Sunday, 21 October 2018

जमुना मौसी का बुलावा ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

     जमुना मौसी का बुलावा ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

     गंगा मैया के बेटे मोदी पिछली बार मुझे देर से पता चला कि बेटे आजकल बुलावे पर आते हैं मां के पास। तुम गंगा के बेटे हो तो जानते तो होंगे जमुना मौसी को मुझे , इस बार कोई और बुला ले उस से पहले मैं बुला रही हूं। और कहीं दूर भी नहीं जाना उसी दिल्ली में ही मुझे मिल लेना , अब तो दिल्ली घर जैसी लगती भी होगी। ग़ालिब की दिल्ली ज़फर की दिल्ली , कौन जाता है दिल्ली की गलियां छोड़कर। जो लोग दिल्ली की लाख कमियां गिनवाते हैं वो भी दिल्ली से सब कुछ लेते हैं दिल्ली की बदनसीबी है दिल्ली से लेकर खाते हैं फिर भी गरियाते भी हैं। मेरा दिल भी दिल्ली की तरह विशाल है किसी से कोई भेदभाव नहीं करती। गंगा जमुना संस्कृति की बात सुनी ज़रूर होगी हम हिंदी उर्दू भाषा और सभी धर्मों के मेल की बात को सबसे महत्वपूर्ण मानती हैं। चिंता मत करना मुझे किसी से कुछ भी नहीं चाहिए और मैं नहीं सवाल भी पूछूंगी कि गंगा कितनी स्वच्छ हुई अब तक। मन की बात दिल की बात दोनों एक ही हैं और दिल की बात देश का दिल कहलाने वाली दिल्ली से नहीं होगी तो किसी और से हो भी नहीं सकती है। मेरा महत्व इसी से समझ लेना कि सभी महान लोगों की समाधियां मेरे किनारे पर ही तो हैं। सबकी आत्माओं का मुझसे गहरा नाता है। तुम दिल्ली की जनता के मानस को गलत मत समझना उसे कोई नहीं जान पाया है , चिंता मत करना कि दिल्ली से तुम्हारे दल को बुरी पराजय मिली थी। साहस होना चाहिए दिल्ली का दिल जीतना मुश्किल नहीं है , मगर अहंकार से दिल्ली किसी को नहीं मिली इतिहास गवाह है। नफरत की जगह दिल्ली वालों को भाती नहीं है और दिल्ली का अनुभव है कि जो उसे छोटा समझता है उसे सबक भी सिखाती है। तभी जिसे सभी संसदीय क्षेत्र में जितवाती है विधानसभा में हरवा भी सकती है। गंगा स्नान से पाप धुलते हैं तो जमुना की डुबकी लगाने वाले पाप करने से ही तौबा किया करते हैं। मौसी बुलाए तो हिसाब नहीं लगाते कि जाना फायदे की बात होगी या नुकसान की , मौसी मां से बढ़कर प्यार करती है अगर दिल से बात करता है कोई। 
     कोई मांग नहीं है न मेरा कोई झगड़ा है किसी से भी। हरियाणा हो या दिल्ली हो मैं रोकने से रूकती नहीं , जो भी बाहें फैलता है चली आती अविरल बहती हर रुकावट को पार कर। कुछ लोग हैं जो मौसी के रिश्ते को समझते नहीं हैं अन्यथा हर मौसी अपने बच्चों की तरह सभी बहनों के बच्चों को प्यार करती है। मौसी सा रिश्ते निभाना चाचा ताऊ भाई जीजा साला मामा मामी कोई नहीं जानता है। जिनको मां भी कभी प्यार नहीं करती किसी भी कारण उनको भी मौसी सीने से लगाती है। लिखने वालों ने मौसी के किरदार को ठीक से समझा और पहचाना नहीं है वर्ना मौसी की बात पर शोले की बसंती की मौसी याद नहीं आती। यहां ये बताना ज़रूरी नहीं है मगर ध्यान दोगे तो याद आ जाये शायद जब कोई मां जान लेती है कि बच नहीं सकूंगी तब बच्चों का ख्याल रखने को जिसे कहती है वो मौसी ही हो सकती है। हो सकता है तुम्हारे मन में ये बात आये कि मैं खुद तुम्हें क्यों बुलावा भेज रही हूं , मेरा कोई स्वार्थ तो नहीं है। इशारे से समझ जाना मां को जब अपने बच्चे को बचाना होता है तो अपनी छोटी बहन से कहती है तुम उसे अपने घर बुला लेना मेरे पास आएगा तो डरती हूं कोई सज़ा नहीं मिल जाये। और मौसी कभी नहीं पूछती किस बात की सज़ा क्या शरारत की है उसने। भरोसा कर सकते हो सगी मौसी हूं सौतेली मां नहीं हूं। मुझे चुनाव तक तुम्हारा इंतज़ार रहेगा। अपना ख्याल रखना मैसी की ताकीद है।

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