Saturday, 20 October 2018

शुरू भी हमसे खत्म हमीं पर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        शुरू भी हमसे खत्म हमीं पर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

          चार साल बाद फुर्सत मिली अपनी कुर्सी पर बैठे तो पीठ पीछे लिखे नामों को ध्यान से पढ़ने लगे। सचिव को बुलाया और सवाल दाग दिया मेरा नाम सबसे आखिर में इतना नीचे क्यों लिखवाया गया है। सचिव ने बताया कि हर दफ्तर में ऐसा ही चलन है शुरुआत पहले नंबर से की जाती है आप का नंबर आखिर में ही है पहले 13 और नेता पद पर रहे बारी बारी और एक बीच में कार्यवाहक भी बनाये गये थे। नेता जी को अपना नाम ऊपर चाहिए था इसलिए कहने लगे कि अगर इस को बदलकर उलटी तरह लिखा जाये तो क्या परेशानी है। सचिव ने बताया ये संभव नहीं है कि हर बार संख्या घटती हुई लिखी जाये ऐसे में शुरुआत किस संख्या से करेंगे क्योंकि ये सिलसिला आगे बढ़ता रहेगा। आपके बाद जो बनेगा उसका नाम आपके नीचे लिखा जायेगा। नेता जी को ये अच्छा नहीं लगा , उनको लगता है उनके बाद भी उन्हीं को ही बनना ही है। उनको तो जो नाम पहले लिखे उनको नीचे करना है और सबसे ऊपर अपना लिखवाना है। हमारा नाम वारणसी बाबू , बने हैं हम बनेंगे भी हम हमारा नाम वाराणसी बाबू। नेता जी सुबह शाम दिल ही दिल में यही सोचते रहे तो ये होना ही था कि दिल की बात ज़ुबान पर आ गई। दिन रात यही सोचते रहते और यही सपना देखते कि काश उनका नंबर सबसे ऊपर हो जाये।
             ऐसे में ख्वाब में मनचाही मुराद मांगने की बात सुनते ही कहा कि बस यही बात खलती है कि मुझे 14 वें 15 वें स्थान पर नहीं पहले स्थान पर होना चाहिए था। मुझे हमेशा से लगता रहा है कि इस पद की कुर्सी और मैं एक दूसरे के लिए ही बने हैं। जब भी कुर्सी पर बैठता हूं मुझे लगता है जो जो भी पहले इस पर बैठे काबिल नहीं थे। जिस तरह हर कुंवारा चाहता है उसकी दुल्हन को किसी ने भी पहले छुआ नहीं हो , मुझे भी लगता है कि जब तक मैं नहीं बनाया गया था इस कुर्सी को दूसरे किसी को बैठने देना नहीं था। मेरा इंतज़ार करती रहती। सपना टूट गया वरदान मिलते मिलते रह गया। अपनी उलझन उसको बताई जो इस समस्या का समाधान कर सकता है। बताया कि अगर इस पद का नाम ही वारणसी बाबू हो जाये तो जो भी चुना जाएगा उसी को देश का चौकीदार नहीं वाराणसी बाबू ही कहकर पुकारा जाएगा। नेता जी की चिंता अपनी जगह है उनकी अपनी जगह। ज़िद पर अड़े हैं कि पद का नाम वाराणसी बाबू हो और उसके साथ संख्या एक से लेकर बढ़ती जाये। वाराणसी  शब्द  ही उनका नाम है। संविधान में बदलाव कर हमेशा को पद पर बैठे व्यक्ति को उसी तरह संबोधित किया जाना चाहिए जैसे एलिजाबेथ एक दो तीन हुआ करता था। मगर उलझन है कि नेता जी संविधान में संशोधन भी आज़ादी के बाद से करना चाहते हैं ताकि इतिहास में शुरुआत से ही उन्हीं का नाम लिखा जाये बदल कर। मगर संविधान लागू किया ही बाद में गया था 26 जनवरी 1950 को। अब उससे पहले की तारीख में संशोधन कैसे हो सकता है लेकिन उनका कहना है जब मेरे पास तीन चौथाई बहुमत है तो सब मुमकिन है। आज़ादी की तारीख तक बदल सकते हैं नेता जी का दावा है। नेता जी को पुराना इतिहास पसंद नहीं है बदलना चाहते हैं। सड़कों शहरों के नाम बदलने से बात बनती नहीं लोग तब भी पुराने नाम को याद करते हैं। नेता जी को लगता है इतिहास को दोबारा लिखवाया जाये और ऐसा घोषित किया जाये कि आज़ादी मिली ही उसी दिन जिस दिन उनको कुर्सी मिली थी। और देश की सत्ता जिस का हाथ हो उसको वाराणसी बाबू कहा जाये अभी खुद वाराणसी बाबू हैं तो लिखा जाना चाहिए वाराणसी बाबू एक उसके बाद जब तक उनकी सत्ता है संख्या पहली ही रहेगी जब कभी कोई और बनेगा तो उसको भी वास्तविक नाम से नहीं वाराणसी बाबू दो उसके बाद तीन चार लिखते रहेंगे ताकि अनंतकाल तक उन्हीं का ही नाम रहे। सोशल मीडिया पर बहस जारी है , उनके बाद भी उनकी ही बारी है। सत्ता की ज़िद हमेशा जीतती है कब भला हारी है। नाम लिखना नहीं मिटाना है दिल में बेकरारी है। नाम की भूखी दुनिया सारी है बड़ी मुश्किल से मिलती बारी है। क्या करना है मर्ज़ी हमारी है। निभानी थोड़ी सी मगर दुनियादारी है।
         मगर नेता जी असली बात भूल गये हैं , ख्वाब में जो उनसे बातें कर रहा था वो वाराणसी का गंगा का तट था। उसने बताया था आप को सत्ता मिली ही वाराणसी से जीत के कारण है। जिस दिन वाराणसी ने आपको ठुकरा दिया आप पुराने राज्य से जीत कर भी देश की राजधानी में सत्ता नहीं हासिल कर सकते हैं। वारणसी बाबू नाम दिया था उसी तट ने वो याद रहा मगर असली बात भूल गये। क्या वाराणसी अपनी राय बदलेगी या शायद खुद जनाब ही वाराणसी छोड़ कोई और किनारा तलाश करने लगेंगे। गंगा फिर से उनको बुलाएगी ऐसी संभावना लगती नहीं है। जब नाम ही नहीं रहा वाराणसी बाबू कोई दूसरा बन गया तो क्या होगा। ख्वाब की बात अक्सर आधी अधूरी याद रहती है। ख्वाब तो ख्वाब है उनके सपने भी कमाल के हैं खुद ही अपना नाम याद करते हैं इस डर से कि कहीं भूल ही जाऊं मैं कौन हूं कहां से आया हूं। सिवा अपने कुछ नहीं याद।

No comments: