Thursday, 30 October 2014

क्या सच में कुछ बदल रहा है ( आलेख ) डा लोक सेतिया

कई दिन के बाद लिखने को आया हूं ब्लॉग पर। सच कहूं तो खुद निजि बातों में खोया रहा कुछ दिन से और हर दिन लिखना छूट सा गया। हर लेखक के जीवन में ऐसा होता है कभी जब उसका ध्यान लिखने में नहीं रहता है। शायद एक महीना मैंने लिखने को लेकर सोचा ही नहीं। सत्ता बदली देश में भी राज्य में भी , समझ रहा था क्या जो बदलता हुआ लग रहा है वो वास्तव में बदल भी रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमेशा की तरह नाम ही बदलें बाकी सब वही चलता रहे। कुछ बातें नज़र आईं हैं जिनसे थोड़ा भरोसा हुआ है जनता को कि शायद अब सच में सब बदलने वाला है। डर लगता है कहीं फिर देश की उम्मीदें टूट न जायें , सत्ता ही बदले व्यवस्था जस की तस बनी रहे। कम से कम कुछ बातें तो हैं जिनको फिर से दोहराया जाने लगा है , आडंबर जो कोई और करता था किसी और रूप में वो कोई दूसरा नये ढंग से करता लग रहा है। कहां से शुरू की जाये बात , चलो आज के दिन से करते हैं।
          सरदार पटेल के नाम पर मैराथन दौड़ क्या है , कुछ सुविधा संम्पन लोगों का मात्र दिखावा नहीं क्या। क्या देश की जनता का इस से कुछ भला होने वाला है , क्या आम लोग शामिल होंगे ऐसे खेल में। कब तक आखिर कब तब यूं ही देश का धन फज़ूल दिखावों पर बर्बाद किया जाता रहेगा। महाराष्ट्र में शपथ ग्रहण समारोह पर ऐसा महंगा आयोजन किसलिये , समझना होगा भाजपा को उसको शासन का अधिकार मिला है या देश जनता की सेवा का। अंतर इतना सा ही है , सब मांगे देश और जनता की सेवा का अवसर हैं , मगर जब कुर्सी मिलती है तब शासक बन जाते हैं। बहुत अचरज हुआ जब जो कांग्रेस किया करती थी अपने सांसदों को बुला छप्पन प्रकार के व्यंजन परोसना वही मोदी जी ने भी किया। अगर सत्ताधारी ऐसे ही राजसी शान से रहते रहेंगे तब गरीब भूखा ही रहेगा , भाषण से पेट नहीं भरता।
            मैं कभी आगरा नहीं गया , ताजमहल मुझे हमेशा लगता किसी शासक ने जनता के खून पसीने की कमाई से अपना खज़ाना भर उसको अपनी ख़ुशी पर बर्बाद किया। शायद उस धन से लोगों को कितनी सुविधायें दी जा सकती थी। ये जो बुत , समाधियां बनाने का चलन है मैं इसको लोकतांत्रिक नहीं मानता , अभी भी सत्ताधारी खुद को देश का मालिक ही समझने लगते हैं। अन्यथा जिस देश की आधी जनता को दो वक़्त रोटी नहीं नसीब होती हो उस देश में मरने के बाद नेताओं की समाधियों पर धन कभी खर्च नहीं किया जाता। सोचो अगर वो नेता वास्तव में देश के और जनता के सेवक थे तो क्या उनको ऐसा किया जाना पसंद होता। काले धन की बात हो रही है , काला धन विदेशी बैंकों में ही नहीं है , नब्बे प्रतिशत देश में ही है ,उसको ढूंढने में उसपर अंकुश लगाने में कोई संधि बाधा नहीं है। क्या चाहती है सरकार रोक लगाना काले धन पर , मुश्किल नहीं है , एक कानून होना चाहिये हर नागरिक को बताना पड़े उसके पास क्या क्या है , घर ज़मीन , नकद , गहने या जो भी , और बिना घोषित कुछ भी हो उस को देश की संम्पति घोषित किया जाये। किसी को भी जितने भी चाहे घर खरीदने का अधिकार नहीं होना चाहिये ताकि जो बेघर हैं वही खरीद सकें। जो व्योपारी हैं उनको खेती की ज़मीन खरीदने का अधिकार किसलिये , काला धन सफ़ेद करने को। जब तक राजनेता खुद सादगी से नहीं रहते उनको गांधी का आलाप लगाने का कोई हक नहीं है। खुद को देश को जनता को धोखा देते रहे हैं नेता हमेशा , लेकिन कब तक। अभी भी भाजपा हो चाहे कोई दल सबका एक मात्र ध्येय सत्ता पाना ही है , और उसके लिये जो भी करना हो करते हैं। कुछ उसी तरह जैसे हम मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे बनाते जा रहे और जो वास्तविक धर्म है उसको समझना ही नहीं चाहते। लिखा बहुत जा सकता है मगर यहीं अंत करता हूं इस लेख का दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल के कुछ शेरों से।
   हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए ,
   इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
  सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं ,
  मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
  मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही ,
  हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।

No comments: