जून 16, 2017

POST : 666 पी लिया जाम इक बेखुदी मिल गई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

         पी लिया जाम इक बेखुदी मिल गई ( ग़ज़ल ) 

                       डॉ लोक सेतिया "तनहा"

पी लिया जाम इक बेखुदी मिल गई
मिल गए आप तो ज़िंदगी मिल गई । 

इश्क़ ऐसे हुआ जिस तरह से से कहीं
खुद समंदर से आकर नदी मिल गई ।

जल रहा धूप में था हमारा बदन
पर तभी प्यार की चांदनी मिल गई ।

उम्र भर हम अकेले ही चलते रहे
ढूंढते थे उसे शायरी मिल गई ।

ख्वाब हर रात "तनहा" वही देखता
मोड़ पर ज़िंदगी थी खड़ी मिल गई । 
 

 

जून 15, 2017

POST : 665 शुद्धिकरण की ज़रूरत ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      शुद्धिकरण की ज़रूरत ( तरकश )  डॉ लोक सेतिया

    मुझे इक कवि की वो कविता आई याद , जो उन्होंने लिखी थी जयप्रकाश नारायण जी के आंदोलन को लेकर सत्ता पर कटाक्ष करते हुए। सब दरवाज़े बंद कर लो खिड़कियों के पर्दे गिरा दो क्योंकि एक सत्तर साल का बूढ़ा आदमी निकल पड़ा है बिना कोई हथियार लिए सच बोलता हुआ। कल वही देखा बहुत लोगों की बड़े बड़े पदों पर बैठे तथाकथित पढ़े लिखे सभ्य भाषा में अच्छी अच्छी बातें बोलने वालों की सारी सभ्यता सब शराफत तमाम शिष्टापूर्ण आचरण नग्न हो गया जान 6 6 साल का इक आदमी मैं जा पहुंचा उनसे सवाल करने। ऐसा क्या तूफ़ान खड़ा हो जाता अगर मैं उनको दिखला देता आपकी सजावट झूठी है , गंदगी वहीं है जिस जगह आपने कार्पेट बिछाया हुआ है। इस तरह मैंने अपने सामने खूबसूरत लिबास पहनी सभ्यता को नंगा देखा , ऐसा कोई पहली बार तो नहीं हुआ मगर जिस तरह हुआ वो पहली बार था। आप इतने लोग इतनी व्यवस्था ताम झाम साथ लेकर साबित करने आये थे हम स्वच्छता की बात करने आये हैं और आपके आचरण की गंदगी सामने आ गई। अभी उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री बनते किसी भगवा वेषधारी ने पहले वाले शासक के खाली किये घर को गौ मूत्र से धुलवा पूजा पाठ से शुद्ध कर ग्रहप्रवेश किया। काश कोई उपाय इस सड़े गले लोकतंत्र की शुद्धि का भी होता और पहले विधायक संविधानानुसार अपना दायित्व निभाते नेता चुनते न कि आलाकमान किसी का मनोनयन कर देश की राजधानी से तय करता किसको आपने अपना नेता चुनना है जो मुख्यमंत्री कहलायेगा। चार दिन तक फिर नए मंत्री मीडिया को साथ लेकर दफ्तरों से पान की पीक साफ कराते मिले , किसी को व्यवस्था और कार्यप्रणाली पर लगे निरंकुशता के अन्याय और मनमानी से सत्ता शासन के दुरूपयोग के दाग़ धब्बे नज़र नहीं आये। पिछले सप्ताह मैं अपने शहर के सचिवालय गया किसी सरकारी काम से तो देखा अगले दिन मुख्यमंत्री को आना इसलिए बहुत स्वच्छता का प्रबंध किया गया है मगर जहां सब अधिकारी बैठे काम कर रहे थे उनके पीछे रखी मेज़ों जिन पर तमाम फाइलें रखी थी जाने कितनी धूल जमी हुई थी जो भीतर जाकर देखी मैंने बाहर से किसको नज़र आती। सफाई करना नहीं की हुई दिखाना था। 
 
                                     ये कैसी विडंबना है सत्ता मिलते हर नया शासक खुद को पाक साफ दूध का धुला बतलाता है और जो जो पहले थे सब अपराधी पापी थे कहने लगता है। जबकि तमाम लोग जो तब उधर थे आज आपकी सरकार में शामिल हैं। आपका दल क्या गंगाजल है जिसमें आकर नहाये अपराधी भी पुण्यात्मा बन जाते हैं जब उनसे आपकी सरकार बहुमत साबित करती है। बड़े बड़े वादे किये हुआ कुछ नहीं , उल्टा जो जो कहते थे पहली सरकार गलत करती है उसको ही करते रहे और अधिक मगर अब अच्छा बताकर। व्यवस्था तो बदली नहीं आपकी सोच बदल गई हर बात पर , अपनी कही बाद के उल्ट करना सत्ता पाकर बिना लाज शर्म क्या बात है। जनता को बदलाव नज़र नहीं आता , केवल बदले विज्ञापन दिखाई देते हैं , महानता के खुशहाली के। मगर ख़ुदकुशी करते किसान और बेरोज़गार होती युवा पीढ़ी को विज्ञापन नहीं अधिकार चाहिएं। देश विदेश की यात्रा और हर जगह जाकर धार्मिक होने का दिखावा नहीं आपको अपना राजधर्म निभाना था। आपको गरीबों की सुध लेनी थी मगर आप केवल अपने दल को सत्ता दिलवाने तक की सोच लिए रहे और अभी भी आपको वादे निभाने की चिंता नहीं है , चिंता अगला चुनाव जीतना है की है। इस पर भाषण देते देश की खातिर सब त्याग दिया है। अगर सत्ता पाकर सादगी से रहते और जो अभी तक होता आया जनसेवक बन शाही जीवन जीना तो कोई बात भी थी।  मगर आपने तो सब पहले से और अधिक हासिल किया और अपने गुणगान पर देश का खज़ाना लुटवाया मीडिया वालों के मुंह बंद रखने को। महलों में राजा महाराजा की तरह रहते गरीबों के मसीहा होने का दम भरना कितना भद्दा मज़ाक है। हर शासक अपना खज़ाना भरता है गरीबों की कमाई छीन कर , सत्ता से बड़ा कोई भिखारी नहीं है। सरकारों की तिजोरी भरती ही नहीं कभी भी किसी भूखे राक्षस के पेट की तरह। 
 
                           आज़ादी का ऐसा ढंग ऐसा रूप होगा शायद उन्होंने इसकी कल्पना भी नहीं की थी जो देश की आज़ादी की खातिर कुर्बान हुए। कलयुग इसी को कहते हैं , चोर डाकू लुटेरे सब गरीब जनता से छीनी कमाई से आलिशान महलों में रहते हैं और देवताओं का भेस धारण किया हुआ है। सबने पहले साधु संतों के आत्मिक शुद्धि के लिए सन्यास लेने की कथाएं पढ़ी सुनी हैं। कभी किसी ने किसी कुटिया की मकान की शुद्धिकरण की बात कही हो नहीं पढ़ा सुना। ये कोई नए तरह का धर्म है। आप किस शुद्धिकरण और स्वच्छता की बात करते हैं जब तमाम अपराधी आपके दल में शामिल हैं , तमाम बाहुबलियों से आपका भाईचारा है। सब से ज़्यादा गंदगी उसी राजनीति में है जिस कीचड़ में आप खुद भी हैं। आप किसी और नेता पर कटाक्ष करते हैं नहाते समय रैनकोट पहनते हैं तभी कोई दाग़ उन पर नहीं लगा। अपने सुंदर वस्त्र के नीचे कभी तो देखा होगा भीतर कितनी मैल है। मन का मैल गंगा स्नान से भी नहीं मिटता आप जानते हैं। अदालत बेगुनाह बताती है का मतलब कभी ये नहीं होता कि कत्ल हुआ नहीं , कातिल पर इल्ज़ाम साबित नहीं होना निर्दोष होना नहीं है। काश कोई डिटरजेंट बना होता ऐसा जो राजनीति के मैल को साफ कर सकता। अगर कोई संत महात्मा पंडित मुल्ला पादरी ज्ञानी उपाय जानता हो इंसान के मन की सोच को साफ करने का तो देश की जनता अपना सब कुछ देकर भी सब दल के नेताओं को मन आत्मा से शुद्ध करवा लेती और सब समस्याओं से निजात मिल जाती। सब से अधिक गंदगी वहीं हैं जहां पर सत्ता के लुभावने शानदार कारपेट बिछे हैं।

जून 14, 2017

POST : 664 स्वच्छता अभियान या कुछ और ( आज की बात ) फतेहाबाद का पपीहा पार्क अभी अभी का सच डॉ लोक सेतिया

      स्वच्छता अभियान या कुछ और ( आज की बात )

                   फतेहाबाद का पपीहा पार्क अभी अभी का सच 

                                              डॉ लोक सेतिया 






अभी अभी मेरे घर के सामने भाषण दिया जा रहा था , सुन कर मैं जब पहुंचा तब सब से प्रमुख अधिकारी धन्यवाद कर रहे थे अपनी बात को खत्म करते हुए। मैं दो साल से यहां की गंदगी को लेकर लिखता रहा हूँ हर अधिकारी को हर तरह से। सुबह जब जाता हूँ सड़क पर पांव रखने को जगह नहीं होती इतनी गंदगी फैली होती है। आज क्योंकि सरकारी आयोजन करना था इसलिए कुछ हद तक सफाई की गई दिखावे को और जो गंदगी डालते उनको आज रोक दिया गया। क्या इस तरह भारत स्वच्छ होगा झूठ दिखला कर। मैंने मंच पर जाकर उन अधिकारी से कहा कि जो आप बोल रहे वो झूठ है मैं आपको बताता सच क्या है। और मुझे वहां से बलपूर्वक बाहर धकेला गया , प्रशासनिक लोगों और पुलिस अधिकारीयों द्वारा। आप कहते हैं आपको बताया जाये क्या कहाँ गलत होता है मगर आप सच को खामोश करना चाहते हैं। किसी ने कहा आप बाद में मिल कर बताना जो वास्तविकता है , मगर अपमानित किये जाने के बावजूद भी मैंने फिर वापस अपनी गाड़ी की तरफ जाते उन अफसर से कहा क्या दो मिंट बात सुनोगे। मगर उनके इशारे से पहले ही पुलिस वाले मुझे ज़बरदस्ती पकड़ दूर ले गए। शायद उनको परवाह ही नहीं कि उनको ऐसा करने का अधिकार है भी या नहीं। जो उन सब की नज़रों में दिखाई दिया वो साफ था कि उनका बस चले तो वो मुझे कुछ भी कर सकते हैं।  कम से कम ऐसी पुलिस से सुरक्षा की उम्मीद तो नहीं की जा सकती। क्या यही सुशासन है , आप एक तरफ इमरजेंसी के कैदियों को पैसे देते हैं साथ ही बिना आपत्काल घोषित किये उसी तरह का अलोकतांत्रिक आचरण करते हैं। शायद इनको याद नहीं ये शासक नहीं हैं और कोई राजा नहीं है। जनता या किसी नागरिक पर इस तरह पब्लिक प्लेस में आपको रोक लगाने की अनुमति नहीं है।  सब से विचित्र बात ये होती है कि हम जो लोग भी भीड़ बन जमा होते हैं वो कभी साहस ही नहीं करते उनसे निडर होकर बात करने का। आज जब मुझ अकेले से बात करने से बच रहे थे वो वास्तव में खुद डर रहे थे क्योंकि उनमें सच का सामना करने का साहस ही नहीं था। तंत्र की ये सारी ताकत भी उनको अपने झूठ की पोल खुलने से बचा नहीं सकती थी , और इस तरह मुझे अथवा किसी भी आम नागरिक के सवाल  का जवाब नहीं देकर पुलिस द्वारा हटाने को देखना उनकी देश की सेवा और जनता के अधिकारों की रक्षा करने की शपथ का उपहास कर साबित कर रही थी कि आप में संविधान और नागरिक  के मौलिक अधिकार जिन में विरोध की बात कहना भी शामिल है का पालन नहीं कर रहे हैं।  आप अँधेरा फैला कर उसको रौशनी का नाम देना चाहते हैं। आज की यहाँ की असली तस्वीर भी आपको देखनी ज़रूरी हैं।

लेकिन कल सुबह आपको अख़बार में खबर मिलेगी हरियाणा के फतेहाबाद शहर की स्वच्छता अभियान की सफलता और खुले में शौच मुक्त और आवारा पशु से मुक्त होने पर मिले सम्मान के बाद स्वच्छता के इस आडंबर की भी। किसी टीवी या अख़बार वाले को कुछ भी नज़र नहीं आएगा।  मुझे  ये सब करते बयालीस साल हो गए हैं।  आपातकाल से ही लिखता आया हूँ और 2 5 जून 1 9 7 5 को लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी के भाषण सुनने वाले में रहा हूँ। जिनको पता नहीं उनको बताना चाहता हूँ जिन शब्दों के उपयोग की बात की आड़ लेकर एमरजेंसी लगाई थी वो क्या थे।

        जे पी जी ने कहा था सुरक्षा कर्मियों से कि अगर कभी कोई शासक आपको शांतिपूर्वक विरोध करती जनता पर लाठी या गोली चलाने को कहे तो आपको उनका आदेश नहीं मानना है। क्या भाजपा आज मानती है ऐसा बोलना गुनाह था। अगर नहीं तो जो आज मेरे साथ हुआ या किसी और जगह किसी और के साथ होता है तब पुलिस का ऐसा आचरण उचित है। आपकी कथनी और करनी में अंतर होगा तो इतिहास आपको मुजरिम ठहराएगा ही। इतिहास ने वो मंज़र भी देखे हैं , लम्हों ने खता की थी सदियों ने सज़ा पाई। आज की ये बात भी लिखी जायेगी किसी न  किसी रूप में।


जून 12, 2017

POST : 663 हम सब देशभक्त हैं ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया

    हम सब देशभक्त हैं (  आठवां सुर  )  डॉ लोक सेतिया

   कल ही की बात है , टीवी देख रहा था , जबकि अब टीवी देखना मुझे अपराध जैसा लगता है।  किस दुनिया की बातें हैं समझ नहीं आता , असली दुनिया में तो नहीं ऐसा। विडंबना ही है टीवी अख़बार फिल्म क्या संगीत तक कहानी भी फिल्मों टीवी सीरियल की केवल मनोरंजन को हैं सब। क्या मनोरंजन जी जीवन है या जीवन से भटकाव है। इक तथाकथित रियल्टी शो में इक भगवा वस्त्र डाले बाबा जी कहलाने वाले अतिथि थे , चंद्रशेखर आज़ाद का अभिनय किया बच्चे ने और बाबा जी भावुकता जतलाते कहने लगे वो शहीदों की गाथाएं पढ़ते पढ़ते बड़े हुए हैं। आदत के अनुसार खूब नारे भी लगाए भारत माता की जय के , और महान देशप्रेमी बन गए। ये आसान तरीका है देशभक्ति प्रदर्शन का। विदेशी भी देश को इसी तरह लूटते रहे सस्ता लेते और कई गुणा महंगे दाम अपना सामान बेचते। दावा जो भी करो आप हज़ारों करोड़ के मालिक बन गए और जिन का सामान बेचा वो गरीब किसान भूखे है तो इसको शोषण नहीं तो और क्या समझा जाये। देश को तन मन धन अर्पित करना किसी को आता है , लोग बदहाल और कुछ कारोबारी मालामाल ये न तो देशभक्ति है न कोई धर्म है मानवता तो कदापि नहीं। आधी जनता को रोटी नहीं मिलती और उस की बात का भाषण भी जिस सभा में हर दिन देते नेता लोग उसके मंच की सजावट पर ही लाखों बर्बाद किये जाते। किसी मंत्री को सांसद विधायक को एहसास हुआ कभी , क्या उनका लाखों रूपये हर दिन खर्च करना अपने आप पर देश के प्रति अपराध नहीं है। जो भी उद्योगपति या कारोबारी सैंकड़ों प्रतिशत मुनाफा लेकर मालामाल होते हैं जबकि खेती किसानी करने वाले उनके सामान के खरीददार को लागत मूल्य को जूझना पड़ता है क्या देशभक्त हैं। आपने टीवी पर या मैदान में कोई खेल देखा और अपनी देशभक्ति साबित कर ली। वही खिलाड़ी इतना धन पाकर भी अपने नाम और शोहरत को बाज़ार में बेचते हैं और अमीर बनने को। मेरा मानना है देश की गरीबी का एक मात्र कारण ही थोड़े से मुट्ठी भर लोगों की अधिक पाने की हवस है। क्योंकि उनके पास ज़रूरत से बहुत अधिक है इसीलिए बाकी भूखे हैं गरीब हैं। और इस में नेता अधिकारी कारोबारी क्या अभिनेता तक शामिल हैं , इन को जो मिलता है वो आता उन्हीं गरीबों की जेब से है जो भूखे हैं बदहाल हैं। 
 
         साहित्य की बात और कला की बात सार्थक तभी होती है जब वास्तविक समाज की दशा दिखाई दे। बाहुबली की बात कितनी सार्थक है , आज की फ़िल्में क्या संदेश देती हैं। जो खुद भटक गए अपनी राह से उनसे आशा रखना मार्ग दिखाने की क्या मुमकिन है। जिसे देखो इक अंधी दौड़ में भाग रहा है धनवान बनने की। इक बात शयद भूल गए जो बचपन में पढ़ी थी हाउ मच लैंड ए मैन नीड्स , कितनी ज़मीन चाहिए आदमी को , बस दो गज़ मिलती है आखिर। इक बादशाह को वो भी नहीं मिली इसी का मलाल था उन्हें , ज़फ़र जी की ग़ज़ल याद है , ऐसा है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए , दो गज़ ज़मीन भी न मिली कुए यार में। 
 
आज बड़े बड़े खबरनवीस कहलाने वाले मीडिया पर काबिज़ लोग क्या जानते भी हैं खबर क्या होती है , खबर की परिभाषा उनको याद भी है। जिस बात का शोर हर तरफ हो रहा उसको खबर नहीं कहते। खबर तो वो सूचना है जो कोई जनता तक पहुंचने नहीं देता जिसको तलाश कर सब को बताना आपका कर्तव्य था। 
 
        अभी दो टीवी के रियल्टी शो फिर शुरू होने वाले हैं , बिग बॉस और कौन बनेगा करोड़पति। मैंने पहले भी लिखा है करोड़पति बनाने का ये ख्वाब इक धोखा है , साहस है तो किसी एपिसोड में अपना सच बताएं इसके आयोजक संचालक प्रस्तुत करने वाले। इस से कितने लोग अमीर बने और कितना धन आपको मिला , ये लूट का आधुनिक तरीका है। आप लोगों को जुआरी बना रहे हैं और खुद मालामाल हो रहे हैं। उसके बाद भले किसी मंदिर में करोड़ों का चढ़ावा देना पहले सोचना ये कमाई मेहनत की तो नहीं है। आप ध्यान से देखो आपको जो महान लोग लगते हैं वो वास्तव में कितने छोटे हैं , उनका कद उनकी ऊंचाई दूसरों पर चढ़कर मिली हुई है। जब तक देश के सब से बड़े पद पर आसीन राष्ट्रपति एक सौ पचास एकड़ के महल में शाही शान बान से अपने आप पर रोज़ लाखों खर्च कर गरीबी का मज़ाक उड़ाएगा तब तक आज़ादी और लोकतंत्र बेमतलब के जुमले ही रहेंगे असलियत कभी नहीं। 
 
              इक नशे के आदी हो गए हैं लोग , फेसबुक व्हाट्सएप्प पर दिन भर बड़ी बड़ी ज्ञान की बातें। आस पास कभी नज़र डाली क्या होता है। आपको अच्छा वेतन मिलता है सुख सुविधा है मगर आपका कर्तव्य भी कोई है अपने देश के लिए। अपना फ़र्ज़ निभाए बिना देशभक्त बन गए केवल भाषण देकर बातें कर के झूठे नारे लगा कर। बिग बॉस जैसे आयोजन से समाज को क्या मिलता है , गंदगी। आप उसका हिस्सा हैं पैसे के लिए और बीइंग ह्यूमन की बात भी साथ साथ। डाकू भी लूट कर दान भी दिया करते थे। दान धर्म कभी पाप की कमाई से नहीं किया जाता।  देश का नेता अगर जनकल्याण को भुला मंदिरों में पूजा पाठ करता है तो उसे धर्म ग्रंथों को फिर से पढ़ना होगा। सारी उम्र प्रचारक बने समझाते फिरे देश पहले बाकी बाद में , अब सत्ता पहला ध्येय और देश से पहले अपना राजनितिक दल। अंत कोई नहीं विषय का , मगर कहीं तो बात को विराम लगाना होगा , तो आखिर में दुष्यंत जी की ग़ज़ल के शेर हाज़िर हैं। 

               अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार ,

               घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार। 

               मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं ,

               बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार। 


 

                                            

जून 11, 2017

POST : 662 मेरी कालजयी रचना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

            मेरी कालजयी रचना ( व्यंग्य )  डॉ  लोक  सेतिया

  बड़ा ही सुंदर नज़ारा है , मंच सजा हुआ रंग बिरंगे फूलों से , उत्सव सा माहौल , खचाखच भरा हाल। साहित्यकार बुद्धीजीवी वर्ग और मेरे सभी सब दोस्त रिश्ते नाते वाले , मुझ से जलने वाले भी बैठे हुए हैं। मुझे मंच पर बैठा देख रहे सब लोग , इंतज़ार कर रहे हैं कि कब देश के सर्वोच्च पद पर आसीन महानुभव मंच संचालक के बुलावे पर उठ कर आएं और मुझे साहित्य लेखन और उम्र भर जनहित की बात करने पर पुरुस्कृत एवं सम्मानित करें। आखिर वह पल आ ही गया और मुझे मुख्यातिथि द्वारा फूलों का गुलदस्ता भेंट कर प्रशस्ति पत्र और सम्मान राशि का चेक दिया गया और सभा के सभी उपस्थित लोग तालियां बजा कर मेरा अभिवादन कर रहे थे। इस मुख्य काम की औपचारिकता पूरी होने के बाद मंच संचालक ने मुझे डायस पर आने और आज जिस रचना और कार्य की खातिर ईनाम मिला उन सब की बात बताने का आग्रह किया। मैंने तुरंत माइक को अपने अनुसार सही किया और अपनी बात विस्तार से बतानी शुरू की। ऐसा अवसर मुझे पहली बार मिला था और शायद अंतिम बार भी यही हो मुमकिन था। ये ईनाम जिस रचना पर मिला उसकी बात आखिर में करना उचित होगा , मैंने कहना शुरू किया इन शब्दों से। कहानी का अंत शुरू में पता चल जाये तो कहानी का लुत्फ़ नहीं रहता है। शुरू से बताता जो जो भी हुआ। 
 
           कुछ भी हो सकता है आज यकीन हुआ मुझे भी , अभी कुछ महीने पहले मेरे पासक्या था , अनाम इक लेखक। सभी कहते थे आप ने क्या हासिल किया है , साहित्य अकादमी क्या किसी स्थानीय संस्था तक से कोई पुरुस्कार सम्मान नहीं , किसी प्रकाशक से कोई किताब छपवाई नहीं। कितने साल से लिखते हर विधा में लिखा और देश भर में रचनाएं छपती रहीं फिर भी आपकी गिनती किसी में नहीं। सैंकड़ों व्यंग्य सैकड़ों ग़ज़ल कविताएं और जीवन की वास्तविकता पर मन को छूती कहानियां और झकझोर देने वाली रचनाएं आपके लिखे जनहित पर निडरता पूर्वक बेबाक लेख , इंसानियत के दर्द को कितना अच्छी तरह बयान किया है आपने। आपका अपना तरीका है सीधे साफ आसान शब्दों में बगैर कठिन गूढ़ शब्दों का उपयोग किये , अपनी खुद की शैली में लिखना बगैर किसी और से प्रभावित हुए आपकी रचना पढ़ना इक अनुभव कराती है। आपने क्यों अन्य मित्र लेखकों की तरह तमाम किताबें नहीं छपवाई , आपको ईनाम पुरुस्कार मिलते कैसे। आप किसी सरकारी संस्था , साहित्य अकादमी के सदस्य भी रहे नहीं कभी , किसी नेता अधिकारी से दोस्ती करके। जबकि अधिकतर लेखक खुद ये सब करते हैं अपनी ही जेब से पैसा खर्च कर किताबें छपवाना क्योंकि उनका मानना है इसी तरह उनका नाम सदा कायम रहेगा , दो सौ प्रतियां किताब की छपवा मुफ्त में पहचान वालों में बांट कर।

                          मैं भी सभी लिखने वालों की तरह चाहता था , मेरी भी किताबें कोई प्रकाशक छापता , मगर किसी ने संपर्क किया ही नहीं कभी। खुद अपने पैसे खर्च कर कुछ प्रतियां मुफ्त में बांटना वो भी उन को जिनको शायद पढ़ने में रूचि भी नहीं हो , मुझे उचित लगा नहीं। और अख़बार पत्रिका वाले भी बहुत कम हैं जो उचित मानदेय भी देना चाहते हों। करोड़ों की आदमनी करने वाले तक हिंदी के लेखक को इतना भी नहीं देना चाहते जिस से उस का जीवन यापन हो सके। शोषण की बात लिखने वाले लेखक खुद शोषण का शिकार हैं। मगर अख़बार और पत्रिका वाले नहीं मानते वो कोई गलत काम करते हैं , उनका विचार है वो रचना छाप कर लिखने वाले पर एहसान उपकार कर साहित्य की सेवा करते हैं। उनको रोटी की ज़रूरत है पेट भरने को मगर लेखक को भूख कहां लगती है , उसकी भूख तो छपने की ही है। कानून बदल गया हो तो क्या , आज भी जाने माने लेखकों को रायल्टी कौन देता है , भीख की तरह नाम को राशि देकर सभी अधिकार खरीद लेते हैं , गैर कानूनी ढंग से भी। मुझे इस सब से तालमेल बिठाना नहीं आया।

                     मगर अचानक कुछ महीने पहले मुझे इस बात का ख्याल आया कि , कोई नेता अपने भाषणों के जादू से ऐसा रुतबा हासिल कर चुका है जो भगवान से कम हर्गिज़ नहीं है। सब लोग समझते हैं जैसे कोई फरिश्ता या मसीहा ज़मीं पर उत्तर आया है हमारे सब दुःख दर्द मिटाने को। अब गरीबी भूख , अव्यवस्था , भरष्टाचार और महिलाओं बच्चों के शोषण , देश में फैली गंदगी जैसी समस्याओं का अंत कर अच्छे दिन सब को दिखाई देने लगेंगे। देश विदेश में भारत का नाम रौशन होगा और कोई किसान मज़दूर क़र्ज़ से तंग आकर आत्महत्या नहीं करेगा। सब को रोज़गार मिलेगा और सब अधिकार समानता के भी बराबर सबको। तीन साल तक कुछ भी ऐसा किये बिना ही टीवी अख़बार और सोशल मीडिया के उस चतुर खिलाड़ी ने विज्ञापनों द्वारा हर तरफ अपने नाम की गूंज खड़ी कर दी है। कोई जब उसको झूठा बताता है तब लोग मानते हैं जैसे कोई अधर्मी पापी भगवान का अपमान कर रहा है। जैसे कोई जादूगर तमाशा दिखलाता है और जो असंभव उसको देख हम सच समझने लगते हैं ,उसी तरह , मगर अंतर है हाल से बाहर निकलते हम समझ लेते जो देखा नज़रों का धोखा था असलियत नहीं। लेकिन इस जादूगर नेता का सम्मोहन खत्म नहीं होता बढ़ता जा रहा है। तब मुझे लगा बहुत लोग कोई आरती कोई चालीसा लिखते हैं चढ़ते सूरज को प्रणाम कर। मैंने ढूंढा तो पता चला अभी तलक नहीं सूझा किसी को ये। शायद मुझे ही करना होगा ये महान काम , इक भजन लिखना जो जन गण मन और सारे जहां से अच्छा गीत की तरह लोकप्रिय हो। जिस के बारे सरकार घोषणा कर दे कि इस भजन को गाने से सब समस्याएं हल हो जाएंगी और अच्छे दिन आ जाएंगे। जब मैंने ये अपना विचार सरकार को भेजा तो उसे पसंद आया ताकि हर विज्ञापन के साथ जोड़ इसको सोशल मीडिया पर उपयोग किया जा सके। और मैंने ये भजन लिखा।

           अब दिन अच्छे आये हैं , गूंगे भी सब गाये हैं। 

  भजन की धूम से हर तरफ मेरा नाम छा गया , और प्रकाशकों ने मेरा छपा अनछपा सब मुंह मांगे दाम देकर किताबों के रूप में छापा ही नहीं अन्य भाषाओं में अनुवादित भी किया। मुझे इक भजन ने मालामाल कर दिया है , मैं सुबह शाम उसी को गाता हूं और रोज़ बहुत कुछ मनचाहा पाता हूं। आप भी इस को जपना शुरू करो ताकि आपका भी कल्याण हो। मेरा संबोधन सुनकर सब तालियां बजा अभिवादन कर रहे थे खड़े हो कर। अचानक श्रीमती जी ने मुझे झकझोर कर जगा दिया , उठो अब दिन निकल आया है कब तक सोते रहोगे। काश मेरी नींद खुलती नहीं और मेरा सपना सच हो जाता , मेरा लिखा भजन राष्ट्रीय भजन घोषित किया जाता। कालजयी रचना इसी तरह रची जाती है।

POST : 661 एक दिन को सब कुछ ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    एक दिन को सब कुछ ( हास-परिहास )  डॉ लोक सेतिया

एक दिन दीपावली मनाते हैं ,
एक दिन दशहरा भी मनाते हैं ,
एक दिन उजाला करते हैं मन में ,
एक दिन बुराई को जलाते हैं ।

एक दिन को आज़ादी  है मिलती ,
एक दिन वोट दे सरकार बनाते हैं ,
एक दिन को मालिक बन कर फिर ,
पांच बरस सभी बस पछताते हैं ।

एक दिन के खेल बहुत हैं यहां पर ,
हर दिन इक तमाशा बनाते हैं ,
एक दिन हर किसी को देकर हम ,
साल भर उसको भूल जाते हैं ।

एक दिन महिला दिवस  होता है ,
एक दिन बाल दिवस मनाया जाता ,
एक दिन पृथ्वी दिवस भी है यहां ,
एक दिन पर्यावरण को बचाते हैं ।

एक दिन मज़दूर की बात करते हैं ,
एक दिन गणतंत्र दिवस सजाते हैं ।

एक दिन स्वच्छता की बात होती है ,
बाद में गंदगी सभी फैलाते हैं ,
एक दिन होली और ईद का मिलन ,
बाकी दिन भाईचारा क्या भूल जाते हैं ।

हर दिन तथाकथित पढ़े लिखे लोग ,
कोई न कोई सभा मिलकर कराते हैं ,
झूठ आडंबर की बड़ी बड़ी बातें कर ,
सभ्य और बड़े महान बन जाते हैं ।

एक दिन को सब धर्मात्मा हैं यहां ,
गरीबों को भी जब खाना खिलाते हैं ,
मगर उन्हीं को करते नफरत भी हैं ,
लूट कर भी हम उनको ही खाते हैं ।

एक दिन को खाई कसम ईमानदारी की ,
अगले ही पल जिसे भूल भी जाते हैं ,
हर दिन सोचते इक दिन जीना भी है ,
एक दिन यूं ही पर मर ही जाते हैं ।

अब एक दिन ऐसा भी करें काश ,
एक दिन की रस्म को तोड़ आते हैं ,
जो भी करना हर दिन करें या फिर ,
अच्छाई को छोड़ बुरे कहलाते हैं । 
 

 

जून 10, 2017

POST : 660 भगवान हुए परेशान ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    भगवान हुए परेशान ( हास-परिहास )  डॉ लोक सेतिया

भगवान सदियों से सोये हुए थे
आखिर उनको जगाना ही पड़ा
हर पत्नी का यही तो फ़र्ज़ है
पत्नी को भी उसे निभाना ही पड़ा ।
 
उठे नहाये धोये खाया पिया तब 
उसको कर्तव्य बताना ही पड़ा
जाओ दुनिया का हाल भी देखो
परमेश्वर को ये समझाना ही पड़ा ।

पता चला कहीं भीड़ लगी हुई है
चले गए भगवान उसी जगह पर
लेकिन इतना शोर था सभा में
सुनते हर कोई जाएगा ही डर ।
 
चढ़ गए भगवान मंच पर जब 
किसी की नहीं उनपे पड़ी नज़र
कोई नेता जिस दिशा से आ रहा
सभी देखने लग गए थे बस उधर । 

आखिर उनको समझ नहीं आया
ये कोई क्या है हुआ अवतार नया 
सब सर उसी को झुकाए खड़े हैं
करते उसी की सभी जय-जयकार ।
 
संचालक को परिचय देकर तब
कहने लगे दुनिया के पालनहार
खुद मैं आया हूं धरती पर आज
करने सब दुखियों का खुद उद्धार । 

मंच संचालक ने मांगा तब उनसे
परिचय पत्र , वोटर कार्ड आधार
भगवान के पास नहीं था लेकिन
कुछ भी सरकारी आमंत्रण पत्राचार ।
 
समझाया भगवान को तब यही
नहीं मिलेगा कुछ भी इधर जाओ
जाकर कहीं और ढूंढो अपने लिए 
जगह कोई दफ़्तर या कोई घरबार । 

बहुत सभाएं देखी जा जाकर मगर
नहीं दे पाए अपनी कोई भी पहचान
कैसे प्रमाणित करते ईश्वर धरती पर 
वही हैं अपनी इस दुनिया के भगवान ।
 
हालत खराब देख आया इक लेखक
पूछा क्या हुआ किसलिए हुए परेशान 
अब तुझे कोई कैसे जानेगा यहां पर
बना लिए कितने सभी ने यहां भगवान ।

कोई नेता बना खुदा है देता वरदान
कोई खिलाड़ी बन गया है भगवान
अभिनेता कोई ईश्वर टीवी पर देख   
 निराली उसकी शान करती है हैरान ।
 
तुम तो पत्थर की मूरत बनकर 
बैठे रहते चुपचाप करते पश्चताप 
कोई तुमको प्रवेश नहीं देगा यहां 
तुम ऐसे हो बिन बुलाये मेहमान । 

असली नकली सब असली लगते हैं 
नकली लगते हैं इक खुद हो भगवान
नकली असली हैं , और मैं नकली हूं
भगवान तेरी मर्ज़ी , मान चाहे न मान ।
 
वापस जाना भी बहुत कठिन है
आया था ले क्या क्या अरमान
सच बताया जाकर पत्नी को गर 
घर से बाहर होगा अपना सामान । 

घूम रहा इधर उधर समझाता 
इस दुनिया का हूं मैं भगवान
सब को कोई पागल लगता है
अपना नाम हुआ ऐसा बदनाम ।
 
लेखक से जाकर पूछा उपाय
क्या मेरा लिखोगे हुआ अंजाम
रिटायर हो जाओ यही उचित है
नहीं करने को कोई अब काम । 

सब जाते जाने किधर किधर
सोच वहीं मिलता है भगवान
सामने आये जब खुदा भी तब
कहते जाओ छोड़ो भी जान ।
 
धर्म कर्म किसको चाहिए अब
झूठे रटते रहते सब कोई नाम
ये सारे भगवान खुद ही बने हैं
तुम किस के हो अब भगवान । 

देख दशा भगवान की समझ मुझे
आई  इतनी सी खरी इक बात है
सूरज आसमान पर चमक रहा है
दिन लगता जैसे अंधियारी रात है । 
 
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जून 08, 2017

POST : 659 भगवान धर्मराज की अदालत में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     भगवान धर्मराज की अदालत में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

सोचा ही नहीं था उसने , उसको तो लोग भगवान का दूसरा रूप ही मानते हैं , इक दिन उसे भी धर्मराज की अदालत में कटघरे में खड़ा किया जायेगा। और हिसाब लिया जायेगा अपने सारे कर्मों का , अपने हर कर्म को उम्र भर उचित ही माना है उसने। भला भगवान से कोई पूछता है उसने कुछ सही किया गलत किया , धरती पर तो उसको हर जगह विशेषाधिकार मिलते थे। न्याय करने की हर सरकारी जगह उसको न्याय देने वाला अपने बराबर कुर्सी पर बिठाया करता था , आखिर उसको भी मालूम ही होता था डॉक्टर की ज़रूरत कभी भी पड़ सकती है। हर कोई उसको हाथ जोड़ नमस्कार किया करता था सब जगह। धर्मराज ने पहला सवाल यही किया हे मनुष्य तुमने क्या क्या उचित कर्म किये क्या क्या अनुचित क्या याद हैं। डॉक्टर की आत्मा ने जवाब दिया मुझे अच्छी तरह याद है मैंने हमेशा बहुत अच्छे काम ही किये हैं , मैंने कितने लोगों की सेवा की है उनको रोगमुक्त किया है। धर्मराज बोले वह करना तो आपका कर्तव्य था आपने उस सब के लिए वेतन लिया सरकार से या फिर अपने हॉस्पिटल में अपनी फीस ली। मगर क्या आपने बदले में वही किया जो ईमानदारी पूर्वक आपको करना चाहिए था। आपने इक शपथ भी ली हुई थी , और आपने जाने क्या क्या तख्ती लगा रखी थी अपने बारे में अपने यहां उपलब्ध सेवा को लेकर ही नहीं ईश्वर की मूर्ति तस्वीर और बड़ी ऊंची आदर्शवादी बातें लिख कर। आप जो होने का दावा कर रहे थे क्या आप वही थे वास्तव में , आप कोई अनपढ़ नहीं थे अनजान नहीं थे पढ़े लिखे जानकर थे और खूब समझते थे अच्छा क्या है और बुरा किसको कहते हैं। आप की कहानी आपको फिर से याद दिलानी है ताकि आपको पता चले कि आज यहां आपको वास्तव में इंसाफ दिया जाना है आपके अच्छे और बुरे सारे कर्मों का हिसाब देखकर। और इक बात और समझ लो इस अदालत में ऐसा नहीं किया जाता कि अच्छे कर्मों का ईनाम जमा किया और बुरे का क़र्ज़ नाम लिखा और उसके बाद गणित लगाया क्या बचता है खाते में बनिये वाली बही की तरह। यहां अच्छा किया उसके अलग हिसाब और जो बुरा किया उसका अलग हिसाब किया जाता है। आपने जो किया संक्षेप में बताता हूं क्योंकि बाकी आप भी समझ सकते हो। 
 
                        आप डॉक्टर बन गए और सरकारी हॉस्पिटल में नौकरी मिली आपको , आप कभी समय पर हॉस्पिटल नहीं पहुंचे , आपने हॉस्पिटल जाने से पहले घर पर न केवल अनुचित ढंग से रोगी से पैसे लिए इलाज करने को बल्कि आपने तमाम लोगों से ऑप्रेशन की फीस भी वसूली जब कि आप सरकारी डॉक्टर थे। हैरानी की बात है कि तब भी आप मंदिर जाकर धार्मिक होने का दावा किया करते थे। आपने अपनी ड्यूटी अपने बड़े अधिकारी से मिलकर उस विभाग में लगवाई जिस में पुलिस केस वाले लोग आते और आप रिश्वत लेकर उनकी मर्ज़ी की रिपोर्ट लिखा करते थे। आपको वो सब करना कभी गलत नहीं लगा , रात को आपकी ड्यूटी होती तो आप अपनी जगह नहीं मिलते बल्कि कहीं जाकर सोया करते और आपकी जगह कोई चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी रोगी देख उनके स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया करता था। आपने इस तरह काली कमाई कर बहुत धन जमा कर लिया और फिर अपना निजि हॉस्पिटल बना लिया। आपने कभी किसी देश के कानून का आदर नहीं किया , अपना हॉस्पिटल भी आपने हर कायदे कानून की अवेहलना कर बनाया। आपने सड़क और फुटपाथ पर अनधिकृत कब्ज़ा किया अपने सामान को अपनी जगह में नहीं रख कर बाहर रखा। आपने बिना पूरी व्यवस्था किये गंभीर रोगियों के इलाज का दावा किया जबकि आपके पास उपचार का पूरा प्रबंध नहीं था। आपने अप्रशिक्षित लोग रख स्वास्थ्य सेवा के नाम पर रोगियों की जान को खिलौना समझ केवल पैसा बनाने को जो भी किया आप जानते हैं वो कितना गंभीर अपराध था। आपने कितनी बार रोगी को ध्यानपूर्वक देखना तक ज़रूरी नहीं समझा , बिना ज़रूरत उनके टेस्ट कराये बिना ज़रूरत एडमिट किया दवाएं लिखीं अपनी कमाई को , यहां तक कि आपने जानबूझकर घटिया दवाएं बिकवाईं अपने हॉस्पिटल में। आपने क्या क्या नहीं किया , आपके पास को ज़हर खाकर आया तो उसकी जान बचाने की बात से पहले आपने उसके घर वालों से अनुचित रूप से बहुत पैसा लिया ताकि उनकी सूचना पुलिस को नहीं देनी। आप इक अपराधी की तरह आचरण करते रहे और खुद को सभ्य नागरिक मानते रहे। याद करो जब कोई दुर्घटना का शिकार घायल आपके पास लाया गया तब आपने क्या किया। आपने किसी दलाल की तरह उन को बताया कि आपका ऑप्रेशन का खर्च तीस हज़ार आएगा जो आपको नहीं देना आपका जिस वाहन से टकराव हुआ उस से मांग कर मुझे दिलवाना है। मगर जब दूसरा पक्ष सामने आया और उसने बताया कि सब ने देखा गलती खुद इनकी ही थी हम तो मानवता की खातिर इसको हॉस्पिटल लेकर आये  हैं। ये बेशक एफ आई आर लिखवा दे हम साबित कर सकते दुर्घटना खुद इसी की गलती से हुई। और हमारे पर ड्राइविंग लाइसैंस और बीमा दोनों हैं , तब आपने बताया ऑप्रेशन ज़रूरी नहीं था पर जब रोगी को सलाह दे चुके तब करना तो होगा मगर उसकी फीस तीस हज़ार नहीं दस हज़ार ही होगी। आप डॉक्टर होकर ब्लैकमेलर की तरह काम करते रहे हैं। आपने कभी सोचा आपकी गलती से कितने रोगी जान से हाथ धो बैठे , आपने कभी मुफ्त कैंप की आड़ में कभी किसी और ढंग से रोगियों को छला है , कभी किसी को बाहर बड़े हॉस्पिटल में भेज कमीशन खाई तो कभी किसी अपने से छोटे डॉक्टर को या झोला छाप को कमीशन दी। 
 
             जब विश्व स्वास्थ्य संगठन के बार बार अनुरोध पर देश की सरकार ने कोई नियम कोई कानून बनाना चाहा ताकि रोगियों को स्वास्थ्य सेवा उचित तरीके से मिल सके तब आपको जनहित की बात अपनी मनमानी के खिलाफ लगी क्योंकि आपने असूल और मानवता के नियम को कभी समझा नहीं माना नहीं। हमारे पास कोई सॉफ्टवेयर नहीं जो आपके पल पल का हिसाब लगा झट से बताता। मगर इतना स्पष्ट है आपने जो भी किया खुद अपने पेशे को कलंकित ही किया। भगवान कहलाने की आड़ में आपने हैवानियत तक को शर्मसार किया है। अब आपको बहुत जन्म तक गंभीर रोगों का रोगी बन अपने कर्मों का हिसाब चुकाना होगा। बेशक आपने बहुत रोगियों को स्वास्थ्य सेवा देकर उनकी भलाई भी की मगर उसकी कीमत आपने ज़रूरत से कहीं ज़्यादा वसूली जो खुद धर्म करना ही अधर्म बन गया। आपने लूट की आमदनी से बहुत मज़े किये हैं , अब आपको बीमार भी बनना है और बेहद गरीब भी जिसको ईलाज करवाने को रोज़ मौत की तरह जीना हो। आप को फिर भेजा उसी देश में जायेगा जिस में सरकार अभी भी जनता को स्वास्थ्य सेवा या शिक्षा देना अपना कर्तव्य नहीं समझती। विकास के नाम पर विनाश जारी है आज भी , उसी देश में आपको जीने होगा शोषण का शिकार बनकर और हर सुविधा से वंचित होकर। और ये निर्णय केवल आपके लिए नहीं , न सिर्फ डॉक्टर्स की बात है , और भी तमाम पेशे वालों की गति यही होने वाली है। आपको पहले से मालूम तो था अच्छे बुरे कर्मों का फल इक दिन मिलना ही है।



     

जून 06, 2017

POST : 658 आपके बिना साजन ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

           आपके बिना साजन ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

       मैं ऐसा सोचती थी या समझती थी कह नहीं सकती , मगर मानती ज़रूर थी साजन तुम बिन नहीं जी सकूंगी। जब भी कोई बात होती और मुझे या साजन को अलग होना होता तब यही कहते दोनों क्या करें मज़बूरी है दूर जाना है। दिल नहीं चाहता तब भी जाना ही होगा। अपने अपने मतलब की खातिर समझते थे यही प्यार है इक दूजे का साथ होना। उम्र बिता दी और सच कहूं इक बेगुनाह मुजरिम की तरह रही किसी ज़ालिम की कैद में। हर दिन एहसास करवाया जाता मुझ पर रोज़ उपकार किया जाता है , जबकि वास्तव में किसी की गुलामी खुद कबूल की थी जाने किस डर से। चार दिन पहले इक महिला ने लिखा अपनी फेसबुक पर कि महिला और परिंदे पिंजरे में रहते खुद को सुरक्षित समझते। मुझे हैरानी हुई पढ़कर भला कोई पंछी पिंजरे में खुश रह सकता है। कोई महिला दिल से किसी की गुलाम बन खुश हो जी सकती है। शायद उस को अपने पति के नहीं रहने का दुःख होगा , मगर मैंने कई महिलाओं को देखा उनको जीना आया ही तब जब किसी कारण उनके जीवन साथी नहीं रहे या अलग हो गए। घुट घुट कर जीने से अच्छा है आज़ाद हो खुद ज़िंदगी से लड़ना। अभी तक आप इसे किसी दुखियारी की व्यथा समझे तो आप नहीं समझे , ये किसी अबला नारी की बात नहीं है। आज देश भर में डॉक्टर्स हड़ताल पर हैं , आज मुझे समझना मैं रोगी होती तो मुझे इस से क्या होता , क्या मैं इलाज नहीं मिलने से मरती या इलाज ही से मौत आती। क्योंकि मौत आनी है आएगी इक दिन जान जानी है जाएगी इक दिन , ऐसी बातों से क्या घबराना।
 
         टीवी पर देखना आपको हाहाकार होने की खबरें देखने को मिलेंगी दिन भर। शाम तक अख़बार वाले बता देंगे कितने लोग मर गए आज बिना इलाज मिले। क्या इलाज होता तो नहीं मरते किसे खबर , अभी तक तो कोई ज़िंदा बचा नहीं दुनिया भर में। धनवान लोग कभी नहीं मरते अगर पैसे और इलाज की सुविधा से मौत से बचा जा सकता। आपको बता देना ज़रूरी है ये बात मैंने गांव के इक बनिये से सुनी थी जो किसी क़र्ज़ मांगने वाले को समझा रहा था अगर तुम सोचते हो पैसे मिल गए तो किसी अपने को बचा लोगे तो बताओ ये जो चौधरी हैं गांव के अपने दादा जी को मरने देते। लाख टके की बात थी मैंने गांठ बांध ली , जीना मरना किसी के बस में नहीं है। अब अगर किस्मत में लिखा है डॉक्टर के हाथ से मरना तो इलाज को पैसे भी मिल ही जायेंगे अन्यथा मौत तो कीमत मांगती नहीं। लेकिन आज इक बात का अध्यन किया जा सकता है , वो इसका कि आंकड़े देख तय किया जाये आज कितने लोग मौत की गोद में समाए और कितने पिछले दिन जब डॉक्टर्स काम पर थे। सोचो कहीं ये सच सामने आया कि आज पहले से कम की मौत हुई तब क्या होगा , डॉक्टर तक हैरान हो सकते हैं। जिनको बचना है ऊपर वाला बचा ही लेता है और जिनकी मौत का इल्ज़ाम  किसी रोग को देना उनको भेज देता हॉस्पिटल।

       साजन आपने बिना किसी का कुछ नहीं होगा मगर अगर आपके पास रोगी नहीं आएं उनकी भी हड़ताल हो जाये तब आपका जीना कठिन नहीं असंभव हो जायेगा। ये भला क्या बात हुई , इक कहावत है गिरी थी गधे के ऊपर से और लड़ पड़ी थी कुम्हार के साथ। आपको शिकायत सरकार से कि आपको किसी नियम कानून में अपना कारोबार करने को कानून बनाना चाहती है और आप सरकार का कुछ नहीं कर सकते तो रोगियों की जान आफत को लाना चाहते। आगे कुछ कहना  नहीं उचित आप खुद समझ लो , अपने पांव को काहे कुल्हाड़ी पे मारते हैं। रोगी नहीं अपने जीने की सोचो ज़रा। अंत में सभी को इक काम की बात कहनी है। मौत से डरने की ज़रूरत नहीं है , मौत बड़ी खूबसूरत होती है , ज़िंदगी कभी खूबसूरत नहीं होती। जीना है तो मौत का डर दिल से निकाल फिर देखो क्या है जीना।
 

                            मौत तो दरअसल एक सौगात है

                          हर किसी ने उसे हादिसा कह दिया।


जून 05, 2017

POST : 657 जीवन की कविताएं - डॉ लोक सेतिया

           जीवन की कविताएं   -   डॉ लोक सेतिया

    1 जन्म 

मिट्टी के ढेर तले 
दफ़्न होती सांसें 
पल-पल  इक मां 
 
कड़ी मेहनत से मिट्टी को 
हटाती रहती है निरंतर  
 
जन्म देती है इस तरह
मासूम नन्हीं सी जान को। 

2 संघर्ष 

ये कौन है जो समझता है कि 
मैंने दिया है जीवन इसे 
 
पिता हूं पालक हूं मैं
इसको जीना है मेरे लिए

उस तरह जैसे मैं चाहूं
कब खत्म होगा यह 
 
रिश्तों का कड़ा संघर्ष । 

3  ज़िंदगी 

अग्रिम भुगतान देने वाली
बाद में कीमत चुकाने वाली

दो तरह की है ज़िंदगी ।

सांसों को चलाने के लिए
चुन लें जो भी सस्ती लगे

बार बार खरीदें वैधता

चाहे हर मास भुगतान करें
प्रीपेड पोस्टपेड फोन की तरह ।

4   अंजाम 

सौ बरस जीने का अरमान
हर दिन मरने का सामान  
 
चाहते जाना उस दिशा 
इस तरफ आओ का फरमान  
 
खो रहे सब कुछ मगर 
पाया है बस यही अभिमान  
 
भरा खज़ाना खाली दोनों हाथ  
फैला हुआ है इक रेगिस्तान । 

5  दुनिया 

बेरहम सी बला , 
नहीं करती कभी भला 
 
बेचैन करती रहती , 
थमता नहीं सिलसिला 

स्वर्ग का जगा अरमान , 
बेचती मौत का सामान

नर्क की दे दे सज़ा ,
खूब लेती है मज़ा

मिले उन्हीं से दर्द हैं , 
कहते जो हमदर्द हैं

कोई ठौर रहने को नहीं , 
जीना यहीं मरना यहीं ।

6 क्षणिका 

कहानी नहीं ग़ज़ल नहीं 
इक घटना की है लघुकथा  
 
निर्धारित हैं दो पन्ने डायरी के 
पहला भी  अंतिम भी  लिखा हुआ 
 
बीच में लिखनी सब  बात अपनी 
 
उपन्यास आपको लगती है 
ज़िंदगी है वास्तव में क्षणिका ।

7  शराब कर लेते 

नीयत थोड़ी खराब कर लेते 
सरकती रुख से नकाब कर लेते 
 
खत में गुलाब भेज देते 
कुछ बराबर हिसाब कर लेते
 
देख कर होश खो जाते 
नज़रों को वो शराब कर लेते । 
 

 

 

जून 04, 2017

POST : 656 हमारी मांगे पूरी करो ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया ( कविता ) - हास्य व्यंग्य

            हमारी मांगे पूरी करो ( हास - परिहास )

                        डॉ लोक सेतिया ( कविता ) 

सब एक साथ नारे लगाते
हाथों में बैनर उठाये
सरकार के विरोध में
चल रहे थे आला अधिकारी
को मिल कर अपना विरोध
जताने को देने को इक विरोध पत्र ।

अधिकारी से पहले से ही समय लेकर
आपस में खुल कर चर्चा की थी
नहीं बनाने देना ऐसा नया कोई कानून
जो अंकुश लगाए हमारे काम
जब जैसे मर्ज़ी हमेशा की तरह
निर्बाध रूप से करने पर रोक लगाए ।

देख कर उनको लगता था जैसे
आंदोलन करने नहीं कोई जंग लड़ने को
सीना ताने चल रहे हैं सब के सब
आर-पार की लड़ाई लड़ने को ।

लगता था आज उस अधिकारी की
खैर नहीं जिसको मिलने जा रहे
संगठन बनाकर सभी एक साथ
मगर जब सचिवालय पहुंचे तब
आला अधिकारी के सचिव ने
दफ्तर से बाहर आकर बताया था
साहब कब से आप का इंतज़ार कर रहे
आपको हमेशा की तरह समर्थन देने को
आप में पांच सात लोग भीतर जाकर
विरोध पत्र दे सकते हैं ।

संगठन के ओहदेदार चले गए भीतर
और बाकी सब बाहर बैठ जलपान करने लगे
बाहर जो नारे लगा रहे थे अंदर जाकर
दोनों हाथ जोड़ कर आदर सहित
प्रणाम की मुद्रा में खड़े थे अधिकारी के सामने ।

स्वागत है आप सभी बंधुओं का आज यहां
बताएं अब क्या परेशानी है आपको
आपकी सहायता करना हमारे लिए
सरकार के लिए भी ख़ुशी की बात होगी ।

विरोध पत्र दिया गया पढ़ लिया साहब ने
पूछा कहें आपको किस बात की चिंता है
संगठन के प्रमुख ने समझाया सरकार
ठीक से पढ़ समझ लो तब करो विचार
हम सभ्य नागरिकों पर इतना अत्याचार ।

आपके नियम कानून तो बंद कर देंगे
हमारा निर्भय होकर करते रहना कारोबार ।
 
हंस दिए अधिकारी सुन उनकी बात को
बोलो आप लोग किस दुनिया में रहते यार
अभी तलक आपने किस किस नियम का नहीं तोडा
सब देख कर भी आंखें बंद रखती रही है सरकार ।

कब किया किसी नियम का सच में पालन आपने
अनधिकृत ढंग से घर दुकान भवन निर्माण क्या
नहीं किया हमेशा सभी आपने जब मर्ज़ी जैसे
हद से हद कभी कभी कहने को नोटिस मिला
शायद मज़बूरी में आपने कोई कर दिया जुर्माना भरा ।

आप को सब पता है धनवान हर कानून को रखता है
अपनी पतलून की जेब में खरीद कर निडर होकर
आपको पहले कभी अनधिकृत काम करते नहीं लगा डर
अब क्यों बेकार शोर मचा खुद को करते बेनकाब
जो नहीं जानते थे आपके किये कर्म कितने गलत
आपने खुद मचाया शोर हो गई सभी को खबर ।
 
अब अगर नहीं बनाया गया जनता की भलाई को
ज़रूरी ऐसा कानून तब होगी हाहाकार  बिक गई सरकार ।

आप बताओ कितने कानून बनाये हैं हर तरह के
दहेज बंद हुआ क्या  क्या रुकी बाल मज़दूरी
स्वच्छ भारत दिखा कहीं , हुई बंद रिश्वतखोरी
अपने देश में कानून बनते ही नहीं पालन करने को
हमने प्रदूषण वाहन के सभी नियम बनाये हैं
तोड़ने को जुर्माना भरने को छूट जाने को ।

बन जाने दो ये नया कानून भी सरकार का
सब बाकी नियमों की तरह साबित होगा बेकार सा ।

सब संतुष्ट होकर धन्यवाद देते निकले बाहर
आकर बाहरी जमा सदस्यों को सब समझाया
चले एक दिन मौज मस्ती की साथ बंद कर धंधे को
अब मत सोचो हमने क्या खोया और क्या पाया ।

आप जिस को समझ रहे कोई भूत है नज़र आता
असल में वो नहीं था कोई  था हमारा साया
गलती हमारी सूरत की नहीं कोई भी चाहे शक्ल जो
अपराध उस का जिस ने आईना लाकर हमें दिखाया । 
 

 

जून 03, 2017

POST : 655 मैं चाहे जो करूं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

          मैं चाहे जो करूं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

अभी तक किसी ने नहीं पूछा आप क्या क्या करते हैं , क्या वो सब जो किया अभी तक सही था। बस किसी भी तरह पैसा बनाया आपने बिना विचारे कि ये किसी अन्य के साथ कितना अनुचित है। आप ने कभी समझना ही नहीं चाहा कि आपके कई काम आपराधिक तरह के हैं। किसी नैतिक मूल्य का आपने पास नहीं रखा कभी , आपने इक पवित्र माने जाने वाले पेशे को इस कदर बदनाम कर दिया कि लोगों को हर मसीहा जैसे इक कातिल हो प्रतीत होने लगा। अपने व्यवसाय में आपने स्वार्थ में अंधे होकर हर सामाजिक कर्तव्य को अनदेखा किया , नियम कानून का पालन करना तो दूर की बात आपने उनको भी अपने हित साधने को दुरूपयोग किया। आपने डर दिखा कर , षड्यंत्र तक कर आपराधिक तत्वों का पक्ष लेकर बिचौलिया बन धन अर्जित किया। जब कभी आपके किसी हमपेशे व्यक्ति पर अनुचित काम करते हुए कोई परेशानी पेश आई आप सब संगठित हो गए ताकि जब आप भी अनुचित करते पाए जाएं तब बाकी सदस्य आपका भी बचाव करें। आपने किसी नियम किसी कानून का पालन नहीं किया अपना व्यवसाय करते हुए। अनधिकृत रूप से सब करना आपको अपना अधिकार लगने लगा और आप सब नियम जानबूझकर तोड़ते रहे। आपने जो करना था उस के विपरीत कार्य किये हैं सालों साल तक और हर गलत ढंग से काली कमाई जमा कर आपने मान लिया कि धनवान होने से कोई आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। आप अच्छी तरह जानते हैं आप सभी जो जो दावे करते हैं अपने पास आने वालों को उचित सेवा देने के वो रत्ती भर भी सच हैं नहीं। आपने मान लिया था आपके कृत्यों पर कभी कोई रोक नहीं लग सकती , हर बार आपके संगठन ने सरकार को अपने महत्व और अनिवार्यता का दबाव बनाकर अथवा मिलकर बहुत बड़ी राशि चंदे की आड़ में घूस दे कर भी आपके पर कोई नियम लागू करने नहीं दिया। काठ की हांडी जितनी आपने लगातार चढ़ाई उसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती।

            अचानक सरकार को विवश होकर सब बाकी व्यवसाय उद्योगों और कारोबारों की तरह आपके पेशे के लिए भी जनता की भलाई और लूट के व्यापार पर प्रतिबंध की खातिर कठोर नियम बनाने की ज़रूरत लगी तो आपको लगा ऐसा करना आप पर अन्याय होगा। आपको अपने स्वार्थ जनहित ही नहीं मानवीय मूल्यों से भी अधिक महत्वपूर्ण लगने लगे। और आपको लगता है सही ढंग से ईमानदारी से व्यवसाय करना आपके लिए संभव ही नहीं है। अगर आपकी तरह सभी को अपनी मर्ज़ी और सहूलियत से जो मर्ज़ी करने दिया जाये तब क्या होगा ये कभी विचार किया है। खेद की बात है हम सब से सभ्य और उच्च शिक्षित लोग किसी कानून का पालन नहीं करना चाहते और तब भी खुद को देश के अच्छे नागरिक कहते हैं। देश की खातिर हम करते क्या हैं , अपनी आय पर आयकर भी सही कभी नहीं देते। नेताओं के कारनामों पर आग बबूला होते हैं और अपने नियम कानून तोड़ने को अपनी विवशता कहते हैं।

                     हम कितने ईमानदार हैं और देश के प्रति कैसी निष्ठा रखते हैं इस पर हमारा विवेक कभी झकझोरता नहीं है हमको। हम जब टीवी पर देखते हैं कोई दृश्य तब हमारी संवेदना पल भर को जगती लगती है मगर दो मिंट बाद खुद उसी तरह का अनुचित कर्म हम बहुत आराम से कर रहे होते हैं। देशभक्ति हमारे लिए कोई भावना नहीं रही केवल इक दिखावा मात्र है। पाप पुण्य की हमने अपनी परिभाषाएं बना ली हैं अपनी सुविधा से। अपने सभी अपकर्मों को हमने सद्कर्म घोषित कर दिया है , अब कोई आकर साबित कर दे कि अभी तक आपने जो जो किया वो कितना अनुचित था ये नहीं स्वीकार करना चाहते। अर्थात हम चाहते हैं जो जो कोई अनुचित करता आया उसका अधिकार बन जाता है , और अपने गलत करने के अधिकार को हासिल करने को आप एकमत हैं। बेईमानी को खतरा है क्योंकि ईमानदार होना किसी को भाता नहीं इसलिए बेईमानी पर अंकुश नहीं लगाया जाना चाहिए। देश में कानून सख्ती से लागू होने ज़रूरी हैं बस हम पर कोई नियम कानून लागू नहीं होने देना है। हम सब के जैसे नहीं हैं , बहुत ऊपर हैं। 

 

जून 02, 2017

POST : 654 भिक्षा सरचार्ज का प्रावधान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

भिक्षा सरचार्ज का प्रावधान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

           इतना तो सभी पहले से ही जानते हैं कि देश को भ्रष्टाचार से निजात दिलाना ज़रूरी है। सामने भाषण में खुद को सेवक बताने वाले सब नेता और अधिकारी ऑफ द रिकॉर्ड ही सही मान लेते हैं कि हम सब जो कर रहे वह और जो भी हो देशभक्ति कदापि नहीं है। मगर उनकी मज़बूरी है देश की जनता के धन को लूटना और अपने घर भरना साथ अपने ख़ास लोगों को कोई ओहदा कोई साधन उपलब्ध कराना ताकि सरकारी गोदाम में कोई छेद उनको भी मिले पेट भरने को। आज तक हर सत्ताधारी नेता और हर अधिकारी यही कहता है वही इस कोड़ को मिटा सकता है , मगर वक़्त आने पर बेबस हो जाता है। आदत है कि जाती ही नहीं , हर शराबी की समस्या है छूटती ही नहीं मुंह को लगी हुई। जानवर तक जब आदमी का लहू चख लेते हैं तो उसका स्वाद उनको आदमखोर बना देता है। राजनीति आदमखोर बन चुकी है , सत्ता को गरीबों का लहू मुंह को लगा हुआ है , अब रहा नहीं जाता। आप चिंता नहीं करें कभी न कभी हर मर्ज़ की दवा मिल जाती है। मेरे पास इक नुस्खा है जो लिख कर देश की सरकार को भेजा है , सुना है ये नया प्रधानमंत्री जो अब उतना नया भी नहीं है , नई नई योजना रोज़ लागू करता है। देश को घोटालों और दलाली रिश्वतखोरी के मुक्त करवाने की फूलप्रूफ योजना बना भेज दी है , मुझे उस के लागू होने की पूरी उम्मीद है। संभावना को तलाश किया जाना ही नया कुछ करना होता है। ख़ास बात ये भी है इस में जनता तो खुश हो ही जाएगी साथ में उनका भी कल्याण होगा जो अपनी उचित आमदनी से गुज़र बसर कर पाने में कठिनाई महसूस करते हैं। 
 
            बस इक भिक्षा सरचार्ज का प्रावधान किया जाना होगा , रिश्वत की पुरानी परंपरा है। सैंकड़ों साल का इतिहास है , कभी इसे ईनाम नाम दिया जाता था और जनता अपना काम करा सरकारी कर्मचारी को आना दो आना बक्शीश दिया करते थे। कहते थे ये लो इस से मिठाई खा लेना , मिठाई शब्द सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है और इसका ध्यान कहां रहता है कि आपका कोई स्वाभिमान है , वेतन मिलता है अच्छा फिर भिखारी क्यों बनें। शुरू में एक प्याली चाय और बीड़ी से ईमान खरीद लेते थे लोग , और पाने वाला देने वाले को सलाम किया करता था , बदलते बदलते रिश्वत का सवरूप बदला और मंत्री अधिकारी और सरकारी बाबू भीख मांग कर नहीं अपना अधिकार समझ छीन के लेने लगे। अपने धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि जिन के पास सब कुछ हो तब भी और अधिक हासिल करने की लालसा या हवस रहती है वही सब से दरिद्र होते हैं। आप इनको भिखारी ही समझना जिनकी आमदनी है तब भी बिना रिश्वत गुज़र बसर नहीं होती। देश के बड़े बड़े अदाकार खिलाड़ी नामी लोग साधु संत भगवा वेशधारी भी दरिद्र ही हैं , सेठ साहूकार उद्योगपति तो भूखे होते ही हैं दौलत के। ऐसे सभी भिखारियों की भूख कभी खत्म नहीं होती। जब मुफ्त की हराम की आसान ढंग से कमाई की आदत पड़ गई तो उनका खुद पर इख़्तियार बाकी नहीं रहता। 
 
              देश में कानून बदलते रहते हैं , इक और सही। भिक्षा सरचार्ज का प्रावधान किया जाना चाहिए। नेताओं और अधिकारीयों को अधिकृत सरकारी भिखारी घोषित कर बड़ी आसानी से देश को भर्ष्टाचार मुक्त किया जा सकता है। हर मंत्रालय के बाहर हर अधिकारी के दफ्तर के दरवाज़े के पास भीख के कटोरे की तरह इक दान पेटी रखी जानी चाहिए। जनता को अपनी स्वेच्छा से देश हित में भीख देनी चाहिए , अगर ऐसा नहीं किया तो आपको देश विरोधी समझा जायेगा। लोग भीख यूं भी बढ़ चढ़ कर देते हैं। घूसखोरी किसी आपदा से कम नहीं है और आपदाग्रस्त लोगों की सहायता सभी करना चाहते हैं। सत्ता में अकाल रहता है हमेशा ज़मीर नाम की मौत होने से। नेता अफ्सर घबराएं नहीं उनको कमी नहीं होगी , अपने देश में रिवायत है खेत से इक गन्ना तोड़ने नहीं देते मगर गुड़ की भेली खुद ही दे देते हैं। दान देने ईनाम देने में अपनी बराबरी कोई नहीं कर सकता। यहां तक कि सरकारें भी जनता की समस्यायों में धन की कमी की बात कहने के बावजूद , दानवीर कहलाने को कितने आडंबर करती हैं। मगर अगर फिर भी आपको लगता है लोग दानपेटी में भिक्षा नहीं डालेंगे तब आप पेट्रोल अदि पर जैसे कई कर लगे हैं उसी तरह हर जगह भिक्षा सरचार्ज लगा सकती है। और इस से आया धन सभी अमला बांट सकता है , माना ये रिश्वत को कानूनी रूप देना होगा फिर भी विश्व में भ्रष्ट देशों में अपने स्थान की बदनामी तो नहीं होगी। भिक्षा देना तो पुण्य का काम है , सब मानते हैं। 
 

 

जून 01, 2017

POST : 653 मुंह नहीं छिपाते वो मुखौटा लगाते हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        मुंह नहीं छिपाते वो मुखौटा लगाते हैं ( तरकश )

                                           डॉ लोक सेतिया

इसको कायाकल्प कहते हैं , मेकअप से चेहरे को सुंदर बनाना। ठेठ गंवार को सूट बूट पहना साहब बना देना। महंगे ब्रांडेड कपड़े पहन शान दिखाना। गंगू राम जब जी आर बन जाता तब चाल तक बदल जाती है। लड़का लड़की की कुंडली तक का मिलान नाम भर बदलने से संभव है। एच यू डी ए अर्थात हरियाणा अर्बन डेवलप्मेंट अथॉरिटी का नाम बदल कर एच इस वी पी अर्थात हरियाणा शहरी विकास प्रारधिकरण होने से सब सही हो जायेगा। लगता है ऐसी राय किसी पंडित या ज्योतिष विशेषज्ञ ने दी होगी , इधर सरकारें भगवान के दर पर अक्सर जाती रहती हैं ताकि जो जो उन्होंने वादे किये हैं उनको समझ नहीं आता कैसे ठीक होंगे तब भगवान की शरण चले जाते हैं। ये अलग बात है भगवान तक उनको समझ नहीं पाए , कभी मंदिर याद आता है कभी सत्ता बड़ी लगती है। विभाग का नाम बदनाम बहुत है , हर अनुचित काम सहूलियत से हो जाता है और उचित काम लाख कोशिश करो तब भी नहीं होता जब तक सिफारिश या रिश्वत नहीं दी जाये। कभी लोग चोरी करते पकड़े जाने पर गांव तक छोड़ देते थे , आजकल लूट डाका डालते पकड़े भी जाएं तब भी गली तक नहीं छोड़नी पड़ती। विभाग वही लोग वही नियम कायदे वही जो जैसे जब चाहो बदल सकते हैं तब कैसे सब बंद होगा , अधिकारी फाइलों में सब करवाई दिखाते रहेंगे और वास्तव में अनाधिकृत कब्ज़े करने वालों से घूस हर महीने वसूल करते और बांटते रहेंगे। शायद रिश्वत का नाम भी कुछ और बदल दिया जाये। आजकल दलाली को कमीशन नाम देकर सब किया जाता है। डॉक्टर तक केमिस्ट से लैब से दवा बनाने वाली कंपनी से हिस्सा कमीशन या उपहार मांगते हैं और इस में अनुचित कुछ नहीं लगता। जब सब करते हैं तब हर बात सब को उचित लगती है , सब करते हैं बिजली चोरी कह कर रईस लोग बेशर्मी से खड़े रहते हैं।

        इधर सब कितना बदल चुका है , सन्यासी का भगवा चोला पहन हर कारोबार कर करोड़ों कमाते हैं , सत्ता पर आसीन होकर राज करते हैं , राष्ट्र की सेवा की राह चलते चलते सत्ता के मोहजाल में फंस जाते हैं।  कहते हैं देश की खातिर सब छोड़ दिया था , मगर सत्ता की चाह में भूल जाते हैं उम्र भर प्रवचन किये घर परिवार नहीं देश के बन कर रहना है। सत्ता मिलते देश और जनता की भलाई से अधिक महत्वपूर्ण दल या अपना तथाकथित परिवार लगता है। चले थे हरि भजन को ओटन लगे कपास। अपने अपनों को रेवड़ियां बांटते हुए याद तक नहीं आता सच और झूठ क्या है। सब त्याग भूल शान से जनता का धन अपने पर ही नहीं अपने झूठे विज्ञापनों पर बर्बाद करते हैं। सत्ता पाने से पहले जो कहते थे आचरण उसके विपरीत करते हैं। सरकार होने से यही लाभ तो मिलता है कल तक जो अनुचित था नियम बदल उसको उचित बना लेते हैं। लोग आह भर भी बदनाम हो जाते हैं और सरकार कत्ल भी करती है तो चर्चा नहीं होता। अब तो मीडिया वालों की ज़ुबान सिल दी गई है , विज्ञापनों की हड्डी डाल कर। हरियाणा सरकार ने भी बीस साल तक पत्रकारिता करने वालों को हर महीने दस हज़ार की पेंशन देने का निर्णय किया है। बीस साल कोई और कुछ भी करता रहा क्या उसको भी बराबरी का ये हक मिलेगा। जाने ये कैसे नियम हैं जो ख़ास वर्ग को अलग प्लॉट्स या सुविधा देने को बनते हैं जबकि संविधान हर नागरिक को समानता का हक देने की बात कहता है और हर सत्ताधारी यही शपथ लेकर मंत्री बनता है सब के साथ निष्पक्षता से राग द्वेष से दूर रहकर न्यायपूर्ण कर्तव्य का पालन करने को। समाज को बदलने की बात कहने वाले खुद बदल जाते हैं , काम नहीं बदलते आचरण नहीं बदलता , नाम को बदल रहे हैं। कपड़े और सौंदर्य प्रसाधन कितने महत्वपूर्ण हो गए हैं। चेहरा नहीं बदल सकते तो मुखौटा लगा रहे हैं।