Thursday, 31 July 2014

शुक्रिया मित्र याद रखने का मुझे ( कविता ) 105 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कब सोचा था ,
कभी सच होगा ये सपना भी ,
किसी को यूं ही किसी दिन ,
आयेगा ये भी ख्याल ,
कि जाने कहां खो गया ,
कोई दोस्त कई दिन से ,
और वो चला आयेगा ,
मेरे घर में पूछने हाल मेरा ,
लोग कहते हैं ,
आज के नये दौर में ,
भला किसे फुर्सत है ,
जो सोचे किसी दूसरे के लिये ,
मगर फेसबुक के दोस्तों में भी ,
मुझे रही है तलाश ऐसे ही ,
दोस्त की जो रखे याद ,
वो बात जो कही थी हमने ,
दोस्त बनते समय कि ,
हम हैं इक घर के सदस्य ,
जो रहते हैं बेशक दूर ,
मगर होता है एहसास ,
उनके करीब होने का ,
शुक्रिया मेरे फेसबुक के दोस्त।