Saturday, 28 April 2018

बोलिये मत केवल सुनिये ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया

      बोलिये मत केवल सुनिये ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया

      बात इक पुरानी फिल्म की है , इक महिला कमरे में आती है , ध्यान से देखती है। वही खुशबू वही सिगरेट का ब्रांड वही शराब की बोतल भी उसकी पसंद की ब्रांड की। सिगरेट सुलगाती है और कश लेकर सोचती है वही पुराना खरीदार है। महिला काल गर्ल का काम करती है। दरवाज़ा खुलता है तो महिला जिस की बात समझ रही थी उसकी जगह और ही शख्स भीतर आता है। वास्तव में यह शख्स उस महिला का आशिक है और महिला उसके दोस्त की बात समझ रही थी। उस दोस्त ने ही महिला को बुलवाया था अपने दोस्त की उदासी मिटाने की खातिर बिना जाने कि उसकी उदासी की वजह क्या है। नायक के पांव तले से ज़मीन खिसक जाती है ये असलियत जानकर कि दिन भर मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाने वाली महिला रात को जिस्म बेचती है। मुझे ये कहानी क्यों याद आई असली बात पर आता हूं। 
       फिर वही जगह वही लोग वही तमाशा। पुलिस वाले फिर पार्क में लाऊड स्पीकर लगा कर नाच गाना करवा रहे हैं। खाई के पान बनारस वाला , नाच गाना देखो सुनिये। इसे जनता से संवाद कहते हैं। आपको बोलना नहीं है केवल सुनना है देख कर झूमना है और ताली बजानी है। सब वही है लोग कुछ पुराने कुछ नए हो सकते हैं मकसद नहीं बदला। पार्क के बाहर खड़े पुलिस वालों ने बुलाया आप रोज़ सैर करते हो आज हमारे साथ भी सैर करो , उनसे बात की और कई घटनाओं की चर्चा की और सवाल किया मुझे समझा दो ये क्या है जनता से मेलजोल कदापि नहीं है। तमाशा है आखिर पुलिस वाले को भी कहना पड़ा। तमाशा मदारी दिखलाता है और जादूगर आपको सामने दिखलाता है। असलियत और होती है। सरकार और अधिकारियों को खुद भी वास्तविकता को समझना होगा , झूठे सपने बेचना किसी विभाग का काम नहीं है। शायद बिना विचारे अपने उच्च अधिकारी की हर बात पर अमल करना इक सीमा तक ज़रूरी है। कभी तो चिंतन करें आपका काम क्या है और कर्तव्य क्या है , क्या इन बातों से उसका कोई मतलब है। आंखे बंद रखना गंधारी की तरह कोई सच्ची निष्ठा नहीं , आपकी निष्ठा देश समाज के लिए होनी चाहिए व्यक्ति के लिए नहीं। 43 साल बीत गए लोकनायक जयप्रकाशनारायण की बात फिर भी वही है। सुरक्षाकर्मी जनता और देश की सुरक्षा को हैं या सत्ताधारी नेताओं की उचित अनुचित हर बात हर आदेश के पालन करने को। यक्ष प्रश्न यही है।

Thursday, 26 April 2018

काम की बात ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

            काम की बात ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

      आज काम की बात करते हैं। आपको गलतफ़हमी न हो इसलिए पहले ही बताना चाहता हूं कि यहां काम से अभिप्राय कामवासना नहीं है। चर्चा इसकी है कि कौन कितने घंटे काम करता है। अपने नेता जी सुना है अठाहर घंटे काम करते हैं , करते होंगे जब कहते हैं तो। मगर करते क्या हैं यही नहीं बताया किसी ने। कोई अगर कहता है मैं सिनेमा देख रहा हूं , पहाड़ों पर घूमने गया हुआ हूं या दोस्तों के साथ मौज मस्ती कर रहा हूं तो उसे छुट्टी मनाना कहते हैं , काम करना नहीं। नेता सत्ता पाने के बाद काम नहीं करते हैं सत्ता सुख का लुत्फ़ उठाते हैं। स्कूल मास्टरजी जो घर से कर लाने को दिया करते थे वही काम कहलाता था , बच्चे स्कूल में पढ़ाई करें भले नहीं करें कोई नहीं पूछता , अगले दिन अध्यापक यही देखते थे घर में दिया काम किया या नहीं। सरकार भी इसी तरह काम करती है , देश और जनता का काम नहीं करते , अपने दल वालों घरवालों का काम करना ज़रूरी है। संविधान में आपको पांच साल मनमानी की छूट है जो चाहो करो या नहीं करो। 
      कभी किसी आई ए एस या आई पी एस अधिकारी से बात करना तो समझोगे वो क्या करते हैं। अधिकारी बनने का मतलब ही है काम नहीं करना। काम करना मनरेगा मज़दूरों के लिए है जो मांगते हैं तब भी काम नहीं मिलता। काम करना उनकी मज़बूरी है ज़रूरत है पेट भरने को। नेताओं अधिकारियों की भूख काम से नहीं बुझती , धन दौलत शान शोहरत और रईसी ठाठ बाठ की भूख कभी मिटती नहीं है। शासन की बागडोर जिस के हाथ होती है उसे हुक्म चलाना आता है , काम करना उसे तौहीन लगता है। देश की सरकारों नेताओं अफ्सरों ने अगर वास्तव में दायित्व निभाया होता काम करते तो तमाम विकसित देशों की तरह हमारा देश भी तरक्की कर सकता था। नेता लोग काम करने का अर्थ केवल चुनाव जीतने और सत्ता हासिल करने को की दौड़ धूप को मानते हैं। सरकार बन गई तो क्या क्या कर देंगे केवल जुमला होता है। 
               आपको यकीन नहीं आये तो कभी आर टी आई से पता लगवाना कौन नेता कौन अधिकारी कितने समय तक अपने दफ्तर में जाकर बैठा। उपयुक्त तक तथाकथित कैंप ऑफिस से काम करते हैं , इधर इक सी एम की घर बुलाकर अधिकारी से मारपीट की बात सामने आई है। जब हर किसी को सरकारी कर्मचारी को दफ्तर जाकर काम करना होता है तो देश का प्रधानमंत्री क्यों अपने दफ्तर जाकर काम करता है। अब पता लगाओ पी एम साहब पी एम ओ अर्थात प्रधानमंत्री कार्यालय कितने दिन कितने घंटे गए चार साल में। अब इधर उधर भाषण देना विदेश की सैर करना कोई काम नहीं है ऐश करना है , कितने साल जिन देशों में जाने की अनुमति नहीं थी वहां शान से हो आये , क्या सही क्या गलत की बात छोड़ दो। तुलसी की बात नहीं कि जहां आपके आने को नहीं पसंद किया जाता वहां नहीं जाना भले सोने की बरसात होती हो। 
        काम वही होता है जो सामने दिखाई दे भी की हमने क्या क्या कर दिया। देश की जनता की भलाई का कुछ भी हुआ दिखाई नहीं देता तो फिर किया क्या है। अभी चाहते हैं करने को और समय दिया जाये।

Wednesday, 25 April 2018

सूचना और जनसम्पर्क विभाग भगवान का ( तीर ए नज़र ) डॉ लोक सेतिया

     सूचना और जनसम्पर्क विभाग भगवान का ( तीर ए नज़र )

                             डॉ  लोक सेतिया 


        ऊपर वाला कब से हैरान और परेशान था , जिस तरह से सरकारी नौकरी मिलते ही इंसान काम नहीं करना चाहता केवल वेतन पाना चाहता है और बढ़ाना बढ़वाना उसका उदेश्य बन जाता है उसी तरह भगवान ने जिनको अपना प्रतिनिधि बना कर भेजा था वो सब भी अपने पदों का दुरूपयोग करने लगे हैं और मार्ग से भटक गए हैं। इक ऐसी ही आत्मा से साक्षात्कार हुआ भगवान का। भगवान ने कहा मैंने तुम्हें अच्छे माता पिता के घर जन्म देकर अच्छी शिक्षा के बाद अच्छे सरकारी ओहदे पर बिठाया था। तुम और तुम्हारे सभी साथी अफ्सर और राजनेता अगर अपना फ़र्ज़ निभाते तो मेरे प्यारे भारत देश की दशा कभी ऐसी बुरी नहीं हो जाती। तुमने कभी सोचा कितना बड़ा अपराध करते रहे हो , जैसे कोई डॉक्टर वैद हकीम अपने पास रोग की दवा होने पर भी रोगी का उपचार नहीं करे और लापरवाही से मरीज़ों की जान लेने का पाप करता रहे। तुम सभी कहते रहे जनता से हमें बताओ कोई परेशानी हो अगर लेकिन जब भी किसी ने बताया क्या क्या गलत है तब तुम लोग अपनी गल्ती और नाकामी ही नहीं अपनी नाकाबिलियत को छुपाने को उन्हीं को परेशान करते रहे। अपने कार्यकाल में हर दिन तुमने पाप और अपराध ही किये हैं। तुम लोग सब जानकर भी अनजान बने रहे किसलिए। उस आत्मा ने बताया क्योंकि आपके भेजे साधु संत सन्यासी और उपदेशक हमें यही पाठ पढ़ाते रहे कि उन्हें दान देकर और किसी तरह से पूजा अर्चना आदि कर हम सभी अपकर्मों के फल पाने से बच जाएंगे। यही सिस्टम बना हुआ है हर कोई दस बीस प्रतिशत लेकर गलत को सही साबित कर देता है।
मुझे नहीं पता आपकी अदालत में गुनाहों की माफ़ी कौन कैसे दिलवा सकता है मगर मैं तलाश कर ही लूंगा जो भी कोई हो। भगवान बोले जीते जी नहीं समझे तो मरने के बाद तो ये मूर्खता की बात नहीं करो।
              भगवान ने कहा तुम्हें अपने अपराधों की सज़ा भुगतनी ही होगी और अपने फ़र्ज़ नहीं निभाने का पछतावा तो होना ही चाहिए। अधिकारी की आत्मा बोली काश आपने धरती पर अपना कोई विभाग खोला होता जो सब को आपकी सही सूचना और तथ्यात्मक जानकारी देता तो हम लोग भी सुधर गए होते। ये बात सुनकर भगवान ने अफ्सर रही आत्मा से विस्तार से इस पर चर्चा की है। और बहुत जल्दी ही भारत के हर शहर में भगवान अपना कार्यालय खोलने जा रहे हैं। भगवान का सूचना और जनसम्पर्क विभाग शुरू होने के बाद दुनिया में भगवान को लेकर सब गलतफहमियां दूर हो जाएंगी और धर्म के नाम पर धंधा करना भी संभव नहीं रहेगा। हर कोई भगवान से सीधे सम्पर्क कर सकेगा और इंसाफ में अंधेर नहीं होगा न ही देर ही। बस कुछ ही दिन में भगवान आमने सामने नहीं होने के बावजूद भी सब के साथ जुड़े रहेंगे। ठीक उसी तरह जैसे हम लोग सोशल मीडिया आदि से जुड़े रहते हैं आपस में चौबीस घंटे।
                       ( कथा का पहला अध्याय समाप्त )

Sunday, 22 April 2018

मोदी मॉडल का लोकतंत्र ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    मोदी मॉडल का लोकतंत्र ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     2014 में चुनाव कैसे जीते और कैसे इतना बहुमत मिल गया , सच भाजपा तो क्या खुद मोदी जी को भी समझ नहीं आया। सभी लोग अचरज करते रहे हैं मोदी जी की तमाम बातों को सुनकर , खुद अपनी ही बात अपने ही पहले भाषणों में व्यक्त विचारों के उल्ट बातें और काम करते रहे हैं। सुनते आये थे अचानक अमीर हो जाने से आदमी खुद को खुदा समझने लगता है। लेकिन चुनाव जीतते ही कुछ भी और करने की बात से अधिक चिंता आगामी चुनाव जीतने की रहने लगी थी। ऐसा लगता है मानो ये चुनाव जीता ही अगले चुनाव कैसे जीतेंगे के मकसद को लेकर था। बस इसी चिंता में चार साल बीत गए हैं , और अभी तक जिन विदेशी चाहने वालों की जय जयकार का भरोसा था वही विरोध करने लगे हैं इसलिए बहुत ऐसे लोगों को भेजा इनविटेशन रद्द करने की नौबत आ गई। जनाब आपको वोट देश वालों ने देने हैं , आप 53 देशों की ख़ाक छानते रहे और बात उल्टा बिगड़ गई है। 
             लेकिन इसका अर्थ ये कदापि नहीं कि मोदी जी आगामी चुनाव हार सकते हैं। इस देश का महाज्ञानी और सच का झंडाबरदार मीडिया कब का घोषित कर चुका है कि मोदी का कोई विकल्प नहीं है। जिस युग में टीवी चैनलों अख़बारों ही नहीं मोबाइल फोन और डाटा तक सब के नित नये विकल्प खुलते हैं उस में इन बेचारों को सवा सौ करोड़ में कोई और काबिल नहीं दिखाई देता ठीक उसी तरह जैसे खुद अपने से अधिक कोई टीवी चैनल या अखबार लोकप्रियता में नहीं दिखाई देता। सब लोग समझना चाहते हैं कि जब मोदी सरकार के अच्छे दिन , स्वच्छ भारत , गंगा सफाई से मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया और न्याय व्यवस्था से लेकर बेटियों की सुरक्षा तक सब में सरकार नाकाम रही है। जब भाजपा की राज्य की सरकारों में खुलेआम दंगे और अपराधियों का समर्थन खुद सत्ताधारी दल के नेता मंत्री मुख्यमंत्री करते रहे हों और अदालत तक फटकार लगाती रही हो उसे लोग फिर से वोट देकर खुद अपनी जान जोखिम में क्यों डालना चाहेंगे। 
             मोदी जी को नया करने में बहुत मज़ा आता है , नतीजा जो भी हो मोदी जी फ़िल्मी खलनायक की तरह , खुश हुआ कहने का लुत्फ़ उठाते हैं। सौ दो सौ लोग नोटबंदी में मरे तो क्या हुआ। किसान ख़ुदकुशी करते हैं तो क्या हुआ , यार बेली बैंक को चूना लगाकर विदेश भागते हैं तो कोई चिंता नहीं। भाषण देना जुमले उछालना और मन की बात जैसा एकतरफा संवाद और करोड़ों लाख रूपये के विज्ञापन तो हैं शोर मचाने को। लेकिन फिर भी आगामी चुनाव से पहले उसी तरह जैसे 8 नवंबर को आठ बजे नोटबंदी की घोषणा की गई थी , ये घोषित किया जाएगा कि अगला चुनाव मोदी मॉडल के आधुनिक लोकतंत्र के अनुसार करवाया जाएगा। जिस में ईवीएम मशीन में आपके पास दो तरह के विकल्प होंगे। एक विकल्प होगा मोदी की भाजपा के उम्मीदवार के पक्ष में बटन दबाने का या फिर दूसरा विकल्प होगा बाकी सभी दलों के उम्मीदवारों के सामने उनके विरोध में बटन दबाने का। आपको जो पसंद हो करें नतीजा वही होगा। भाजपा के विरोध का कोई बटन नहीं होगा न ही बाकी दलों के समर्थन का ही कोई बटन होगा। 8 को उल्टा लिखो तब भी 8 और सीधा लिखो तब भी 8 होता है। और आठ जनता के लिए अशुभ भले हो मोदी जी की पसंद का लकी नंबर है।

Wednesday, 18 April 2018

हसरत ही रही ( अधूरा ख़्वाब ) डॉ लोक सेतिया

       हसरत ही रही ( अधूरा ख़्वाब ) डॉ लोक सेतिया 

अकेला चला जा रहा था ,
राह में मिले कुछ लोग ,
वही पुरानी पहचान थी , 
वही बचपन की बातें हुईं। 
उन्हें भी गांव ही जाना था ,
रास्ता कब कैसे कट गया ,
पैदल चलते चलते नहीं पता ,
कोई थकान नहीं थी किसी को। 
घर की गली में आते याद आया ,
किसी जगह जाना था सभा में ,
थोड़ा समय अधिक हो गया था ,
सोचा पहले मां से मिलता हूं। 
दिल में इक हसरत थी उठी ,
आज अपनी झाई ( मां ) से ,
पांव छूने की जगह पहले जाते ,
कस कर लगना है मुझे गले। 
याद नहीं आता मुझे कभी भी ,
हुआ होगा ऐसा वास्तव में ,
सोचा भी नहीं लगता अजीब ,
दरवाज़ा खोला गया करीब। 
सब अपनों से राम राम हुई ,
रसोई में बना रही थी मां कुछ ,
बाहर से खुशबू आ रही थी ,
सुनाई दिया स्वर मां गा रही थी। 
गले मिलता पांव छूकर तभी ,
पास जाता अपनी मां के करीब ,
नींद खुली अधूरा रह गया ख़्वाब ,
हसरत दिल की हसरत ही रही। 
कितने बरस बीत गए इस बीच ,
दुनिया से चली गई मां भी ,
बचपन कहां अब बुढ़ापा है ,
नहीं उस गली गांव से नाता है।

क्या हुआ क्यों हुआ को छोड़ो - ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     क्या हुआ क्यों हुआ को छोड़ो - ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

        जो लोग हमेशा अनुचित कार्यों को अनदेखा करते रहे , शायद अब उनको समझ आये कि बुराई को शुरुआत में ही मिटाया जाना चाहिए। निप दि ईविल इन दि बड। बात महिलाओं के साथ अपराध तक सिमित नहीं है। समाज के हर भाग में अनुचित ढंग से काम करने पर विरोध नहीं जताना , उसको अनदेखा करते जाना , और आखिर में समाज का उसे स्वीकार कर लेना , सब तो गलत है। मैंने जब भी किसी भी बारे खुलकर विरोध किया कुछ समझदार कहलाने वाले लोगों ने हर तरह से हतोत्साहित किया। आप इस तरह से तो किसी संगठन किसी संस्था में नहीं टिक सकते , हां नहीं रहना जहां करनी और कथनी में विरोधभास हो। आप दावा कुछ करें और वास्तव में कुछ और ही मकसद हो तो उसे समर्थन देना गलत को बढ़ावा देना होगा। 
अभी भी जाग जाओ , समाजसेवा धर्म और तमाम बुद्धिजीवी लोगों के काम , शिक्षा स्वास्थ्य सेवा और देश का प्रशासन तक कोई निजि स्वार्थ साधने की जगह नहीं हैं। मानवीय संवेदनाओं और नैतिक मूल्यों को छोड़ अपनी आमदनी , अपने स्वार्थ , नाम शोहरत हासिल करने को इनका दुरूपयोग नहीं किया जाना चाहिए। हर दिन देश इक बेहद भयानक डरावने भविष्य की तरफ जाता लगता है और हम खुद को देशभक्त कहने वाले खामोश हैं कुछ करना तो क्या बोलते तक नहीं हैं। इन सभी बातों ने हालत इस हद तक पहुंचा दी है। आजकल जो हो रहा है उसके लिए सरकारों अधिकारीयों और कानून और न्याय व्यवस्था के दोषी होने के साथ गंदी राजनीति और हमारे चुप चाप अनदेखा करने का भी हाथ है। बस अब अंत होना चाहिए।

Saturday, 14 April 2018

रास्ता अंधे सबको दिखा रहे ( समाज और सरकारी संस्थाओं की वास्विकता ) डॉ लोक सेतिया

                रास्ता अंधे सबको दिखा रहे 

      ( समाज और सरकारी संस्थाओं की वास्विकता ) डॉ लोक सेतिया

      सब से पहले साफ़ करना चाहता हूं कि इस आलेख का एक ही मकसद है खुद को अपने समाज को अपनी सरकार को प्रशासन को समाजिक धार्मिक संस्थाओं को वास्तविकता बताना , आलोचना करने के लिए आलोचना करना कदापि नहीं और न ही किसी व्यक्ति या संस्था पर आक्षेप ही है। अभी की इक घटना से शुरआत करना सही होगा क्योंकि इस से सभी की आंखे खुल सकती हैं। मगर उनकी नहीं जो वास्तव में गंधारी की तरह आंखों पर पट्टी बांधे हुए हैं। महाभारत की बात नहीं करनी मगर सोचता हूं अगर किसी औरत का पति अंधा हो तो उसे अपनी आंखे खुली रखनी चाहिएं उसकी सहायता को या फिर खुद को खुद को अंधेरों में कैद कर लेना चाहिए। 
         खबर पढ़कर मन विचलित हुआ कि बलात्कार का विरोध करने को कैंडल मार्च में किसी महिला के साथ अनुचित आचरण किया गया। यही इस समाज का सच है जो खुद गंदी मानसिकता वाले हैं वो दूसरों को गलत बता खुद अपने गिरेबान में नहीं झांकते हैं। आज से नहीं अन्ना हज़ारे के आंदोलन में भी देखा रिश्वतखोर लोग मंच से भाषण देते रहे। मैं जयप्रकाशनारायण जी के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन का साक्षी रहा हूं और जानता  हूं कि तब जो लोग शामिल थे बाद में सत्ता मिलते ही कैसे साबित हुए। आज भी लोग किसी भी काम में समाजिक सुधार करने को या समाज की सेवा करने को नहीं बल्कि उसको सीढ़ी बनाकर अपने स्वार्थ सिद्ध करने को शामिल होते हैं। कुछ लोग जो किसी के सुख दुःख में शामिल नहीं होते समय का अभाव का बहाना होता है वही सरकारी विभाग की बनाई संस्था में सदस्य बनने को सब कुछ करते हैं और बाद में अधिकारीयों की हाज़िरी भी लगाते हैं। उन्हें अपने नाम के साथ लिखवाना होता है अमुक अमुक की समिति का सदस्य है। 

                                  उलटी गंगा बहाना

      पहले समझना होगा कि सरकार या कोई विभाग या अधिकारी जब कोई समिति बनाता है तो उसका घोषित मकसद क्या होता है। दावा किया जाता है कि जो लोग सरकारी अधिकारी से मिलने में डरते हैं या खुद विभाग में जाकर शिकायत नहीं करना चाहते उनसे ये समिति खुद मिलकर सहयोग कर सकती है और उनकी बात विभाग तक पहुंचा सकती है। मगर ये लोग कभी आम लोगों के पास जाकर नहीं पूछते कि आपको कोई समस्या या परेशानी हो तो हमें बताओ हम आपकी बात पहुंचा सकते हैं। उल्टा ये लोग चाटुकार बनकर जब किसी आम नागरिक ने किसी विभाग से कोई शिकायत की हो या कोई जानकारी दी हो गलत काम होने की तब उस विभाग के पैरोकार बनकर उस से कहते हैं हमें बताओ क्या बात है। ताकि उस विभाग की बातों पर परदा डालने को उस व्यक्ति से लिखवा सकें सब ठीक है बिना कुछ भी ठीक हुए। समिति जनता की बात की है या सरकारी विभाग और अधिकारी की बचाव की। मगर इन में शामिल लोगों को इन बातों का मतलब नहीं , उन्हें तो अपने नाम के साथ समिति का सदस्य होने का फायदा उठाना होता है समाज में ही नहीं सरकारी कामकाज में भी। उनके पर कोई अधिकार नहीं आपकी समस्या के हल का उनका काम डाकिये की तरह आपकी चिट्ठी ले जाने लाने का है। मगर डाकिये बहुत भले लोग हुआ करते थे जो सब के सुख दुःख में शामिल होते थे , अब तो डाकिया खत समय पर दे जाता है तो उपकार करता है। 

                   कुछ पुरानी संस्थाओं की असली बातें

      मुझे एक लेखक को अपनी जाति की नहीं सबकी बात करनी चाहिए , फिर भी कई साल पहले इक संस्था का गठन किया ताकि समाज में बुराइयों को भेद भाव को मिटाने का काम किया जाये। मगर कुछ ही दिन में किसी को नाम शोहरत और रुतबा पाना था इसलिए असली मकसद छोड़ बाकी सब काम किये जाने लगे तो किनारा कर लिया। आज भी बहुत लोग उस में हैं तो किसी संस्था की सम्पति के अघोषित मालिक बनने की खातिर या तमगा लगा सही गलत की बात को दरकिनार करने को। धार्मिक काम का नाम रखकर कारोबारी तरीके अपनाना तो और भी अनुचित है। शाकाहारी भोजनालय नाम और खाते खिलाते सब कुछ तो ये विश्वास और भरोसे को तोडना है। 
                 कुछ साल पहले इक मंदिर की सभा के अध्यक्ष बनने की खबर पढ़कर उन मित्र से पूछा कि आप तो भगवान को नहीं मानते और नास्तिकता की बातें करते हैं फिर आप इस में कैसे शामिल हैं। कहने लगे कल को राजनीति करनी है तो धार्मिक होने का दिखावा करना पड़ता है। दो चार हज़ार में ये सौदा महंगा नहीं है। यकीन मानिये तमाम धार्मिक संस्थाओं सभाओं धर्मशालाओं स्कूलों अस्पतालों में यही हालत है। उन्हें किसी देवी देवता से मतलब नहीं , कुछ लोग मंदिर भी जाते हैं जब उस मंदिर के स्वामी जी आते हैं। मंदिर भगवान के नहीं इन्हीं लोगों के हैं और ऐसा सभी धर्मों में है मस्जिद गुरूद्वारे सब के मालिक हैं कुछ लोग। 
       इक बार इक और संस्था का गठन किया था , बदलाव की बात थी। फिर होने लगा कि महीने बाद मिल बैठ मस्ती की और इक पत्र लिख भेज दिया अधिकारी को , जनहित की बात मकसद नहीं था , कहा गया उनको मालूम होना चाहिए हम लोग संगठित हैं और हम जब बड़े अधिकारी के दफ्तर जाएं तो आदर से अंदर बैठ उनके साथ अख़बार वालों की तरह चाय पकोड़े या ठंडा पीकर शान बढ़ाएं। 
                                       अंत में कुछ शेर :-

            रास्ता अंधे सबको दिखा रहे , वो नया कीर्तिमान हैं बना रहे। 

            सुन रहे बहरे भी बड़े ध्यान से , गीत मधुर गूंगे मिलकर गा रहे। 

दुष्यंत का शेर भी :- यहां दरख्तों की छांव में धूप लगती है , चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए।


Thursday, 12 April 2018

आओ यारो रल मिल गलां करिये - डॉ लोक सेतिया

     आओ यारो रल मिल गलां करिये - डॉ लोक सेतिया

पहली गल कि सारी गलती मेरी नहीं , जे कर मेरी वी ए की मैं तेरी नहीं। 

ओ कहंदा ए प्यार ते जंग विच जायज़ है सब , मैं केहनीं हां ओहो हेरा फेरी नहीं। 

कितना डर दा धोखा जांदा नींदर नू , तू की जांणे तेरे घर ज्यूं बेरी नहीं।

मेरी मन्न ते अपणे अपणे राह पईए , की केहनां ऐं जिंनी रही वधेरी नहीं। 

     कल किसी ने पंजाबी की ये रचना भेजी विडिओ में , मुझे अच्छी भी लगी और शिक्षाप्रद भी। शायद आपको मुहब्बत इश्क़ की बात लगेगी , मगर नहीं मुझे ये चार शेर ज़िंदगी के हर मुकाम में सही सबक लगे। चलो देश की घर की दोस्ती की रिश्तों की सभी की बात करते हैं इसी को लेकर। आपको क्या लगता है देश की सब से बड़ी समस्या गरीबी भूख बेरोज़गारी आपसी टकराव है। नहीं ये सब ठीक होना संभव है अगर जिनको ये सब करना हैं वो ईमानदारी से करना चाहें। जब सरकारी प्रशासन अपने काम अपने आप करता है तो गलत होने की संभावना रहती ही नहीं। बेशक सत्तर साल में सरकार किसी दल किसी नेता की रही हो अगर कार्यपालिका ने अपना फ़र्ज़ निभाया होता तो देश की समस्याएं हल हो गई होती। आप नेताओं की गलतियां समझते हो जो वास्तविकता भी है मगर शायद आपने विचार किया ही नहीं कि कोई भी नेता बिना अधिकारीयों के कुछ भी नहीं कर सकता , वो चाहे विकास हो या फिर घोटाले। ये हैरानी की बात हो सकती है मगर सच है विदेशी राज में यही अधिकारी सरकारी अमला ईमानदारी से काम किया करता था , क्यों देश की आज़ादी के बाद वही लोग ईमानदार नहीं रहे और कभी नौकर और गुलाम बन कर काम करने वाले आज़ादी का अधिकार मिलते ही खुद को शासक और मालिक समझने लगे। यहां फिर वही पहली बात कि सारी गलती उनकी भी नहीं , हम लोग ही उनको सलाम करने और जनाब हज़ूर साहब कहने लगे। उनको लगा कल तक विदेशी लोगों के गुलाम थे अब हमारे हैं। सब से पहला काम हमने उनसे अपने कर्तव्य निभाने की बात करनी थी और जो सही नहीं किया उसका हिसाब मांगना था , लेकिन हमारी मानसिकता गुलामी की रही और अपने अधिकार नहीं खैरात मांगते रहे। 
                 अब नेताओं की बात तो उन्होंने सत्ता हासिल करने को हर हथकंडा अपनाना सही मान लिया और हमने कभी उनसे नहीं सवाल किया कि लोकशाही में लोकलाज की उपेक्षा करने की हेरा फेरी नहीं। वो हमें अपने स्वार्थ में बांटते रहे और हम उनकी चाल में फंसते रहे। आज भी वही लोग जो आज़ादी के समय देश के विभाजन के विरोध की बात करते हैं आज भी , वास्तव में देश को धर्म के नाम पर और तमाम तरह की भेदभाव की दीवारें खड़ी कर बांटना चाहते हैं। जिनकी निष्ठा देश की जनता तो क्या अपने दल के लिए भी नहीं और अभी भी उस संगठन के लिए वफादारी निभाते हैं जो सामने आकर राजनीति नहीं करती और पीछे से कठपुतलियां नचवाती है। देशभक्ति केवल भाषण नहीं होते हैं , जब आप सत्ता में आसीन हैं तो आपको सभी देशवासिओं को एक समान न्याय दिलवाना चाहिए जिसकी शपथ ली थी आपने संविधान के अनुसार। खेद है सभी नेता वही पाठ औरों को पढ़ाना चाहते जिसे खुद याद नहीं रखते। 
          अगली बात , जिसके पांव न फ़टी बुआई , वो क्या जाने पीर पराई। ये नेता और अधिकारी जो गरीब जनता के धन से शाही ठाठ बाठ से रहते हैं उनको क्या पता लोग बदहाली में कैसे जीते हैं। अंत में बस बहुत हो गया गंदी झूठ की राजनीति और सरकारी प्रशासन की मनमानी से देश को रसातल तक ले आये। अब अपने सही रास्ते पर आ जाओ। अगर इसी तरह हालत बिगड़ते रहे तो देश ही सही सलामत नहीं बचेगा तब आप भी कहां शासन करोगे। ये लूट ये छल कपट और केवल चुनावी जीत हार की राजनीती देश सेवा नहीं कहला सकती है। अभी पुराने लोगों के इतिहास को पलटना चाहते हो मगर शायद भविष्य में जो इतिहास लिखा जायेगा उस में आप सभी अपराधी ठहराए जाओगे जिन्होंने स्वार्थ में देश का बदहाली में पहुंचा दिया है। आखिरी बात हम लोग भी अपने निजि स्वार्थ के इलावा भी देश और समाज के लिए कुछ सार्थक करें। अपना देश है कोई बाहरी लोग आकर नहीं उसको सही करने वाले।

उपवास भी उपहास भी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

          उपवास भी उपहास भी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

  सरकार भी उपवास पर , विपक्षी दल भी उपवास पर। जनता का उपवास हमेशा से रहा है। ज़रूर किसी डॉक्टर या वैद ने सलाह दी होगी। बहुत खा चुके पहले वाले भी छप्पन भोग अब छोले भठूरे खा रहे हैं। आप भी न खाऊंगा न खाने दूंगा कहकर आये थे , और कितना खाओगे चार साल में जनता के धन पर खूब ऐश आराम किया अब एक दिन तो उपवास रख लो। सेहत के लिए अच्छा है। उपवास की परिभाषा कभी किसी को समझ नहीं आई। कोई फलाहार करता है कोई नमक नहीं खाता तो कोई पानी की एक बूंद तक नहीं पीता है। पंडित जी बताया करते हैं किस दिन का उपवास क्या फल देता है। इक बात पक्की तरह तय है कि हर उपवास फलदायी होता है। मैंने भी कभी मंगलवार के उपवास रखे थे और जब शाम को एक बार खाना होता था तो परांठे और मलाई में शक़्कर मिलाकर खूब पसंद से भरपेट खाता था , नतीजा मेरा वज़न और अधिक हो गया तो बंद करना पड़ा। मुझे समझाया गया कि हर दिन थोड़ा खाना उचित है , न एक दिन अधिक खाना सही है न ही एक दिन उपवास रखना ही। लोग उपवास अकारण नहीं रखते हैं। महिलाएं पति की लंबी आयु चाहती हैं ताकि खुद सदा सुहागिन रहें। सत्ता की कुर्सी की बात अलग है वो कभी विधवा नहीं रहती , इक शासक जाता है तो दूसरा उस पर बैठ कुर्सीपति हो जाता है।
     नेता कभी भूखे नहीं रहते मगर उनकी भूख कभी खत्म भी नहीं होती है। इनकी भूख रोटी की नहीं होती है सत्ता की शासन की भूख होती है। सत्ता मिलते ही सब कुछ खा जाते हैं चारा खाते हैं दलाली खाते हैं और इंसान और इंसानियत तक को बिना डकार लिए हज़्म कर जाते हैं। सब से पहले सच को खा जाते हैं ज़िंदा ही। कोई भी उपवास हो उस में सत्य का आचरण और झूठ नहीं बोलना ज़रूरी होता है। सत्ताधारी दल में सभी को इस बात की चिंता है कि उनका महान नेता कहीं उपवास में अपनी झूठ बोलने की कला को छोड़ सच नहीं बोलने लगे। इसी डर से इक मुंहलगे ने चेतावनी की तरह कह ही दिया सरकार आप उपवास नहीं रखें तो चलेगा क्योंकि सब जानते हैं आप कितने बड़े झूठे हैं और उपवास में झूठ नहीं बोलना होता है। हंस दिये नेता जी , कहने लगे तुम लोग हर बात को सीरियसली ले लेते हो। हमारा उपवास खुद ही झूठा है तो झूठ बोलने नहीं बोलने से क्या अंतर होगा। आज लोकतंत्र को खतरे की बात हम कर रहे हैं जबकि लोकतंत्र को खतरा कभी विपक्षी दलों से नहीं होता है। सत्ताधारी सत्ता नहीं छोड़ना चाहता तभी खतरा होता है। मुंहलगे ने कहा मुझे यही तो डर था जो सच होता लग रहा है जो आप सच बोल रहे हैं कि डेमोक्रेसी को खतरा आपसे है। नेता जी फिर हंस दिए , बोले तुम को इतना भी नहीं मालूम मैं जनता हूं किस जगह झूठ को सच कैसे साबित करना है। उपवास राजनीति में छल ही होता है , हमारे लिए वास्तविक उपवास तभी होता है जब हम सत्ता के भूखे होते हैं। तुमने स्वच्छ भारत अभियान नहीं देखा , हम झाड़ू लेकर सफाई करते दिखाई दिए थे तो क्या हम वास्तव में गंदगी साफ करने लगे थे। हमारी हर योजना यही है बिना कुछ किये सब कर दिया दिखलाने वाली।
               अभी जनता को समझाना है उसे भी भूखे रहने का मज़ा लेना चाहिए हमारी तरह। अभी हमारी ऐप बनी नहीं है जिस से सभी को रोटी स्मार्ट फोन पर खुद डाउनलोड करते मिल सकेगी। तब तक लोग उपवास रख सकते हैं। मैंने पहले भूल से पचास दिन मांगे थे सब ठीक करने को , मगर इस बार पचास साल की बात कहनी है। पहले दूसरे दल को पचास साल मिले अब हमारी बारी है। मुंहबोले का मुंह खुला रह गया। कल तक 2022 की बात करते थे अब पचास साल की करते हैं , जाने क्या इरादा है जनाब का। शायद आधे घंटे के उपवास में भूख ने सोचने समझने का संतुलन बिगाड़ दिया है। उसकी मन की बात समझ गए मन की बात करने वाले , कहने लगे ये सब तो हंसी मज़ाक की बात है तुम चिंता नहीं करो। ये उपवास भी उपहास है जान कर वो खिसिया कर हंसने लगे।

Friday, 6 April 2018

कहने को बहुत है अगर कहने पे आए हम ( चिंतन ) लोक सेतिया

कहने को बहुत है अगर कहने पे आए हम ( चिंतन ) लोक सेतिया

आजकल अख़बार टीवी चैनल से लेकर सोशल मीडिया तक हर दिन कुछ नया चर्चा में होता है। ख़बरों में रहना चर्चा में रहना आजकल उतना भी कठिन नहीं रह गया है। मशहूर होने की चाहत सभी की रहती है। कभी ये भी कहते थे बदनाम हुए तो क्या नाम तो हो गया। हालत ये हो गई है कि मशहूर लोग गली गली मिलते हैं और होता ये भी है कि खुद अपने मुंह से मियां मिठू बन सवाल करते हैं आप मुझे नहीं पहचानते मैं वही हूं कल जिसकी खबर टीवी पर थी। अभी भी पुराने लोग अखबार में अपनी छपी फोटो को दिखाया करते हैं अपनी फाइल खोलकर इतने साल तक संभाले रखा है। आजकल सेल्फी ने ऐसा सितम ढाया है कि लोग देश के पी एम के साथ फोटो में दिखाई देते हैं तो इसी बात पर हंगामा हो जाता है कि कैसे कैसे लोग किस किस के कितने करीब हैं। इनाम खिताब तमगे इस तरह आम हो गए हैं जैसे फोन की हालत है , कभी बेसिक फोन भी किसी किसी के घर होता था , फिर आम मोबाइल फोन कम लोग रख सकते थे क्योंकि उनका खर्चा बहुत महंगा हुआ करता था , आजकल महंगे से महंगा स्मार्ट फोन हर कोई रख सकता है काल दर और डाटा इतना सस्ता हो गया है। लेकिन आजकल मोबाइल फोन होने से किसी का रुतबा नहीं बढ़ता है। ये इक सामाजिक विज्ञान की बात है की जो वस्तु बहुतियात में हो जाती है उसकी कीमत चाहे जो भी हो कदर कम हो जाती है। हर किसी के पास महंगी कार , हर गली मुहल्ले में कोई लेखक कोई खबर बनाने वाला मिलते हैं। इक ज़माना था बी ए की डिग्री होना शान की बात थी , उच्च शिक्षा हासिल करने वाले लोग ही कोट पेंट पहन टाई लगाया करते थे। कीमत सामान की बढ़ती जा रही है आदमी की कम होती जा रही है , हर आम आदमी अपने को ख़ास मानता है समझता है और साबित करता है। ये ऐसा काम है जिस की खातिर सब कुछ भी करने को तैयार हैं। भला चंगा आदमी तलवे चाटता है किसी अधिकारी नेता या हर उस के जिस से कोई तमगा हासिल हो सकता है जो उसे आम से ख़ास बना सकता हो। संभावनाओं की कोई कमी नहीं है। आपको किसी समिति का सदस्य मनोनित किया जा सकता चंदा लेकर तो कोई अमीर राज्य सभा की सदस्यता खरीद लेता है।
              गोरे शासक खिताब देने का ऐसा चलन बना गए कि हम आज़ादी के बाद भी उन्हीं की निति पर चलते हैं। शहर से राज्य की राजधानी से देश की राजधानी तक आये दिन इनाम पुरुस्कार और तमगे खिताब बंटते हैं। सैनिक जान पर खेल कर सीने पर मेडल सजाया करते हैं और बहुत को मरने के बाद भी मेडल मिलते हैं जिनकी शान ही अलग है। मगर इधर हर सरकारी अधिकारी को उत्कृष्ट सेवा के लिए और तमाम उन कामों के लिए जिन में ईमानदारी और समाज सेवा शामिल हैं सम्मानित किया जाता है जो वास्तव में उन्होंने कभी नहीं किया होता है। जो अपना कर्तव्य नहीं निभाते रहे और पद का दुरूपयोग कर रिश्वत खाते रहे उनको भी सम्मानित होते देखा है। साहित्य में तो रेवड़ियां हमेशा बंटती रही हैं और बीस पचास किताबें छपा खुद को इतिहासकार साहित्यकार कहलाने वाले देश और समाज को कुछ भी सार्थक नहीं दे पाते। कोई राह नहीं दिखला सकते कोई शमां नहीं जला सकते। जिस को पढ़कर पढ़ने वाला कुछ कर दिखाने की सोच भीतर से अनुभव करे ऐसी कोई बात लगती ही नहीं। अधिकतर शब्दों का बदलाव मात्र है नया विचार नई ऊर्जा नहीं है लेखन में। कभी लोग खादी के कपड़े पहन कर भी शान से रहते थे , इधर ब्रांडेड पहन कर भी चिंता रहती है किसी और की शान मुझसे अधिक नहीं हो जाये। इंसान की नहीं कपड़ों की शान है। बड़े से बड़े नेता को भी अपने छोटेपन का भीतर एक एहसास रहता है क्योंकि कथनी और करनी में विरोधाभास कब सामने आ जाये क्या पता। आदर्शवादी होने की बात गाली लगती है जब आपके संबंध तमाम अपरदियों और बदमाशों के साथ हों , सत्ता की खातिर दागदार नेताओं को गले लगाकर आप देश भक्त नहीं बन सकते। आपको चंदा किस किस से मिला किसी को नहीं बताते और क्यों मिला ये बता दें तो सारी प्रतिष्ठा दांव पर लग जायगी।
      जब ऐसे बाज़ार से कीमत देकर तमगे लाओगे तो क्या कहलाओगे। ऊंचाई पर चढ़कर और छोटे हो जाओगे। बहुत झूठ का सामान जमा कर लिया है झूठी शान बढ़ाने को , फिर भी हवस रहती है अभी और भी पाने को। मृगतृष्णा का शिकार होकर चमकती रेत को पानी समझ भागते जाते हैं अंजाम मालूम है। अभी कुछ दिन पहले किसी के शव को तिरंगे में लपेटने पर बहस करने लगे कुछ लोग , जब उनको पदम् पुरूस्कार मिलते हैं तब कहां थे। किसी अभिनेता को जुर्म की सज़ा सुनाई जाती है तो शोर मच जाता है , ये कैसा समाज है कैसा मीडिया है। अपराध भी आम ख़ास होने लगे हैं। मानसिक दिवालियापन है हर पत्थर को खुदा समझ लेते हैं , समाज को देश को क्या दिया है कुछ मशहूर नाम वालों ने। अपने लिए धन कमाया तो क्या बड़ी बात की। महान वो कहलाते थे जो अपना सर्वस्व देश पर समाज पर लुटवाते थे। आज अगर आप देश में बड़े बड़े ईनाम सम्मान पुरूस्कार और तमगों वा प्रशस्तिपत्र प्रमाणपत्र वालों की सूचि बनाओ तो संख्या करोड़ों की होगी लाखों की नहीं। आजकल तो ये भी महान कार्य बन गया है कि किस की कितनी बड़ी जागीर है भले जागीर बनाई ज़मीर बेचकर ही हो।
               कभी कभी सोचता हूं जैसे भारत देश में बताया जाता है कि छतीस करोड़ देवी देवता हैं , और ये सभी वरदान देते हैं मनोकामना पूरी किया करते हैं सैकड़ों सालों से नहीं युगों युगों से। फिर भी इतनी लंबी लंबी कतारें लगी हैं भूखों की बेबसों की , ये भगवान के समान समझे जाने वाले और बाकी सभी धर्मों वाले भी खुद आलिशान भवनों में बड़ी शान से रहते हैं और भक्त जन दरिद्र हैं। क्या उधर भी भारत सरकार जैसी हालत है अधिकारी नेता ठाठ बाठ से रहते हैं और जनता भूखी रहती है। सोचता हूं कि जिस देश में इतने भरत रत्न और जाने क्या क्या हैं समाज की देश की सेवा करने वाले करोड़ों की संख्या है उन्होंने किया क्या है जो अभी भी देश की हालत बदहाली की है। यहां एक एक साधु संत ने समाज को बदल दिया था , नानक कबीर विवेकानंद से गाँधी विनोबा भावे तक सब जीवन भर यही करते रहे और बहुत सारी कुरीतियों का अंत हुआ या फिर उन में बहुत कमी आई उनके प्रयास से। तब इतने देशभक्त नेता अधिकारी और अन्य तमाम लोग जो कहलाते हैं युग के महान नायक हैं उनका किया हुआ दिखाई क्यों नहीं देता देश की दशा और समाज में अच्छाई के रूप में। अगर इन सब से देश और समाज का कोई भला हुआ नहीं है तो किसलिए हम लोग उनकी जयजयकार करते हैं उनकी बढ़ाई की बातें करते हैं उनका गुणगान करते हैं।
          सब जानते हैं इक दीपक जलाने से दूर तक रौशनी हो जाती है। ये सब अगर उजाला बांटने वाले हैं तो फिर अंधकार ही अंधकार क्यों छाया हुआ है। धर्म उपदेशक बहुत हैं धार्मिक आयोजन भी हर दिन हर जगह होते हैं फिर धर्म कहीं नज़र क्यों नहीं आता। पाप ही पाप है अधर्म ही अधर्म है , किसी को किसी पर भरोसा नहीं है। जिस का बस चलता है वही चोर बन जाता है ईमानदारी आचरण में नहीं है जिसे बेईमानी का मौका नहीं मिलता वही ईमानदार है मज़बूरी से। इस सब की सीमा कोई नहीं कहां तक चर्चा की जाये। आखिर में इक पुरानी बात याद आई है। समझाया जाता था , धन गया तो समझो कुछ भी नहीं गया , स्वास्थ्य गया तो समझो कुछ गया , मगर चरित्र गया तो समझो सब कुछ गया। आज चरित्र की कीमत ही नहीं और धन तो जीवन का मकसद बन गया है रही स्वस्थ्य की बात तो हमारा समाज ही बीमार है। किस किस रोग की दवा करें किस किस अंग को ठीक करें , सब कुछ तो रोगग्रस्त है।
                
           

Thursday, 5 April 2018

ग़ज़ल 224 ( हमीं नहीं थे गलत , न तुम हमेशा सही , मिला खुदा जो कभी , सवाल करना यही ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

ग़ज़ल 224  ( हमीं नहीं थे गलत , न तुम हमेशा सही , मिला खुदा जो कभी , सवाल करना यही ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "


Wednesday, 4 April 2018

क्या सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां यही है - डॉ लोक सेतिया

   क्या सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां यही है - डॉ लोक सेतिया 

        शायद इस से बड़ा झूठ कोई नहीं है , अगर यही अच्छा है तो बुरा क्या है। अक्सर किसी से चालीस साल पुरानी घटना इमरजेंसी की और उस से पहले के शासनकाल की बात पूछते हैं तो तमाम मेरी उम्र के लोग जिनके सामने ये सब हुआ था नहीं बता पाते कुछ भी। लोकनायक जयप्रकाशनारायण किसी को याद नहीं है उस काल की फ़िल्में गीत याद हैं। मधुबाला याद है लाल बहादुर याद नहीं। सवाल किसी नेता की याद का नहीं है सवाल ये है कि खुद अपने देश और समाज को लेकर हम कितने संवेदनशील हैं। कहने को किताबी शिक्षा से लेकर गूगल पर सब कुछ समझने और सोशल मीडिया पर उपदेश देने वाले आधुनिक ज्ञानी लोग हैं , मगर इतिहास तो छोड़ो जीवन की समस्याओं पर जानकारी कुछ भी नहीं रखते हैं। मगर बहस देश की समाज की हर समस्या पर करते हैं। वो सब जो वास्तव में मानते हैं हमारा देश महान है मुझे बतलाएं और दिखलाएं। मुझे देखना है सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां। मुझे जो नज़र आता है पहले उसकी बात करता हूं। 
                 हम किसी खेल में जीत हार से खुश और दुखी होने वाले , कभी कभी विशेष दिन देशभक्ति के गीत गाने को और पतंग उड़ाने को देश से प्यार बताने वाले , अपने ही देश की बदहाली को खामोश होकर देखते हैं और मुझे क्या सोचते हैं। हम नागरिक आज़ादी का मतलब मनमानी करने की छूट समझते हैं और किसी कानून का पालन करना और समाज के नैतिक मूल्यों की कदर करना ज़रूरी ही नहीं समझते। देश क्या है केवल ज़मीन नहीं होता है देश , देश एक सौ पचीस करोड़ नागरिक हैं और देश का संविधान हमारा सब से पहला धर्मग्रंथ है। अपने स्वार्थ में संविधान की भावना का निरादर करना और खुद अपने ही देश के बाकी लोगों के समानता के अधिकारों से खिलवाड़ करना देश के साथ प्रेम कदापि नहीं हो सकता है। किसी को भी दूसरों की आज़ादी उनके मौलिक अधिकारों के हनन की अनुमति नहीं दी जा सकती। ये तमाम लोग जो अपनी मांगें उचित या अनुचित मनवाने के लिए कानून हाथ में लेकर सब नागरिकों को बंधक बनाते हैं हड़ताल बंद की आड़ लेकर उनको आगजनी रास्ता रोकने जैसे अपराध करने का हक संविधान नहीं देता है। संविधान सब को बराबरी का अधिकार देता है और किसी को भी दूसरों की आज़ादी और अधिकार छीनने की अनुमति नहीं मिल सकती है। क्या भीड़तंत्र और अराजकता होना देश को सारे जहां से अच्छा बनाता है।
        राजनेता अपनी सत्ता की हवस पूरी करने के लिए , वोट बैंक की गंदी राजनीति करने के लिए , नफरत की आग फैलाते हैं और जाति धर्म अगड़े पिछड़े के नाम पर विभाजित करते हैं लोगों को। ऐसे स्वार्थी लोग क्या देशभक्त कहला सकते हैं। खुद अपने पर करोड़ों रूपये जनता के धन से बर्बाद करना क्या इसे जनता की देश की सेवा कह सकते हैं। दल कोई भी हो देश की सम्पति और धन का दुरूपयोग करना देश को लूटना इनकी आदत बन गई है। सफ़ेद हाथी बन गए हैं ये सब , इनको पालते पालते जनता अपना सब लुटा चुकी है। और अगर सवा सौ करोड़ की आबादी में कुछ हज़ार लोग भी हम ऐसे नहीं चुन सकते जिन्हें अपने लिए गाड़ी बंगला और तमाम सुविधाएं नहीं चाहिएं और जो ईमानदारी से बिना अपने लिए कुछ भी चाहे देश और जनता की सेवा करना चाहते हैं तो फिर देश की भलाई कैसे हो सकती है और सारे जहां से अच्छा देश अपना किस तरह बन सकता है।
               अंत में सब से महत्वपूर्ण बात। अदालत अपना काम करती है और हर बार सजग रहती है। सेना भी रात दिन अपना कर्तव्य निभाती है। मगर कार्यपालिका को अभी तक अपना फ़र्ज़ समझना नहीं आया अन्यथा देश की सभी समस्याएं कब की समाप्त हो जाती अन्य तमाम देशों की तरह जो हमारे साथ या बाद में आज़ाद हुए हैं। सब से बड़ी समस्या यही प्रशासन है जो आज तक भी खुद को विदेशी राज के समय की तरह शासक मानता है और खुद अपने आप कुछ भी नहीं करता। रिश्वत यही लेता है , सत्ताधारी नेताओं को उनके हर अनुचित काम में यही साथ देता है और सरकार में मंत्री बने लोगों की चाटुकारिता कर खुद मनमानी करता है। अगर अधिकारी नहीं शामिल हों तो कोई भी नेता किसी भी पद पर बैठ सत्ता का दुरूपयोग नहीं कर सकता है। जनता को आम नागरिक को अन्याय की या किसी भी समस्या की शिकायत करनी ही नहीं पड़ती अगर ये लोग अपना काम मुस्तैदी से ईमानदारी से और देश के लिए वफादारी और संविधान के लिए सच्ची निष्ठा से किया करते। ये सब से बड़ी समस्या है। इक और हैं जो लिखते हैं अख़बार टीवी चैनलों पर पत्रकारिता की बातें करते हैं उनको भी इक सजग प्रहरी की तरह काम करना था चौकीदारी करनी थी जो खुद थानेदार बन गए और न्यायधीश भी। मुझे सब तरफ अंधेरा दिखाई देता है कहीं कोई रौशनी नज़र नहीं आती। केवल नारे लगाने से भारत माता की जय बोलने से और देशभक्ति के गीत गाने से कुछ भी हो सकता है।

Tuesday, 3 April 2018

अंदोलन कैसे करें सीखने का कॉलेज ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   अंदोलन कैसे करें सीखने का कॉलेज ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      बहुत काम लोग होते हैं जो कुछ नया तलाश करते हैं , बहुत लोग से पुराने किसी काम को फिर से आधुनिक रूप में सामने लाते हैं और लोग समझते हैं ये इसी की खोज है। मगर ऐसे चतुर लोग पुराने पर नया लेबल लगा खूब माल बनाते हैं। किसी ने पहले नहीं सोचा था कि योग करना सिखाना भी करोड़ों का धंधा हो सकता है। इसी तरह धर्म समाज सेवा और निशुल्क शिक्षा और ईलाज भी कमाई का साधन बनाया हुआ है तमाम चतुर लोगों ने। मुझे अब समझ आ रहा है भविष्य में किस क्षेत्र में अधिकतम संभावनाएं हो सकती हैं। आजकल आंदोलन आये दिन होते हैं मगर कोई अंदोलन किस तरह करे कोई इस की शिक्षा नहीं देता है। छात्रों के अंदोलन होते हैं मगर उनकी इक सीमा है और अंदोलन बिना स्कूल कॉलेज में दाखिल हुए भी हो सकते हैं ये कोई पढ़े लिखों का विशेष अधिकार नहीं है। मुझे चालीस साल हो गए हैं आंदोलनों को देखते हुए। इतना अनुभव काफी होना चाहिए खुद को शिक्षक घोषित करने के लिए। इसलिए मैंने राज्य में ही नहीं देश भर में पहला स्कूल कॉलेज खोलने का फैसला किया है जो सभी को बिना भेदभाव के अंदोलन करने की पढ़ाई पढ़ाया करेगा। 
                  आप चाहे कोई भी शिक्षा पा चुके हों या पाना चाहते हों , आपको नौकरी करनी हो या कारोबार अथवा नेतागिरी ही करनी हो , हर दशा में अंदोलन की समझ अनिवार्य है। अंदोलन करने वाले महात्मा गांधी , लोकनायक जयप्रकाशनारायण और आधुनिक काल में अन्ना जी तक खुद कोई भी कुर्सी पर नहीं बैठा मगर उनके आंदोलनों ने कितने मुख्य मंत्री और बड़े बड़े पदों पर बैठने वाले लोग दिए हैं। हम सब को इसकी पढ़ाई करनी ही चाहिए। शिक्षा ही ऐसा धंधा है जिस में जो लोग डॉक्टर इंजिनीयर आईएएस आईपीएस नहीं बन सकते और किसी तरह से डिग्री हासिल कर लेते हैं वो शिक्षक बन कर पढ़ाने से खुद अपना स्कूल कॉलेज खोलने तक का काम का सकते हैं। बाज़ार से हर विषय में अधिकतम अंक पाने वाले बेकार पढ़े लिखे बेरोज़गारों को सस्ते दाम रखते हैं और पढ़ने वालों से सौ गुणा फीस वसूल करते हैं।
       लेकिन मुझे दो बातें पहले से कहनी हैं , भले बाद में इन बातों का कोई अर्थ नहीं रहे। पहली बात ये है कि मैं अपना घर बार छोड़ कर देशसेवा करने को ये काम करने आया हूं और सब को सबक सिखाना मेरे जीवन का मकसद है। समझ गए आप सबक सिखाने की बात। अब दूसरी ज़रूरी बात ये है कि मैं उनकी तरह नहीं हूं जो लोभ लालच में नकली और बेकार की पढ़ाई करवाते हैं , मुझे खुद अपने लिए कुछ नहीं चाहिए जो भी आमदनी होगी समाजसेवा पर खर्च करनी है। आप मेरे धंधे को समाजसेवा समझ सकते हैं। अभी मेरे स्कूल कॉलेज का नाम पेटेंट के लिए आवेदन भेजा है और पंजीकरण के बाद इसके अश्तिहार सब को दिखाई दिया करेंगे। सरकार का आभार जो फेक न्यूज़ की इजाज़त दे दी है अन्यथा मुझे भी कठिनाई हो सकती थी। आप मेरे धंधे में शामिल होकर खूब कमाई कर सकते हैं जिस के लिए आपको मेरी एजेंसी या शाखा अपने शहर में खोलने के लिए आवेदन भेजना होगा।
               हम केवल शांतिपूर्वक अंदोलन करने की शिक्षा देंगे , ऐसा घोषित किया जाना ज़रूरी है। इधर जब तक हिंसा नहीं हो अंदोलन हुआ की खबर तक नहीं छपती। हिंसा और लोगों को उकसाना भड़काना अब केवल राजनेताओं का काम नहीं रह गया है। टीवी चैनल हर घटना को बार बार दिखला कर ऐसा माहौल बना देते हैं कि राई भी पहाड़ बन जाती है। हम उन सभी एंकरों की सेवाएं भी लिया करेंगें उनके भड़काऊ अंदाज़ सीखने बेहद ज़रूरी हैं। नेताओं की तो शांति कायम रखने की अपील काफी होती हैं आग लगाने को। सब से पहले हम हर अन्दोलनकारी को अदालत का और कानून का आदर सम्मान करने की शपथ खाने के बाद जो चाहे करने की हिदायत देना चाहेंगे। फिर बेशक धारा 144 और कर्फ्यू की परवाह नहीं करें।

                       आंदोलन कौन कौन करते हैं ( भूमिका )

      जनता कभी अंदोलन नहीं करती है , जनता को ज़ुल्म सहने की आदत होती है और उसे आज़ादी और गुलामी में भेद करना नहीं आता है। किसी न किसी की जयजयकार करना उसकी ज़रूरत ठीक उसी तरह है जैसे कोई न कोई भगवान चाहिए बंदगी करने को। विपक्ष वाले अंदोलन तभी करते हैं जब पांच साल पूरे करने को होती है सरकार और चुनाव में जनता को अपने पक्ष में करना होता है। क्योंकि सत्ता से बाहर रहते आन्दोलन और सभाओं का आयोजन करना कठिन होता है। खुद सरकार को भी जब लगता है लोग खुश नहीं हैं तो धर्म और भेदभाव की दीवार खड़ी करने को अंदोलन की ज़रूरत होती है। मगर सब से अधिक अंदोलन करवाने के पीछे सत्ताधारी दल के असंतुष्ट लोग होते हैं जो विपक्षी नेताओं से लेकर तमाम संस्थाओं तक को उकसाते हैं और सरकार की कमियां बतला कर अंदोलन करने की सलाह देते हैं। मुझे मालूम है मेरे पास जो है उसका खरीदार कौन कौन है। इसलिए अपनी दुकान में हर खरीदार भगवान है। जिन को अंदोलन करवाना हो उनको एक सप्ताह पंद्रह दिन और महीने का क्रैश कोर्स भी करवाया जायेगा। पहले आओ पहले पाओ , इंतज़ार करते हुए नहीं पछताओ।    

Monday, 2 April 2018

जाकी रही भावना जैसी ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया

    जाकी रही भावना जैसी ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया

          इक अपना पक्ष है इक उनका पक्ष भी है। अपने को अपना सही लगता है उनका गलत लगता है , उनको खुद उनका सही लगता है और जो अपना है उनका नहीं हो सकता है गलत लगता है। तर्क दोनों के पास हैं निष्पक्षता से दोनों को आपत्ति है। सत्ता पक्ष का गठबंधन सफल होता है क्योंकि उसी में सब का पेट घर और तिजोरी भरती है। विपक्षी एकता हमेशा अधर में लटकती रहती है कभी सफल नहीं होती। जनता हमेशा टुकड़ों में बंटी रहती है और उसके टुकड़ों के भी टुकड़े होते रहते हैं। राजनेताओं में अपने अधिकारों पर अपने वेतन भत्तों पर और अपने लिए नियम कानून लागू होने पर आम सहमति बनते देर नहीं लगती। बात उनके अपराधों और चुनाव लड़ने की हो या महिला आरक्षण से अपने वर्चस्व की उनकी एकता देखते ही बनती है। वो आपस में विरोधी और दुश्मन लगते हैं मगर होते नहीं हैं वास्तव में इनमें गज़ब का भाईचारा है। अपने विरोधी को भी गले इस तरह मिलते हैं जैसे बिछुड़े हुए भाई और बचपन के दोस्त मिलते हैं। एकता की इस से अच्छी मिसाल कोई नहीं हो सकती , यही एकता कभी चोरों-डाकुओं में हुआ करती थी। सब अपने अपने इलाके के मालिक होते थे। 
                आजकल न्याय भी टीवी अख़बार वाले बताते हैं कि किस किस तरह का है , उनको ऐसा ज्ञान राजनेताओं से मिलता है। अगड़ों से अन्याय अलग है पिछड़ों से अलग। हिंसा भी दो तरह की है सरकारी हिंसा कानूनी है और आतकंवादी और उपदर्वी हिंसा और है। तर्क भी हैं टीवी चैनल पर बताते हैं अलगाववादी नेता आंतकवादी हिंसा पर खामोश रहते हैं और सेना और सुरक्षाबल आंतकवादी को मारते हैं तो वो बिलबिलाते हैं। इधर धर्म वाले दंगे करवाते हैं और गुनहगार भी सद्गुरु कहलाते हैं। सब लोग भीड़ बनकर कहर ढाते हैं और आगजनी और गुंडागर्दी को अपनी बात मनवाने का हथियार बनाते हैं। देश को आग लगा कर भी देशवासी कहलाते हैं अपने अपराध करने पर इतराते हैं। ये महान देश है जिस में कोई भारतवासी नहीं रहता है हिन्दु मुस्लिम सिख ईसाई रहते हैं। जाट पंजाबी बनिया पंडित तो हैं इक और भी सवर्ण-दलित की दीवार है। किसी का न्याय किसी पर अत्याचार है। ये व्यवस्था किस किस को सही करेगी जो खुद ही बीमार है। 
      हम सब खुदा के बंदे हैं मगर अपने अपने स्वार्थ में सब के सब ही अंधे हैं। हर कोई अपनी आंखों पर अपने रंग के शीशे वाला चश्मा लगाता है और भीड़ बनते ही इंसान हिंसक जानवर बन जाता है। खुद ज़ालिम की ज़ुल्म ढाता है फिर भी अपने साथ न्याय चाहता है। कोई नेता है जो केवल माफ़ी मांगकर जान बचाता है उसका आरोप लगाने में किसी का क्या जाता है। हर झूठ आजकल अटल सत्य कहलाता है। हम सोचते हैं और कहते हैं आगे बढ़ रहे हैं मगर अभी भी उल्टा सीधा इतिहास गढ़ रहे हैं। तमाम देश अपनी इतिहास की गलतियों को समझ सुधर रहे भविष्य की तरफ कदम धर आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन हम अभी नफतरों की फसल बोने की बातें कर रहे हैं खुद मार रहे खुद ही मर रहे हैं। लाशों पर चढ़कर कुछ लोग सत्ता की बुलंदी पर चढ़ रहे हैं , इंसानियत को बार बार शर्मिंदा कर रहे हैं। आग बुझाने की बात कर हवा देने का काम कर रहे हैं।  हमेशा से कोई एक दिन पहली अप्रैल को मूर्खता दिवस कहलाता था , हंसी हंसी में बीत जाता था। अब तो महीना साल लगातार मूर्खताएं करते हैं फिर भी समझदारी का दम भरते हैं। अंत किस बात से करें चलो दो शेर याद करते हैं जाने माने शायरों के। 

                     रहनुमाओं की अदाओं पर फ़िदा है दुनिया ,

                     इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारो। 

                   कौम के ग़म में डिन्नर करते हैं हुक्काम के साथ ,

                     रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ।


Sunday, 1 April 2018

मेरे मन की बात ( बेसिरपैर की बात ) डॉ लोक सेतिया

    मेरे मन की बात ( बेसिरपैर की बात ) डॉ लोक सेतिया

न तो मैं कोई सत्ताधारी नेता हूं और न ही मुझे आज पहली अप्रैल को किसी को मूर्ख बनाने की मूर्खता ही करनी है। मुझे इस अवसर पर खुलकर मन की बात करनी है। मन की बात सभी से नहीं की जाती न कर ही सकते हैं। मन की बातें मन ही जानता है और मन ही मन से मन की बात करता है। कुछ साल पहले तक माना जाता था कि मन या दिल की बात किसी एक से ही कर सकते हैं मगर जीवन भर ऐसा कोई मिलता ही नहीं जिस से हम अपने मन की बात कहें भी और वो समझे भी। याद आया मन की बात शीर्षक से मेरी इक कविता भी है लिखी हुई। ग़ालिब न वो समझे हैं न समझेंगे मेरी बात। आज सोचा जब देश का मुखिया मन की बात करता है रेडिओ पर चाहे कोई सुने न सुने समझे न समझे तो हम भी कह सकते हैं। मन की गहराईयां बहुत होती हैं और मन की थाह पाना आसान नहीं होता। इक दोहा है :-

                    प्राणि अपने प्रभु से पूछे किस बिद्ध पाऊं तोहे ,

                     प्रभु कहे तू मन को पा ले पा जाएगा मोहे।

जिसको मन की बात कहनी थी समय पर नहीं कह सके तो अब सब को कहते हैं , मगर ये सच में मन की बात नहीं है। मन की बात कभी झूठ नहीं होती , मन जानता है। आप देश की जनता को दुनिया को मूर्ख बना सकते हैं मन को नहीं। आपका मन जानता है आप झूठे हैं और झूठी तालियां महंगी पड़ती हैं। बहुत दिन तक बहुत लोगों को मूर्ख बना सकते हैं मगर सभी को हमेशा के लिए नहीं। सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है। यहां भी आप सोचोगे मुझे तो रामजी के पास जाना है खुदा से मुझे क्या लेना देना , लेकिन वहां ईश्वर की अलग अलग दुकानें नहीं हैं एक ही है ज़रा सीबीआई जैसी एजेंसी से पता लगवा लो। मन भी कितना अजीब है अपनी बात करनी थी और उसकी करने लग गया जिस के पास मन नाम का कुछ भी नहीं। नेताओं के पास दिल ज़मीर ईमान और ईमानदारी के नाम पर पोशाक ही होती हैं जिनको ज़रूरत अनुसार बदल लेते हैं। अभी देखो इक खिलाड़ी शायरी करता है टीवी पर मगर नेता बनकर कल एक नेता पर जो चोरी का शेर पढ़ता था अब नाम बदल दूजे पर चिपकाता है। छोड़ो उनकी बात आगे करते हैं सच्चे मन की बात। 
                    मुश्किल बहुत है भाई मन की बात दिल की बात भीतर ही रह जाती है जुबां पर आती ही नहीं। अगर दिलबर की रुसवाई हमें मंज़ूर हो जाए , सनम तू बेवफ़ा के नाम से मशहूर हो जाए। खिलौना फिल्म भी कमाल थी इक नाचने वाली इक पागल से इश्क़ कर बैठी। ये इश्क़ होता ही पागल है मूर्ख लोग इश्क़ किया करते हैं। समझदारी पास हो तो किसी हसीना से प्यार नहीं होता कभी। देशभक्ति भी इश्क़ ही है जिनको सत्ता की भूख हो वो समझदार राजनीति कर सकते हैं और देशप्रेम पर केवल भाषण दे सकते हैं। मित्रो मैंने गलत तो नहीं कहा , ठीक कहा है ना। ताली बजाओ। 
                पढ़ते पढ़ते आपको लगा ये लेखक भी पहली अप्रैल को मूर्ख तो नहीं बना रहा जो अभी तक मन की बात बताई ही नहीं। माफ़ करना मन भटक जाता है जो सोचता है नहीं समझ आता है। मन मन ही मन अपनी मूर्खता पर मुस्कुराता है। मूर्ख बन जाना बुरा नहीं होता , बुरा होता है दूसरों को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करना। अपने देश की हालत खराब समझदार लोगों ने ही की है मूर्ख लोग कभी देश का कबाड़ा नहीं करते हैं। हम में अधिकतर मूर्ख और नासमझ लोग हैं जो खुद को समझदार दिखलाना चाहते हैं मगर कोई यकीन नहीं करता अपनी बात पर। सब यही मानते हैं ये मूर्ख अपने को अक्लमंद समझता है। और जो वास्तव में समझदार लोग हैं वो खुद को बेहद मासूम और भोला दिखलाते हैं और हमपर राज करते हुए दावा करते हैं हम सेवक हैं। अब देखो आम लोग चार साल में दुबले क्या सूख कर कांटा हो गए हैं और कोई सेवक बनकर अठाहर घंटे काम करने की बात कहता फिर भी देश विदेश भाग दौड़ करने के बाद भी और तंदरुस्त और मोटा ताज़ा हो गया है। मन की बात का कमाल है। हम हैं कि आज भी मन की मन ही में रही कहने की चाह थी कह सकते थे मगर नहीं कही। कहो मित्रो कैसी रही।