Thursday, 25 September 2014

एक नीति कथा ( इंसाफ )

एक नीति कथा। न्याय। 
कोई राजा था जिसका न्याय बिलकुल सही माना जाता था। एक बार एक साथ तीन लोग एक ही अपराध करते हुए पकड़े गये और राजा की कचहरी में पेश किये गये। राजा ने तीनों को अलग अलग सज़ा दी , ये देख इक मंत्री को अचरज हुआ।  तब मंत्री की दुविधा को समझ राजा ने उसको अपने तीन आदमी उन तीनों के पीछे भेजने को आदेश दिया ताकि समझ सके कि किस पर उसको दी गई सज़ा का क्या असर होता है।
       तीनों का पीछा करने वालों ने वापस आकर बताया जो उनको नज़र आया था। पहले एक व्यक्ति को राजा ने केवल इतना ही कहा था "आपने भी ऐसा अपराध किया " और कोतवाल को उसको छोड़ने का आदेश दे दिया था। उसका पीछा करने वाले ने आकर बताया था कि उसने घर जाते ही खुद को फांसी पर लटका ख़ुदकुशी कर ली थी।
                 दूसरे व्यक्ति को राजा ने ये सज़ा सुनाई थी कि वो भरी सभा में खुद अपनी पगड़ी उतार घर जा सकता है। उसका पीछा करने वाले ने बताया था की वो शहर को छोड़ कहीं और चला गया है , खुद को अपमानित महसूस कर के।
                        तीसरे को सज़ा सुनाई गई थी कि कोतवाल उसका मुंह काला कर नगर में सात चक्कर लगवाये। उसका पीछा करने वाले ने बताया था कि जब उसको नगर में घुमाया जा रहा था तब नगर के लोगों में उसकी अपनी पत्नी भी तमाशा देखने में शामिल थी अपने घर के बाहर खड़ी होकर। जब उसका पांचवा चक्कर लगवा रहे थे तब उस व्यक्ति ने अपने घर के पास से गुज़रते हुए अपनी पत्नी से कहा था कि क्या यहां खड़ी तमाशा देख रही हो , बस दो चक्कर बाकी हैं पूरे करते घर आता हूं तुम जाकर मेरे लिये स्नान का पानी गर्म करो।
                          मंत्री समझ गया था राजा ने उचित निर्णय किया था।
( नीति कथाओं के लेखक कौन थे ये नहीं पता चलता क्योंकि ये सदियों से इक दूजे की ज़ुबानी सुनी और सुनाई जाती हैं शिक्षा देने को )

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