Thursday, 24 May 2018

ऐसी होगी मेरी शोकसभा कभी ( तीरे-नज़र ) डॉ लोक सेतिया

     ऐसी होगी मेरी शोकसभा कभी ( तीरे-नज़र ) डॉ लोक सेतिया 

      आप शोक जताने आये हैं या एहसान करने। चलो मेहरबानी की कुछ लोग तो मिल बैठे। मुझे मालूम है कितना कठिन है आपका मुझे अच्छा बतलाना। हमेशा जो बेहद खराब लगता रहा हो उसे अच्छा ही नहीं बेहद भला इंसान कहना सच साहस की बात है। आकर मेरी तस्वीर पर फूल चढ़ाना और हाथ जोड़ मन ही मन कुछ कहना , कमाल ही किया है। पता नहीं था वर्ना कब का मर जाता मैं। ये जो मंच पर भली भली बातें की जा रही हैं सब को पता ही हैं , हर शोकसभा में बार बार दोहराई जाती हैं। सुनाई देती हैं समझ नहीं आती कभी भी। अभी कहते हैं आत्मा नहीं मरती और अगर अच्छे कर्म किये हैं जीवन में तो भगवान से मेल हो जाता है , दुःख की कोई बात नहीं है , फिर इसे शोकसभा क्यों कहते हैं। जश्न होना चाहिए। मैं समझा नहीं सका मगर मैंने हमेशा समझा यही है। मौत से मुझे शायद ही डर लगा हो , ज़िंदगी ने डराया है मुझे हमेशा। 

           मौत तो दरअसल एक सौगात है , हर किसी ने इसे हादिसा कह दिया।

    रस्मे-दुनिया है निभा लेते हैं मगर ऐसे भी नहीं , आप तो भाषण देने लगे , इतनी मुहब्बत होती जिनको उनकी आवाज़ आंसुओं में डूब जाती है। संख्या की बात छोड़ो कोई फर्क नहीं पड़ता मुझे कितने अधिक आये या थोड़े आये , मगर जितने भी आये हैं सब दावा करते हैं मुझे जानते हैं समझते हैं , ज़िंदा था तब तलक तो मुझे पहचान नहीं सके आप लोग। मुझे लगता था शायद मैं किसी और जहां का हूं गलती से आपकी दुनिया में भटक कर चला आया। उपकार तो किया है आपने घंटा भर मेरे लिए मेरे नाम पर खर्च किया है और बदले में मैं इतना भी नहीं कर सकूंगा कि बदला चुका सकूं , उस जहां से वापसी का रास्ता नहीं मालूम। दोस्त तो दोस्त वो भी आये हैं जो जलते थे मुझसे बिना बात दुश्मन समझ , मैं कब किसी का दुश्मन बना कभी। आया ही नहीं दुश्मनी करना , जो दुश्मनी करते रहे उन्हें ठीक से दुश्मनी निभानी भी नहीं आती। अगर आती होती तो वही लोग इक पार्टी रखते जश्न मनाते गाते झूमते ख़ुशी मनाते। कम से कम इसी तरह मेरी इक इच्छा ही पूरी हो जाती। वो पंजाबी गीत भी सच नहीं हुआ , जदों मेरी अर्थी उठा के चलणगे , मेरे यार सब हमहुमा के चलणगे। चलणगे मेरे नाल दुश्मन वी मेरे , ओ वखरी ए गल मुस्कुरा के चालनगे। आप तो यहां भी झूठ का दिखावा कर रहे हो। झूठी गमगीन सूरत बनाकर किसे बहला रहे हो अपने आप को। या ऐसा तो नहीं कि अभी तक ऐतबार ही हो रहा कि मैं मर गया और मेरी शोकसभा आयोजित की जा रही है , खुद आकर तसल्ली करने पर भी शक बाकी है। अपने भीतर से मुझे निकाल दो और भूल जाओ अदावत की बातों को। मरने के बाद दोस्ती दुश्मनी क्या सभी रिश्ते नाते खत्म हो जाते हैं। औपचारिकता निभाना भी ज़रूरी था जनता हूं। पढ़ते पढ़ते सोचोगे ये लेखक भी कमाल का है मरने के बाद भी इसकी रचना पढ़नी पड़ रही है। वाह इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। 

                                      कल की बात से आगे 

     मुझे लगता है कि किसी के भी दुनिया से जाने के बाद अगर उसके अपने और चाहने वाले उसकी याद में कुछ भी करना चाहते हैं तो वह बात करें जो उस मरने वाले को पसंद हो या थी। ऐसा भारत में बेहद कम होता है मगर पश्चमी देशों में होता है ऐसा पढ़ते रहते हैं। अभिनेता अनुपम खेर के पिता की इच्छा थी उनके बाद शोकसभा नहीं इक शानदार पार्टी आयोजित की जाये और ऐसा ही किया भी गया। उनकी अलग दुनिया में कोई सवाल नहीं करता क्यों किसी ने क्या किया। मगर अधिकतर हम लोगों की दुनिया में अपने तरीके से कुछ करने की छूट नहीं होती है। मेरे इक दोस्त के पिता इन सब बातों को नहीं मानते थे ये उनके बेटे जानते थे , इसलिए जब वो सब भाई हरिद्वार अस्थियां लेकर जा रहे थे तो पिता की बात का ध्यान रखकर अस्थियां राह में किसी नदी में प्रवाहित कर खुद कहीं और चले गए हरिद्वार की जगह। मगर उनको नहीं पता चला कि जब वो किसी राह की नदी में अस्थियां डाल रहे थे तब किसी ने उनको ऐसा करते देख लिया था और पहचान लिया था। वापस घर आने पर कोहराम मच गया और लोग बहुत साल तक उनकी आलोचना करते रहे। कुछ ऐसे ही राजकुमार जो हम कहकर मुखातिब हुआ करते थे अपने अंदाज़ में डायलॉग बोला करते थे , नहीं चाहते थे कि उनके मरने की खबर भी किसी को पता चले और उनकी इस इच्छा को पूरा करते हुए उनका अंतिम संस्कार दो चार दोस्तों और परिवार के लोगों ने किया था और फिल्म उद्योग के लोगों तक को नहीं पता चला उनकी मौत कब हुई। अभी साल दो साल पहले की बात है इक बेहद अच्छे व्यंग्यकार की मौत के बाद उनकी इच्छा का आदर करते हुए उनकी रचनाओं का पाठ किया गया था। ये बेहद भावनापूर्ण दृश्य था कि जब उनकी बेटी आंखों में आंसू लिए उनकी हास्य व्यंग्य की रचना पढ़कर सुना रही थी। ऐसा ही कुछ मेरे दोस्त पंजाबी के शायर कवि हरिभजन सिंह रेणु की शोकसभा में दिखाई दिया था सिरसा में ही। किसी भी वास्तविक रचनाकार को इससे बेहतर श्रद्धांजलि नहीं दी जा सकती है।
          मैंने कुछ रचनाएं लिखी हैं इसी विषय को लेकर। हास्य व्यंग्य कविता श्रद्धांजलि सभा , इक ग़ज़ल , जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये , इक कविता नाट्यशाला , मैं रहूंगा हमेशा , मेरी खबर। इक बात किसी कवि की कविता की मुझे बहुत पसंद आई थी और उसे मैंने अपनी कविता श्रद्धांजलि सभा के आखिर में लिखा भी है उसको दोहराना चाहता हूं।  दोस्तो मेरे लिए स्वर्ग की दुआ मत करना ,न ही मुझे मोक्ष या मुक्ति की चाह है।

भगवान से यही कहना है कि ,
मुक्ति दे देना तुम  ,
गरीब को भूख से  ,
दिला सको तो दिला दो  ,
मानव को घृणा से मुक्ति ,
और नारी को  ,
दे देना मुक्ति अत्याचार से  ,
मुझे जन्म देते रहना  ,
बार बार इनके निमित।
मित्रो ,
मेरे लिये  स्वर्ग की  ,
प्रार्थना मत करना  ,
न ही कभी मेरी  ,
मुक्ति की तुम दुआ करना ,
मेरी इस बात को  ,
तब भूल मत जाना  ,
मेरी श्रधांजली सभा में  ,
जब भी आना।

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