Friday, 7 July 2017

जनसम्पर्क की बात या इक धोखा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    जनसम्पर्क की बात या इक धोखा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

नाम बदल दिया तौर तरीके वही हैं। हरियाणा की सरकार ने इक नया तमाशा शुरू किया है , राहगिरी नाम से। आज सुबह देखा सामने अपने घर के। जनता से सम्पर्क क्या इसी तरह होगा , बड़े अधिकारी उसी शासकीय अंदाज़ से आये जब उनकी ही पसंद वाले शासन से जुड़े लोग उस जगह उनका अभिनंदन को तैयार बैठे नहीं खड़े थे। किसी भी तरह कोई नहीं समझ सकता कि समानता की कोई झलक भी है। कुछ ख़ास लोग कुछ बेहद ख़ास लोग और कुछ ख़ास से भी खास ऊंचे ओहदे वाले लोग। और उसी सत्ताधारी अंदाज़ से हर नियम कायदे की अनदेखी कर जब जो जैसे करते हुए। बीच सड़क मंच लगाकर , स्कूल के बच्चों को सर्वोच्च न्यायालय की बात को दरकिनार कर उपयोग करते हुए। सरकारी तंत्र से बुलाये हुए लोग कलाकार योग और जाने क्या क्या दिखाते लोग। गीत संगीत और शोर शराबा सब किसी भी सरकारी आयोजन की तरह कुछ पल की झूठी चमक दमक। कहीं भी आम निवासियों से वास्तविक मेल मिलाप की बात नहीं , किसी को अपनी समस्या बताने की अनुमति नहीं।  बस भाषण सुनना है इक फासला रख कर अधिकारी लोगों से , कोई खेल तमाशा ही नहीं , सब का वास्तविक उद्देश्य से दूर तक कोई मतलब लगा ही नहीं। हर दिन इसी तरह सरकारी धन किसी संस्था या विभाग द्वारा कुछ तथाकथित समाजसेवी लोगों की दुकान चलने को ही। सब से पहली बात ऐसा कदापि नहीं लगता कि आपके पास सरकार के लोग सेवक बनकर आये हैं। उसी खनक उसी ठसक के साथ जिस अंदाज़ से सचिवालय में मिलते हैं शासक बन शासित लोगों की तरह मानकर जनता को। जब तक नेता और अधिकारी अपनी मानसिकता नहीं बदलते और उनको ये नहीं समझ आता कि वो जो करते हैं उनका कर्तव्य है और अगर अपना कर्तव्य ईमानदारी से नहीं निभाते तो ये देश और जनता के खिलाफ अपराध है। इन को उपहार अथवा भीख नहीं बांटनी है जनता को उसके हक देने हैं। जो चलन चलता आया है सत्ता की लाठी वाला उसका अंत होना ज़रूरी है। जिस दिन लोग हाथ जोड़ कर नहीं अपना अधिकार अधिकार की तरह लेना सीख जायेंगे उस दिन ही व्यवस्था बदलेगी। हम राज करने वालों से उम्मीद करें खुद झुकने की तो वो केवल सपने में मुमकिन है।



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