Monday, 6 April 2015

ग़ज़ल - ( रात दिन साथ मिलकर चले किसलिये ) - लोक सेतिया "तनहा"

रात दिन साथ मिलकर चले किसलिये - लोक सेतिया "तनहा"

रात दिन साथ मिलकर चले किसलिये ,
फिर भी बढ़ते रहे फासिले किसलिये।

उम्र भर जब अकेला था रहना हमें ,
फिर बनाते रहे काफिले किसलिये।

देख कर लोग सारे ही हैरान हैं ,
इन बबूलों पे गुल सब खिले किसलिये।

हर किसी को बहुत कुछ है कहना मगर ,
चुप सभी लोग हैं , लब सिले किसलिये।

मिल के दोनों चलो आज सोचें ज़रा ,
दिल नहीं जब मिले , हम मिले किसलिये।

रोक लीं जब किसी ने हवाएं सभी ,
फिर ये पर्दे सभी खुद हिले किसलिये।

रौशनी को नहीं चाहते लोग जब
दीप "तनहा" तुम्हारे जले किसलिये।