बड़े नेता को गुज़रना होता था तब हम गरीबों की बस्ती को परदे कनातें लगाकर ढक देते थे जनाब को देख कर दुःख नहीं महसूस हो इसलिए। आजकल सड़कों की सजावट और आंखों को चुंधियाती रौशनी में हमारा अस्तित्व विलीन हो जाता है उनको पता होता है हम हैं मगर नज़र नहीं आते हैं। हम भी उसी तरह हैं जैसे देश में अपराध बढ़ रहे हैं मगर अपराधी किस बिल में छुपे हैं पता नहीं चलता मगर अपराधी हमारी तरह गरीब नहीं होते हैं मालदार होते हैं देश विदेश जाते हैं राजनीती में शामिल होकर शासक भी बन जाते हैं। उनके अपराध की जांच सरकार अपनी सुविधा के अनुसार करती है और निर्णय होते होते अपराधी का निशान बाकी रहता नहीं है। हम बेक़सूर हैं फिर भी गरीबी के गुनाह परे शर्मसार रहते हैं। हर किसी के सामने हाथ जोड़ कोई गुनाह किया नहीं मगर गुनाह की माफ़ी मांगते हैं। पुलिस से सरकारी अधिकारी से नेता से पूछना हम खुद गुनहगार होने का सबूत देते हैं। हर कोई इसी नज़र से देखता है हमको हर दिन।  गिला है इल्ज़ाम मान लेते हैं फिर भी सज़ा का फरमान जारी नहीं होता अक्सर सदियों तक सज़ा पाकर भी फरियादी कहलाये जाते हैं।
        इक शानदार भवन के बीच लंबे चौड़े फैले हॉल में मंच पर बहुत लोग हमीं गरीबों की बात सुना रहे हैं और सामने बैठे रईस लोग लुत्फ़ उठाते हुए तालियां बजा रहे हैं। नहीं मालूम उन्हीं में किस किस ने किस किस बेबस गरीब को कितना सताया होगा। गरीबी की बात कहने सुनने को कोई गरीब नहीं फिर भी भूले से भटकता हुआ मैं उधर चला आया। रहमदिल लोग हैं समझ गलती से पायदान चढ़ उनसे मुखातिब हुआ तो संचालक को हैरानी हुई बिना बुलाये किस तरह चला आया तुम्हारा काम बाहर दरवाज़े पर सलामी देना है कविता ग़ज़ल और बड़ी बड़ी गंभीर बातों की समझ कहां तुझ को। जो काम बताया गया करो चुपचाप ख़ामोशी से पानी चाय देने के बाद नज़र नहीं आना कैमरे की तरफ। गरीबी की बात मगर गरीब को धुत्कार करना जाने कितना अच्छा कितना खराब है। कोई ग़ज़ल आधी कोई शेर अकेला कोई चर्चा किसी विषय से शुरुआत करते और पहुंचती बात किसी और विषय पर। जाने क्यों लगा शायर की खुद अपनी ग़ज़ल घायल कराहती होगी उसे टुकड़ों टुकड़ों में सुनाते हुए। ये कोई अदब की पहली सी रिवायत नहीं लगती आधी आधी कितनी कविता ग़ज़ल और हर बार बीच में तालियों की भीख की बात आयोजकों की तारीफ की और बार बार उन्हीं के नाम कोई शेर कहने का ढंग लगा जैसे किसी राजदरबार के कवि शायर अपने आका का दिल बहलाने को खुश कर ईनामात पाने को बेताब हैं। गरीबी का दर्द नहीं समझते उसको उपयोग करते हैं और गरीब को मंच से ठोकर लगाकर नीचे उतार देते हैं। कोई साहित्यकार कहलाता है कोई राजनेता आयोजन का महत्वपूर्ण अंग है कोई और आयोजन के भागीदार हैं और सब के इश्तिहार लगे हैं कारोबार भी समाज की बात करने का दम भरने का दावा भी और कवियों शायरों कलाकारों के शुभचिंतक भी। किसी गरीब की कोई भलाई इस से नहीं होने वाली है। इंसानियत इंसानियत की बात मगर इंसानियत को भूलकर अपने अपने मकसद याद हैं। अपनी कहानी में अपना कोई किरदार नज़र नहीं आया मुझे।

Tuesday, 5 February 2019

झूठ को सच बनाता आईना टीवी सिनेमा - डॉ लोक सेतिया

    झूठ को सच बनाता आईना टीवी सिनेमा - डॉ लोक सेतिया 

    आजकल हर दिन एक रुपया रोज़ देकर टीवी चैनल का कोई न कोई पैक लेने का विज्ञापन दिखाई देता है। हम हवा पानी के प्रदूषण पर चिंता जताते हैं मिलावट की वस्तु और फल सब्ज़ी पर कीटनाशक की चर्चा करते हैं। सोशल मीडिया स्मार्ट फोन के समाज पर हो रहे बुरे असर की बात करते हैं फेसबुक व्हाट्सएप्प से बढ़ते अपराधों का भी विचार कभी कभी आता है मगर इन पर हम कोशिश कर अंकुश लगा सकते हैं। लेकिन टीवी चैनल के सीरियल की कहानी विज्ञापन की नग्नता और छल कपट और फिल्मों की कहानी संगीत किस तरह से किस पर क्या असर छोड़ते हैं शायद कोई सोचता ही नहीं है। फिल्म टीवी का बहुत शौक रहता था मुझे और उनसे बहुत जानकारी और समझ मिला करती थी लेकिन अब टीवी सीरियल फिल्म देख समझ नहीं आता कि उनके बनाने वालों का मकसद है क्या , क्या केवल पैसा कमाना समाज को गुमराह कर या बच्चों और युवा वर्ग को भटका कर इक अपराध नहीं है। कलाकार कला सृजन का मकसद समाज को भटकाना नहीं हो सकता है जो ऐसा कर रहे हैं सच्चे कलाकार नहीं पैसे के लालची लोग लिखने वालों फिल्म टीवी सीरियल बनाने वालों समाज के दुश्मन हैं। हर टीवी सीरियल की हर फिल्म की कहानी की बात करना संभव नहीं है मगर यहां अधिकांश जो परोसते हैं उसकी बात से समझ सकते हैं। 
          शायद टीवी सीरियल वालों को लगता है दर्शक के पास कोई दिमाग नाम की चीज़ नहीं है इसलिए अपनी कहानी में कितनी बार कोई मरता है ज़िंदा होता है , चेहरा बदल लेता है और अपराध कर बच जाता है। बार बार अजब इत्तेफाक होते रहते हैं और सबसे बुरी बात कोई भी किरदार सही दिशा नहीं दिखलाता है। छल कपट षड्यंत्र पुरुष महिला सभी निडरता से करते हैं कोई कानून का डर नहीं है और अधिकारी डॉक्टर जब जिस को जो करना हो रिश्वत देकर झूठी रपट बनवा लेते हैं। हर कोई असंभव लगने वाले कार्य किसी को बेहोश करना कोई फ़िल्मी खलनायक जैसे पहले फिल्म में अपने अड्डे पर किया करते थे टीवी सीरियल का हर किरदार करने को सक्षम है। नागिन बन औरत बन जाने किस युग में जीना चाहते हैं , अंधविश्वास जादू टोना तंत्र के नाम पर बलि की बात और बंधक बनाकर रखने और ऐसे समाज जिस में आज भी बच्चियों के लिए शिक्षा उपलब्ध नहीं है और एक साथ आधुनिक होते हुए सदियों पिछड़े लोग वास्तविक समाज में जो कहीं नहीं मिलते टीवी सीरियल फिल्म में उनकी कहानी दिखाई देती है। फिल्म टीवी कला अगर वास्तविकता से परे कोरी कल्पना जो शायद उस पुराने युग में भी नहीं संभव था को आज की सच्चाई बताना चाहते हैं और विचारशीलता को नकारते हैं। 
                        कॉमेडी के नाम पर बेहूदा डॉयलॉग और घटिया निम्न स्तर के चुटकुले सुनकर लगता है इनको स्वस्थ्य हास्य की समझ नहीं है। हर शो में रियल्टी के नाम पर बनावट और लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता है। सरकार का विभाग इसकी चिंता करता है कि लोग जिस चैनल को देखें उसकी ही कीमत चुकाएं मगर क्या इस पर पहले ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए कि मनोरंजन के नाम पर जो परोसा जा रहा है उस से समाज की मानसिकता खराब ही नहीं हो रही बल्कि नैतिकता और आदर्श का पतन हो रहा है। जो धर्म की समाज के मूल्यों की दुहाई देते हैं उनको ये सब क्यों नज़र नहीं आता है। कभी कभी किसी टीवी सीरियल को देखकर सोचता हूं कि कई साल बाद जब लोग इसको फिर से देख सकेंगे तो क्या उनको ऐसा नहीं लगेगा कि हम कितने ज़ाहिल नासमझ और दिमाग से काम नहीं लेने वाले लोग थे। एक साथ रहते हैं एक घर में मगर हर एपीसोड में कोई दोस्त दुश्मन कोई दुश्मन दोस्त हो जाता है। बार बार धोखा छल कपट फिर भी बार बार प्यार मुहब्बत करना लगता है पिछले दिन की कहानी आपको भूल जानी चाहिए अन्यथा आपको समझ नहीं आएगा कोई भी किरदार क्या है। हर कोई गुनहगार भी है और खुद को सही भी साबित करता है। सब चालाक भी हैं मगर नासमझ और मूर्ख भी हैं जो सामने होते हुए किसी बात को नहीं समझ पाते हैं।
      टीवी और फिल्म वालों ने भगवान को अपनी कठपुतली समझा हुआ है जैसे मन चाहा उपयोग कर लेते हैं। दुनिया भर के गलत कार्य करने वाला भगवान के सामने हाथ जोड़ अपने अनुचित कर्मों में भी साथ मांगता ही नहीं कथाकार दिखलाता है उसकी दुआ सुन ली भगवान ने। इक अजीब सी दुविधा दर्शक को रहती है कि किस बात को कब सही और कब गलत समझना होगा। समय के साथ तमाम चीज़ों में बदलाव आता है और हर चीज़ पहले से बेहतर बनते बनते और अच्छी बनती जाती है मगर हमारे देश का सोशल मीडिया टीवी चैनल सिनेमा हर दिन और बदतर हालत होती जाती रहती है। खराब होने को सफलता की निशानी जैसे मान लिया गया है , बेतुकी कहानी निरर्थक गीत के बोल और संगीत के नाम पर शोर के साथ अपशब्दों को भद्दे लगने वाले शब्दों को स्वीकार करना बताता है कि हम सभ्यता को त्याग असभ्य बनने को तरक्की कहने लगे हैं। जो बच्चे इस सब को देख कर बड़े होंगे उनको पहले युग के आदर सूचक शब्द बकवास लगेंगे और गाली देना गंदी भाषा का उच्चारण करना आधुनिकता लगेगा। कभी ये समझते थे कि अपनी कुरीतियों को गलत परंपराओं को छोड़ समय के साथ अच्छी बातों को अपनाना चाहिए मगर यहां तो जो हमारी अच्छी और कायम रखने के काबिल बातें थीं उनको छोड़ व्यर्थ की फालतू की गंदी और खराब बातों को अपना रहे हैं। ये सब टीवी सोशल मीडिया और फिल्मों तथा जाने माने नायक नायिकाओं से सीखा है हमने और सीख रहे हैं। पढ़ाते हैं हमको ये उल्टी पढ़ाई जो उल्टी पढ़ाई तो मैं क्या करूं।

Monday, 4 February 2019

ईमानदारी नहीं रही ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

          ईमानदारी नहीं रही ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      अख़बार में इश्तिहार छपा है समाचार पक्का है टीवी चैनल वाले भी सबूत के साथ घोषणा करते हैं नहीं बचा सके सोशल मीडिया वाले मिलकर भी उसको। बस इक रस्म निभानी है सपुर्दे ख़ाक करना है कि जलाना है एक जैसी बात है कोई फर्क नहीं पड़ता है। कोई किसी पर इल्ज़ाम नहीं लगा सकता कि उसने मारा है मरने दिया है या बचाया नहीं है। सभी को वो कब से बेकार अनचाहा बोझ लगती थी सब उसको अपने से दूर बाकी लोगों के पास देखना चाहते थे। ईमानदारी के परिवार का कोई बचा नहीं इसलिए उसकी शोक सभा आयोजित कोई नहीं कर सकता। मगर आजकल लोग अवसर की तलाश में रहते हैं कोई जश्न मनाया जाये। ऐसे में सभी बेईमान लोगों ने मिलकर ईमानदारी की याद में सभा आयोजित करने का कार्य किया है। चलो अच्छा है ऐसे अवसर पर विरोध की बात भुलाना दिल में ख़ुशी और सामने संवेदना व्यक्त करना बचा हुआ है। पहले शोक सभा पर रिश्तेदारों को खत लिख बुलावा भेजते थे आजकल अपने पराये का भेद नहीं है और सार्वजनिक सूचना देते हैं और तमाम लोग कुछ मिंट का मौन रखने फूल चढ़ाने आते हैं। किसी के चेहरे पर दुःख की कोई झलक नहीं नज़र आती और जो जितना बड़ा व्यक्ति समझा जाता है जश्न उतना भव्य और शानदार होता है। इक शायर कहता है कि :- बड़े लोगों के घर सोग का दिन भी लगता है त्यौहार सा। उस शायर को लगता था :- इस तरह साथ निभाना है मुश्किल , तू भी तलवार सा मैं भी तलवार सा। 
                      सभा की शुरुआत होने वाली है और देश का हर ख़ास वर्ग इस जश्न में शामिल है। हर टीवी चैनल पर सीधा दिखाया जा रहा है और देश के बड़े बड़े सभी शहरों में एक साथ जश्न मना रहे हैं। इस से पहले कि मंच से भाषण शुरू हों मैं आपको अपनी इक नज़्म सुनाता हूं मौका भी है दस्तूर भी है। 


                        जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये

                        बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये।

                    इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात

                        जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये।

                    वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं

                       कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये।

                    मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे

                      मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये।

                      दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई

                       ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये।

                       जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी

                        इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये। 

            मंच पर सबसे पहले महान लेखक संचालन करने को माइक पर आये हैं , कह रहे हैं आज का दिन बहुत ख़ास इतिहासिक दिन है और शायद हमारी एकता का सबूत भी है जो ईमानदारी के विलुप्त होने पर एकमत हैं और एक साथ मिलकर उसे श्रद्धासुमन भेंट करने वाले हैं। समय के साथ जो भी अनावश्यक समझा जाने लगता है उसका अंत होना स्वाभाविक है और अंत को स्वीकार करना ज़रूरी है। ईमानदारी देखने में जैसी भी थी उसका गुणगान जितना भी किया जाता रहा हो वास्तव में उसका होना सभी को समस्या लगता रहा है। राजनीति और धर्म वालों को इस शब्द ने बहुत परेशान किया है। कारोबार करने वालों को भी यही सब से बड़ा दुश्मन लगती थी और सरकारी कर्मचारी के लिए इस से बड़ी दुविधा कोई नहीं थी। उनकी निष्ठा उनकी ईमानदारी पल पल बदलती रहती थी और किस के लिए ईमानदार रहना है उनकी यही समस्या कोई काम करने नहीं देती थी। कर्तव्य के लिए ईमनादार होने पर नौकरी से हाथ धोने का डर देश समाज के लिए ईमानदारी रोज़ बिस्तर बांध तबादले की तलवार लटकी हुई लगती थी और जनता के लिए ईमानदार होना तो नासमझी का सबूत होती थी। ईमानदारी होती है ये शायद कुछ लिखने वालों का ख्वाब था जो उनकी कविता कहानी उपन्यास निबंध आदि में दिखाई देता था और उनकी रचनाओं में आखिर में ईमनदारी जीत जाती थी सच ज़िंदा रहता था और झूठ का मुंह काला होता था। मगर किसी ने भी उनकी रचनाओं को जीवन में अपनाने का काम किया नहीं और गीता कुरान बाइबल गुरुग्रंथ साहिब को सजावट का सामान समझ सुरक्षित रखा गया बंद कमरों में। कुछ खासियत रही होगी जो ईमानदारी का गुणगान सभी करते रहे मगर किसी ने उसे अपने भीतर जगह नहीं दी। ईमानदारी से प्यार किसी भय की तरह किया है सभी ने इसलिए उसका वास्तव में कोई बाकी रहा ही नहीं। बारी बारी सब अपनी बात कहने को आये हैं और समय की कमी को देखते हुए थोड़े शब्दों में सार की बात कहना उचित होगा , कहकर उन्होंने माइक किसी और को थमा दिया है। 
       नेताजी की आंखों में मगरमच्छ के आंसू हैं , गला भरा हुआ है शब्द निकल नहीं रहे लगता है सबसे करीबी रिश्ता उन्हीं का था। हमने बहुत कोशिश की थी ईमानदारी को न सही उसके कुछ अवशेष ही किसी तरह बचाकर रखने की मगर कोई भी विभाग कामयाब नहीं हुआ बचा पाने में। हम आने वाली नस्लों को दिखला सकते थे कि ईमानदारी का अंजाम क्या से क्या हुआ ताकि उनको सबक मिलता। मगर सब जानते हैं ईमानदारी का बंटाधार खुद ईमानदार समझे जाने वालों ने किया है। गैर लोग इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं। अधिकारी की बारी आई तो उनका कहना था कि ईमानदारी हमेशा हर विभाग के हर दफ्तर में दीवार पर टंगे इश्तिहार जैसी रही है जिस पर जहां रिश्वत देना मना है उसी जगह बिना रिश्वत कोई काम नहीं होता है। कोई भी ईमानदार होने की सज़ा भोगना नहीं चाहता अन्यथा सब ईमानदार ही हैं। ईमानदारी के चर्चे सदा होते रहे हैं बस उसको देखना संभव हुआ नहीं है , जिस के ईमानदार होने का शोर हुआ उसी ने सबसे अधिक घोटाले का इतिहास रचा है। भगवा पहने कारोबारी के कहना है कि उसने असली ईमानदारी को सुरक्षित रखा हुआ है और उसके लेबल लगी बेईमानी को कोई भी ईमानदारी समझ महंगे दाम खरीद सकता है। इस तरह तमाम लोग आते रहे और संवेदना व्यक्त करते रहे। 
                      इधर दूर किसी शहर की गरीबों की बस्ती में इक झौपड़ी में इक महिला ने बच्ची को जन्म दिया है। टीवी चैनल का कैमरा उस पर थम गया है बता रहा है कि महिला के साथ दुष्कर्म किया गया था और अपराधी अभी पकड़ा नहीं गया है। टीवी वालों ने उस को ईमानदारी नाम दे दिया है अर्थात ईमानदारी उस लड़की का नाम है जिस के पिता का कोई अता पता नहीं है और जिसकी मां उसको जन्म देते ही मर गई है। ईमानदारी की शोकसभा मातम मनाना छोड़ उसके जन्म पर जश्न मनाने लगी है।

Sunday, 3 February 2019

गलत परंपराओं आडंबरों को ढोते हम लोग - डॉ लोक सेतिया

   गलत परंपराओं आडंबरों को ढोते हम लोग - डॉ लोक सेतिया 

       आपका आदर्श कौन है , अगर आप किसी की शोहरत या सफलता से प्रभावित होकर उसको अपना नायक मानते हैं और उसकी तस्वीर या पत्थर से बनाई मूरत की आरती पूजा करते हैं तो शायद आपको इक बात पर विचार करना चाहिए कि ऐसा करने से हासिल क्या होगा और क्या ऐसा कर के आप अपनी भीतर की छुपी हुई गुलामी की मानसिकता का परिचय तो नहीं दे रहे हैं। हम कुछ ख़ास नामों का गुणगान किया करते हैं और देश को उनके योगदान की बात करते हुए उनके बुत उनकी समाधियां उनके नाम पर कोई इमारत बना उनकी वस्तुओं को सहेज कर रखते हैं जिस पर हर साल सालों साल देश की जनता का धन खर्च किया जाता है जो किसी गरीब देश जिस में आधी आबादी शिक्षा स्वास्थ्य बुनियादी ज़रूरतों से बंचित है पर खर्च किया जाता तो मुमकिन है उन्हीं महान नायकों को सच्ची श्रद्धांजलि होती। हमने विचार को छोड़ केवल दिखावे को किसी के नाम पर आडंबर करना आसानी समझी है। देश की आज़ादी अथवा देश के निर्माण में अगर योगदान की बात की जाये तो केवल उन्हीं नाम वाले लोगों ने सभी कुछ नहीं किया है बल्कि सच तो ये है इस में तमाम बाकी लोगों का भी योगदान रहा है और शायद उनके साथ अन्याय है कि उनकी काबलियत महनत को दरकिनार कर थोड़े से लोगों को महत्व देने का कार्य किया जाये। देश समाज के लिए कुछ भी करना सभी का कर्तव्य है और ऐसा कभी नहीं माना जाना चाहिए कि उन्होंने देश पर कोई उपकार या एहसान किया था जिसे सदियों तक हमको क़र्ज़ की तरह चुकाना होगा। जिन लोगों ने देश की सेवा करने को समाज को बेहतर बनाने को जो भी किया उनको उस से ख़ुशी मिलती थी और अपना कर्तव्य समझते थे बदले में कोई चाहत तमगे आदि की नहीं रखते थे। उनके कार्य को अधूरा छोड़ उनके नाम पर देश का धन खर्च करना उनका आदर करने से अधिक उनकी विचारधारा को भुलाना है। इक पुल कोई शुरुआत करता है बनाने की और कोई बनकर तैयार होने पर उद्घाटन करता है दोनों के नाम के शिलालेख लगा देते हैं जबकि पुल बनाया किसी कारीगर किसी मज़दूर ने देश की जनता के कर द्वारा जमा धन से है और वास्तविक हकदार वही लोग हैं। सत्ताधारी राजनेता जनता के निर्वाचित सांसद विधायक जनता के नियुक्त सेवक हैं और उनको ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाने को खज़ाने से जितना मिलता है वो बहुत अधिक है। वास्तविक जनता के सेवक तब कहलाते जब इतने अधिक साधन सुविधाएं नहीं लेकर सादगी से जीवन व्यतीत कर समाज कल्याण में योगदान देते। ये खेदजनक बात है कि अपने देश में राजनीति करने वालों में ऐसा सच्ची देशभक्ति की भावना नहीं है और निर्वाचित होने के बाद खुद को शासक और राजा महाराजा की तरह देश का मालिक समझने लगते हैं और मनमानी करते हैं। आपको अगर ये महान लगते हैं तो आपकी महानता की परिभाषा बदलनी चाहिए क्योंकि ये गलत है। 
       कब हम इस वास्विकता को समझेंगे कि नेताओं अधिकारियों की राजसी विलासिता के चलते ही देश की गरीबी बढ़ती रही है। जो सबसे आखिर में खड़े वंचित व्यक्ति के आंसू पौंछने की बात कहते थे हम उनकी समाधि को सजाने उस पर फूल चढ़ाने पर धन बर्बाद करते हैं तो उनकी विचारधारा के विपरीत आचरण करते हैं। नहीं गरीब देश में 150 एकड़ ज़मीन पर महल में किसी बड़े पद वाले का शाही ढंग से रहना जिस पर हर दिन कितने लाख खर्च होते हैं और इसके बावजूद गरीबों के दुःख दर्द की बात करना एक साथ नहीं हो सकते। इसको उचित कहना देश के गरीबों का उपहास करना है। देश समाज की सेवा इतने महंगी कीमत लेकर की जाती है तो नहीं ज़रूरत ऐसे देशसेवकों की सफेद हाथी की तरह बोझ बन गए है ये लोग। कोई सवाल नहीं करता इनसे कि आप पर कितना धन देश की जनता खर्च करती है क्या उस आम जनता को भी कोई न्यूनतम आय मिलनी ज़रूरी है कि नहीं। आंकड़ों की बाज़ीगरी नहीं देश में बड़े छोटे की खाई इतनी अधिक नहीं स्वीकार की जा सकती है कोई हर दिन हज़ारों करोड़ की आमदनी करे और किसी को दिन में रोटी खाने को सौ रूपये भी नहीं मिलते हों। जनता की सेवा का दम भरने वाले को आम नागरिक की औसत आमदनी से कितने गुणा अधिक मिलना चाहिए। विकसित अधिकतर देश में आम नागरिक की आय और सरकारी अमले की औसत आय या वेतन में दो से पांच गुणा अधिक का अंतर होता है अर्थात आम जनता अगर एक रुपया कमाती है तो सरकारी कर्मचारियों का औसत वेतन दो से पांच रूपये होता है जबकि यही हमारे गरीब देश में बीस तीस पचास गुणा होते होते आजकल हज़ारों गुणा हो चुका है और कोई सरकार कभी किसी बजट में इस पर इक शब्द नहीं बताती है। विदेशी शासक लूटते रहे थे मगर स्वदेशी तो उनसे भी बढ़कर लुटेरे निकले हैं। क्या किसी बजट में किसी सरकार ने बताया है कि पिछले पांच सालों में किस किस राजनेता पर सरकारी खज़ाने से कितना धन खर्च किया गया। चौंक जाओगे जानकर कि उनके एक एक मिंट की कीमत करोड़ों में हमने चुकाई है , विडंबना ये है कि ऐसा करने वाले हम आम नागरिकों को किसी गुनहगार की तरह समझती है। 
               अपराध उस व्यवस्था का है जिस के चलते कोई कारोबार की आड़ में कुदरत की दी हुई हवा पानी जैसी चीज़ों को हथिया कर बेचता है। जिस व्यवस्था की कल्पना आज़ादी पाने से पहले की गई थी उस में महल और झौंपड़ी का इतना अंतर स्वीकार नहीं था। इसकी छूट किसी को नहीं दी जानी चाहिए कि कोई सर छुपाने को जगह नहीं पाए और कोई आलीशान महल बनाकर रहता हो। देश की कुल संपत्ति का 70 प्रतिशत केवल दस प्रतिशत हथिया लेते हैं तो ऐसा व्यवस्था मंज़ूर नहीं की जा सकती है। जिस विकास की बात करते हैं नेता उस में मानवीयता की कोई बात नहीं है और देश इंसानों से होता है सड़कों इमारतों को विकास नहीं समझा जा सकता है।