Wednesday, 12 November 2014

कब तक तमाशाओं से बहलाएंगे देश को ( सवाल - तरकश ) डा लोक सेतिया

भाजपा को लगता है सत्ता की सीड़ी मिल गई है , हर रोग की एक ही दवा है मोदी नाम का जाप। सब यही रट रहे हैं , देश का शासन मिला अब राज्यों का भी मिलने लगा है। ऐसे में सत्ता हासिल करना ही कहीं इक मात्र ध्येय न बन जाये , बहुत मुमकिन है। सपनों से देश की जनता को छलते आये हैं हमेशा से ही राजनेता। कहीं फिर वही कहानी इस बार भी न दोहराई जाये , संभलना ज़रूरी है। चलो देखते हैं देश की सतसठ साल में जो बर्बादी हुई है उसके पीछे कारण क्या रहे हैं। इधर देश विदेश में काले धन की और घोटालों की राशि की बहुत बातें सुनाई दी हैं , मोदी जी का अवतार काफी हद तक इसी माहौल के कारण ही संभव हो सका है। मगर क्या मोदी जी सब बदल देंगे या कम से कम बदलना चाहते हैं। कुछ सवाल पहले याद रखने हैं।
क्या देश के गरीबों की गरीबी दूर होगी ?
क्या भूख से अब लोग नहीं मरेंगे ?
क्या शिक्षा सब को एक समान मिलेगी , शिक्षा का बाज़ार बंद हो सकेगा , क्या ये कारोबार और सिर्फ मुनाफे का कारोबार नहीं बना रहेगा ?
क्या सब को स्वास्थ्य सेवा एक समान मिला करेगी , क्या चिकित्साक्षेत्र की लूट थमेगी ताकि सही इलाज संभव हो सके या सारी सुविधायें धनवानों के लिये ही आगे भी सुरक्षित रहेंगी ?
क्या नौकरी काबलियत से मिला करेगी , बिना सिफारिश बिना रिश्वत ?
क्या प्रशासन न्यायकारी बन जायेगा , पुलिस जनता की मित्र बन सकेगी , इस विभाग को सुधारा जायेगा ताकि ये जनता का दमन न करके उसको सुरक्षा देने का कर्तव्य निभा सके ?
कोई ये न कहे कि आपने देश की सब से गंभीर बिमारी भ्र्ष्टाचार की बात ही नहीं की , तो उस पर पूरी चर्चा करते हैं। किसी भी योजना का धन अगर देश की जनता को नहीं मिलकर कुछ अन्य लोगों को मिलता है जिस से देश या जनता का कोई भला नहीं होता , और ही काम पर खर्च या बर्बाद किया जाता है तब उसको घोटाला कहते हैं। शायद बहुत लोग हैरान हों कि आज़ादी के बाद से इक ऐसा घोटाला देश की और राज्यों की सभी सरकारें करती आई हैं , वो है सरकारी प्रचार के अनावश्यक विज्ञापन। उनसे किसी को कुछ नहीं मिलता , मिलता है मुट्ठी भर अखबार टीवी वालों को मुफ्त का धन और नेताओं को झूठा प्रचार भी और मीडिया को अपने प्रभाव में रखने का रास्ता भी। यकीन करें इन विज्ञापनों पर इतना धन बर्बाद किया गया है जितना देश में आज तक हुए सभी घोटालों को देश विदेश में जमा काले धन की राशि में जोड़ कर भी नहीं हुआ है। लेकिन इसको रोकने की बात भला कौन करेगा , सच बोलने वाले ये सच कभी बोलते ही नहीं , पापी पेट का सवाल जो है। अभी बात हुई है किसी ने अपने किसी कार्यक्रम में देश के प्रधानमंत्री जी को क्यों नहीं बुलाया है। मुझे लगता है देश के प्रधानमंत्री को राज्यों के मुख्यमंत्रियों को ही नहीं सांसदों विधायकों और प्रशासन के बड़े अधिकारियों को मुख्य अतिथि बनने से अधिक ज़रूरी और बहुत काम करने चाहियें। मुझे याद है कुछ साल पहले हमें बाल भवन में साहित्य की मासिक सभा करने की मनाही इसलिये की गई थी कि हमने इक कवि सम्मलेन में उपायुक्त महोदय को मुख्य अतिथि नहीं बनाया था। क्या ये लोग जनता की संपत्ति को अपनी निजि जायदाद समझना छोड़ देंगे।
                       गंगा की सफाई की बात हो रही है , थोड़ी सफाई संसद की भी की जानी चाहिये। संविधान में तीन कार्यों के लिये तीन अंग बनाये गये थे , कार्यपालिका अर्थात प्रशासन का काम था देश के विकास और जनता की सुविधाओं पर आबंटित धन को इमानदारी से खर्च करना , विधायिका का काम था उसपर निगाह रखना और योजनायें बनाना बजट पारित करना , न्यायपालिका का काम था न्याय व्यवस्था कायम रखना। जिस दिन नरसिंहराव जी ने सांसदों को हर वर्ष विशेष निधि देने का प्रावधान रखा था उस दिन ही विधायिका ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर अतिक्रमण किया था जिसको तभी न्यायालय में चुनौती दी जानी चाहिये थी। मगर ये रोग ऐसा बढ़ता गया कि अब कोई प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री इसको रोकने को सोच भी नहीं सकता है। कौन नहीं जानता है कि ये राशि कैसे खर्च की जाती है , हर सांसद हर विधायक को जो हिस्सा देता है उसी ठेकेदार को ठेका मिलता है। यहां के पिछले विधायक ने तो खुद टाइलों की फैक्ट्री ही लगा ली थी और पांच साल तक हर विभाग उनकी टाइलें ही चौगुने दाम पर खरीदता रहा। मोदी जी क्या ये असंवैधानिक कार्य जो भ्र्ष्टाचार का बहुत बड़ा माध्यम भी है बंद कर सकते हैं। स्वच्छता की ज़रूरत आपके अपने घर को भी है , याद है संसद में प्रवेश करते समय माथा टेका था , मंदिर की पवित्रता को बखूबी जानते हैं नरेंद्र मोदी जी। कब शुरुआत करते हैं हम भी देखना चाहते हैं।  

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