Friday, 22 June 2018

झूठ की किताब कितनी खूबसूरत है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    झूठ की किताब कितनी खूबसूरत है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     बस नाम बदलते हैं और तस्वीरें बदलती हैं। शाइनिंग इंडिया , भारत निर्माण , सब से अच्छा हरियाणा , जाने क्या क्या। सत्ताधारी दल के पैसा सबसे अधिक आता है इस में राज़ क्या है। अब ऐसे में जब चुनाव आने वाले होते हैं नेता लोग पुस्तक छपवाते हैं जिस में लोगों को बताया जाना होता है कि जो आपको सामने नहीं दिखाई देता लो पढ़ कर समझ लो। लोग जैसे अंधे हैं और मूर्ख तो हैं ही जो उनको इतना भी दिखाई नहीं देता कि आपकी भलाई की जा चुकी है सब समस्याओं का समाधान किया जा चुका है और थोड़ी सी कुछ कमी रही भी होगी तो अगली बार हो जायेगा सब ठीक। मैं यकीन से कह सकता हूं ये सब बातें किसी राजनेता की कलम से नहीं किसी किराये के लिखने वाले की कलम से लिखवाई गई हैं। अच्छे दिन आने वाले हैं लिखने वाला भी फ़िल्मी गीतकार निकला। झूठ कितना अच्छा लगता है आप किसी शैतान को देवता कह कर देखो। और सच नामुराद कभी मीठा होता ही नहीं स्वाद उसका।

                   विज्ञापन का अर्थ ही यही है , जिस सामान को सही बनाया हो उसे लोग खुद ढूंढते हैं खरीदते हैं। जो वास्तव में काम का नहीं होता उसे ही बेचने को लुभाना पड़ता है। छूट और सेल या इश्तिहार यही हैं। आपको लगता है आपको फायदा हुआ मगर कमाई बेचने वाले की होती है जेब आपकी खाली होती है। आज कोई हैरान हो सकता है कि अभी भी बहुत अच्छी कंपनियों का बनाया सामान खुद बिकता है। मैं ऐसी आयुर्वेदिक कंपनियों की दवाएं खुद मंगवाता हूं बिना किसी एजेंट के आने के बावजूद भी क्योंकि उनकी गुणवत्ता और कीमत दोनों उचित हैं। उस कंपनी को इश्तिहार की ज़रूरत नहीं होती है। ऐसे ही जो अच्छे डॉक्टर होते हैं उनको अपना जन संपर्क अधिकारी और कमीशन देने का काम नहीं करना पड़ता। मिला इक न्यूरो सर्जन से जो कहने लगे वो हर दिन सात सर्जरी ही कर सकते हैं और उनके पास सप्ताह तक कोई समय नहीं है आपके रोगी को तुरंत ज़रूरत है किसी और से करवा लो। पांच लाख का लालच नहीं था क्योंकि वो पैसों की खातिर इलाज नहीं करते हैं इलाज करने के पैसे लेते हैं। इन दोनों में ज़मीन आसमान का अंतर है।
              उनका दावा है वो सिफारिश पर नौकरी तबादला नहीं करते हैं। ये समझ नहीं आया कि जब किसी राज्य का मुख्य मंत्री या देश का राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति बनाना हो तब काबलियत किसी एक संस्था का सदस्य होना दिखाई देती है। कथनी और करनी में इतना विरोधभास। देश की बात दिखावे को मगर आपकी आस्था किसी दल ही नहीं किसी एक व्यक्ति में। आचरण में नहीं दिखाई देता जो भाषण में या सभाओं में कहते हैं। झूठ की दास्तान की किस किस बात की बखिया उधेड़ूं। बाहर लिबास साफ़ है भीतर मन में मैल भरा पड़ा है। लेकिन आपको इसी सहारे आगामी चुनाव लड़ना भी है और जीतना भी चाहते हैं। कहा तो ये जाता है कि काठ की हांडी बार बार चढ़ती नहीं , कौशिक कर के देख लो शायद जनता फिर मीठी बातों में आ जाये।

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