Tuesday, 31 December 2013

भ्रष्टाचार को बचा लो ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

अभी भी सोच लो वर्ना बाद में बहुत पछताओगे। अचार सब को पसंद होते हैं , दाल रोटी के साथ अचार भी ज़रूरी होता है। खाने का मज़ा कई गुणा बढ़ जाता है। वेतन तो दुल्हन की तरह है , और रिश्वत दहेज की तरह। अभी तक तो कोई बिना दहेज की दुल्हन नहीं चाहता। कोई जितना भी अमीर हो और कितना भी कमाता हो फिर भी क्या लड़की वालों के सामने दोनों हाथ ही नहीं पूरी झोली तक नहीं फैलाते सभी। क्या हो गया कानून बनने से और क्या बदल गया अच्छी शिक्षा अच्छी नौकरी मिलने से। देखा जाये तो यहां हर कोई भिखारी है , कोई भगवान से मांगता है कोई इंसान से।  कोई न मिले तो छीन लेना जनता है। कौन है जो दूसरों को देना चाहता हो बेशक उसके पास कितना भी अधिक क्यों न हो। डॉक्टर लोग जब अचार पर पाबंदी लगा देते हैं तब खाने का मज़ा ही नहीं आता , और अगर दुल्हन दहेज नहीं लाई हो अपने साथ तो वो भी कम ही भाती है ससुराल वालों को। रिश्वत को नाहक बदनाम किया गया है , ये एक विशुद्ध शाकाहारी चीज़ है जो लेने वाले से अधिक भला उसका करती है जो दे रहा होता है। जो दोनों का भला करे उसे बुरा बताना बुरी बात है। वास्तव में भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की बात वही लोग करते हैं जिनको खुद अवसर नहीं मिल पाता भ्रष्ट बनने का। और तब वे झूठा प्रचार करते हैं कि भ्रष्टाचार ने देश का बंटाधार किया है। सच पूछो तो देश का उद्धार करने के लिये भ्रष्टाचार भी उतना ही ज़रूरी है जितना विश्व बैंक या आई एम एफ से क़र्ज़ लेना। हमारे देश की कोई बड़ी परियोजना बिना कोई क़र्ज़ लिये शुरू ही नहीं हो सकती न ही बिना रिश्वत के लालच के इस देश का प्रशासन कभी कुछ करना ही चाहता है। जिस तरह गंगा लाख पापियों के स्नान करने के बाद भी पावन ही रहती है उसी तरह भ्रष्टाचार भी तमाम रुकावटों विरोधों के बावजूद भी फलता फूलता रहता है। हमारे देश के नेताओं और अफसरों ने भ्रष्टाचार में कितने ही नये आयाम स्थापित किये हैं जिससे भारत देश विश्व में किसी भी दूसरे देश से कभी पीछे नहीं रह सकता। इसके लिये कभी पदक मिलने लगे तो सवर्ण , रजत , कांस्य सभी अपने ही नाम पर होंगे। जैसा कि आप जानते हैं कुछ लोग फिर से भ्रष्टाचार को मिटाने की बात करने लगे हैं। पहले भी होता रहा है ऐसा। मगर ये उचित नहीं होगा , भ्रष्टाचार को किसी से भी कोई खतरा नहीं है , लेकिन जिस दिन देश से भ्रष्टाचार का खात्मा हो गया उस दिन जाने क्या होगा। जिस तरह दमे का मरीज़ बिना दमे की दवा एक पल जिंदा रह नहीं सकता उसी तरह ये देश बिना भ्रष्टाचार कैसे रहेगा ये सोच कर भी डर लगता है। कभी ये ऐलान किया गया था कि गरीबी को खत्म करेंगे और सरकार के आंकड़े हमेशा गरीबी की रेखा से नीचे के लोगों को कम होता बताने का ही काम करती रहती है , फिर भी गरीबों की संख्या कभी कम नहीं हो सकी है। आज जब विवाह करना हो तो वेतन से पहले ऊपर की कमाई के बारे पूछा जाता है। इस महंगाई में वेतन से गुज़ारा करना बहुत ही कठिन है।
                                      मगर सब से ज़रूरी बात और है , ये जो हर कोई नेता बनना चाहता है और उसके लिये सब जोड़ तोड़ करता है वो किसलिये। अगर भ्रष्टाचार के अवसर नहीं होंगे तो कौन मूर्ख नेता बन जनता की सेवा करना चाहेगा। और जब नेता नहीं होंगे तो लोकतंत्र का क्या होगा। इसलिये नेता और भ्रष्टाचार दोनों को बचाना होगा , इनका आपस में बेहद करीबी रिश्ता है। पता नहीं कौन किसकी नाजायज़ औलाद है। अब तो कानून भी मानता है कि नाजायज़ औलाद को भी सभी अधिकार मिलने चाहिएं । कहीं ऐसा न हो कि भ्रष्टाचार को मिटाते मिटाते हम नेता नाम की प्रजाति को ही मिटा बैठें। जब किसी प्रजाति के लुप्त होने का खतरा हो तब उसको संरक्षण दिया जाता है , शायद कल नेता और भ्रष्टाचार दोनों को संरक्षण की ज़रूरत आन पड़े। नेताओं के बिना हमारा लोकतंत्र भी अनाथ न हो जाये। सब जानते हैं कि आज तक देश में कोई भी ऐसा कार्य नहीं हुआ है जिसमें भ्रष्टाचार नहीं हुआ हो , सच तो ये है कि नेता और अफसर अभी तक विकास का हर काम करते ही इसलिये रहे हैं कि उनके खाने पीने का समुचित प्रबंध हो सके। जिस काम में भ्रष्टाचार की संभावना न हो उसे कोई करना ही नहीं चाहता। जब भ्रष्टाचार समाप्त हो गया तो कौन विकास के काम करना चाहेगा , गरीबी और भूख की तरह हर योजना अधर में लटकती रहेगी। अपने अफसर और मंत्री अभी भी फाईलों को दबाये रहते हैं अपने पास या इधर उधर सरकाते रहते हैं लेकिन फैसला नहीं करते। जब कुछ मिलना ही नहीं होगा तो कौन फैसला करने का सरदर्द अपने ऊपर लेना चाहेगा। सब सोचेंगे जाने कब कुछ गड़बड़ हो जाये और उनपर कोई मुसीबत आ जाये। और विकास के काम रुकने से देश व जनता को कुछ हो न हो उसका पहला असर दलालों कमीशनखोरों और ठेकेदारों पर होगा ही , क्या ये सब के सब भी लुप्त प्रजाति के प्राणी बन जाएंगे। लगता है जो भ्रष्टाचार का विरोध कर रहे हैं उन्होंने सोचा तक नहीं कि इसके क्या क्या दुष्प्रभाव किस किस पर हो सकते हैं। यूं भी जिस तरह हम लोग चाय , सिगरेट , शराब , सिनेमा और आजकल केबल टीवी के आदि हो चुके हैं और इनमें लाख बुराईयां होने पर भी इनको छोड़ कर नहीं रह सकते हैं , उसी तरह हमारी रग रग में भ्रष्टाचार समा चुका है , इसको ख़त्म कर हम कैसे जी सकेंगे। बेहतर यही होगा कि भ्रष्टाचार मिटाने की बात को भूल जायें। खाओ और खाने दो की आदर्श परंपरा को क्या इतनी आसानी से छोड़ा जा सकता है। 

No comments: