Monday, 6 April 2015

ग़ज़ल
रात दिन साथ मिलकर चले किसलिये ,
फिर भी बढ़ते रहे फासिले किसलिये !

उम्र भर जब अकेला था रहना हमें ,
फिर बनाते रहे काफिले किसलिये !

देख कर लोग सारे ही हैरान हैं ,
इन बबूलों पे गुल सब खिले किसलिये !

हर किसी को बहुत कुछ है कहना मगर ,
चुप सभी लोग हैं , लब सिले किसलिये !

मिल के दोनों चलो आज सोचें ज़रा ,
दिल नहीं जब मिले , हम मिले किसलिये !

रोक लीं जब किसी ने हवाएं सभी ,
फिर ये पर्दे सभी खुद हिले किसलिये !

रौशनी को नहीं चाहते लोग जब
दीप "तनहा" तुम्हारे जले किसलिये !