Sunday, 28 May 2017

इक भजन सब से अलग है

       इक भजन सब से अलग है 


ये भजन मेरी माता जी हर समय गाती - गुनगुनाती रहती थी।
 मैंने फिल्मों में और सभी जगह बहुत भजन सुने हैं
मगर मुझे जो अलग बात इस भजन में लगती है।
कहीं और नहीं मिली अभी तलक।
भजन का मुखड़ा ही याद है
उसके बाद उस भजन की बात को खुद मैंने।
अपने शब्दों से सजाने का प्रयास किया है।
ये भजन अपनी प्यारी मां को अर्पित करता हूं।
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भगवन बनकर तू अभिमान ना कर ,
तुझे भगवान बनाया हम भक्तों ने।

पत्थर से तराशी खुद मूरत फिर उसे ,
मंदिर में है सजाया हम भक्तों ने।

तूने चाहे भूखा भी रखा हमको तब भी ,
तुझे पकवान चढ़ाया हम भक्तों ने।

फूलों से सजाया आसन भी हमने ही ,
तुझको भी है सजाया हम भक्तों ने।

सुबह और शाम आरती उतारी है बस ,
इक तुझी को मनाया हम भक्तों ने।

सुख हो दुःख हो हर इक क्षण क्षण में ,
घर तुझको है बुलाया हम भक्तों ने।

जिस हाल में भी रखा है भगवन तूने ,
सर को है झुकाया हम भक्तों ने।

दुनिया को बनाया है जिसने कभी भी ,
खुद उसी के है बनाया हम भक्तों ने।

मुझे नहीं बनना अच्छा आदमी - डॉ लोक सेतिया

    मुझे नहीं बनना अच्छा आदमी - डॉ लोक सेतिया 

 सच अगर मीठा होता तो कोई झूठ नहीं बोलता , अब सच का स्वाद अगर कड़वा है तो सच बोलने वाला क्या करे। मगर इधर लोगों की शक्ल खराब है और बुरा भला दर्पण को कहते हैं , दर्पण झूठ न बोले जो सच है वो सामने आया , हंस ले चाहे रो ले। हम कैसा सभ्य समाज हैं जो खुद बोता है कांटें और चाहता फूल हासिल करना। सच सच बताओ कौन कौन सच के साथ खड़ा होता है। मुझे सामने बेशक नहीं बोलते मगर पीठ पीछे कहते हैं ये अच्छा आदमी नहीं है , भला कोई अधिकारी कर्तव्य नहीं निभाता , पुलिस अपराधी का बचाव करती है , नेता अपने चहेतों को मनमानी की छूट देते हैं , शिक्षक विद्या को दान नहीं वयापार समझते हैं , करबारी अपने मुनाफे की खातिर हर अनुचित तरीका अपनाते हैं , डॉक्टर हॉस्पिटल ईमानदारी से मरीज़ का इजाल नहीं करना चाहते बल्कि किसी भी तरह अधिक से अधिक पैसा बनाना चाहते हैं , लूट करना सभी की आदत बन गई है। सेवा की आड़ में स्वास्थ्य से खिलवाड़ होता है , लगता ही नहीं शराफत और मानवीय मूल्य किसी को याद भी हैं। कितना धन कमा लो क्या होगा , इक मित्र जो जाने कितने धंधे कर चुके हैं और अब दलाली का धंधा करते हैं , मुझे बता रहे थे मैंने क्या क्या नहीं बना लिया। उनको लगता है इन सब से उनका नाम अमर हो जायेगा , लोग याद किया करेंगे क्या क्या ज़मीन जायदाद उनकी बनाई हुई है। मैंने कहा आपको अपने पिता जी से जो मकान दुकान मिले क्या आपको अभी लगता वो उनकी है। आप किसी को बताते हैं ये मेरी नहीं पिता जी की बनाई हुई है मुझे विरासत में मिली है। चुप लगा ली क्योंकि उनको लगता है अब ये सब उन्हीं का है पिता जी के बाद। मैंने कहा ठीक ऐसे आपके बेटे और उनकी संतानें जब उनको जो मिला उसे खुद अपना ही समझेंगे आपका नहीं। आप को अपने लिए जितना चाहिए उतना आप बिना ठगी या धोखे के कारोबार किये कमा सकते हैं। सब धर्म बताते हैं अपनी संतान को काबिल बनाओ तो वह खुद अपनी काबलियत से कमा सकती है। और अगर नाकाबिल हो तो आपका जमा किया भी खत्म कर सकती है। इक बात उनको बताना बेकार था मगर आपको बताता हूं , आपकी जमा पूँजी कोई छीन सकता है चुरा सकता है , मगर आपकी काबलियत कोई नहीं छीन सकता। उनको ही नहीं तमाम बाकी लोगों को भी लगता है मैंने कुछ नहीं जमा किया कोई धन दौलत बढ़ाई नहीं। मगर मैं मानता हूं मेरा रचनाकर्म मेरी सब से बड़ी पूंजी है , जो मेरे बाद भी मेरी ही कहलाएगी किसी और की नहीं। मेरी संतान भी इसको अपना नहीं समझेगी बल्कि याद करेगी ये हमारे पिता की लिखी रचनाएं हैं। बस यही किया है मैंने , भले  घर फूंक तमाशा देखना कहे कोई।
वो जिनको मुझ से गिला है कि मैं बेबाक कहता और लिखता हूं हर किसी के अनुचित आपराधिक कृत्यों को लेकर उनको चिंतन की ज़रूरत है। आप अधर्म कर धार्मिक कहलाना चाहते हैं , तमाम नियम कायदे कानून तोड़ कर अपने अनैतिक कामों को सभ्य नागरिक होने के दावे से ढकना छुपाना चाहते हैं। मुझे समाज के अंधियारे को उजाला नहीं बताना अच्छा कहलाने को। आपको बुरा लगता हूं तो मेरे लिए ऐसा बुरा कहलाना अपमान की नहीं गर्व की बात है।

Saturday, 27 May 2017

खैरात मिल रही है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      खैरात मिल रही है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

आपके भी अच्छे दिन आ ही गए , मैंने अपने पत्रकार मित्र को बधाई दी। हरियाणा सरकार ने घोषित किया है हर उस पत्रकार को हर महीने दस हज़ार रूपये पेंशन मिलेगी जिस को बीस साल हो गए किसी अख़बार की खबरनवीसी करते। लो कोई मतभेद नहीं छोटे बड़े किसी अख़बार से ताल्लुक हो , जाति धर्म कोई होता नहीं मीडिया वालों का , सब का भला हुआ। तमाम ऐसे लोग हैं जो व्यवसाय कोई और करते मगर नाम को पत्रकारिता का तमगा लगाया हुआ ताकि धंधे में प्रशासन और सरकार का सहयोग भी मिलता रहे और समाज में दबदबा भी रख सकें। हर कोई डरता है पत्रकारों से , और हर जगह उनको खास स्थान दिया जाता है। मगर अभी तक कोई नहीं जानता था कि अधिकतर स्ट्रिंगर्स को मिलता क्या है , शायद कोई सोच भी नहीं सकता इतने कम पैसे मिलने पर भी कोई किस तरह शाही ढंग से रह सकता है। इस राज़ को कोई नहीं जान पाया कभी भी , कोई जादू की छड़ी है जो सब देती है। फिर भी किसी ने इनकी सुध ली तो।
      ये सरकार भी अजीब चीज़ होती है , जिस को ज़रूरत उसको देने को कुछ नहीं , और जिसको देना उसके लिए सब कुछ है। बीस साल क्या पचास साल कोई और काम किया तमाम लोगों ने उनको क्या मिलती इतनी पेंशन कहीं। बुढ़ापा पेंशन तो सभी को बराबर मिलती है फिर कुछ विशेष वर्ग की अलग व्यवस्था कितनी सही है। मगर कोई टीवी या अख़बार इस पर सवाल क्यों करेगा , हर सरकार ने मीडिया को विज्ञापनों का चारा डाला है। नेता और अधिकारी तो साफ कहते हैं ये नहीं होगा कि खाओ भी और चिल्लाओ भी , हड्डी मिलती है तो दुम हिलाना ज़रूरी हो जाता है।
      वास्तव में सरकार का मकसद आपको स्वालंबी बनाना नहीं भिखारी बनाना है। और सरकार खुश है कि लोग अधिकार मांगते नहीं भीख चाहते हैं। भीख सब्सिडी की हो या आरक्षण की अथवा कोई और , नेता और अफ्सर समझते हैं हम दाता हैं। जनता का धन जनता को ही वापस देना उपकार की तरह वह भी जिन को मर्ज़ी हो। कहते हैं हमने कोई घोटाला नहीं किया , भाई देश की सत्तर प्रतिशत जनता भूखी नंगी बदहाल है और आप खुद हर दिन जनता का धन व्यर्थ के आडंबरों पर बर्बाद करते हैं। कभी जनसभा कभी धार्मिक आयोजन कभी देश विदेश की यात्रा , इसको शाही ठाठ कहा जाता है जनसेवा नहीं। अपने प्रचार पर लाखों करोड़ खर्च करना देश का सब से बड़ा घोटाला है। ये अजीब बात है हम झूठे प्रचार को देखते हैं अपने सामने की असलियत को नहीं , अन्यथा किसी नेता अभिनेता को मसीहा नहीं बनाते। इन सब को खुद अपने लिए सब पाना है आपको देना कुछ भी नहीं। राजसी शान से रहते सादगी की बातें करना सब से बड़ा फरेब है। हम शोर सुन सुन मानते हैं सब बदल गया है।  बदला निज़ाम है तौर तरीका नहीं , अंधे की रेवड़ियां पहले भी बंटती रही आज भी अंधा सत्ता की गद्दी पर बैठा वही कर रहा और दरबारी लोग भीख लेकर तालियां बजा रहे हैं। क्या भिखारी होना अच्छी बात है।

सफर फेसबुक का ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

        सफर फेसबुक का ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

फेसबुक पर आप चाहे नये हों चाहे पुराने , इसके आदी होते देर नहीं लगेगी। मैं भी करीब चार साल से फेसबुक का बीमार रहा हूं , मैं फेसबुक पर दो बातों की खातिर आया था , पहली शायद कोई मित्र मिल जाये कहीं भी और दूसरा अपनी लिखी रचनाओं के लिए पाठक पाने को। शायद साल भर बाद समझ गया था यहां दोनों नहीं मिलती। झूठी लाइक्स और मित्रता के नाम पर केवल छल। परेशान हुआ और फेसबुक छोड़  दी। मगर बार बार फिर से इक नशा वापस ले आता दो चार दिन को , जब कोई विशेष दिन होते। बहुत बदलाव हुआ है इस बीच , मगर इधर तो जब से व्हट्सएप्प और मेस्सेंजर जैसे साधन आये तब से स्मार्ट फोन पर चैट ही इक मनोरंजन का और समय बिताने का ज़रिया बन गया है। मैंने जब इनका उपयोग किया तो बीस दिन में ही परेशान होकर बंद कर दिया व्हट्सएप्प , और हज़ारों मित्रों की सूचि वाली फेसबुक बंद कर दूसरी बनाई बहुत कम नाम भर के दोस्तों वाली। अब मालूम है निराश नहीं होना , कोई मित्र नहीं मिलते न कोई पाठक। केवल अपनी पसंद की चीज़ें खुद ही शेयर करना और खुद ही देखते रहना है। फेसबुक वालों को लगा शायद उनकी उपयोगिकता नहीं बची और लोग फेसबुक खोल फिर व्हट्सएप्प पर ही सब करते हैं। तब इक डर लगा होगा धंधा मंदा होने का तभी बहुत नई नई बातें लेकर आये हैं। मुझे हैरानी होती है जब तमाम लोग फेसबुक के कहने पर कोई पोस्ट बनाते हैं , कौन आपके जैसा है , किस ने आपकी प्रोफाइल पिक सब से अधिक देखी , कौन आपको सच चाहता है , आपका फेसबुक कार्ड आपको पास ही करता है अंक देकर भले आप कितना कम रहे हों फेसबुक पर। अब तो तमाम कारोबार होने लगे यहीं फेसबुक पर , हद तो तब हुई जब आपकी कितनी उम्र बाकी से आपके दिन कब कब अच्छे आने वाले हैं की बात कोई लिंक आपको बताता है। मैंने सोचा इसकी असलियत को परखना चाहिए और अपनी तीन फेसबुक पर जिन पर खुद अपना नाम जन्म तिथि और फोटो तक इक समान है इन लिंक्स से यही मूर्खता कर देखा और सब में अलग अलग नतीजे सामने आये। शायद हमारी मानसिकता को समझ हमें किसी न किसी तरह फेसबुक पर उलझना उनकी ज़रूरत है। बहुत पहले किसी ने कहा था दुनिया में मूर्ख बनने को बहुत लोग तैयार हैं बस कोई बनाने वाला चाहिए। आप सोशल मीडिया पर रहें मगर कुछ सार्थक कार्य करने के लिए। मूर्ख बनने को बाहर दुनिया कम नहीं है। अच्छे दिन लाने वाले तक नहीं जानते कब कैसे आएंगे , सरकार बना खुश हैं अपने अच्छे दिन लाकर। आपके लिए अच्छे दिन कोई मसीहा नहीं लाएगा।

Wednesday, 24 May 2017

मंदिर चालीसा काण्ड आरती का पेटेंट ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया


मंदिर चालीसा काण्ड आरती का पेटेंट ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 कलयुगी अवतार प्रकट हो चुके हैं , तीन साल से हर तरफ यही शोर है। मुझे ख्याल आया क्या किसी ने उनके नाम से आरती , चालीसा , उनका कांड लिख छपवा लिया है। गूगल से सब जानकारी हासिल की जा सकती है , तुरंत पता चला अभी तक किसी ने ये महान कार्य नहीं किया। शायद मुझे ही करना हो तभी किसी ने इस बारे सोचा ही नहीं। मुझ से पहले कोई दूसरा नहीं लिख ले इसलिए सब से पहले मैंने आधुनिक भगवान का मंदिर , उनकी आरती , उनका चालीसा , उनका काण्ड सभी पर अपना कॉपी राइट करवा लिया है। जब तक लिखूंगा छपवाऊंगा तब तक उसका प्रमोशन भी शुरू कर रहा हूं , जिस को अपना कल्याण कराना हो और इस धरती पर जीते जी स्वर्ग का सुख पाना हो , उसको मंदिर में दर्शन से लेकर आरती चालीसा और काण्ड की प्रति आरक्षित करवा लेनी चाहिए मुझे अग्रिम भुगतान कर के। सिमित प्रतियां छपवाने की बात कहना ज़रूरी है ताकि लोग भाग भाग सब से पहले बुकिंग करवा मुझे आधुनिक बाबा जी की तरह मालामाल कर दें। ये बताना ज़रूरी है कि इन की केवल हार्ड कॉपी ही उपलब्ध होगी आप उसको गूगल व्हाट्सएप्प अदि पर तलाश करोगे तो निराश हो जाओगे। मुफ्त कुछ भी नहीं मिलेगा , मरने से देख तो लो स्वर्ग की असलियत क्या है , अन्यथा स्वर्ग की कामना करते मरोगे मगर जब ऊपर जाकर हाल देखा तो सोचोगे ये कितनी बड़ी भूल हुई। स्वर्ग की दशा भारत देश से बदतर मिली और सामने देखा कि नर्क में तो सब के मज़े हैं , तब आपको कोई वहां ट्रांसफर नहीं करेगा लाख विनती करना। इसलिए कुछ हज़ार की बात है आधुनिक कलयुगी अवतार के मंदिर में दर्शन और उसका गुणगान करने का हर मंत्र मेरी लिखी आरती , मेरा लिखा चालीसा और कांड पढ़कर अपने जीवन को सफल बनाएं। नहीं मैं ये सब कोई जनकल्याण की खातिर नहीं कर रहा हूं , और लोगों की तरह इतना बड़ा झूठ मैं नहीं कर सकता , शुद्ध व्यापार की तरह कमाई करने को कर रहा हूं। आपको भुगतान नकद काली कमाई से करने तक की छूट है।  मंदिर में अर्पित धन काले से सफेद हो जाता है ठीक राजनीतिक दल को मिले चंदे की तरह। पाप और पुण्य की भी कलयुगी परिभाषा आपको समझाई जानी है , जब कोई और दल या नेता करे तब जो अपराध और पाप कहलाता है , वही जब खुद सत्ता में आकर करते हैं तब राजधर्म बन जाता है। इक तथ्य सर्वविदित है राजा कभी गलत नहीं होता , भगवा वेस धारण कर आप अपशब्द भी बोलते हैं तब उसको प्रवचन माना जाता है।
                 अंत में जैसे कथा का सार बताना ज़रूरी होता है , हर कथा के आखिर में लिखा हुआ होता है , इस को पढ़ने से क्या फल प्राप्त होगा। उसी तरह ये बताना आवश्यक है कि सतयुगी देवी देवताओं की आरती पूजा कलयुग में किसी काम नहीं आती है। आप कलयुगी इंसान हैं आपके देवी देवता भी इसी युग वाले कल्याणकारी होंगे , सतयुगी भगवान , देवी देवताओं की उपासना से अभी तक आपका कल्याण हुआ है , इस बात पर विचार करना। और सब लोग अपने लिए आरक्षण करवा लें और आप बाद में हाथ मलते रह जाएं ऐसा नहीं होने दें। जितना जल्द हो अपनी बुकिंग करवा लो , अगर जेब खाली है तो लोन की सुविधा भी खुद आधुनिक भगवान ने हर बैंक में उपलब्ध कराई हुई है , बिना किसी गारंटी के। जल्दी करो , पहले आओ पहले पाओ का नियम लागू है।

Thursday, 18 May 2017

अच्छे दिन आये हैं भजन ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   अच्छे दिन आये हैं भजन ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया


जनता को उसने भरोसा दिलवाया था , अगर उसको चुन लोगे तो अच्छे दिन लेकर आएगा। वो समझता था जनता से अभी तक सभी ने बस झूठे वादे ही किये हैं और चुनाव जीत कर वादे निभाना किसी ने याद रखा ही नहीं। जैसे हम सब समझते हैं हम तो भले आदमी हैं बाकी दुनिया बड़ी खराब है , उसी तरह की मानसिकता उस नेता की भी रही। और उसकी बड़ी बड़ी बातों का जादू चल गया और जनता ने उसको शासन की बागडोर संभलवा दी। उसने आते ही हर जगह अपनी पसंद के खास लोगों को राज्यों की सत्ता हासिल कर कुर्सी पर बिठा दिया। उसको यही लोकतंत्र लगता था , कल तक परिवारवाद की आलोचना करने वाला व्यक्तिवाद और अपने महिमामंडन में अपने को इस दुनिया का भगवान समझने लगा। करोड़ों रूपये जनता के खज़ाने से लुटा टीवी अख़बार और अपने प्रचार के बड़े बड़े पोस्टर्स लगवा दिए। स्वच्छता अभियान मेक इक इंडिया जाने क्या क्या तमाशा हर दिन करना उसकी आदत हो गई। देश भर में भृमण करता रहा मगर जनता की बदहाली को देखने को नहीं अपनी जय जयकार करवाने को रोज़ लाखों करोड़ों खर्च कर। विदेश यात्रा करता रहा अपने को विश्व के महान लोगों में शामिल कराने को। उस ने और उसके मनोनित सत्ता पर बैठे लोगों ने हर जगह कोई स्थान बना दिया जहाँ जाकर कोई अपनी पहचान बताकर शिकायत लिखवा सकता था। उसको पता था देश में सत्तर साल से प्रशासन और व्यवस्था कितनी लचर और संवेदनहीन हो चुकी है। मगर उसने उन्हीं अधिकारियों को खुद को भगवान कहलाने को पंडित मुल्ला मौलवी का रुतबा दे दिया। अब जो भी शिकायत करने आता उसकी शिकायत दर्ज कर उसको इक कागज़ दिया जाता जो बताता था अच्छे दिन आ गए हैं। अब खुश हो जाओ अब रोना मना है , आह भरना गुनाह है।
           जब साल दो साल तक कोई समस्या हल नहीं हुई और लोग अपनी दी अर्ज़ी पर करवाई नहीं करने की शिकयत करने लगे जबकि अधिकारी कागज़ों पर लिख चुके थे कोई करवाई करने की ज़रूरत ही नहीं अथवा शिकायत का समाधान किया जा चुका है। तब राजधानियों को ये रास नहीं आया और आदेश जारी किया गया कि जो फिर से शिकायत दर्ज करवाने आये उसकी जांच की जाएगी। ऐसे लोग नास्तिक हैं जो भगवान को नहीं पूजते या मानते। ऐसे विलाप की विरोध की आवाज़ को बंद कर तानाशाही जैसे हालात लाकर बताया गया है सब ठीक हो गया है। गरीबी भूख बेरोज़गारी कोई भी समस्या नहीं  रही। जिसको आसपास गंदगी दिखाई देती है स्वच्छत भारत नहीं दिखाई देता या सुशासन नहीं तानाशाही नज़र आती है वह बागी है देश का दुश्मन है। हर समस्या का समाधान हो गया है केवल इक बात कर के , कि अब कोई समस्या है बोलना मना है। सब को सुबह शाम अच्छे दिन आ चुके हैं का सरकारी भजन गाना ज़रूरी है।

Saturday, 13 May 2017

मेरा कातिल ही मेरा मुनसिब है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  मेरा कातिल ही मेरा मुनसिब है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया


भगवान कहलाना सब चाहते हैं , भगवान बनना किसी को नहीं आता है। मालूम नहीं तब क्या होता था , मगर हमने किस्से कहानियां बहुत सुनी हुई हैं , बादशाह इंसाफ करने या न्याय देने को इक घंटा महल के द्वार पर लगवा देते थे। दावा किया जाता है कि कोई भी आकर घंटा बजा सकता था और अपने साथ हुए अन्याय की फरियाद कर न्याय की गुहार लगा सकता था। अब उस घंटा बजाने का कोई रजिस्टर तो होता नहीं था कि बाद में हिसाब पता चलता कितने लोग घंटा बजाने आये और उन में से कितनों की परेशानी का अंत हुआ। सोचा जाये तो कौन जाकर बादशाह से उसी की कार्यपालिका की शिकायत करने की सोचता भी होगा। और फिर राजा का आदेश ही न्याय कहलाता है इसलिए शासक जो भी करता इंसाफ ही माना जाता होगा। मगर बादशाह सोचते थे कि वही ईश्वर का सवरूप हैं इसलिए चाहते थे जनता उनके दरवाज़े पर आये इंसाफ और न्याय की याचिका लेकर और उनसे दया की विनती करे। अपने भारत देश में जब से लोकतंत्र के नाम पे वोटतंत्र का खेल चालू हुआ है राजनेताओं को खुद को भगवान की तरह सब की विनती सुनने का शाही शौक होने लगा है। कभी नेता आते जाते थे जब किसी शहर तब लोग उनका भाषण सुन बाद में किसी रेस्ट हाउस में अपनी अपनी अर्ज़ियां दे आते थे और इतने से खुश हो जाते थे कि मंत्री जी ने अर्ज़ी ले ली। इसका कोई ऐतहासिक प्रमाण नहीं मिलता कि उन सारी अर्ज़ियों का क्या किया जाता था। मगर देश की बिगड़ती दशा से समझ आता है की उन सभी अर्ज़ियों को रद्दी की टोकरी में ही डाला जाता रहा होगा। 
         इधर नेता भी समझ चुके हैं कि अब पुराने ढंग से जनता को नहीं बहलाया जा सकता है। इसलिए हर राज्य के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री सी एम विंडो या टॉक टू पी एम ओ जैसे नाम से से बादशाही घंटे जैसा कुछ नया शुरू कर देते हैं। हम लोग ऐसे नासमझ हैं जो हर बार छले जाते हैं तब भी वही तमाशा बदले नाम से देखने चले जाते हैं। समस्या और बढ़ गई है जब से सब ऑनलाइन होने लगा है , आपने शिकायत की और आप देख सकते हैं आपकी समस्या का क्या समाधान किया गया है। अब सरकार अपना डंका पीटने लगती है कितनी अर्ज़ियाँ मिली और उनका निदान कर दिया गया। बस ये कोई नहीं बताता कि उन सब को इंसाफ मिला या इंसाफ के नाम पर और अधिक अन्याय किया गया। बुरा हो सूचना के अधिकार और सोशल मीडिया का जिस पर हर प्रशासन और सरकार के झूठे दावों की पोल खुल जाती है वह भी प्रमाण सहित। मगर हर नेता मकड़ी की तरह अपने ही बुने जाल में फंस जाती है वाली दशा को पहुंच जाता है। उनकी खोली खिड़की जनता की शिकायत दर्ज करने के बाद उसी विभाग के उसी अधिकारी को भेज मान लेती है अपना दायित्व निभा दिया। और खुद गुनहगार लिखता है अर्ज़ी पर कि शिकायत पर कोई करवाई करने की ज़रूरत ही नहीं है। और इक एस एम एस भेज देते हैं शराफत से शिकायत करने वाले को कि आपकी शिकायत का निपटान किया जा चुका है आप साइट पर देख लें। 
              समझदार को इशारा बहुत होता है , फिर भी कई नासमझ पत्र लिख कर मंत्री जी को या पी एम अथवा सी एम को सूचित करने की जुर्रत करते हैं कि सब तो अनुचित है फिर भी आप कोई करवाई क्यों नहीं करना चाहते। और कभी कभी सबूत इतने साफ होते हैं कि शिकायत दोबारा खोलनी पड़ती है। मगर किया कुछ भी नहीं जाता , जब जिस नगर में मंत्री जी जाते हैं इक दिखावे की कोशिश करते हैं कि सब मिल सकते हैं समस्या बताने को। मगर मिलने की अनुमति उन्हीं विभाग के अधिकारी से ही मिलती है , और इस तरह चूहे बिल्ली का खेल जारी रहता है। मुश्किल ये है कि सब छुपाने का प्रयास सफल होता नहीं और किसी न किसी तरह सामने आ जाता है कि असली काम नहीं हुआ और कागज़ी बहुत किया गया है। ऐसे में इधर इक बेहद चौंकाने वाली बात सामने आई है , हरियाणा सरकार की सी एम विंडो नाम की जनशिकायत की जगह पर अब ये देखना छोड़ कर कि इसने किया क्या समस्याओं पर , उल्टा ये आदेश दिया गया है कि पता लगाओ कौन कौन बार बार शिकायत करते रहे हैं  उन पर कठोर करवाई की जाये ये समझ कर कि उनकी शिकायत झूठी और किसी निजि हित साधने को की गई है। अब घंटा बजाने वाले को गुनहगार साबित करने को वही अधिकारी ज़ोर शोर से लग जायेंगे ऐसा लगता है। ये न्याय का अनोखा ढंग है जिस में कोशिश की जाएगी कि लोग शिकायत करने से परहेज़ करें। 
                  वास्तव में इस सब की शुरआत की गई थी भगवान के मंदिर में घंटा लगाकर , लोग जाते हैं और भगवान के सामने घंटा बजाकर प्रार्थना करते हैं। अब भगवान को सुविधा है कि उसको सामने आकर जवाब देना नहीं पड़ता न ही कोई हिसाब कहीं से हासिल किया जा सकता है। पत्थर के भगवान को किसी शोर किसी विलाप किसी की सिसकियों से शायद कोई परेशानी नहीं होती और वह आराम से चैन की नींद सोता किसी ऐसी जगह जहाँ कोई नहीं जाकर देख सकता न पूछ सकता क्या किया मेरी विनती का। अब तो मंदिर वाले पुजारी लोगों ने भी समय तय कर दिया है , भगवान भी हर समय नहीं सुनते विनती। ये भगवान ने नहीं किया होगा , मंदिर या धर्मस्थल चलाने वालों ने अपनी सुविधा से किया है। सी एम या पी एम अगर भगवान जैसा होना चाहते हैं तो उनको भी पुजारिओं की तरह सब अधिकारीयों को मनमानी करने देना ही होगा। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को भगवान कहलाना है तो बिना पंडित पुजारियों के सम्भव नहीं है। बात समझ आई आपको या नहीं।

Friday, 12 May 2017

सोशल मीडिया की दलदल में ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया



    सोशल मीडिया की दलदल में ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया


सोशल साइट्स की इधर धूम मची हुई है , हर कोई ट्विटर फेसबुक मेस्सेंजर व्हाट्सएप्प पर मग्न है। मुझे कभी कभी हैरानी होती है देख कर कि तमाम लोगों ने बिना सोचे समझे इनको अपनी ज़रूरत बना लिया है। इक अलग तरह का नशा छाया हुआ है , शायद अधिकतर लोग जानते तक नहीं इसकी उपयोगिकता कितनी है और क्या इनका इस्तेमाल कर कुछ सार्थक हासिल कर रहे हैं। मेरा विचार है अक्सर इन पर अपनी सब से कीमती चीज़ समय को हम बर्बाद करते हैं और बदले में मिलता है इक झूठा संतोष लोकप्रिय होने या जानकर होने का। शायद चार साल पहले अनजाने में ही मेरी पहली फेसबुक बन गई थी , बिना समझे जो सामने विकल्प आता रहा क्लिक करता गया और मुझे खबर भी नहीं हुई कि मैं फेसबुक पर शामिल किया जा चुका हूं। जब भी मेल खोलता सन्देश मिलता किसी ने मित्रता की रिक्वेस्ट भेजी है। ये क्या है नहीं मालूम था , फिर पता चला कि ये मित्रता की जगह है तो लगा ये तो बहुत अच्छी बात है। मित्रता मेरा दीन धर्म क्या जूनून है और मुझे उम्र भर किसी सच्चे दोस्त की तलाश रही है। इक आशा की किरण दिखाई दी कि शायद इस तरह ही सही कोई मुझे मिल जायेगा वास्तविक दोस्त। और मैं बहुत चुन चुन कर दोस्त बनाता गया , कुछ दोस्त बहुत अच्छे लगने लगे। विशेष कर जो साहित्य में लेखन में रूचि रखते थे वो लोग। मगर कुछ ही दिन में लगने लगा फेसबुक की मित्रता केवल इक संख्या मात्र है। वास्तविक जीवन में इसका कोई अर्थ ही नहीं है , कुछ निराश हुआ और बहुत बातें ऐसी भी नज़र आई जिन से इक डर सा लगने लगा। मित्रता की आड़ में अन्य मकसद पुरे करना चाहते थे अधिकतर लोग। बहुत समय लगता लिखने में फेसबुक पर मगर समझ आया किसी को पढ़ना नहीं न ही दोस्ती जैसी कोई बात ही करनी है। एक मिंट में जब लोग बीस पोस्ट्स पर लाइक्स करें तब समझने में कठिनाई नहीं हुई कि ये केवल दिखावे की झूठी दोस्ती है। और फिर मैंने इक दिन अपनी फेसबुक बंद ही कर दी। मगर कुछ दिन बाद इक दिन इक मित्र का फोन आया ये पूछने को कि मैं ठीक ठाक तो हूं। शायद पहली बार लगा कोई है जो मेरी तरह फेसबुक की मित्रता को भी मन से जुड़ कर समझता है निभाता है। उन महिला मित्र को मेरा मोबाइल नंबर अख़बार में छपी ग़ज़ल से मिला था , उनकी भावना और उनकी दोस्ती की सच्चाई ने मुझे दोबारा फेसबुक पर वापस आने को विवश किया।
            बहुत तरह के अनुभव होते रहे और मैं फेसबुक के मोहजाल में कभी फंसता रहा और कभी मोहभंग होता रहा। अतिभावुकता के कारण जल्द विचलित होता रहा और फेसबुक बदल कर दूसरी बनाता गया जाने क्या तलाश करना चाहता था। जिस वास्तविक दोस्त की चाहत है वो फेसबुक पर मिलना शायद सम्भव ही नहीं था। फिर बार बार मैंने कई प्रयोग किये कोई सार्थक कार्य करने को , कभी आयुर्वेदिक उपचार की निस्वार्थ सलाह तो कभी ग़ज़ल क्या है ये सबक सिखाने को पेज बनाना। धीरे धीरे समझ आया कि मैं जिस को सोशल साईट समझ कोई काम समाज और समाजिकता से सरोकार का करना चाहता हूं लोग वहां केवल अपना मन बहलाने अपने अकेलेपन को मिटाने का इक खोखला जतन करते हैं और अपने वक़्त को बेकार बर्बाद करते हैं। इक अंधेरा है जिसको लोग रौशनी का नाम देकर समझते हैं उजियारा कर रहे हैं। आज देखता हूं फोन पर मेस्सेंजर और व्हाट्सऐप पर महान विचार भेजे जा रहे दिन भर , जबकि उन्हीं लोगों के अपने वास्तविक जीवन में इन बातों को महत्व कुछ भी नहीं। ये कुछ अजीब लगता है , हम नासमझ नहीं हैं सब समझते हैं भलाई क्या है बुराई क्या है फिर भी भलाई को अपने जीवन में अपनाते नहीं हैं। बुराई की राह को छोड़ नहीं सकते बस इक दिखावा एक आडंबर करते हैं भलाई की बातें कर के। कितने नकली चेहरे हैं हम सभी के , भीतर का चेहरा और और बाहर दिखाने को इक मुखौटा और लगाया हुआ है।
              हम अपने आस पास वही सब देख खामोश रहते हैं और कभी अवसर मिले तो सोशल मीडिया पर उसी पर भाषण व्याख्यान देने लगते हैं। कैसी मानसिकता है हमारी जो हम किसी की समस्या परेशानी को देख उसकी सहायता करने की बात नहीं सोचते अपितु उसको अपने फोन में वीडियो बनाकर सोशल साइट्स या टीवी वालों को भेजने लगते हैं। और जब कोई बदहाल हालत में खबर बनता है तब तमाम लोग दिखावे की झूठी संवेदना लेकर अपने प्रचार को वहीं पहुंच जाते हैं। कितना आगे बढ़े हैं या कितना नीचे गिरते जा रहे हैं। सब से अधिक हैरानी की बात ये है कि देश की सरकारें केंद्रीय और राज्यों की इक अनोखी प्रतियोगिता में शामिल हो गई हैं सोशल साइट्स और मीडिया पर अपना प्रचार करने का। असली काम पीछे छूट गए हैं और हर दिन सोशल मीडिया का प्रबंधन इक बड़ा मकसद हो गया है। जनता का धन जनता की भलाई पर लगाने की जगह विज्ञापनों पर व्यर्थ बर्बाद किया जा रहा है। अख़बार टीवी वाले सरकारी विज्ञापनों की कीमत पर अपना असली मकसद भुला चुके हैं , लगता है जैसे सब के सब बिक चुके हैं या बिकने को बेताब हैं। शायद ही कोई इस से बच सका है , अब तो इनको लगता है जैसे बिना सरकारी विज्ञापनों की बैसाखियों के ये इक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकते। फिर भी सब दावा करते हैं तेज़ दौड़ने का। बात राजनीति की किसी चुनावी जीत या हार की हो अथवा कुछ और सब राजनेता टीवी पर बहस या सोशल मीडिया पर शोर में उलझे हुए दिखाई देते हैं , वास्तविक देश और जनता की समस्याओं से जैसे किसी को कोई सरोकार ही नहीं है।
                          ये सब देख लगता है देश में असली दुनिया के समानांतर कोई दूसरी सपनों की दुनिया है जिस में कुछ लोग खोये हुए हैं। उनको पता ही नहीं कि जिस काल्पनिक दुनिया के आकाश में वे रात दिन विचरण करते हैं उस का कोई अस्तित्व है ही नहीं। हम को जीना है और कुछ भी पाना या खोना है तो इसी धरती की असली दुनिया की हक़ीक़त को समझना होगा। जिस आकाश को हम अपना सर्वस्व समझने लगे हैं उसका अस्तित्व इक परछाई की तरह है। आकाश में आपका घर नहीं बन सकता है। विज्ञान की प्रगति पर सोचते थे कि इस से समय और साधन के सदुपयोग होगा और हम बेहतर जीवन जी सकेंगे मगर जो विकास सोशल नेटवर्किंग से हुआ उसके नतीजे कुछ और ही बताते हैं। अन्यथा नहीं लिया जाये तो कहना होगा कि फेसबुक ट्विटर और व्हाट्सऐप जैसे साधन इक ऐसा तालाब बन गए हैं जिस में जाकर लोग कीचड़ में धसते ही जा रहे हैं। इस दलदल से निकलना शायद असम्भव नहीं भी हो तो कठिन अवश्य है।

Sunday, 7 May 2017

दौलत वाले दिल से खेलते ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    दौलत वाले दिल से खेलते ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया


दिल को कभी दौलत के तराज़ू में नहीं तोला जाता , जिस पलड़े में तुले मुहब्बत उसमें चांदी नहीं तोलना , याद आया बॉबी फिल्म का गीत। मगर तब की बात और थी वो दौर और था , दिल प्यार की निशानी उसकी कहानी उसके गीत ग़ज़ल कविता हुए करते थे। आज दिल इक कारोबार का साधन है दिल के डॉक्टर करोड़ों की टर्नओवर का धंधा कर रहे हैं। व्हट्सऐप पर इक दिल का धंधा करने वाले डॉक्टर का मैसेज आया है कैसे दिल को बचा कर रख सकते हैं। भला घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या , वही और उन जैसे तमाम डॉक्टर कभी नहीं चाहते लोग दिल की बीमारी से बचे रहें। हर दिन नए नए तरीके अपनाते हैं , शहर शहर छोटे डॉक्टर्स को हिस्सा देते हैं उनके भेजे मरीज़ की ली फीस से। जितने भी मरीज़ आएं उनको थोड़े लगते हैं , इक बार नाम पहचान बन गई तो अपने नाम पर कितने हॉस्पिटल खुलवा लेते हैं। अब कौन वहां किस का ऑप्रेशन करता है किसे पता , और कितनो को वास्तव में ज़रूरत थी कितनो का कमाई को किया ऑप्रेशन किसे सोचना है। हर कोई आजकल अपने आप को बेचना चाहता है , अपना नाम बेच हज़ारों करोड़ का कारोबार करने वाले भगवा वेशधारी हैं तो खिलाड़ी भी अभिनेता भी। पैसा पैसा पैसा। मगर दिल को तो बख्श देते भाई दिल को खिलौना नहीं जिस से आप खेल रहे हैं। मैंने आज दिल से पूछा क्या हाल है , उसने जो जवाब दिया वही लिखता हूं आगे आप ध्यान पूर्वक पढ़ना और दिल से काम लेना दिमाग से नहीं। ये दिमाग बस अपने फायदे की बात समझता है और अपने मुनाफे की खातिर तर्क भी घड़ लिया करता है। जैसे ये दिल के डॉक्टर चाहते कुछ और जतलाना कुछ और चाहते हैं। दिल की दर्द भरी दास्तां अब पढ़ो।
                   ये आज की बात नहीं है , मेरे नाम पर हमेशा से लोग खेल खेलते आये हैं। भला किसी पर कोई आशिक हुआ तो बीच में मैं कहां से आ गया। दिल हूं कोई पागल नहीं , धड़कना मेरी आदत है , मेरी धड़कन में किसी का नाम नहीं , अगर अभी भी गलतफहमी है तो अँजिओग्राफी करा देख लो। जब दिल वाले डॉक्टर का उपकरण जाता कोई दूसरा घायल नहीं होता जिसका दावा हो दिल में रहने का। मुझे बिना कारण बदनाम किया जाता रहा , कोई किसी को पत्थर दिल कहता अगर उसके प्यार को नहीं माना दूसरे ने। दिल तो है दिल दिल का ऐतबार क्या कीजे , हद हो गई दिल ही तो है जो आपको ज़िंदा रखता हर हाल में , अगर मुझ पर नहीं तो फिर किस पर ऐतबार करोगे। आपके पैदा होने से पहले से धड़कना शुरू करता और आखिरी सांस तलक साथ निभाता और क्या सबूत चाहते भरोसा करने को। कोई और है आपका अपना या दोस्त तो क्या शरीर का कोई अंग भी। आजकल हर कोई दिल को बचाने को सब करना चाहता है , जैसे दिल की बिमारी नहीं होती तो कोई मरता ही नहीं , सभी हज़ारों साल ज़िंदा रहते और जब चाहते इच्छा मृत्यु पा स्वर्ग सिधार जाते। खुद दिल के डॉक्टर भी दिल का ख्याल नहीं रख पाए और पता ही नहीं चला खुद उनको कब ये नामुराद रोग लग गया। दिल लगाने की बात करते और दिल को बचाना भी चाहते , दिल का रोग बुरा नहीं कभी विचार करना।
                               मैं तो तभी से हैरान था जब से दिल की तरह के गुब्बारे बाज़ार में बिकने लगे थे , लोग इक दूजे को अठन्नी का गुब्बारा देकर कहते ये लो मेरा दिल तुम्हारा हुआ। कोई आशिक ने किया साहस अपना दिल सीने से निकलवा किसी को उपहार में देने का। अब तो दिल भी बदलने लगे हैं डॉक्टर , अब क्या नया वाला लगवाया दिल उसी से मुहब्बत करेगा जिस से वो पुराना बीमार हुआ दिल करता था। या जो प्यार करते वो कहेंगे जनाब आपने तो उस दिल को ही बदलवा लिया जिस में हम रहा करते थे। कौन जाने इस किसी और के दिल को किस से प्यार था और वही बसता होगा अभी भी इसी में। क्योंकि प्यार तो कभी मरता ही नहीं , मौत के बाद भी ज़िंदा रहता है। मेरी मुब्बत जवां रहेगी सदा रही है सदा रहेगी। चिता में जलके भी न मिटेगी , सदा रही है सदा रहेगी। अब तो संभल जाओ मान भी जाओ दिल पर किसी का ज़ोर नहीं , दिल को इस तरह ज़ोर ज़बरदस्ती मत धड़काओ। आपने दिल के नाम पर कितने खेल खेले अभी तक , मैंने कुछ नहीं कहा। लेकिन अब कोई दिल को धनवान बनने का साधन बना रहा तो आप सब मुझ दिल नादान को अपनी मौत का सामान समझ बैठे हो। मेरी चिंता छोडो दिल खोल कर जीना सीखो , ऐसे तो आप हर दिन मरते हो , भला मेरे धड़कते आपको चिंता की क्या ज़रूरत है। आपको जो बात कोई डॉक्टर नहीं समझा सकता मैं बताता हूं , बेकार दिल की चिंता में दिल को रोगी नहीं बनाओ। चिंता चिता समान है , चिंता मुक्त होकर जीना सीखो , दिल खुश रहेगा तो कभी दग़ा नहीं देगा। दिल वाले डॉक्टर की नहीं मेरी सुनो खुद अपने दिल की।

Friday, 5 May 2017

वास्तविकता से आंखे चुराते लोग ( बाहुबली ) डॉ लोक सेतिया

वास्तविकता से आंखे चुराते लोग ( बाहुबली ) डॉ लोक सेतिया


कल इक नई फिल्म देखी बाहुबली। ऐसा लगा जैसे कोई सपनों की दुनिया है। क्या लाजवाब बड़े बड़े भव्य महल पहाड़ नदियां और नज़र को लुभाते चकाचौंध करते दृश्य। दैव्य शक्तियों की अनुभूति और मन को लुभाते नज़ारे। सब से अजीब था आज की विज्ञान की दुनिया में कोई देवता सा शक्तिशाली मसीहा जो असम्भव को आसानी से संभव बनाता हुआ। मनोरंजन के नाम पर हम वास्तविक दुनिया से भाग इक झूठी काल्पनिक दुनिया में खोना चाहते हैं और सिनेमाकार केवल पैसा बनाने को हमें यही परोस रहे हैं। बेशक तकनीक और भव्यता की इक मिसाल दिखाई दी मुझे भी , मगर लाख चाह कर भी , बहुत सोच कर भी मुझे इस फिल्म की कोई सार्थकता समझ नहीं आई। इसके विपरीत मुझे ये लोगों को भटकाती हुई लगी , ताकि इसको देख हम अपनी  दुनिया की कठिन वास्तविकताओं से बचकर खो जाएं सपनों की लुभावनी सुनहरी दुनिया में। सच कहता हूं मुझे समझ नहीं आया मैं इस फिल्म को देख कर क्या राय दूं। फिल्म देखना मेरा जूनून रहा है , कोई समय था जब हर फिल्म का पहला शो देखना मेरी पहली प्राथमिकता या ज़रूरत हुआ करती थी। फिल्म देखना और संगीत ये दो ही काम मैंने अय्याशी की हद तक किये हैं। मगर उन दिनों फिल्म की कहानी डायलॉग और गाने कितने दिनों तक दिमाग पे छाए रहते थे। हर फिल्म देश समाज से जुड़ी कोई सच्चाई उजागर करती  थी , या प्यार अथवा अन्य किसी विषय पर इक सोच प्रकट करती थी। नया दौर , सफर , ख़ामोशी , कागज़ के फूल , दिल इक मंदिर , नया ज़माना , प्यासा , उपकार , हक़ीक़त , रोटी कपड़ा और मकान , जैसी लाजवाब फिल्मों का युग और जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं जैसा झकझोरने वाला गीत , या फिर महिलाओं की वास्तविकता बताती लता की आवाज़ में दर्द भरी वो रचना , औरत ने जन्म दिया मर्दोँ को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया , आज भी सुन कर सिरहन सी पैदा करती है। कहने को फ़िल्मी दुनिया कितनी तरक्की कर चुकी है मगर वास्तव में क्या अपने आदर्श अपने उद्देश्य और अपने धर्म से भटक नहीं चुकी है। मात्र मनोरंजन ही क्या हम सब का मकसद बन गया है। आज हर कोई फेसबुक व्हाट्सऐप पर महान आदर्शवादी दिखाई देता है जबकि वास्तविक जीवन में हम सभी आदर्शों और नैतिक मूल्यों को ताक पर रख चुके हैं। ऐसे में सही मार्गदर्शन देने की जगह अगर लिखने वाले अभिनय करने वाले और फिल्म या टीवी सीरियल बनाने वाले धन कमाने की खातिर इस तरह खुद भी भटक कर दर्शकों को भी भटकाने का कार्य करें तो इसको उचित नहीं कहा जा सकता। आज देश में समाज का हर हिस्सा जैसे अपने कर्तव्य से विमुख हुआ हुआ है तब साहित्य और कला को और संवेदनशील होना चाहिए। मगर इधर लगता है पैसे की चमक ने सभी को अंधा कर दिया है। टीवी वाले इस को इक महान उपलब्धि बता रहे हैं कि ये फिल्म हज़ार करोड़ की कमाई कर सकती है। जबकि सवाल होना ये चाहिए कि हज़ार करोड़ के बदले आपने दर्शकों को दिया क्या है। अपनी असलियत से नज़रें चुराकर इक झूठे ख्वाबों की दुनिया में जीने का पल भर का धोखा देता एहसास , क्योंकि हाल से बाहर निकलते ही आपका सामना अपनी वास्तविक दुनिया से होना ही है।    

Wednesday, 3 May 2017

मिल गया मुझे सच्चा मित्र ( कविता )  ( डॉ लोक सेतिया )

न जाने कब से ,
मुझे तलाश थी ,
इक सच्चे दोस्त की।
कोई ऐसा जो ,
मुझे समझे और ,
अपना बना ले मुझे ,
मैं जैसा भी हूं ,
बिना कोई कमी बताये।
जो हर हाल में निभाए ,
साथ मेरा उम्र भर ,
सुःख -दुःख में ,
जीवन की कठिन डगर पर ,
नहीं बिछुड़े कभी भी मुझसे।
और मैं आज तक उदास रहा ,
जिया इक निराशा को लेकर ,
कि मुझे इस सारी दुनिया में ,
नहीं मिल सका कोई भी ,
दोस्त जैसा मेरी कल्पना में था।
आज सोचा शायद पहली बार ,
समझा और किया एहसास भी ,
कोई कदम कदम चलता रहा है ,
जीवन भर मेरे साथ बनकर दोस्त ,
बिना मुझे महसूस हुए भी ,
और मेरी हर परेशानी को ,
हर कठिनाई को दूर करता रहा ,
बिना कोई एहसान या उपकार ,
करने का दुनिया वालों की तरह ,
मुझे करवाए ज़रा सा भी मुझे।
मैंने जाने कितनी बार अपना भरोसा ,
उस प्रभु के होने नहीं होने का ,
टूटता बिखरता हुआ अन्तरमन में ,
किया है महसूस भी अक्सर ,
तब भी बिना मेरे विश्वास के ,
होने या नहीं होने का विचार किये ,
कभी किसी कभी किसी रूप में ,
उसने आकर मेरा हाथ थामा है ,
और पल पल डोलती मेरी जीवन नैया ,
को हर मझधार हर तूफ़ान से ,
बचाकर लाया है हर बार किनारे पर।
सामने नहीं दिखाई देता फिर भी ,
वही एक है जो मेरा ही नहीं ,
हर किसी का साथ देता ही है ,
नहीं बदले में चाहता कुछ भी ,
कभी रूठता नहीं खफ़ा नहीं होता ,
अपनाता है हर किसी को सदा ,
उस से अच्छा सच्चा दोस्त ,
पूरी दुनिया में दूसरा कोई नहीं ,
मैं जिस को ढूंढता रहा इधर उधर ,
वो तो पल पल था मेरे पास ही ,
मैंने ही उम्र गंवा दी उसको ,
समझने पहचानने  में कितनी ,
मिल गया है मुझे मेरा सच्चा मित्र ,
कभी जुदा नहीं होने को आज।