Sunday, 12 June 2016

फिर से इक बार ( कविता ) 120 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

हमारी आंखों पर
बंधी हुई थी कोई पट्टी
और हम कोल्हू के बैल बन कर
रात दिन चलते गये चलते गये
पहुंचे नहीं कहीं भी
थे चले जहां से ,
रहे बस वहीं ही।
सोच रहे हैं अब
उतार फैंकें इस पट्टी को
और चल पड़ें
नई राह बनाने को जीवन की
ताकि बर्बाद न होने पायें
बाकी बचे पल जीवन के
शायद अभी भी
अवसर है हमारे पास
कुछ फूल खिलाने का
कुछ दीप जलाने का
कोई साज़ बजाने का
कोई गीत गुनगुनाने का।

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