Sunday, 1 November 2015

ज़िंदगी चाहती है ( कविता ) 111 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

चाहती है ज़िंदगी
अभी शायद
और बहुत कुछ दिखाना
तभी चलते चलते
थोड़ा सा थामकर
कहती है बार-बार
सोचो देखो समझो
क्या है हासिल
और हर विपति मुझे
कुछ और ताकत
देकर जाती है हमेशा।
मालूम होता है तभी
कौन कैसा है अपना-पराया
जो नहीं जान सकते थे
बर्सों में भी हम
ज़िंदगी का कठिन दौर
दिखा देता है ,
समझा देता है
चंद ही दिनों में।
नहीं सोचता हूं मैं
जीना है कब तलक
न कोई डर है मौत का
मगर चाहता हूं
समझना अपने जीवन की
सार्थकता
नियति ने जो भी तय
किया होगा मेरा किरदार
मुझे निभाना है उसे
निष्ठा से इमानदारी से।