Monday, 28 March 2016

वजूद की तलाश में ( कविता ) 115 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

जाने कहां खो गया हूं मैं ,
खोजना चाहता हूं अपने आप को ,
वापस चला जाता हूं ,
ज़िंदगी की पुरानी यादों में ,
समझना चाहता हूं दोबारा ,
किस मोड़ से कैसे मुड़ गया था ,
रास्ता ज़िंदगी की राह का कभी।
शायद चाहता हूं जानना ,
कि क्या होता अगर तब मैंने ,
चुनी होती कोई और ही राह चलने को ,
तब कहां होता मैं आज और क्या होता ,
मेरा वर्तमान भी और भविष्य भी।
लेकिन समझ आता है तभी मुझे ,
ये सच कि कोई कभी भी ,
लिखी हुई किताब को दोबारा पढ़कर ,
बदल नहीं सकता है लिखी हुई ,
इबारत को ,
गुज़रे हुए पलों को।
हो सकता है ,
मेरी ज़िंदगी की किताब में ,
बीते हुए ज़माने की ही तरह ,
पहले से ही लिखा हुआ हो मेरा ,
आने वाला कल भी भविष्य भी ,
शुरुआत से अंत के बीच ,
न जाने कब से भटकता रहा हूं ,
और भटकना है जाने कब तलक ,
अपने खोये हुए वजूद की तलाश में ,
मुझे।

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