Friday, 11 April 2014

ग़ज़ल 210 ( कल किसी ने किसी को खुदा कह दिया )

कल किसी ने किसी को खुदा कह दिया ,
क्या बताएं तुम्हें उसने क्या कह दिया।
ग़म इसी बात का दिल से जाता नहीं ,
बेवफ़ा ने , हमें बेवफ़ा कह दिया।
हम सभी के लिये मौत सौगात है ,
पर सभी ने इसे हादिसा कह दिया।
दिल का शीशा हुआ चूर जब एक दिन   ,
जिसने तोड़ा उसे दिलरुबा कह दिया।
खुद सफीना डुबोई थी उसने , जिसे ,
हर किसी ने यहां नाखुदा कह दिया।
नाम तक का मेरे , ज़िक्र करना नहीं ,
सिल गई इक जुबां आज क्या कह दिया।
तुम तड़पते रहो आ रहा है मज़ा ,
और "तनहा" इसे इक अदा कह दिया।