Friday, 1 June 2018

विरोध की सच की आवाज़ अपनी साहूलियत के साथ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   विरोध की सच की आवाज़ अपनी साहूलियत के साथ ( आलेख ) 

                                   डॉ लोक सेतिया 

    ये विषय तो बहुत पुराना है और मैंने इसको लेकर पहले भी लिखा भी है। मगर शीर्षक का विचार अभी अभी इक महिला के विडिओ यूट्यूब में उनकी बात सुनकर आया है। उन्होंने अपने विभाग के सरकारी नौकरी के काल में अपने अनुभव को लेकर बताया। ये भी बताया कि जिसको हमने पकड़ा आरोप लगाए और दोषी साबित किया वो वास्तव में अपराधी नहीं था , बकरा था। अर्थात गुनहगार कोई और था मगर हमने सज़ा किसी और को दिलवाने में इक हथियार बनकर काम किया। जब आप नौकरी में होते हैं तब तमाम गलत कार्यों में शामिल होते हैं अपनी मर्ज़ी से या मज़बूरी से , तब खामोश रहते हैं लेकिन जब आपका नाम हो जाता है तब पुरानी घटनाओं की असलियत बताते हैं मगर ये नहीं बताते कि आप भी हिस्सा थे सरकार और विभाग के आपराधिक कारनामों का। बहुत नाम हैं और बहुत विभागों से बड़े बड़े पदों पर रहे हैं , जब राजनीति में आये या फिर समाजसेवा की दुकान लगाई जिस में लाखों करोड़ों का चंदा दान और सरकारों से लाभ मिलता है , तब आप सच के पुजारी और झंडाबरदार बन पाक साफ़ दिखना चाहते हैं। अख़बार में कॉलम लिखते लिखते किसी दल में मंत्री बन गए तो सच लिखना क्या समझना भूल गए। सच तब सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते थे। इक घटना की बात बताई कि कुछ नेताओं पर संदेह था और फोन टेपिंग की जा रही थी , इक सुबह आगजनी और अपराध की बातें सुनकर करवाई की और जो नेता लोग चाहते थे नहीं हुआ , मगर सबूत थे और रिपोर्ट दर्ज की गई मुकदमा दायर किया गया मगर सालों तक अंजाम तक नहीं पहुंचा क्योंकि बड़े बड़े नेताओं के पास बचाव को बड़े बड़े वकील होते हैं जो सब के लिए नहीं होते हैं। और फिर इक दिन उनका मुकदमा ही सरकार ने वापस ले लिया था। ये बात आपने तब क्यों नहीं बताई अदालत को कि ऐसा क्यों किया जा रहा है , आपको अधिकारी मंत्री आदेश देता है अनुचित कार्य करने के और आप सवाल नहीं करते इनकार नहीं करते , विरोध नहीं करते साथ देते हैं। जब आपको सुविधा है कि आप पर आंच नहीं आएगी तब आप सोशल मीडिया और टीवी चैनल या अख़बार को बताते हैं और महान कार्य करने का दम भरते हैं। ऐसे लोग देश में सब बदलने की बात कहते हैं तो धोखा है। दोस्तो संभलना और सोचना उनकी बात का दूसरा पक्ष भी है जो इसी के पीछे छुपा हुआ है कि तब क्यों नहीं बताया और आज जब बता रहे तब क्या मकसद है।

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